scorecardresearch
 

खास रपटः थोड़े को बहुत समझें

कोविड के ताजातरीन दिशानिर्देश कहते हैं कि हल्के संक्रमण वाले मामलों में कोई दवाई न दी जाए. आखिर क्यों?

विशिष्ट उपचार केमिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ पुणे के दफ्तर के बाहर अप्रैल महीने में रेमडेसिविर की सप्लाई की मांग करते तीमारदार विशिष्ट उपचार केमिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ पुणे के दफ्तर के बाहर अप्रैल महीने में रेमडेसिविर की सप्लाई की मांग करते तीमारदार

सोनाली आचार्जी

जब भी मैं कुछ ठोस खाना खाती हूं, लगता है पेट में आग-सी भड़क उठी है.’’ यह कहना है कोलकाता की 39 वर्षीया साउंड इंजीनियर सुप्रिया मलिक का. उनकी कोविड जांच दो महीने पहले नेगेटिव आई थी. तब से लगातार गैस्ट्रोइंटस्टाइनल (जीआइ) यानी पेट और पाचन की परेशानियों से उनका वजन 15 किलो घट गया. मलिक को हल्का कोविड हुआ था.

करीब दो दिन बुखार रहा और थोड़ी सूखी खांसी. वे बताती हैं कि डर के मारे उन्होंने खुद ही ऐंटीबायोटिक दवा डॉक्सीसाइक्लीन ले ली, जो भारत में डॉक्सी 100 के नाम से बिकती है. उनके पिता को हल्की बीमारी के लिए यह दवा दी गई थी और उन्हीं का परचा देखकर मलिक ने यह ले ली. लेकिन दवाई लेने के बाद उन्हें शरीर में कमजोरी महसूस होने लगी.

यही नहीं, उन्हें पहले गैस्ट्रोइसोफैगल रिफ्लक्स बीमारी रही थी, जो और बढ़ गई. फिलहाल कोलकाता के अपोलो अस्पताल में इलाज करा रहीं मलिक कहती हैं, ''पेट की परेशानियां पूरे परिवार में हैं. मेरे डॉक्टर का कहना है कि मुझे डॉक्सी 100 की जरूरत नहीं थी. इसे लेने के कारण आंत से अच्छे बैक्टीरिया निकल गए. तभी से मुझे पेट और पाचन की गंभीर परेशानियां रहने लगीं.’’

महामारी के दौरान ऐंटीबायोटिक की खपत में बढ़ोतरी ने चिकित्सा विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया. भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की माइक्रोबायोलॉजिस्ट कामिनी वालिया कहती हैं, ''सकंडरी बैक्टीरियल इंफेक्शन के डर या कोविड का निश्चित इलाज नहीं होने से जमकर ऐंटीबायोटिक दवाइयां लिखी गईं. ऐंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध अपने आप में भारत में खामोश महामारी है, जिसे कोविड और बढ़ा रहा है.’’

भारत के लोगों ने अप्रैल में 15,662 करोड़ रुपए की दवाइयां खरीदीं. पिछले साल के मुकाबले 51.5 फीसद ज्यादा. देश भर की दवा दुकानों की बिक्री पर नजर रखने वाली मार्केट रिसर्च फर्म एआइओसीडी-एडब्ल्यूएसीएस की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, संक्रमण-रोधी दवाइयों की बिक्री में 134 फीसद इजाफा हुआ. इन दवाओं का बड़ा हिस्सा ऐंटीबायोटिक्स हैं.

कोविड के लिए दो सबसे आम ऐंटीबायोटिक—एजिथ्रोमाइसिन और डॉक्सीसाइक्लीन—लिए गए. दोनों की बेतहाशा बढ़ती मांग के चलते इनके निर्माण में काम आने वाली सक्रिय औषधि सामग्री की कीमतों में भारी इजाफा हुआ. एजिथ्रोमाइसिन के लिए यह फरवरी 2021 (दूसरी लहर की शुरुआत से पहले) की कीमत के मुकाबले 3,500 रु. प्रति किलो बढ़ी, जबकि डॉक्सीसाइक्लीन के लिए दुगुनी बढ़कर 6,000 रु. प्रति किलो हो गई.

इंडियन फार्मास्युटिकल एसोसिएशन के डायरेक्टर टी.वी. नारायण कहते हैं, ''दूसरी लहर के शिखर के दौरान कई केमिस्ट को दोनों दवाइयों के लोकप्रिय ब्रांड हासिल करने में मुश्किलें आईं. बाद में न मिलने के डर से लोग दहशत में आकर ऐंटीबायोटिक खरीद रहे थे.’’

दवाई का दर्द
दवाई का दर्द
दवाई का दर्द
दवाई का दर्द

शुरुआती ऊहापोह और ऐंटीबायोटिक

असल चिंता ऐंटीबायोटिक के उपयोग की नहीं बल्कि दुरुपयोग की है. कोविड वायरस है और ऐंटीबायोटिक रोग के बिल्कुल अलग ही कारक बैक्टीरिया पर असर के लिए बनाए गए हैं. मगर महामारी की शुरुआत में इस तरह के कुछ प्रमाण मिले कि एजिथ्रोमाइसिन और डॉक्सीसाइक्लीन का इम्युनोमॉड्यूलेटरी (रोग प्रतिरोधक क्षमता को साधने वाला) असर हो सकता है, जो वायरस को मध्यम या तीव्र होने से रोकने में मदद करेगा.

बेंगलूरू के बनेरगट्टा स्थित फोर्टिस अस्पताल में आंतरिक चिकित्सा की डायरेक्टर डॉ. सुधा मेनन कहती हैं, ‘‘पहली लहर के दौरान कोविड सभी के लिए चुनौती था. डॉक्टरों के लिए भी. शुरुआत में हम पुराने मॉलिक्यूल को जांचने की कोशिश कर रहे थे कि देखें इसका असर होता है या नहीं. हमें भारत और दुनिया भर से कुछ ऐंटीबायोटिक के बारे में कहे-सुने प्रमाण मिल रहे थे. ये एक किस्म की इम्युनोमॉड्यूलेंट या रोग प्रतिरोधक क्षमता साधने वाली पुरानी दवाइयां हैं. तो शुरू में इनका इस्तेमाल ज्यादातर विकल्प न होने के चलते किया गया.’’

महामारी ज्यों-ज्यों बढ़ती गई, कई डॉक्टरों ने इन दवाओं का इस्तेमाल कम कर दिया और केवल उन्हीं मामलों में देने लगे जहां बैक्टीरिया के संक्रमण की भी संभावना थी. मैक्स हेल्थकेयर में आंतरिक चिकित्सा के डायरेक्टर डॉ. रोमेल टिक्कू कहते हैं, ''हमें समझ आने लगा कि ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है जो कोविड के इलाज में ऐंटीबायोटिक के इस्तेमाल का समर्थन करता हो.

ऐंटीबायोटिक केवल तभी दिए गए जब किसी को कोविड के दौरान यूटीआइ या बैक्टीरियल न्यूमोनिया हुआ. साथ ही कोविड में आपको बैक्टीरिया का इंफेक्शन आम तौर पर तभी होता है जब आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो या स्टेरॉइड दिए गए हों, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता कम करते हैं.’’

2020 के आखिर तक वाकई ऐसे अध्ययन सामने आने लगे, जिन्होंने निर्णायक तौर पर कहा कि कोविड के इलाज में ऐंटीबायोटिक मदद नहीं करते. लांसेट जर्नल के सितंबर 2020 के अध्ययन के मुताबिक, परीक्षणों से पता चला कि अस्पताल में भर्ती कोविड के मरीजों के लिए एजिथ्रोमाइसिन कारगर इलाज नहीं है, फिर चाहे यह अकेले दिया जाए या हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के साथ.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इलाज के जो दिशानिर्देश जारी किए और जिनका पालन अमेरिका, ब्रिटेन के साथ हमारे पड़ोसी देशों बांग्लादेश और पाकिस्तान ने भी किया, उनमें कोई ऐंटीबायोटिक कभी शामिल नहीं था. भारत में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के मार्च 2020 के दिशानिर्देशों में एजिथ्रोमाइसिन की सिफारिश की गई थी, लेकिन जुलाई 2020 तक इसे हटा दिया गया.

अलबत्ता डर और चिंता की वजह से लोग यह दवाई लेते रहे. कुछ डॉक्टरों पर तो उनके मरीजों ने जोर भी डाला कि उनके कोविड के इलाज के परचे में ऐंटीबायोटिक भी लिखें. पुणे के जनरल फिजीशियन डॉ. अनमोल चव्हाण कहते हैं, ''मैं पिछले साल जुलाई तक कोविड मरीजों को ऐंटीबायोटिक दे रहा था, पर उसके बाद बंद कर दी. दूसरी लहर में ऐसे भी मरीज थे जिन्होंने इसलिए धमकाया क्योंकि उनके परिवार या दोस्तों के इलाज का मेरा परचा पिछले साल से अलग था. वे इतने भयभीत थे कि कुछ सुनने-समझने को तैयार न थे.’’

ऐंटीबायोटिक के लगातार इस्तेमाल के चलते केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को 7 जुलाई, 2021 को जारी अपने ताजातरीन निर्देशों में साफ-साफ लिखना पड़ा कि कोविड के हल्के मामलों के लिए ‘किसी दवाई’ की जरूरत नहीं है. जानी-मानी माइक्रोबायोलॉजिस्ट और वायरोलॉजिस्ट डॉ. गगनदीप कंग कहती हैं, ‘‘कोविड का बहुत ज्यादा और विवेकहीन इलाज हुआ है. नए दिशानिर्देश प्रमाणों और इस जानकारी पर आधारित हैं कि बीमारी के किस चरण में क्या कारगर होगा.’’

अपने मन से दवाई लेने के नतीजे

बताया गया है कि बहुत ज्यादा या गलत दवाई लेने से जीआइ सेहत यानी पेट और पाचन पर फौरन बुरा असर होता है. कोविड के बाद जीआइ सेहत पर पड़ने वाले असर के बारे में लांसेट के मार्च 2021 के अंक में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, इसमें शामिल 117  कोविड मरीजों में से 44 फीसद को टेस्ट निगेटिव आने के 90 दिन बाद तक भी जीआइ लक्षण अनुभव होते रहे. इलाज के दौरान ली गई तमाम दवाइयों को इसका एक संभावित कारण बताया गया.

साकेत, दिल्ली के मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. विकास सिंगला कहते हैं, ''ठीक-ठीक कारण हमें नहीं पता. यह जीआइ लाइनिंग पर वायरस का असर या दवाइयों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल भी हो सकता है. पर हम इतना जानते हैं कि ऐंटीबायोटिक्स का जीआइ संतुलन को बिगाडऩे का इतिहास रहा है.’’ वे यह भी बताते हैं, ''हमारी बड़ी आंत में, जहां खाने को पचाया जाता है, ढेरों अच्छे बैक्टीरिया होते हैं जो पचाने के लिए खाने को टुकड़े-टुकड़े करने में मदद करते हैं.

इनसान का पाचन तंत्र फाइबर या जटिल कार्बोहाइड्रेट को नहीं पचा पाता. इसे बैक्टीरिया पचाते हैं और हमें ऊर्जा मिलती है.’’ डॉ. सिंगला यह भी कहते हैं कि स्वस्थ व्यक्ति में अच्छे बैक्टीरिया की संख्या बुरे बैक्टीरिया से ज्यादा होती है. जब मरीज ऐंटीबायोटिक लेते हैं, तो यह दवाई अक्सर अच्छे बैक्टीरिया को चुन-चुनकर मारती है. ''ऐसे में हमारे खाने में शामिल कार्बोहाइड्रेट पच नहीं पाते, जिससे शरीर में पानी ज्यादा बनता है और डायरिया हो जाता है.’’

चिंता की बात यह भी है कि ऐंटीबायोटिक के बहुत ज्यादा या गलत इस्तेमाल से बैक्टीरिया कुछ किस्म की दवाइयों के प्रतिरोधी हो जाते हैं. डब्ल्यूएचओ की ‘ऐंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस—ग्लोबल रिपोर्ट ऑन सर्विलांस इन 2014’ के मुताबिक, भारत में 30 या उससे ज्यादा आइसोलेट के साथ किए गए तमाम अध्ययनों में सबसे आम तौर पर इस्तेमाल ऐंटीबायोटिक के प्रति ई-कोलाइ बैक्टीरिया की प्रतिरोध दर 82 फीसद थी.

कोविड के मामले में आइसीएमआर (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) ने 1 जून से 30 अगस्त 2020 के बीच 10 चुनिंदा अस्पतालों में से एक में भर्ती 17,534 कोविड मरीजों के डेटा का विश्लेषण किया और पाया कि करीब आधे मामलों में बहुऔषध-प्रतिरोधी जीवों की वजह से सह-संक्रमण पैदा हो गए.

डॉ. मेनन कहती हैं, ‘‘असल मुश्किल तो कोविड के बाद भी पेश आएगी, जब अगली बार बैक्टीरिया के संक्रमण के इलाज के लिए ऐंटीबायोटिक देने की जरूरत होगी और वह कारगर नहीं होगा, क्योंकि वह दवा उस बैक्टीरिया पर तब तक बेअसर हो चुकी होगी. यह बैक्टीरिया दूसरों को भी संक्रमित कर सकेगा. हम पहले ही ऐसे मुकाम पर हैं जहां टॉन्सिलाइटिस के लिए भी अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है. ऐसा पहले कभी न हुआ. ऐंटीबायोटिक के दुरुपयोग के चलते हमारा साबका ऐसे मरीजों से पड़ता है जिनके टॉन्सिल संक्रमण पर इलाज का असर नहीं होता.’’

इम्युनिटी की तलाश

बीते महीनों में केवल ऐंटीबायोटिक का ही बहुत ज्यादा और विवेकहीन इस्तेमाल नहीं हुआ. महामारी की शुरुआत से ही भारत के लोग पोषण अनुपूरक दवाइयों की भारी खुराक लेते रहे हैं. देश के फार्मास्युटिकल मार्केट ने अन्न्तूबर 2020 में एक हैरतअंगेज बदलाव देखा. पहली बार जीवनशैली से जुड़ी डायबिटीज और हृदयरोग सरीखी बीमारियों की दवाइयों से कहीं ज्यादा एक मल्टीविटामिन ब्रांड की गोलियां बिकीं.

चेन्नै की एपेक्स लैब के 30 साल पुराने ब्रांड जिंकोविट ने उस माह 50 करोड़ रुपए की बिक्री दर्ज की, जबकि ह्यूमन मिक्सटार्ड या इन्सुलिन की बिक्री कुल 47 करोड़ रुपए थी. जनवरी 2020 में यह मल्टीविटामिन और मल्टीमिनरल दवा संगठित खुदरा दवा बाजार में बिकने वाली शीर्ष दवाइयों की फेहरिस्त में 53वें नंबर पर थी.

महामारी के बाद यह एक नंबर पर आ गई. मगर जिंक या विटामिन सी के कोविड से लड़ने में मदद का कोई सबूत नहीं है. दरअसल, इस साल मेडिकल जर्नल जेएएमए नेटवर्क ओपन में प्रकाशित 214 लोगों के छोटे-से अध्ययन ने बताया कि जिंक और विटामिन सी की भारी-भरकम खुराकों से लक्षणों में ज्यादा सुधार नहीं आया.

फोर्टिस अस्पताल मुंबई में न्यूट्रिशनिस्ट डॉ. मुलुंद रसिका परब कहती हैं, ‘‘आप महज एक गोली लेकर या खाने-पीने की एक-सी ढेरों चीजें खाकर इम्युनिटी हासिल नहीं कर सकते. महामारी के दौरान जिंक पोषक तत्व बन गया. पर आपके शरीर को इसकी बहुत थोड़ी-सी मात्रा और उसके साथ कई दूसरे विटामिनों की जरूरत है. विटामिनों की बहुत ज्यादा खुराक लेने के कई साइड-इफेक्ट होते हैं, खासकर जब आप दूसरी दवाइयां भी ले रहे हों.’’

दिल्ली की 41 वर्षीया हृदयरोगी कल्पना जैन (आग्रह पर बदला नाम) ऐसी दवाइयां ले रही थीं जिनमें जिंक भी था. साथ में उन्होंने जिंक सप्लीमेंट भी ले लिए. नतीजा यह कि एक सुबह वे अचानक बेहोश हो गईं. जिंक की ज्यादा खुराक ने उनके दिल की दवाइयों पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया की. जैन कहती हैं, ‘‘सबने कहा कि कोविड के लिए जिंक लो. मैंने ले लिया. सोचा नहीं कि इसके साइड-इफेक्ट होंगे.’’

हल्के मामलों में क्या करें

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के ताजातरीन दिशानिर्देश खालिस लक्षण पर आधारित इलाज की सलाह देते हैं. बगैर लक्षण वाले मरीजों के लिए केवल आइसोलेशन और आराम की सलाह दी गई है. डॉ. मेनन कहती हैं, ‘‘अगर आपको कोई लक्षण नहीं है या बस हल्का बुखार है तो आपको बार-बार ब्लड टेस्ट या सीटी स्कैन करवाने की जरूरत नहीं.

संक्रमण के सक्रिय दौर पर लगाम के लिए आप आठवें या बारहवें दिन छह मिनट का वॉक कर सकते हैं.’’ वे यह भी कहती हैं, ‘‘टेस्ट निगेटिव आने के बाद बुखार की वापसी या खांसी का बिगड़ना बैक्टीरियल इंफेक्शन के संकेत हो सकते हैं. ऐसा होने पर डॉक्टर से मिलें.’’

कोर्टिकोस्टेरॉइड से बीमारी को बढ़ने से रोक पाने की कुछ संभावना है. डॉ. टिक्कू कहते हैं, ''कोई दवाई नहीं लेने का मतलब यह नहीं कि आप लक्षणों का इलाज न करें या नैदानिक तौर पर साबित तरीके न अपनाएं. मसलन, अगर आपको बुखार या खांसी है, तो शुरुआत में ही बुडेसोनाइड इन्हेल करने से वायरस की बढ़त रुक जाती है.

हल्के मामलों में इससे ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं, पर मध्यम से तीव्र मरीजों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ेगा.’’ ऐंटीबायोटिक अद्भुत दवाइयां हैं और जीवन रक्षा का इनका इतिहास रहा है. बात बस इतनी है कि इनका सही और संभलकर इस्तेमाल करें. ठ्ठ

चिंता इस बात की है कि ऐंटीबायोटिक्स का जरूरत से ज्यादा या गलत इस्तेमाल करने से ऐसा न हो कि बैक्टीरिया कुछ दवाओं का आदी हो जाए, उस पर उन दवाओं का असर ही न हो

भारतीय दरअसल महामारी के आगाज के समय से ही पौष्टिक सप्लीमेंट्स  की बड़े पैमाने पर जरूरत से कहीं ज्यादा की खुराक लेते आ रहे हैं

दवा का दर्द

कोविड के हल्के संक्रमण के इलाज वाली लोकप्रिय दवाओं के बारे में अब तक जो पता चला है

एजिथ्रोमाइसिन और डॉक्सीसाइक्लिन जैसी ऐंटीबायोटिक्स के बारे में

संभावित साइड-इफेक्ट पेट संबंधी दिक्कतें, सूक्ष्मकीटाणु रोधी दवाएं बेअसर बना दें

अध्ययन किसी भी अध्ययन में साबित न हुआ कि ये दवाएं कोविड में कारगर हैं

स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशानिर्देश में अब स्थिति अब यह कोविड इलाज संबंधी दिशानिर्देश में शामिल नहीं

जिंक सप्लीमेंट

संभावित साइड-इफेक्ट सिरदर्द, क्रैंप आना

अध्ययन अध्ययनों से पता चला कि जिंक से इलाज में कोई मदद नहीं मिलती

स्थिति स्वास्थ्य मंत्रालय की उपचार सूची में शामिल नहीं

आइवरमेक्टिन

संभावित साइड इफेक्ट चक्कर आना, पेट की दिक्कतें, कमजोरी

अध्ययन डब्ल्यूएचओ ने क्लिनिकल ट्रायल को छोड़ आइवरमेक्टिन के इस्तेमाल से परहेज करने को कहा है

स्थिति स्वास्थ्य मंत्रालय ने हल्के/गैर-लक्षण वाले मामलों में प्रयोग करने को कहा है

फेविपिराविर

संभावित साइड-इफेक्ट पेट संबंधी दिक्कतें, यूरिक एसिड का स्तर और लीवर के एंजाइम बढ़ा देती है

अध्ययन ग्लेनमार्क के अध्ययन में हल्के से थोड़ा भारी संक्रमण की दशा में फेविपिराविर से वायरस का असर चार दिन में घटने के संकेत

स्थिति हल्के मामलों के इसे न देने के निर्देश

रेम्डेसिविर

संभावित साइड- इफेक्ट ब्लड प्रेशर बढ़ना, दिल की धड़कन ऊपर नीचे होना, मतली

अध्ययन भर्ती मरीजों को तेजी से स्वस्थ करने में कारगर रही

स्थिति हल्के मामलों में प्रयोग की मनाही; गंभीर मामलों में आपातकालीनन इस्तेमाल की अनुमति

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन

संभावित साइड-इफेक्ट सिरदर्द, चक्कर आना, असमान धड़कन, मतली आना

अध्ययन डब्लयूएचओ के पैनल ने कोविड के उपचार में इसे कतई न देने की हिदायत दी है

स्थिति भारत में हल्के मामलों में इसका पांच दिन का कोर्स व्यापक चलन में (आइवरमेक्टिन और हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन में से एक का विकल्प दिया जाता है)

डेक्सामेथासोन सरीखे कार्टिकोस्टेरॉइड

संभावित साइड-इफेक्ट प्रतिरोधक शक्ति घटना, ब्लड शुगर बढ़ना

अध्ययन पता चला कि गंभीर मामलों में इसने मौत के अंदेशे को कम किया

स्थिति हल्के मामलों में प्रयोग की मनाही; भर्ती मरीजों पर सिर्फ आपातकालीन प्रयोग की अनुमति

ब्यूडेसोनाइड सूंघने की दवा

संभावित साइड-इफेक्ट सिरदर्द, नाक जाम हो जाना

अध्ययन कोविड की शुरुआत की स्थिति में इससे इलाज में मदद मिली

स्थिति हल्के मामलों में प्रयोग किए जाने को मंजूरी.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें