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यह यूसीसी है क्या?

विवादों से घिरी समान नागरिक संहिता सभी धर्मों के समस्त भारतीयों के लिए उत्तराधिकार, विवाह और तलाक पर प्रस्तावित साझा कानून है

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समान नागरिक संहिताः ध्यान देने का समय समान नागरिक संहिताः ध्यान देने का समय

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 22 अप्रैल को भोपाल में भाजपा की एक बैठक को संबोधित करते हुए कथित तौर पर साथियों से कहा कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर ध्यान देने का समय आ गया है. अगले ही दिन उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि भाजपा सरकार राज्य में यूसीसी लागू करने पर विचार कर रही है. पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में भाजपा की सरकार यूसीसी के लिए पहले ही विशेषज्ञों की एक समिति का गठन कर चुकी है. शाह की मंशा स्पष्ट है कि उत्तराखंड पायलट प्रोजेक्ट है जिसकी पदचाप जल्द पूरे देश में सुनाई देगी.

यूसीसी 1998 से भाजपा के घोषणापत्र में है. करीब दो दशक बाद भगवा पार्टी इस विवादास्पद एजेंडे को आहिस्ता-आहिस्ता लागू करने की तरफ बढ़ती दिख रही है.

सभी भारतीयों के, फिर उनका धर्म चाहे जो हो, विवाह, तलाक, गोद लेने और उत्तराधिकार को शासित करने वाला एक साझा कानून, यानी अनिवार्यत: सभी नागरिकों पर लागू होने वाला एक नागरिक कानून, ऐसा आदर्श है जिसका जिक्रनीति निर्देशक सिद्धांतों में है और जिसे संविधान के वास्तुकार डॉ. बी.आर. आंबेडकर अभीष्ट कसौटी के तौर पर देखते थे, हालांकि उन्हें लगता था कि तब नवजात गणतंत्र इसके लिए तैयार नहीं है.

क्या अब वह तैयार है? सुप्रीम कोर्ट ने गाहे-ब-गाहे इसका उत्तर हां में दिया है: 1985 के शाह बानो फैसले में; 2015 में उसने विभिन्न धर्मों के नागरिक कानूनों में ''पूर्ण भ्रम'' की बात की; और 2019 में. फरवरी में उसने विभिन्न उच्च न्यायालयों में यूसीसी पर चल रहे मामले अपने पास मंगवा लिए और अंतिम फैसले के लिए सबको एक साथ नत्थी कर दिया. विधि आयोग ने अगस्त 2018  में अलग ही तान छेड़ी और कहा कि यूसीसी ''इस पड़ाव पर न तो जरूरी है और न ही वांछित.'' यह बात उसने 'परिवार कानून में सुधार' पर एक परचे में कही, जो 2016 में केंद्रीय कानून मंत्रालय की ओर से इस मुद्दे को परखने के लिए कहने के बाद तैयार किया था.

परचे में कहा गया कि परिवार कानून के लिहाज से समुदायों के बीच समानता की तलाश करने के बजाए समुदायों के भीतर महिलाओं के खिलाफ पक्षपात को दूर किया जाए. इसकी अंतिम रिपोर्ट का इंतजार है. केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू कहते हैं कि जब यह आ जाएगी, केंद्र हितधारकों से सलाह-मशविरा शुरू करेगा. मगर 2018 में न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त होने के बाद विधि आयोग में कोई नियुक्ति नहीं की गई. साफ है कि केंद्र फूंक-फूंककर कदम रख रहा है.

क्या सरकार खुद-ब-खुद यूसीसी का खाका तय कर सकती है? चूंकि विवाह, तलाक, गोद लेने और उत्तराधिकार जैसे विषय समवर्ती सूची में हैं इसलिए राज्य और केंद्र दोनों उन पर कानून बना सकते हैं. क्या इसमें यूसीसी का खाका तय करने का अधिकार भी है? संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल पी.डी.टी. अचारी ऐसा ही मानते हैं जबकि पूर्व केंद्रीय विधि सचिव पी.के. मल्होत्रा को लगता है कि केवल संसद ही ऐसा कानून बनाने में समर्थ है क्योंकि अनुच्छेद 44 यानी इससे संबंधित निर्देशक सिद्धांत भारत के सभी नागरिकों का जिक्र करते हैं. उत्तराखंड के सामने एक नजीर भी है. गोवा में पहले से समान नागरिक संहिता है जो 1867 की पुर्तगाली नागरिक संहिता का अवशेष है.

यह सच्चे अर्थ में समान कानून नहीं है और विशेष हालात में हिंदुओं को द्विविवाह की इजाजत देती है. संहिता चर्च को विवाह की स्वीकृति देने और खत्म करने का अधिकार देती है जो कई लिहाज से असंगत है. कुछ लोग कहते हैं कि यूसीसी अनुच्छेद 25 और 26 में दी गई धर्म की स्वतंत्रता का उल्लंघन है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने नवंबर 2021 में कहा, ''भारत बहुधार्मिक देश है और हर नागरिक को अपने धर्म तथा धार्मिक विश्वासों को मानने तथा उनकी घोषणा करने, उनके अनुसार कार्य करने और प्रचार करने का अधिकार है.'' सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि ''धर्म के अधिकार'' का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता.

यूसीसी के साथ दूसरी दिक्कत यह है कि इसका कोई एक मसौदा नहीं है. कोई नहीं जानता कि यह क्या आकार ग्रहण करेगी, कौन-से प्रावधान इसमें शामिल होंगे और विभिन्न समुदायों के मौजूदा कानूनों पर इसका क्या असर होगा. कई लोगों को संदेह है कि यूसीसी बहुसंख्यक हिंदू कानूनों के हक में अल्पसंख्यक समुदायों के पर्सनल लॉ को मिटा देगी. चूंकि भाजपा और आरएसएस इसकी तरफदारी कर रहे हैं, इसलिए यह संदेह और भी ज्यादा है.

मगर यूसीसी का असर हिंदू कानूनों पर भी पड़ेगा. मसलन, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) कहती है कि कानून के प्रावधान अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होंगे. इस कानून की धारा 5(5) और 7 कहती हैं कि रीति-सम्मत प्रथाएं इन प्रावधानों के ऊपर प्रभावी होंगी. यूसीसी में ऐसे अपवाद मौजूद नहीं होंगे.

पर्सनल के साथ कई फौजदारी कानूनों की मौजूदगी से भी उलझन बढ़ती है. पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण के कानून की तरह इनका प्रावधान सीआरपीसी की धारा 125 में भी है. दहेज और घरेलू हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा देने वाले दंडात्मक कानूनों ने पर्सनल लॉ के दायरे में भी अपने पैर पसार रखे हैं. मुसलमानों सहित आबादी के बड़े हिस्से ने सिविल विवादों के समाधान के लिए इस कानून की विभिन्न धाराओं का सहारा लिया है. धार्मिक पर्सनल लॉ पर निर्भरता लगातार कम हो रही है. जब एक समान संहिता की दूरदर्शिता पर बहस चल रही है, यहां प्रस्तुत है भारत के निजी कानूनों की एक झलक और यह भी कि यूसीसी का उन पर क्या असर पड़ेगा.

यूसीसी का विवाह पर क्या असर पड़ सकता है
एक समान कानून विवाह की न्यूनतम कानूनी उम्र तय कर सकता है, द्विविवाह और बहुविवाह को खत्म कर सकता है और अंतर-धार्मिक विवाह को बढ़ावा दे सकता है

हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों के विवाह कानून
तीनों धर्मों के विवाह हिंदू विवाह अधिनियम (हिंदू मैरिज ऐक्ट या एचएमए) 1955 से शासित होते हैं

विशेष प्रावधान जो यूसीसी से समाप्त हो सकते हैं: एचएमए की धारा 2 (2) जो अनुसूचित जातियों को इस कानून के दायरे से बाहर करती है; धारा 5 (5) तथा 7 जो कहती है कि  रीति-सम्मत प्रथाएं इस कानून के प्रावधानों से ऊपर प्रभावी होंगी

मुसलमानों के विवाह कानून
मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीअत) विनियोग अधिनियम 1937 कहता है कि विवाह, तलाक और गुजारा भत्ता शरीअत या इस्लामी कानून से निर्देशित होंगे

विशेष प्रावधान जो यूसीसी से समाप्त हो सकते हैं: शरीअत में यौवन की शुरुआत या 15 वर्ष विवाह की न्यूनतम उम्र है
 पुरुष चार पत्नियां रख सकता है, बशर्ते वह उन सभी के साथ बराबर का व्यवहार करे. महिलाएं द्विविवाह या बहुविवाह नहीं कर सकतीं

मुस्लिम पुरुष और गैर-मुस्लिम महिला के बीच विवाह मान्य नहीं होने पर अनियमितता है और महिला के इस्लाम में धर्म-परिवर्तन से उसे जायज बनाया जा सकता है

 साइयों के विवाह कानून
 ईसाई विवाह अधिनियम 1872 से शासित होते हैं

विशेष प्रावधान जो यूसीसी से समाप्त हो सकते हैं: ईसाई और अन्य व्यक्ति के बीच अंतर-जाति या अंतर-धार्मिक विवाह अमान्य होगा, अगर दूसरे व्यक्ति पर लागू होने वाले निजी कानून ईसाई के साथ विवाह का निषेध करते हों

सिखों के विवाह कानून
सभी विवाह सिख विवाह समारोह से निष्पादित होते हैं, जिसे आनंद (आम तौर पर आनंद कारज) कहा जाता है, और आनंद विवाह (संशोधन) अधिनियम 2012 से शासित होते हैं

विशेष प्रावधान जो यूसीसी से समाप्त हो सकते हैं: आनंद अधिनियम के तहत विवाह पंजीकृत किए जाते हैं, जिसकी अन्यथा जरूरत नहीं पड़ सकती है

पारसियों के विवाह कानून
पारसियों के विवाह 1936 के पारसी विवाह और तलाक अधिनियम के जरिए शासित होते हैं

विशेष प्रावधान जो यूसीसी से समाप्त हो सकते हैं: महिलाएं अगर अन्य धार्मिक आस्थाओं को मानने वाले व्यक्ति से विवाह करती हैं तो वे पारसी अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों का अधिकार गंवा देती हैं

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