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विश्व कप जाएगी दर्शकों की टीम

इस साल कतर में होने जा रहे वर्ल्ड कप में जुनूनी फुटबॉल प्रेमी दर्शक करेंगे भारत का प्रतिनिधित्व.

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 सारे जहां में फीफा वर्ल्ड कप मैचों जितना जुनून शायद ही किसी खेल में दिखता हो सारे जहां में फीफा वर्ल्ड कप मैचों जितना जुनून शायद ही किसी खेल में दिखता हो

अखिल सूद

अरुणाचल प्रदेश के ओकेन तायेंग ईटानगर से हमसे बात करते हुए आने वाले कतर विश्व कप को साफ लफ्जों में परिभाषित करते हैं. उनके लिए यह एक तरह का जश्न है. वे कहते हैं, ''मैं विश्व कप टेलीविजन पर देखते बड़ा हुआ, पर यह टूर्नामेंट कभी लाइव नहीं देख पाया.’’ पहले उन्होंने जाने की कोशिश की, पर न 'समय जुटा सके, न पैसा’. अलबत्ता इस साल वे अपने पांच दोस्तों के साथ कतर जा रहे हैं. वे कहते हैं, ''अगस्त में मैं 50 का हो जाऊंगा और यह जश्न मनाने का मेरा तरीका है. मैं समझता हूं मुझे विश्व कप देखने का हक है.’’

तायेंग की आवाज में दिखने वाला उत्साह तर्कसंगत है. स्पोर्ट्स कैलेंडर के कम ही आयोजन दुनिया भर में वैसा जुनून और उन्माद पैदा करते हैं जैसा फुटबॉल का विश्व कप करता है. 2014 के विश्व कप के लिए ब्राजील जाने वाले और सल्वाडोर में दो-एक मैच देखने वाले 34 वर्षीय अंकित सोबती कहते हैं, ''सड़क पर रोज जैसे जलसे और पार्टियां चलती थीं. जिस शहर में मैच होता, वहां होने का मतलब यही था कि वहां लोगों के अलग-अलग समूहों को आते और उन्हें वक्त गुजारते देखें; पूरा डायस्पोरा ही बदल जाता. यह दिलकश था.’’ अमेरिका के टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल सोबती उस वक्त मुंबई में थे. उन्हें याद है कि कैसे उन्होंने ब्राजील का सबसे सस्ता टिकट खोजा.

खुशी और उत्साह तो अपनी जगह है पर फीफा का विवादों से भी गहरा नाता रहा है. इस साल के विश्व कप के लिए नीलामी की प्रक्रिया और कतर में प्रवासी कामगारों के साथ सुलूक के मसले पर लोगों का ध्यान गया है. साथ ही, फीफा विश्व कप के इतिहास में पहली बार यह सर्दियों के महीनों नवंबर और दिसंबर में आयोजित किया जाएगा. इससे यूरोप में कुछ लोगों की त्योरियां चढ़ गई हैं क्योंकि वहां लीग सीजन में खलल पड़ेगा. यह सारा शोर-शराबा अलबत्ता मुरीदों के उस जोश पर कोई असर नहीं डाल सका जो धीरे-धीरे शिखर की तरफ बढ़ रहा है.

हालात, निवेश और अत्याधुनिक सुविधाओं को देखते हुए यह निश्चित जान पड़ता है कि कतर विश्व कप बिल्कुल अनोखा होगा. इलाके के अत्यधिक तापमान का मुकाबला करने के लिए स्टेडियमों में विशाल एयरकंडीशनिंग प्रणालियां लगाई गई हैं. तायेंग कहते हैं, ''टेक्नोलॉजी ही अपने आप में इतनी आकर्षक है. यह बस एक और विश्व कप भर नहीं है.’’

यही नहीं, ज्यादा मुरीदों को जगह देने का तरीका यह निकाला गया है कि 'मैच डे शटल’ से यात्री दुबई और मस्कट सरीखे पड़ोसी इलाकों में रहेंगे और गेम्स के लिए उड़कर कतर आ सकेंगे. टूर्नामेंट में जो भारतीय भाग लेना चाहते हैं, उनके लिए फीफा अधिकृत वैश्विक कंपनी 'मैच हॉस्पिटैलिटी’ ने विश्व कप के आधिकारिक आतिथ्य कार्यक्रमों के लिए पूरी तरह केवल भारत के सेल्स एजेंट फैनेटिक स्पोर्ट्स ऐंड कटिंग ऐज की नियुक्ति की है.

अब अमेरिका में रह रहे कंपनी एग्जीक्यूटिव 58 वर्षीय निखिल बसु ने अपने 29 और 25 वर्षीय दो बेटों के लिए कतर एयरलाइंस के पैकेज (जो 3,800 डॉलर से शुरू होता है) के जरिए कतर के टिकट बुक किए हैं, जिसमें वे दो दौर के 16 गेम देख सकेंगे. उनका बेटा इंग्लैंड टीम का मुरीद है, जबकि बसु अर्जेंटीना के समर्थक हैं. वे कहते हैं, ''मेरी बीवी अर्जेंटीना की है तो हम लड़ नहीं सकते ना!’’ 1970 के दशक में बड़े होते वक्त फुटबॉल से उनका कम ही साबका पड़ा था—''उन दिनों आपके पास टीवी मुश्किल से होता था; कुछ भी टेलीविजन पर नहीं दिखाया जाता था’’—ब्रिटेन में कुछ वक्त रहने के बाद पांच साल की उम्र से वे आर्सेनल के मुरीद हैं.

बसु कहते हैं, ''इंतजाम शानदार होंगे. यह उन खौफनाक कहानियों की तरह नहीं होगा जैसी आप यूरो 20 फाइनल (पिछले साल आयोजित और उपद्रवों से तार-तार) और हाल में हुए यूईएफए चैंपियनशिप लीग फाइनल (जिसमें फ्रांसीसी पुलिस पर स्टेडियम के बाहर लिवरपूल के प्रशंसकों के खिलाफ कथित अनावश्यक और अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगे) के बारे में सुनते हैं. कतर को इतना कुछ दिखाना और साबित करना है. मैं समझता हूं यह अविश्वसनीय आयोजन होने जा रहा है. सब कुछ बिल्कुल चाक-चौबंद होना चाहिए.’’

दिल्ली और मुंबई में रहने वाले 35 वर्षीय वरुण खुल्लर को भी विश्व कप की सह-प्रायोजक एक क्लाइंट कंपनी के जरिए टिकट मिलने की उम्मीद है. आधिकारिक तौर पर संदेश नहीं मिलने के कारण अपनी योजनाओं को लेकर अभी वे थोड़ा ढुलमुल हैं, पर जाने की संभावना मात्र से रोमांचित हैं. उन्हें लगता है कि भारत से अंतत: ढेरों मुरीद विश्व कप आयोजित करने वाले देश के 'अनुभव’ के बजाए फुटबॉल की खातिर ज्यादा जाएंगे. खुल्लर याद करते हैं कि 2014 में वे 'इस खेल के आध्यात्मिक घर’ ब्राजील जाना चाहते थे, पर नहीं जा सके.

मौजूदा सरकारी अधिकारी 30 वर्षीय राहुल (आग्रह पर बदला हुआ नाम) 2018 के विश्व कप के लिए एक दोस्त के साथ रूस के पांच शहरों में गए थे और लीग स्टेज के तीन मैच उन्होंने देखे थे. मूलत: बेंगलूरू के रहने वाले राहुल बताते हैं कि रूस किस तरह सहभागी देशों के मुरीदों, मुसाफिरों और स्थानीय लोगों के साथ दुनिया भर के लोगों का 'मिलन स्थल’ बन गया था. वे हंसते हुए कहते हैं, ''मुझे वहां दो-एक ऐसे लोगों से मिलना याद है जो मुझे अनूप जलोटा और सीता और गीता के बारे में बता रहे थे!’’

जहां तक कतर की बात है, देश के कानून और रूढ़िवादी संस्कृति उस बेलौस और स्वतंत्रचेता बर्ताव से शायद मेल न खा सके जिसके लिए फुटबॉल के मुरीद पारंपरिक तौर पर जाने जाते हैं. मसलन, कतर के अमीर ने परोक्ष रूप से आश्वासन दिया है कि उनके देश के समलैंगिकता विरोधी कानून के बावजूद समलैंगिक प्रशंसकों का स्वागत किया जाएगा और साथ ही उन्होंने आगंतुकों से यह भी कहा कि वे ''हमारी संस्कृति का सम्मान’’ करें. शराब की खातिर दिशानिर्देशों में छूट दी गई है और यह स्टेडियमों में परोसने दी जाएगी.

बसु कहते हैं, ''मैं मानकर चल रहा हूं कि वे ढील देंगे.’’ वे इस सबके तजुर्बे के लिए उत्सुक हैं और जापान में हुए रग्बी विश्व कप (2019) का हवाला देते हैं. उनका बेटा टिकटों का इंतजाम किए बिना वहां गया था और फिर भी उसने खचाखच भरी सड़कों और भीड़ भरे बारों के साथ चौतरफा पसरी चहल-पहल की बदौलत शानदार वक्त बिताया. विश्व कप आयोजनों की यही खासियत है. यह हर चार साल में होने वाला वैश्विक तमाशा है, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें लगी होती हैं.

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