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विपक्षः विरोध में तो साथ मगर संदेह भी

विपक्षी पार्टियों ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा से लोहा लेने के लिए कदम आगे बढ़ाया, लेकिन कामयाबी का दारोमदार कांग्रेस की पहल और प्रदर्शन पर निर्भर

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ताकत का प्रदर्शन राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेता 12 अगस्त को संसद के वर्षाकालीन सत्र के अचानक खत्म किए जाने का विरोध करते हुए ताकत का प्रदर्शन राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेता 12 अगस्त को संसद के वर्षाकालीन सत्र के अचानक खत्म किए जाने का विरोध करते हुए

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 20 अगस्त को 18 दूसरी राजनैतिक पार्टियों के नेताओं के साथ वर्चुअल बैठक की, ताकि केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ साझा मोर्चा बनाया जा सके. मोटे तौर पर ये सभी पार्टियां भाजपा की विरोधी हैं. हाल के दौर में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से आयोजित ऐसी यह तीसरी बैठक थी. संसद के मॉनसून सत्र के दौरान राहुल गांधी भी दो बार विपक्षी नेताओं से मिले. एक बार उन्होंने उन्हें नाश्ते पर बुलाया. इस सारी पहल को 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद पहली बार कांग्रेस की तरफ से भाजपा-विरोधी पार्टियों का गठबंधन बनाने की संगठित और गंभीर कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.

अगले लोकसभा चुनाव तीन साल दूर हैं. फिर गठबंधन बनाने की यह हड़बड़ी क्यों? लगता है कि विपक्षी दलों को यह एहसास हो गया कोविड-19 महामारी से हुई मौतों और आर्थिक तबाही से पैदा लोगों की मायूसी का फायदा उठाने के लिए भाजपा के खिलाफ जोरदार और सिलसिलेवार नैरेटिव खड़ा करना जरूरी है. इस कोशिश को कुछ और चीजों से बल मिला. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की करारी मात से उत्साहित मुख्यमंत्री तथा टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) प्रमुख ममता बनर्जी कांग्रेस सहित विपक्षी नेताओं से मुलाकात के लिए दिल्ली आईं और उन्होंने खुद को भाजपा-विरोधी गठबंधन को जोड़ने वाली सबसे अहम शख्सियत के तौर पर स्थापित करने का जतन किया. उससे पहले राकांपा (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) के सर्वेसर्वा शरद पवार ने भी विपक्षी नेताओं के साथ बातें-मुलाकातें कीं. इस सबने कांग्रेस को विपक्षी पाले में अपनी अगुआ की हैसियत का दावा करने के लिए प्रेरित किया.

नेतृत्व का मुद्दा वैसे गैर-कांग्रेसी विपक्षी दलों के बीच ज्यादा चिंता का सबब नहीं लगता. ज्यादातर नेता एकमत हैं कि विपक्षी गठबंधन की चुनावी कामयाबी अलहदा राज्यों में तमाम पार्टियों की संगठन क्षमता के आधार पर सीटों के व्यावहारिक बंटवारे पर निर्भर करेगी. राजद (राष्ट्रीय जनता दल) के राज्यसभा सदस्य प्रोफेसर मनोज कुमार झा कहते हैं, ''नेतृत्व के मुद्दे पर चर्चा की जरूरत ही नहीं थी. आम राय है कि हम सहयोगी संघवाद के मॉडल पर चलेंगे. क्षेत्र विशेष में जो भी पार्टी मजबूत है, वह उस क्षेत्र में अगुआई करेगी. इसलिए राजद को बिहार में अच्छा प्रदर्शन करना है, तो कांग्रेस को भी उन राज्यों में नतीजे देने होंगे जहां वह भाजपा के खिलाफ सीधे मुकाबले में है. इसमें भला टकराव कहां है. इसलिए अभी नेतृत्व का मुद्दा अहम कतई नहीं है. अभी तो अपनी ताकत बढ़ाने पर जोर देना ही सबसे अहम है.''

विरोध में तो साथ मगर संदेह के साथ
विरोध में तो साथ मगर संदेह के साथ

बेशक, कागजों पर यह व्यवस्था कारगर मालूम देती है, पर गठबंधन की कामयाबी अंतत: कांग्रेस के प्रदर्शन से ही तय होगी. यह अखिल भारतीय मौजूदगी वाली अकेली पार्टी है और यही बात उसे अनायास गठबंधन की धुरी बना देती है. मगर चुनावी नजरिए से देखें, तो फिलहाल वह विपक्षी पार्टियों में सबसे कमजोर नजर आती है. 11 राज्यों की 108 सीटों पर (देखें ग्राफिक आमने-सामने) कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है. गौरतलब है कि कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव में इनमें से महज पांच सीटें जीतीं और सात राज्यों में उसका खाता तक नहीं खुला.

इसके अलावा 10 राज्यों में 205 सीटें और हैं जहां कांग्रेस का दबदबा है या वह प्रमुख प्रतिद्वंद्वी है (देखें ग्राफिक). 2019 में कांग्रेस ने इनमें से 41 सीटें जीतीं, जिनमें से 31 सीटें महज तीन राज्यों केरल, तमिलनाडु और पंजाब से आईं. हाल में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन से भी उसकी तकदीर बदलती दिखाई नहीं देती. तमिलनाडु में वह द्रमुक (द्रविड मुनेत्र कडगम) की अगुवाई वाले गठबंधन में जूनियर भागीदार थी. असम में, जहां 2019 में उसने तीन सीटें जीती थीं, वह भाजपा से बहुत पीछे दूसरे नंबर पर रही. ज्यादा फिक्र की बात यह है कि केरल में, जहां 2019 में उसने किसी एक राज्य से सबसे ज्यादा 15 सीटें जीती थीं, वह गद्दीनशीन वामदलों को असरदार चुनौती नहीं दे पाई. पंजाब में, जहां उसने आठ सीटें जीती थीं, अंतर्कलह पार्टी के लिए अच्छा शगुन नहीं है.

फिर आश्चर्य क्या कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में एम.के. स्तालिन को इस साल हुए विधानसभा चुनाव में विजेता बनकर उभरने में मदद करने वाले चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने करीब 300 सीटों की पहचान की, जहां 2024 में जीत की कोशिश के लिए कांग्रेस को अभी से योजना बनानी शुरू कर देनी चाहिए. उन्होंने कांग्रेस में शामिल होने की अपनी इच्छा पार्टी को बता दी है और पार्टी में नई जान फूंकने की विस्तृत योजना भी पेश की है. ममता, पवार और विपक्ष के दूसरे नेताओं के साथ मेलजोल रखते हुए भी प्रशांत किशोर ने साफ कर दिया कि कांग्रेस के बगैर कोई विपक्षी गठबंधन कामयाब नहीं हो सकता.

अलबत्ता, देश की सबसे पुरानी पार्टी को नतीजे देने हैं, तो उसे अपना घर दुरुस्त करना होगा. पहले तो वह पार्टी में नेतृत्व को लेकर ऊहापोह खत्म करे. यानी अध्यक्ष पद नियुक्ति साफ करके और अपने नेताओं और काडर में एकजुटता कायम करे. 2019 के लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेकर जब से राहुल ने इस्तीफा दिया, सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष बनी हुई हैं. मगर यह राहुल को पार्टी से संबंधित फैसले लेने में आड़े नहीं आया. प्रियंका गांधी के तीसरे सत्ता केंद्र के तौर पर उभरने से गफलत बढ़ी ही है. इस व्यवस्था से निजात पाने के लिए ही 23 कांग्रेस नेताओं ने पिछले साल अगस्त में सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर अध्यक्ष पद का चुनाव करवाने के साथ संगठन में फेरबदल की मांग की थी, जिन्हें अब जी-23 के रूप में जाना जाता है.

उसके बाद अध्यक्ष पद और दूसरे पदों पर चुनाव करवाने का वादा तो किया गया, पर महामारी के वजह से उसे लगातार टाला जाता रहा. ऐसा लगता है कि पार्टी शायद इस साल के आखिर में चुनाव करवाए, हालांकि यह अब भी साफ नहीं है कि गांधी परिवार का कोई सदस्य चुनाव लड़ेगा या नहीं. पार्टी के फैसलों में राहुल की सक्रिय हिस्सेदारी—खासकर राज्य कांग्रेस अध्यक्षों की नियुक्ति और संसद में पार्टी की अगुआई—के मद्देनजर यह कयास लगाया जा रहा है कि पार्टी के शिखर पर जल्द ही राहुल की वापसी लगभग तय है.

इस बीच, जी-23 के कुछ नेताओं से उनके नेतृत्व को आहिस्ते-से चुनौती देने के भी संकेत हैं. कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने 8 अगस्त को अपनी 74वीं सालगिरह के मौके पर लगभग सभी विपक्षी नेताओं को न्यौता. उस बैठक में नहीं बुलाया गया तो बस कांग्रेस नेतृत्व को नहीं बुलाया. उस रात्रिभोज में राकांपा प्रमुख शरद पवार, राजद प्रमुख लालू प्रसाद, सप (समाजवादी पार्टी) प्रमुख अखिलेश यादव और तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ'ब्रायन शामिल हुए. शशि थरूर, मनीष तिवारी और आनंद शर्मा सरीखे जी-23 के कुछ सदस्य भी मौजूद थे, तो पंजाब के शिरोमणि अकाली दल और ओडिशा के बीजद (बीजू जनता दल) के नुमाइंदे भी पहुंचे थे.

सूत्रों का कहना है कि उस रात्रिभोज में कांग्रेस के कायापलट पर चर्चा प्रमुख मुद्दों में थी. सूत्रों के मुताबिक, आम राय यह थी कि कांग्रेस को आगे रहकर अगुआई करनी होगी, पर पहले उसे अपने आंतरिक ढांचे को मजबूत करना होगा और अपने घर को दुरुस्त करने के अलावा नेताओं-कार्यकर्ताओं में भरोसा जगाना होगा. हालांकि कुछ नेताओं ने खुलकर कहा कि कांग्रेस का कायापलट तभी हो सकता है जब पार्टी को 'गांधी परिवार के चंगुल से मुक्त' किया जाए.

मगर कांग्रेस के शीर्ष नेता इस नैरेटिव से परेशान दिखाई नहीं देते. कांग्रेस के महासचिव और संचार विभाग के प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला कहते हैं, ''अपने जन्मदिन पर किसी व्यक्ति के पसंदीदा मेहमानों की फेहरिस्त के बारे में मैं कुछ नहीं कहूंगा. गांधी परिवार जीवन और आजिविकाओं पर बेरहम हमला बोल देने वाली और राष्ट्रीय सुरक्षा तथा भूभागीय अखंडता को जोखिम में डाल देने वाली मगरूर सरकार के खिलाफ वैकल्पिक नैरेटिव तैयार कर रहा है. विपक्षी दल सहमत हैं कि हमारे गठबंधन का केंद्र बिंदु मोदी सरकार से निजात पाकर देश के बुनियादी मूल्यों की रक्षा करना है. इसे हासिल करने के लिए उन्हें कांग्रेस के साथ काम करना ही चाहिए.''

विपक्ष के कुछ नेता गांधी परिवार के साथ काम करने को लेकर अभी भी चौकन्ने हैं. यह सिब्बल के रात्रिभोज में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मौजूदगी से भी जाहिर था. वे कांग्रेस की अगुआई वाली विपक्षी पार्टियों की किसी भी बैठक से बचते रहे हैं. यहां तक कि सोनिया गांधी द्वारा बुलाई गई 20 अगस्त की बैठक से भी यह कहकर दूर रहे कि वे उत्तर प्रदेश के दूर-दराज इलाके में हैं. कुछ और भी नेता ऐसी बैठकों से बचते रहे हैं. उनमें बसपा (बहुजन समाज पार्टी) की प्रमुख मायावती और दिल्ली के मुख्यमंत्री तथा आप (आम आदमी पार्टी) के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल भी हैं.

साझा नैरेटिव को लेकर भी विपक्षी पार्टियों में कुछ मतभेद हैं. मसलन, 20 अगस्त की बैठक में कई नेताओं ने पेगासस जासूसी कांड को चर्चा का बड़ा मुद्दा बनाने को लेकर एतराज जताया. उन्होंने कहा कि ऐसा तकनीकी किस्म का कोई मुद्दा ग्रामीण वोटरों के दिलों को छुएगा, इसकी संभावना कम है

बहरहाल, ऐसी कुछेक अड़चनों से विपक्षी खेमे का जज्बा फीका नहीं पड़ा है. टीएमसी के डेरेक ओ'ब्रायन कहते हैं, ''ओलंपिक के हॉकी मैचों में हमने देखा कि टीमों की किस्मत मैच के हर चौथाई हिस्से में कैसे बदल जाती है. पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु में भाजपा को मटियामेट किए तीन महीने हुए हैं. दूसरे चौथाई हिस्सों का इंतजार करें. मैच अभी खत्म नहीं हुआ है.'' यकीनन, मैच खत्म नहीं हुआ है, मगर दमदार स्ट्राइकर दरकार है.

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