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क्या अड़चन है न्यायिक नियुक्तियों में

कॉलेजियम और केंद्र के बीच एक गुत्थी से पैदा काहिली हाइकोर्ट के जजों के खाली पदों को भरने में बनी बाधा, जबकि बढ़ता ही जा रहा है लंबित मुकदमों का अंबार.

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न्यायपालिका में खाली पद न्यायपालिका में खाली पद

यह एक बड़ा मौका था जब लोकतंत्र के दो स्तंभ—कार्यपालिका और न्यायपालिका—भारत में तेज और समावेशी न्याय मुहैया करने का ढांचा खड़ा करने के लिए साथ आए. पांच साल के अंतराल के बाद 30 अप्रैल को दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा भारत के प्रधान न्यायाधीश एन.वी. रमण की ओर से संबोधित मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन ने देश के न्यायिक तंत्र के सामने मौजूद सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक को उजागर कर दिया और वह थी न्यायाधीशों और खासकर हाइकोर्ट के जजों की गंभीर कमी.

भारत के कुल 25 हाइकोर्ट में जजों के 1,104 पद हैं, पर 31 मार्च, 2022 को उनमें से 378 खाली थे. सम्मेलन के बाद नौ नए जजों की नियुक्ति हुई. निचली अदालतों में जजों के 24,521 पद हैं, पर 7 अप्रैल, 2022 को 5,180 पद भरे जाने थे. असल में, सभी हाइकोर्ट में खाली पदों का हिस्सा 2014 में—जब नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार ने केंद्र में बागडोर संभाली—29 फीसद से छलांग लगाकर अब 35 फीसद पर पहुंच गया है.

वह भी इस तथ्य के बावजूद कि 2014 और 2021 के बीच केंद्र हर साल हाइकोर्ट के औसतन 92 जजों की नियुक्ति करता रहा है, जबकि 2006 और 2014 के बीच यह आंकड़ा महज 76 था. यही नहीं, 2014 के बाद केंद्र सरकार ने हाइकोर्ट के जजों के 198 नए पद बनाए हैं. निचली अदालतों में भी सरकार ने बीते आठ साल में जजों के 5,000 से ज्यादा पद बढ़ाए, जिससे उनकी कुल तादाद 24,521 हो गई और उनमें से कई नियुक्तियां भी कीं. इसकी बदौलत अदालतों में खाली पदों का हिस्सा 2014 में कुल स्वीकृत पदों के 23 फीसद से घटकर अब 21 फीसद पर आ गया है.

इसमें कोई शक नहीं कि लगातार बढ़ते खाली पदों की वजह से न्यायपालिका पर बोझ और ज्यादा बढ़ गया और मुकदमों का लगातार बढ़ता भार कई गुना हो गया है. विभिन्न अदालतों में करीब 4.8 करोड़ मामले लंबित हैं और हरेक जज के पास औसतन 2,356 लंबित मुकदमों का भार है. प्रधान न्यायाधीश रमण बताते हैं कि निचली अदालतों में जजों की 16 प्रतिशत बढ़ोतरी के बावजूद 2016 में पिछले सम्मेलन के बाद मुकदमों की तादाद में 55 फीसद का इजाफा हुआ. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा कहते हैं, ''जजों की भर्ती में देरी की वजह से मौजूदा जजों पर काम का बोझ बढ़ जाता है और इसका बुरा असर उनकी कार्य दक्षता पर पड़ता है. हमारे ज्यादातर जज रोस्टर को साफ करने और साफ रखने के लिए काम कर रहे हैं.’’ 

ऐसे होती है हाइकोर्ट के जजों की नियुक्ति

सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्ट में न्यायिक नियुक्तियां मोटे तौर पर मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) से शासित होती हैं जो 1998 में तैयार कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सहयोगात्मक रूपरेखा है. हाइकोर्ट में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया हाइकोर्ट कॉलेजियम (जिसमें मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ जज होते हैं) की तरफ से नियुक्ति के नामों की सिफारिश के साथ शुरू होती है. ये सिफारिशें फिर राज्य सरकार, इंटेलिजेंस ब्यूरो (आइबी) और केंद्रीय कानून मंत्रालय को भेजी जाती हैं.

स्वीकृति के बाद मंत्रालय इन्हें मंजूरी के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम (जिसमें भारत के प्रधान न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के अन्य बड़े जज होते हैं) को भेजता है. सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम अंतिम सिफारिशें कानून मंत्रालय को भेजता है. सरकार को आपत्ति होने पर नाम पुनर्विचार के लिए कॉलेजियम को लौटाए जाते हैं. अगर वह अपनी सिफारिश दोहराते हुए नाम वापस भेज देता है तो सरकार नियुक्ति के लिए बाध्य होती है.

मौजूदा एमओपी के तहत हाइकोर्ट कॉलेजियम को पद खाली होने के छह महीनों के भीतर नए नाम की सिफारिश करनी होती है. मौजूदा एमओपी में कोई समयावधि स्पष्ट नहीं की गई है कि कानून मंत्रालय को कितने समय में सिफारिश सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को भेजनी होगी, पर सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में इस प्रक्रिया के पूरा होने के लिए 18 महीने की समयावधि तय की.

आइबी को आठ हफ्तों के भीतर नामों पर अपना इनपुट देना होगा और आइबी का इनपुट मिलने के बाद कानून मंत्रालय को चार से छह हफ्तों के भीतर नामों पर प्रक्रिया पूरी करनी होगी. एमओपी में निर्धारित समय सीमा के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को अगले चार हफ्तों में अपनी अंतिम सिफारिश केंद्र को भेजनी होगी. 

अगले तीन हफ्तों में केंद्रीय कानून मंत्री को हाइकोर्ट के संभावित जजों के नाम प्रधानमंत्री के समक्ष रखने होंगे, जो उन्हें नियुक्ति की सलाह के साथ राष्ट्रपति को भेजेंगे. प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के काम के लिए समय सीमा निर्धारित नहीं है. केंद्र सरकार कोई नाम पुनर्विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को लौटा सकती है, पर अगर कॉलेजियम उसी नाम को दोबारा भेजता है, तो नियुक्ति तीन से चार हफ्तों के बीच कर दी जानी चाहिए. पहले कॉलेजियम की ओर से नियुक्ति के लिए नाम दोबारा भेजने के मामले में एमओपी में कोई समय सीमा तय नहीं थी.

कागजों पर प्रक्रिया ऐसी दिखाई देती है, पर इसमें शामिल कोई भी संस्था समय सीमाओं का पालन नहीं करती. अधिकांश कानूनी पर्यवेक्षक इस पर सहमत हैं कि नामों पर सर्वानुमति बनाने में हमेशा वक्त लगता है. जज बनने के आकांक्षी को न केवल कॉलेजियम की कड़ी जांच में उत्तीर्ण होना होता है बल्कि कार्यपालिका की छानबीन में भी टिकना होता है. यह अंतिम जांच उनके परिवार के राजनैतिक संबंधों, पिछले जीवन और किन्हीं भी अन्य 'चयन संबंधी विवरणों’ पर निर्भर होती है, जो कभी लोगों के सामने नहीं आ पाते हैं. अपने फैसलों और सिफारिशों के सप्रमाण कारण न तो कभी केंद्र सरकार बताती है और न ही कॉलेजियम प्रणाली.

पहला सुस्त कदम
देरी सबसे पहले हाइकोर्ट कॉलेजियम के स्तर पर ही शुरू हो जाती है. पद खाली होने के छह महीने पहले नामों की सिफारिश की समय सीमा का विरले ही पालन किया जाता है. मार्च अंत तक जहां हाइकोर्ट में जजों के 378 पद खाली थे, उनमें से 219 के लिए हाइकोर्ट कॉलेजियमों से नामों के प्रस्ताव ही नहीं आए थे.

भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी की अध्यक्षता में कार्मिक जन शिकायत, कानून और न्याय मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने हाल में हाइकोर्ट कॉलेजियमों की ओर से नामों की सिफारिश में देरी पर खिन्नता जाहिर की, बावजूद इसके कि पद खाली होने की तारीख न्यायाधीश के काम संभालने के दिन ही पता होती है.

मुख्य न्यायाधीशों के 39वें सम्मेलन में 29 अप्रैल को न्यायमूर्ति रमण ने सभी हाइकोर्ट से खाली पदों के लिए प्रस्ताव भेजने की प्रक्रिया में तेजी लाने की अपील की. विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के रिसर्च डायरेक्टर अर्ध्य सेनगुप्ता मानते हैं कि समय से सिफारिशें नहीं भेजने के लिए न्यायाधीश दोषी नहीं हैं. वे कहते हैं, ''जजों से इसका ध्यान रखने की उम्मीद नहीं की जा सकती कि कौन कब रिटायर हो रहा है. यह प्रशासनिक काम है जो हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पेशेवर ढंग से नहीं किया जाता.

सबसे पहले तो इसी से देर होती है. समाधान न्यायिक प्रशासन को पेशेवर बनाने में है.’’ सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन लोकुर एक और सांस्थानिक रुकावट पर उंगली रखते हैं. वे कहते हैं, ''हाइकोर्ट का चीफ जस्टिस हमेशा बाहरी होता है और वकीलों, उनकी योग्यता और ईमानदारी से परिचित होने में उसे वक्त लगता है. इससे प्रक्रिया में देर होती है.’’

सरकार या सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की तरफ से सिफारिश में भेजे गए नामों को नामंजूर कर देने से भी देरी होती है, क्योंकि तब हाइकोर्ट को नए नाम खोजने के लिए पूरी प्रक्रिया फिर शुरू करनी पड़ती है. अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल के मुताबिक, करीब 35-40 फीसद नाम सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम नामंजूर कर देता है. न्यायमूर्ति लोकुर कहते हैं, ''सिफारिशों से निपटने के तरीके में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाइकोर्ट के बीच संवाद का पूर्ण अभाव है और पारदर्शिता भी नहीं है. सिफारिशों को नामंजूर करने का कारण हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस को पता नहीं होता. इसलिए त्रुटि में सुधार संभव नहीं हो पाता.’’

कई कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि हाइकोर्ट को नामों की ज्यादा बड़ी फेहरिस्त भेजनी चाहिए ताकि नामंजूर होने के बाद भी खाली पद भरने के लिए काफी नाम हों. सुप्रीम कोर्ट ने भी अक्सर जोर दिया है कि हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को खाली पद भरने के लिए सिफारिशें यथासंभव जल्द से जल्द भेजनी चाहिए, फिर उनकी पुरानी सिफारिशें मंजूर हुई हों या न हुई हों.

ऐसा कहना आसान है, करना नहीं. ज्यादातर जज अकेले में कहते हैं कि उपयुक्त और इच्छुक उम्मीदवारों की भारी कमी है. कॉलेजियम गैर-मुनासिब उम्मीदवार के नाम की सिफारिश केवल इसलिए नहीं कर सकता कि खाली पद बढ़ते जा रहे हैं. उसे उम्मीदवार के कामकाज और ईमानदारी सहित कई बातों पर विचार करना होता है.

इन फैसलों में वक्त लगता है, क्योंकि राय अक्सर लोगों की अपनी होती हैं. सुप्रीम कोर्ट के वकील उत्कर्ष सिंह कहते हैं, ''हमें भूलना नहीं चाहिए कि जजों को हटाना उनकी नियुक्ति के मुकाबले कहीं ज्यादा मुश्किल है. एक गलत नियुक्ति से पूरी व्यवस्था तहस-नहस हो सकती है.’’

कॉलेजियम की चुनौतियां

नामों को मंजूरी देने में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की तरफ से भी देरी होती है. वेणुगोपाल ने 2020 में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कॉलेजियम को नामों को मंजूरी देने में औसतन 119 दिन या 17 हक्रतों का वक्त लगा, जबकि एमओपी में इसके लिए चार हफ्ते तय हैं. इस विलंब  के अलावा पारदर्शिता नहीं होने के लिए भी कॉलेजियम प्रक्रिया की आलोचना की जाती है.

2018 से पहले कॉलेजियम की सिफारिशें सार्वजनिक दायरे में उपलब्ध नहीं करवाई जाती थीं. सीजेआइ दीपक मिश्र के कार्यकाल में इसमें बदलाव आया. उन्होंने कॉलेजियम की ओर से पारित प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर प्रकाशित करने को आसान बनाया. हालांकि नाम मंजूर या नामंजूर किए जाने के कारण और तर्क अब भी प्रकाशित नहीं किए जाते.

इन फैसलों की सार्वजनिक पड़ताल को लेकर न्यायिक बिरादरी दोफाड़ है. डर है कि विचाराधीन नामों के बारे में पारदर्शिता से प्रक्रिया और लंबी खिंच सकती है, क्योंकि हर फैसले पर सवाल उठाए जाएंगे. उत्कर्ष सिंह कहते हैं, ''नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पारदर्शिता लाई जा सकती है. पुनर्विचार की अवधि पूरी होने के बाद कार्यवाही के ब्योरे किसी की भी ईमानदारी पर सवालिया निशान लगाए बिना उपयुक्त तरीके से उजागर किए जा सकते हैं.’’

यहां तक कि कॉलेजियम प्रणाली को भंग करने की कोशिश भी हो चुकी है. न्यायिक नियुक्तियों को सुचारु और आसान बनाने के लिए अप्रैल 2015 में संवैधानिक संशोधन के जरिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) कानून पारित करके एनजेएसी बनाया गया था. एनजेएसी में सुप्रीम कोर्ट के तीन सबसे वरिष्ठ जजों, केंद्रीय कानून मंत्री, सीजेआइ की तरफ से नियुक्त दो गणमान्य व्यक्तियों, और लोकसभा में विपक्ष के नेता को होना था.

अलबत्ता, एनजेएसी के लागू होने के कुछ ही महीनों के भीतर शीर्ष अदालत ने उसे असंवैधानिक कहकर खारिज कर दिया. केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजु कहते हैं, ''सर्वोच्च न्यायालय की उस पीठ के एक सदस्य ने बाद में इसे खत्म करने पर अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि ऐसा करना गलत था. लेकिन अब कोई मतलब नहीं. एनजेएसी होता, तो चीजें अलहदा और ज्यादा पारदर्शी होतीं.’’

कार्यपालिका की तरफ से देरी

इस प्रक्रिया में तीसरा कांटा केंद्र सरकार है, जिसकी सुप्रीम कोर्ट खाली पदों को लेकर लगातार आलोचना करता रहा है. रमण के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने विभिन्न हाइकोर्ट में नियुक्तियों के लिए 180 सिफारिशें की हैं पर सरकार ने अभी तक 45 नाम मंजूर नहीं किए हैं. पहले की कुल 159 सिफारिशें अब भी केंद्र सरकार के पास लटकी हैं.

खुद सरकार ने माना है कि हाइकोर्ट के कॉलेजियम की तरफ से सिफारिश किए गए नामों पर आइबी का इनपुट मिलने के बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को भेजने में उसे 127 दिन या 18 हफ्ते लगते हैं. इतनी लंबी अवधि को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पूछताछ के जवाब में वेणुगोपाल ने कहा, ''मान लीजिए कि आइबी की रिपोर्ट प्रतिकूल है, तब हमें सत्यापन करना होता है. हम उसे आंख मूंदकर आगे नहीं बढ़ा सकते.’’

कुछ लोग तो इन देरियों के पीछे भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार के राजनैतिक मकसदों को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करते हैं. 25 हाइकोर्ट में केंद्र के पास अब भी लंबित सबसे ज्यादा प्रतिशत नामों वाले उच्च न्यायालय हैं—बॉम्बे हाइकोर्ट (उसकी तरफ से केंद्रीय कानून मंत्रालय को भेजे गए सभी नामों के 65 फीसद), कलकत्ता हाइकोर्ट (47 फीसद) और राजस्थान हाइकोर्ट (33 फीसद).

आलोचकों का कहना है कि ये हाइकोर्ट गैर-भाजपा दलों की ओर से शासित राज्यों में हैं. खाली पदों का सबसे ज्यादा हिस्सा भी इन्हीं राज्यों में है—न्यायाधीशों के कुल स्वीकृत पदों के 48 प्रतिशत राजस्थान हाइकोर्ट में, 46 फीसद कलकत्ता हाइकोर्ट में और 38 प्रतिशत बॉम्बे हाइकोर्ट में.
अलबत्ता, भाजपा शासित राज्यों के हाइकोर्टों में जजों के खाली पदों के प्रतिशत देखें तो एनडीए सरकार के खिलाफ यह दलील औंधे मुंह गिरती है.

मसलन, जजों के स्वीकृत पदों के 48 फीसद पटना हाइकोर्ट में खाली हैं. इलाहाबाद हाइकोर्ट और गुजरात हाइकोर्ट के लिए यह आंकड़ा क्रमश: 42 फीसद और 38 फीसद है. ज्यादा बड़ी परेशानी उन नामों को लेकर है जिन्हें कॉलेजियम की ओर से कई बार वापस भेज दिए जाने के बाद भी मंजूरी नहीं दी गई. 1 जनवरी, 2021 और 1 फरवरी 2022 के बीच सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 29 सिफारिशें कम से कम एक बार वापस भेजीं. केंद्र ने 11 अप्रैल तक एक को भी मंजूरी नहीं दी.

न्यायमूर्ति लोकुर कहते हैं, ''दोहराई गई नियुक्तियों को मंजूरी देने में देरी कार्यपलिका की तरफ से सुप्रीम कोर्ट को यह जताने का एक तरीका है कि नियुक्तियों के सर्वेसर्वा हम हैं, फिर आपकी राय चाहे जो हो. इसके अलावा इंतजार का वक्त पिछले कुछ सालों में, और ज्यादा चिंताजनक बात यह कि चुनिंदा मामलों में, बहुत ज्यादा बढ़ गया है. केंद्रीय कानून मंत्री और भारत के प्रधान न्यायाधीश को ये और दूसरी समस्याएं सुलझानी चाहिए.’’

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की तरफ से नामों को कई बार दोहराए जाने के बावजूद ऐसी देरियों से संभावित उक्वमीदवारों का मनोबल टूट सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नामों को लंबे वक्त तक लटकाए रखने से बड़े वकील जज बनने के लिए हतोत्साहित होते हैं. सुशील मोदी की अगुआई वाली स्थायी समिति ने भी इसके प्रभावों का जिक्र किया—नियुक्तियों में देरी की वजह से कई वकील ऐसी नियुक्तियां पाने से इनकार करने लगे हैं.

मसलन, फरवरी, 2022 में वरिष्ठ वकील आदित्य सोढ़ी ने एक साल की देरी का हवाला देते हुए पदोन्नति के लिए अपनी मंजूरी वापस ले ली. कर्नाटक हाइकोर्ट के न्यायाधीश पद के लिए उनके नाम की सिफारिश फरवरी, 2021 में की गई और सितंबर 2021 में दोहराई गई थी. मार्च, 2022 में स्थायी समिति की रिपोर्ट कहती है, ''कोई भी सम्मानीय वकील अनंतकाल तक इंतजार करने के लिए तैयार नहीं है और इसलिए उनकी तरफ से इनकार की बाढ़ आ गई है.’’

रिजिजु दावा करते हैं कि सरकार ने नियुक्तियों में ''कभी जान-बूझकर’’ देरी नहीं की. वे यह भी कहते हैं कि फाइलों को अब ज्यादा तेजी से मंजूरी दी जा रही है और याद दिलाते हैं कि मई में सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश सिफारिश आने के बाद 48 घंटों के भीतर नियुक्त कर दिए गए. उन्होंने यह भी बताया कि खुद सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सरकार को पूरी उचित देख-भाल के बाद ही जजों के चयन पर कदम उठाना चाहिए, जिसमें समय लगता है.

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में केंद्र ने कहा कि उसने 1 जनवरी, 2021 और 30 जनवरी 2022 के बीच सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की तरफ से विभिन्न हाइकोर्ट के लिए सिफारिश किए गए 77 फीसद जजों की नियुक्ति की.

सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में एक आदेश में कहा कि जिन नामों पर सुप्रीम कोर्ट, हाइकोर्ट और सरकारों के बीच सहमति हो जाती है, उनकी नियुक्ति छह महीने के भीतर हो जानी चाहिए. हलफनामे में दावा किया गया कि केंद्र ने विभिन्न हाइकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के अंतिम प्रस्ताव की तारीख से औसतन 41 दिन या छह हक्रतों का वन्न्त लिया.

आगे का रास्ता

कानून से जुड़ी संसद की स्थायी समिति मौजूदा रफ्तार से खुश मालूम नहीं देती. रिपोर्ट में उसने दोटूक और पुरजोर कहा कि ''मौजूदा प्रक्रिया कारगर नहीं है और इसे नए सिरे से तय करने की जरूरत है.’’ समिति आगाह करती है कि जब तक नियुक्ति प्रक्रिया के विभिन्न चरणों के पूरे होने की समय सीमाएं न केवल मजबूती से तय नहीं की जातीं बल्कि सभी प्राधिकारियों की तरफ से उनका पूरी निष्ठा से पालन नहीं किया जाता, तब तक कोई तंत्र असरदार नहीं होगा.

मगर भारत की जजों की कमी की समस्या महज खाली पदों को भरकर हल नहीं की जा सकती. अग्रणी देशों का जज-जनसंख्या अनुपात हासिल करने के लिए भारत को और ज्यादा जज तैयार करने होंगे. 1987 में भारत के विधि आयोग ने प्रति दस लाख आबादी पर 50 जजों की सिफारिश की थी. तीन दशक बाद आज भारत में प्रति दस लाख आबादी पर 21 जज हैं.

वह भी तब जब उनकी गणना स्वीकृति पदों की संख्या के आधार पर की जाए. अगर जजों की वास्तविक कार्यकारी संख्या पर विचार किया जाए तो यह अनुपात और भी काफी कम होगा. इसकी तुलना अमेरिका और चीन में प्रति दस लाख लोगों पर करीब 150 और ब्रिटेन में 50 से ऊपर जजों से कीजिए.

जजों की संख्या में बढ़ोतरी निचली अदालतों से शुरू होनी चाहिए, जहां भर्तियां या तो राज्यों के लोक सेवा आयोगों के जरिए या उच्च न्यायालय की सिफारिश पर की जाती हैं. दोनों ही मामलों में राज्य की कार्यपालिक मशीनरी अहम भूमिका निभाती है. यही वजह है कि न्यायमूर्ति रमण ने मुख्यमंत्रियों से अधीनस्थ अदालतों में न्यायिक अधिकारियों की स्वीकृत संख्या बढ़ाने का आग्रह किया.

अधिक संख्या में न्यायाधीश ही नहीं, न्यायिक ढांचे में भी सुधार लाना होगा. जिला और अधीनस्थ अदालतों में बुनियादी ढांचे की सुविधाओं के विकास के लिए केंद्र ने 2014 के बाद केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत राज्यों को 5,565 करोड़ रुपए दिए. तब भी बुनियादी ढांचा निराशाजनक है—केवल 27 फीसद अदालती कक्षों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए जजों के डायस पर कंप्यूटर है; 26 फीसद अदालती परिसरों में महिलाओं के लिए शौचालय नहीं हैं; केवल 32 फीसद अदालती कक्षों में अलग रिकॉर्ड रूम हैं; और 49 फीसद अदालतों में लाइब्रेरी नहीं है.

ये आंकड़े याद दिलाते हैं कि भारत में न्याय अब भी बैसाखियों के सहारे लंगड़ाकर चल रहा है. इसे पटरी पर लाने का भगीरथ काम सरकार और न्यायपालिका को करना है, जिससे मुकदमों का बोझ घटे और कानूनी प्रक्रिया में खर्च हो रहे धन की बचत हो सके.

जज बनने के आकांक्षी की छानबीन कार्यपालिका की ओर से भी होती है. यह अंतिम जांच उनके परिवार के राजनैतिक संबंधों, पिछले जीवन और किन्हीं भी अन्य 'चयन संबंधी विवरणों’ पर निर्भर होती है, जो कभी लोगों के सामने नहीं आ पाते

मुख्य न्यायाधीश रमण के कार्यकाल में अप्रैल 2021 से सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने विभिन्न हाइकोर्ट में नियुक्तियों के लिए 180 नामों की सिफारिश की है पर केंद्र सरकार ने अभी तक 45 नामों को मंजूरी नहीं दी है

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की तरफ से नामों को कई बार सरकार को भेजे जाने के बावजूद ऐसी देरियों के कारण वरिष्ठ वकील जज बनने के लिए हतोत्साहित होते हैं.

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