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साख पर संशय

राजीव गांधी फाउंडेशन और गांधी परिवार के नाम पर बने दूसरे ट्रस्टों को चीनी चंदे की राजनीति और सचाई

चद्रदीप कुमार चद्रदीप कुमार

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 8 जून को एक अंतर-मंत्रालयी समिति का गठन किया. यह समिति कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के मातहत चल रहे तीन न्यासों में धन शोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए), आयकर अधिनियम और विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) सरीखे कानूनों के विभिन्न प्रावधानों के उल्लंघन की जांच में तालमेल के लिए बनाई गई. समिति के प्रमुख प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के स्पेशल डायरेक्टर हैं और यह राजीव गांधी फाउंडेशन (आरजीएफ), राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट (आरजीसीटी) और इंदिरा गांधी स्मारक न्यास (आइजीएमटी) के मामलों की जांच-पड़ताल करेगी. यह फैसला तब लिया गया जब करीब दो हफ्ते पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कई नेताओं ने आरोप लगाया कि आरजीएफ ने चीन के हितों को बढ़ावा देने के लिए चीनी सरकार से धन लिया था. ये आरोप ऐसे समय लगे जब लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पीएलए के अतिक्रमणों के चलते देश में चीन विरोधी भावनाओं का ज्वार आया हुआ था.

भाजपा ने चीन के साथ आरजीएफ के जुड़ावों को सामने लाने के लिए कई चीजों पर जोर दिया. आरजीएफ की सालाना रिपोर्टों के मुताबिक, 2006 और 2007 में चीनी सरकार और दूतावास उसके दानदाताओं की सूची में थे. यह मुद्दा भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने सबसे पहले मध्य प्रदेश की एक वर्चुअल रैली में उठाया. वहीं केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पूछा कि क्या यह चंदा भारत और चीन के बीच मुक्त व्यापार समझौते की तरफदारी के लिए 'रिश्वत' के तौर पर दिया गया था. बाद में नड्डा ने भी कहा कि कांग्रेस ने 2008 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जिस सहमति पत्र पर दस्तखत किए थे, उसके बारे में उसे सब कुछ खुलकर बताना चाहिए. उन्होंने पार्टी की इस बात के लिए भी तीखी आलोचना की कि उसने यूपीए की हुकूमत के दौरान कई केंद्रीय मंत्रालयों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) को आरजीएफ को चंदा देने के लिए मजबूर किया. भाजपा नेता दावा करते हैं कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष का धन भी उसके मूल उद्देश्यों से हटकर आरजीएफ को दिया गया.

कमजोर फाउंडेशन?

तीनों ट्रस्ट में 1, अकबर रोड, नई दिल्ली स्थित आइजीएमटी सबसे पुराना है. इसकी स्थापना 1985 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन और विरासत के सम्मान में की गई थी. यह ट्रस्ट इंदिरा गांधी स्मारक संग्रहालय और शांति, निशस्त्रीकरण तथा विकास के लिए वार्षिक इंदिरा गांधी पुरस्कार का कामकाज देखता है. पूर्व पत्रकार सुमन दुबे इसके सेक्रेटरी हैं. आरजीएफ की स्थापना साक्षरता, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और विमानन में उत्कृष्टता के साथ साधनहीन और विकलांग लोगों को ताकतवर बनाने के क्षेत्रों में काम करने के लिए 1991 में हुई थी. आरजीएफ के न्यासियों में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम, योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, अर्थशास्त्री डॉ. अशोक गांगुली, दुबे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी-वाड्रा और डेवलपमेंट एक्टिविस्ट विजय महाजन शामिल हैं. महाजन इसके सेक्रेटरी और सीईओ भी हैं.

यह पहली बार नहीं है जब आरजीएफ सार्वजनिक छानबीन की जद में आया है. 24 जुलाई 1991 में तब के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने बजट भाषण में ऐलान किया था कि केंद्र सरकार ''राजीव गांधी को श्रद्धांजलि (के तौर पर) और फाउंडेशन के प्रशंसनीय उद्देश्यों के समर्थन में'' फाउंडेशन को 100 करोड़ रुपए का योगदान देगी, जो हर साल 20 करोड़ की दर से पांच वर्ष तक दिए जाएंगे. हालांकि आरजीएफ ने बाद में यह पेशकश नामंजूर कर दी, लेकिन इस ऐलान से प्रेरित होकर 2010 में एक अपील दायर करके मांग की गई कि आरजीएफ को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाया जाए. अपील इस आधार पर खारिज कर दी गई कि आरजीएफ को सार्वजनिक प्राधिकार नहीं माना जा सकता क्योंकि इसने सरकार से महज 4 फीसद अनुदान सहायता हासिल की—जो किसी भी संस्थान को सार्वजनिक प्राधिकार घोषित करने के लिए जरूरी न्यूनतम 20 फीसद से कम थी.

आरजीएफ के मातहत राजीव गांधी समकालीन अध्ययन संस्थान (आरजीआइसीएस) भी काम करता है, जिसकी स्थापना भारत के सामने मौजूद चुनौतियों को लेकर अनुसंधान करने तथा नीति विकसित करने के लिए राष्ट्रीय नीतिगत थिंक-टैंक के तौर पर अगस्त 1991 में की गई थी. महाजन इसके डायरेक्टर के तौर पर भी काम करते हैं. आरजीसीटी की स्थापना टिकाऊ असर डालने वाले कार्यक्रमों पर अमल के जरिए साधनहीनों की विकास जरूरतों को पूरा करने के लिए की गई थी. इसके न्यासियों में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, डॉ. गांगुली और चार्टर्ड अकाउंटेंट बंसी मेहता शामिल हैं जबकि सोशल एक्टिविस्ट और 2009 के मैग्सेसे अवार्ड विजेता दीप जोशी इसके सीईओ हैं. तीनों न्यासों—आरजीएफ, आरजीआइसीएस और आरजीसीटी—की प्रमुख सोनिया गांधी हैं. तीनों के दफ्तर जवाहर भवन में हैं, जिसकी मिल्कियत जवाहर भवन ट्रस्ट (जेबीटी) के पास है और इसकी प्रमुख भी मौजूदा पार्टी अध्यक्ष हैं.

यहां तक कि जवाहर भवन के इस्तेमाल पर भी सुब्रह्मण्यम स्वामी सरीखे नेताओं ने उंगली उठाई है. 1989 में निर्मित तिमंजिला जवाहर भवन संसद से महज 500 मीटर की दूरी पर 9,319 वर्ग गज जमीन पर फैला है. यह जमीन 1988 में कांग्रेस को पार्टी मुख्यालय का भवन बनाने के लिए आवंटित की गई थी, जो कभी नहीं बना. 28 दिसंबर 1995 को केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने जेबीटी की तरफ से पेश एक अर्जी के आधार पर आरजीएफ को इस जमीन और भवन के मुफ्त इस्तेमाल की इजाजत दे दी. साल 2015 में स्वामी ने केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय को चिट्ठी लिखी और उसमें ब्योरेवार बताया कि किस तरह कांग्रेस पार्टी के दफ्तर के लिए तय भवन को आरजीएफ ने हड़प लिया है और सरकार से निवेदन किया कि वह इस भूखंड को वापस लेकर भवन का राष्ट्रीयकरण करे. बाद में उन्होंने यही मुद्दा उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी लिखा.

आरजीएफ चीन के पक्ष में काम कर रहा?

गृह मंत्रालय में आरजीएफ के एफसीआरए का जो रिकॉर्ड है, उससे पता चलता है कि दिल्ली स्थित चीनी दूतावास ने 2006-07 में फाउंडेशन को 'अन्य खर्चों' के लिए 90 लाख रुपए दिए. आरजीएफ ने उससे पिछले साल भी दूतावास से 10 लाख रुपए लिए थे. आरजीआइसीएस के दानदाताओं की फेहरिस्त में दोनों साल के लिए पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार का नाम भी दर्ज है, हालांकि कोई ब्योरे नहीं दिए गए हैं. आरजीआइसीएस में भारत-चीन संबंधों को मजबूत बनाने के मकसद से अनुसंधान के व्यापक क्षेत्रों की पहचान के लिए भारत-चीन अध्ययन पर एक सलाहकार समूह है. अध्येताओं के आदान-प्रदान के लिए चाइना एसोसिएशन ऑफ इंटरनेशनल फ्रेंड्ली कॉन्टेक्ट के साथ इसका एक एमओयू है.

आरजीआइसीएस ने 16 मार्च 2007 को फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो ऐंड स्मॉल ऐंड मीडियम एंटरप्राइजेज के सहयोग से 'भारतीय एसएमई के लिए चीन में अवसर' विषय पर एक सेमिनार आयोजित किया. साल 2008 में इसने भारत और चीन के बीच आर्थिक रिश्तों पर केंद्रित दो सेमिनार—एक दिल्ली में और दूसरा बीजिंग में—आयोजित किए. उसी साल दो और प्रोजेक्ट लॉन्च किए गए—''भारत और चीन के विषय में धारणा अध्ययन'' और ''भारत और चीन में अनुसंधान और विकास संस्थाओं से उद्योग को टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण.''

ये जहां नियमित अकादमिक कवायदें थीं, भाजपा के हमले के केंद्र में 2008 का वह एमओयू था, जो कांग्रेस पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) के बीच हुआ था और जो ''उनके बीच नियमित उच्चस्तरीय आदान-प्रदान में मदद के लिए एक तंत्र कायम करने'' के लिए था. इस पर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और तब चीन के उपराष्ट्रपति तथा सीपीसी के पोलितब्यूरो की स्थायी समिति के सदस्य शी जिनपिंग ने दस्तखत किए थे. एमओयू पर दस्तखत सोनिया गांधी की मौजूदगी में किए गए थे, जो उस वक्त राहुल, बेटी प्रियंका और दामाद रॉबर्ट वाड्रा के साथ ओलंपिक खेलों के उद्घाटन समारोह में भाग लेने के लिए बीजिंग में थीं. नड्डा ने 23 जून को एक ट्वीट में कहा, ''पहले कांग्रेस सीपीसी के साथ एमओयू पर दस्तखत करती है. फिर कांग्रेस चीन को जमीन समर्पित कर देती है.''

कांग्रेस के संचार प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला ने भाजपा के खिलाफ तीखा जवाबी हमला बोला और चीनी सरकार तथा सीपीसी के साथ भगवा पार्टी के मेलजोल की तरफ इशारा किया. उन्होंने पूछा, ''क्या यह सच नहीं है कि आरएसएस ने 2009 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ एक विचार-विमर्श का आयोजन किया था? क्या रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 2008 में चीनी प्रतिनिधिमंडल का स्वागत और उसके साथ बैठक नहीं की थी? क्या यह सच नहीं है कि 11 जनवरी 2011 को तब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी अपनी अगुआई में प्रतिनिधिमंडल लेकर चीन गए थे और वहां विचार-विमर्श किया था? क्या यह सच नहीं है कि भाजपा ने चीन की राजनैतिक व्यवस्था के अध्ययन के लिए एक 13-सदस्यीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल चीन भेजा था? क्या ये भारत-विरोधी गतिविधियां थीं? क्या ये विचार-विमर्श भारत-विरोधी थे?'' कांग्रेस के एक महासचिव ने यह भी कहा, ''समझौते का उद्देश्य दो देशों की दो सबसे बड़ी पार्टियों के बीच आदान-प्रदान बढ़ाना था ताकि दो पड़ोसियों के बीच स्वस्थ रिश्ता बन सके. यूपीए की हुकूमत के दौरान भारत और चीन के बीच कुछ भी अप्रिय नहीं हुआ. अब मोदी के मातहत हम करीब-करीब युद्ध की तरफ बढ़ रहे हैं. दिक्कत यह है कि भाजपा कूटनीति नहीं समझती.''

आरजीआइसीएस ने अप्रैल 2009 में एक व्यवहार्यता अध्ययन—'भारत-चीन: मुक्त व्यापार समझौता'—किया, ताकि 'भारत और चीन के बीच एफटीए की बेहतर समझ हासिल' की जा सके. यह अध्ययन इस नतीजे पर पहुंचा कि अपनी अर्थव्यवस्था की दक्षता की वजह से व्यापार के तमाम पहलुओं में चीन को ज्यादा फायदा होगा, वहीं रिपोर्ट में यह सुझाव भी दिया गया कि दोनों देश एफटीए पर बातचीत शुरू करें क्योंकि यह 'व्यवहार्य, वांछनीय और परस्पर लाभदायक' होगा. अगले साल भी यही अध्ययन किया गया और वह भी ऐसे ही निष्कर्षों पर पहुंचा. आलोचकों की दलील है कि आरजीआइसीएस ने यह स्वीकार करते हुए भी कि व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में है, चीन के साथ एफटीए के पक्ष में जनमत बनाने का काम किया, शायद 'इसलिए कि आरजीएफ को चीनी चंदा' मिला था. प्रसाद ने कहा, ''मनमोहन सिंह की 10 साल की हुकूमत तमाम सबूतों से भरी पड़ी है जो दिखाते हैं कि किस तरह कांग्रेस पार्टी ने चीन की सहायता करने की कोशिश की और व्यापार घाटे को 33 गुना बढ़ने की इजाजत देकर उसे भारी रकम और मुनाफा कमाने दिया.''

आरजीआइसीएस ने अलबत्ता एनडीए की हुकूमत के दौरान भी अपने चीन अध्ययन जारी रखे. 2018-19 में इसने 'चीनी सामान—भारत में निर्माण और नौकरियों के सृजन' की रणनीति विकसित करने के लिए एक अध्ययन किया. इस बात के मद्देनजर कि भारत न तो चीन के साथ अपने आॢथक रिश्तों को सीमित करना गवारा कर सकता है और न ही भारी दोतरफा व्यापार घाटे को जारी रख सकता है, इस अध्ययन ने मजबूत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और अब तक चीन से आयात किए जा रहे सामान को स्थानीय स्तर पर बनाने की सलाह दी, क्योंकि इससे नौकरियों का सृजन और भारत में रोजगार के लायक कार्यबल की तादाद में इजाफा होगा. यह अध्ययन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत अभियान की पूर्वपीठिका की तरह मालूम देता है. 2018-19 में आरजीआइसीएस ने चीनी उद्यमियों और उद्योग मंडलों के साथ विचार-विमर्श का आयोजन किया और उनकी समस्याओं पर चर्चा की. एक और विचार-विमर्श कांग्रेस शासित प्रदेशों राजस्थान और मध्य प्रदेश में चीनी निवेश और चीन से उद्योग आकर्षित करने पर केंद्रित था.

दिलचस्प बात यह है कि 2006 के बाद से आरजीएफ या आरजीसीटी को सरकारी या निजी, कोई चीनी चंदा नहीं मिला. असल में आरजीएफ ने 2014 से, जब मोदी सरकार सत्ता में आई, कोई विदेशी रकम हासिल नहीं की, जबकि आरजीसीटी को उससे पिछले वित्तीय साल से ही कोई विदेशी चंदा नहीं मिला. पिछले साल उद्योग जगत की एक रिपोर्ट से पता चला कि लाभ-निरपेक्ष संगठनों को मिलने वाली विदेशी सहायता पर मोदी सरकार की कड़ी कार्रवाई का नतीजा यह हुआ कि बाहरी स्रोतों से धन की आमद में 40 फीसद की गिरावट आई. मसलन, 2006-07 में केवल दिल्ली में ही 1,184 संगठन एफसीआरए के तहत विदेशी सहायता हासिल करने के पात्र थे. 2019-20 में इनकी तादाद घटकर महज 14 रह गई. आरजीएफ के न्यासी पी. चिदंबरम कहते हैं, ''चीनी दूतावास से केवल एक चंदा मिला. खाते-बही दिखाएंगे कि यह दो वित्तीय साल के दौरान खर्च किया गया और विधिवत रिपोर्ट भी किया गया था.''

राहत कोष किसके लिए?

2005 से 2008 तक, जब कांग्रेस की अगुआई में यूपीए सत्ता में था, आरजीएफ को उसकी महिला और बाल विकास (डब्ल्यूसीडी) परियोजनाओं के लिए प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (पीएमएनआरएफ) से चंदे मिले. दिलचस्प बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, जिनकी हुकूमत के दौरान ये चंदे दिए गए, अब फाउंडेशन के न्यासी हैं. ट्रस्ट ने पीएमएनआरएफ से मिली धनराशियों के ब्योरे नहीं दिए.

जब पीएमएनआरएफ से चंदा दिया गया, तब सोनिया गांधी भी कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते पीएमएनआरएफ बोर्ड की सदस्य थीं. मोदी के सत्ता में आने के बाद उस बोर्ड में कांग्रेस अध्यक्ष को अनिवार्य रूप से शामिल करने का प्रावधान हटा दिया गया. नड्डा ने कहा, ''भारत के लोगों ने गाढ़ी कमाई का पैसा पीएमएनआरएफ में इसलिए दान दिया था ताकि उनके साथी जरूरतमंद नागरिकों की मदद की जा सके. इस सार्वजनिक धन को परिवार संचालित फाउंडेशन में ले जाना न सिर्फ बेशर्म धोखाधड़ी है बल्कि भारत के लोगों के साथ बड़ा विश्वासघात भी है. पीएमएनआरएफ बोर्ड में कौन बैठता था? सोनिया गांधी. आरजीएफ की अध्यक्ष कौन हैं? सोनिया गांधी.''

पीएमएनआरएफ की स्थापना 1948 में विभाजन के दौरान और उसके ठीक बाद पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए शरणार्थियों की सहायता के लिए की गई थी. इस कोष का इस्तेमाल अब प्राकृतिक आपदाओं में मारे गए लोगों या बड़े हादसों और दंगों के पीड़ित लोगों के परिवारों को तत्काल राहत प्रदान करने के लिए किया जाता है. हार्ट सर्जरी, किडनी प्रत्यारोपण, कैंसर के इलाज और तेजाब के हमलों सरीखे मामलों में चिकित्सा खर्च के लिए भी जरूरतमंदों को पीएमएनआरएफ से सहायता दी जाती है. कोष पूरी तरह सार्वजनिक योगदान से बना है और इसे कोई बजटीय सहायता नहीं मिलती.

भाजपा का आरोप है कि यूपीए के जमाने में न केवल पीएमएनआरएफ बल्कि दूसरे मंत्रालयों और पीएसयू को भी आरजीएफ को चंदा देने के लिए मजबूर किया गया. 2005-06 में गृह मंत्रालय ने डब्ल्यूसीडी परियोजनाओं के लिए आरजीएफ को चंदा दिया. भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी कहती हैं, ''यह राष्ट्रीय दिलचस्पी का विषय है कि सार्वजनिक निधि एक ऐसे प्राइवेट संगठन को क्यों दी जा रही थी जिसे आसानी से गांधी परिवार का निजी संयुक्त खाता करार दिया जा सकता है.''

इन आरोपों के जवाब में कांग्रेस पीएम-केयर्स या 'आपात स्थितियों में प्रधानमंत्री नागरिक सहायता और राहत कोष' की अपारदर्शिता की तरफ उंगली उठाती है. पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के तौर पर 28 मार्च को स्थापित यह कोष मौजूदा कोविड-19 महामारी सरीखी स्थितियों में राहत प्रदान करने के लिए समर्पित राष्ट्रीय कोष के तौर पर बनाया गया है. कांग्रेस मांग करती रही है कि पीएम-केयर्स कोष का ऑडिट करवाया जाए क्योंकि यह सरकारी कोष है. चिदंबरम कहते हैं, ''पीएम-केयर्स कोष को मार्च और अप्रैल में, जब चीनी सेनाओं ने भारत में घुसपैठ की थी, चीनी कंपनियों से बड़ी धनराशियां मिलीं. क्या प्रधानमंत्री सफाई देंगे?'' आरजीएफ सीईओ महाजन और आरजीसीटी के सीईओ जोशी ने इंडिया टुडे के सवालों का जवाब नहीं दिया.

यूपीए सरकार को निश्चित तौर पर सफाई देने की जरूरत है कि आपदा कोष का पैसा एक एनजीओ को क्यों दिया गया. भाजपा जिस वक्त यह मुद्दा उठा रही है—जब देश में चीन विरोधी भावनाओं का ज्वार आया हुआ है—वह जरूर राजनैतिक मंशा से प्रेरित लगता है. विदेशी चंदों और दूसरे वित्तीय स्रोतों और खर्चों के ब्योरे वर्षों से गृह मंत्रालय के पास हैं. मोदी सरकार 2015 से ही भारतीय एनजीओ को मिलने वाली विदेशी धनराशियों की नियमित छानबीन करती रही है. चिदंबरम कहते हैं, ''क्या बाद में आने वाली हर सरकार पिछली सरकारों की तरफ से मंजूर कानूनी रिटर्न को दोबारा खोल सकती है? अगर आपने आयकर रिटर्न या दाखिल किए गए दूसरे कानूनी दस्तावेजों के साथ ऐसा ही किया तो कल्पना कीजिए कैसी अफरा-तफरी मच जाएगी. क्या हम 10 साल या 20 साल पीछे जा सकते हैं? आइटी नियमों के तहत खातों के कागजात केवल करीब सात साल तक ही रखे जा सकते हैं.''

पारदर्शिता साफ तौर पर राजनैतिक पार्टियों के लिए ऐसा गुण है जिससे वे पल्ला छुड़ा सकती हैं. लेकिन लोग यकीनन बेहतर के हकदार हैं.

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