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अतिथि तुम कब आओगे

कोविड ने करोड़ों लोगों को रोजगार देने वाले होटल उद्योग की कमर तोड़कर रख दी. इस मार में सैकड़ों होटलों के तो हमेशा के लिए बंद हो जाने का अंदेशा

चंद्रदीप कुमार चंद्रदीप कुमार

बरेली के 42 वर्षीय गुरमीत शहर के बड़े कपड़ा व्यापारी हैं. कारोबार के सिलसिले में देश के दूसरे कई शहरों के अलावा कानपुर भी जाना होता है, जहां वे सिविल लाइन्स के मॉल रोड स्थित ओरिएंट होटल में ठहरते हैं. लेकिन अभी पिछले ही पखवाड़े बिजनेस की एक मीटिंग के लिए वे यहां पहुंचे तो लॉकडाउन में ढील के बावजूद होटल बंद था. क्यों? होटल मालिक विजय पांडे फूट पड़ते हैं, ''तीन महीने से बंद पड़ा होटल हम चाहकर भी अभी नहीं खोल सकते. चलते रहने पर मेनटेनेंस होती रहती है. बंद होने पर सीलिंग, फ्लोरिंग, बाथरूम फिटिंग्स जैसी कई चीजें खराब हो जाती हैं. होटल दोबारा शुरू करने के लिए निवेश चाहिए और निवेश कोई कारोबारी तभी करेगा जब उसे भविष्य में कुछ बेहतर होता दिखे.''

इधर, दिल्ली-एनसीआर में गाजियाबाद के एक चार सितारा होटल का पिछले हक्रते का दृश्य देखें. शाम के यही कोई चार-पांच बजे के बीच का वाकया होगा. एंट्री गेट पर शील्ड, ग्लव्स पहने खड़े दरबान, टेक्वप्रेचर चेकिंग और हाथ सैनेटाइज करने के बाद अंदर प्रवेश, रिसेप्शन पर एयरपोर्ट की तरह कांच की शील्ड, कॉन्टैक्टलेस पेमेंट का इंतजाम, ग्राहक की एंट्री के बाद पेन का भी सैनेटाइजेशन. और भी कई दिशानिर्देश. सामान्य दिनों में यह शिफ्ट बदलने का समय होता है. नाम न छापने की शर्त पर एक एग्जीक्यूटिव हालत बयान करती हैं, ''होटल में एक भी ग्राहक नहीं. तीन की बजाए दो ही शिफ्ट में, घंटे बढ़ाकर मैनेज कर रहे हैं. एक-तिहाई से भी कम स्टाफ बुला रहे हैं.''

दरअसल, यह कानपुर और गाजियाबाद की कहानी नहीं, कोविड-19 के चलते लागू लॉकडाउन ने पूरे देश में होटल या कहें कि हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री की चूलें हिलाकर रख दी हैं. और कोरोना के मरीजों की तेजी से बढ़ती संख्या को देखते हुए राज्यों में रोज बढ़ रहे लॉकडाउन और क्वारंटीन की अवधि से सूरतेहाल जल्द बदलने की भी कोई उम्मीद नहीं दिखती.

टुरिस्ट सीजन कोविड की भेंट

लॉकडाउन ने पर्यटन और व्यावसायिक दोनों तरह की यात्राएं पूरी तरह बंद कर दीं. यही दो होटलों को धंधा मिलने के मुख्य स्रोत हैं. फेडरेशन ऑफ एसोसिएशंस इन इंडियन टुरिज्म ऐंड हॉस्पिटैलिटी (फेथ) के कंसल्टिंग सीईओ आशीष गुप्ता बताते हैं, ''होटलों के बिजनेस के लिहाज से गर्मी की छुट्टिïयों का सबसे बड़ा सीजन होता है. घरेलू पर्यटन का 65 फीसद बिजनेस मई और जून के महीने में आता है.'' और इस दफा यह पूरा सीजन ही कोविड की भेंट चढ़ गया. गर्मी की छुट्टियों के अलावा दुर्गा पूजा और क्रिसमस पर पर्यटन होता है, लेकिन इस साल इन त्यौहारों पर भी धूमधाम की गुंजाइश ही कहां है.

पर्यटन के लिए पैसा, समय, अवसर, मन और माहौल सबका होना जरूरी है. ऐसी स्थिति में जब कोरोना अभी बढ़ता ही जा रहा है, जब तक इसके थमने के संकेत नहीं मिलते, लोग घरों से भला क्यों निकलेंगे? बंदी के कारण लोगों के हाथ में पैसा भी नहीं आ रहा है. इसका असर भी स्वाभाविक है. विदेशी पर्यटन के लिहाज से अक्तूबर से मार्च पीक सीजन होता है. लेकिन इस साल विदेशी सैलानी आएंगे भी तो किस मुल्क से? वैसे भी आने वालों की बुकिंग इन्हीं दिनों में शुरू हो जाती है और फिलहाल तो यह शून्य है. अभी घरेलू विमान सेवाएं ही पूरी तरह से चालू नहीं हो पाई हैं, अंतरराष्ट्रीय उड़ाने तो दूर की कौड़ी हैं.

आशीष अपनी बात को और स्पष्ट करते हैं, ''बिजनेस ट्रैवल देश में मुख्य रूप से दो वजहों से होता है. पहला रेगुलर मीटिंग और दूसरा डीलर्स मीटिंग या ऑफिस स्टाफ के ग्रुप ट्रिप. यहां भी कोविड के बाद स्थिति जल्द सामान्य होने की उम्मीद नहीं है.'' ऑनलाइन वेबिनार, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या वर्क फ्रॉम होम जैसी व्यवस्थाएं अब स्थायी हो रही हैं, दूसरे सेक्टर के प्रोफेशनल्स भले इससे राहत की सांस ले रहे हों, लेकिन होटल बिजनेस वालों की तो इससे सांस ही फूलने लगी है. अगर आवाजाही और होटलों में ठहरे बगैर ये सब काम यूं ही दूर-दूर बैठ हुए ही होने लगे तो होटल वालों के लिए तो कीर्तन करने की नौबत आ जाएगी. वल्र्ड ट्रैवल ऐंड टुरिज्म काउंसिल के मुताबिक, 2019 (जनवरी से दिसंबर) के दौरान ट्रैवल और टुरिज्म की जीडीपी में 9.4 फीसद हिस्सेदारी पर्यटन और 6 फीसद व्यावसायिक यात्राओं से जुड़ी थी. इस अनुपात में किसी होटल चेन या किसी शहर के लिहाज से फेरबदल हो सकता है. दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में बिजनेस ट्रैवल अधिक है, जबकि गोवा जैसे डेस्टिनेशन पर बड़ी हिस्सेदारी टुरिज्म की है.

किसी के पल्ले पैसा नहीं

होटलों में इस समय ऑक्युपेंसी न के बराबर है यानी पैसे की आमद पूरी तरह बंद. इसके बावजूद होटल के बुनियादी खर्चे तो रोके नहीं जा सकते. मसलन, स्टाफ की सैलरी, बिजली का बिल, होटल का मेनटेनेंस आदि. कर्ज की किस्त पर रिजर्व बैंक की ओर से दी गई मोहलत (मॉरेटोरियम) सितंबर में खत्म हो रही है. इसके बाद खर्चे और बढ़ जाएंगे.

देश की बड़ी होटल चेन सरोवर होटल्स ऐंड रिजॉटर्स के प्रबंध निदेशक अजय बकाया इसी से जुड़े खतरे की ओर इशारा करते हैं, ''स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो नकदी का संकट बड़ी समस्या बनकर खड़ा हो जाएगा. बिना कैश इनफ्लो के होटल्स चल पाना संभव नहीं.'' होटल्स के कुल खर्चों में 50 से 60 फीसद तो फिक्स्ड हैं, इन्हें आप नहीं टाल सकते.

ऐसे में इंडस्ट्री वालों को लगता है कि इसे बचाए रखने के लिए कम से कम साल भर का लोन डिफरमेंट (टालना) होगा. बकाया के शब्दों में, ''हम यह नहीं कह रहे कि आप कर्ज माफ कर दीजिए. हमारे 10 साल के लोन की मियाद 11 साल कर दीजिए. इस साल बिना बिजनेस कर्ज की अदायगी मुश्किल है.'' बैंक भी 180 दिन की मोहलत खत्म होने के बाद अगर 181वें दिन से पिछले छह माह का ब्याज मांगने लगे तो मुश्किल होगी ही. यही कारण है कि हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र के संगठन सरकार के पास विशेष राहत पैकेज की गुहार लगा रहे हैं. इंडस्ट्री की पुरानी मांग है कि उसे 15 से 20 साल का कर्ज मिले. अभी होटलों को अधिकतम 10 साल के लिए कर्ज दिया जाता है. रोजिएट होटल्स ऐंड रिजॉट्र्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कुश कपूर भी इसमें अपनी बात जोड़ते हैं, ''इस मुश्किल घड़ी में सरकार हर किसी को सहारा देने की कोशिश कर रही है. ऐसे में होटल उद्योग के लिए अगले छह माह जीएसटी समेत विभिन्न करों में छूट दे दे तो बड़ी राहत होगी.'' जीएसटी के अलावा राज्य सरकार और निगम के स्तर पर भी होटल उद्योग पर कई तरह के कर लगाए जाते हैं.

वेट ऐंड वाच

लॉकडाउन में थोड़ी-सी ढील के साथ बड़े होटल नए तौर तरीके अपनाकर खुद को तैयार तो कर रहे हैं, लेकिन यहां कोविड के पहले जैसी रौनक लौटने में खासा वक्त लगेगा. थ्री-स्टार और इसके नीचे के दर्जे के हजारों होटल दोबारा खुल भी पाएंगे, इसमें संदेह है. महानगरों के इतर टियर-2 और टियर-3 शहरों के बजट होटल जो पूरी तरह बंद थे उन्हें दोबारा चालू करने से पहले निवेश की जरूरत होगी. विजय पांडेय, जो फेडरेशन ऑफ होटल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मानद सचिव भी रहे हैं, कहते हैं, ''देशभर में बहुत-से बंद पड़े होटलों की हालत खस्ता है. इन होटलों को दोबारा शुरू करने के लिए जरूरी निवेश कोई कारोबारी तभी करेगा जब उसे भविष्य में उम्मीद दिखेगी.'' फिलहाल कुछ निश्चित नहीं. कोविड-19 के केस बढ़ रहे हैं. कई राज्यों में जाने पर क्वारंटीन होना अब भी जरूरी है. पांडेय की राय में, ''ऐसे में निवेश कर होटल दोबारा शुरू भी कर दिए जाएं, तो कारोबार सुचारु होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं.'' ऐसे में 1-2 होटल वाले छोटे कारोबारी तो 'वेट ऐंड वाच' की मुद्रा में ही हैं.

ईज माइ ट्रिप के को-फाउंडर निशांत पित्ती का भी आकलन है कि होटल बिजनेस इस साल चल पाने की उम्मीद कम ही है. ''हमारे बिजनेस में होटल की हिस्सेदारी 5 प्रतिशत है. 95 प्रतिशत निर्भरता फ्लाइट्स पर है. होटल बिजनेस इस साल तो हम शून्य मानकर चल रहे हैं.'' जिस एग्रीगेटर की निर्भरता होटल बुकिंग पर जितनी ज्यादा होगी उसके कारोबार पर उतनी ही ज्यादा चोट पहुंचेगी. ग्राहकों से हुई बातचीत के आधार पर उनका कहना है कि जिन लोगों ने ट्रैवल शुरू किया भी है वे घरों को जा रहे हैं.

इसके अलावा निशांत का एक और अहम आकलन है. उनको लगता है कि ''देश में थ्री स्टार या उससे नीचे के 30 से 35 फीसद होटल कोविड के बाद कभी खुल नहीं पाएंगे.'' अपनी बात को समझाते हुए वे कहते हैं छोटे शहरों में 20-25 कमरों वाले करीब 60 फीसद छोटे होटल उनके मालिक नहीं चलाते बल्कि कोई और व्यक्ति उनका प्रबंधन करता है, जो जमीन के मालिक को एक निश्चित रिटर्न देता है. अब अगर ग्राहक ही नहीं आएंगे तो वह रिटर्न क्या खाक देगा? ऐसे सौदे टूटेंगे तो निश्चित तौर पर इन होटलों को दोबारा खोलना तो मुश्किल होगा ही, साथ ही बैंकों का कर्ज भी बड़ी मुश्किल बन सकता है. एग्रीग्रेटर प्लेटफॉर्म्स पर इन होटलों की मांग होती है.

उम्मीद का छोटा-सा दीया

विदेशी सैलानी कब तक पर्यटन के लिहाज से भारत का रुख करेंगे इसका ठीक-ठीक अनुमान किसी के पास नहीं. इसलिए पर्यटन और होटल उद्योग की सारी उम्मीदें देसी सैलानियों से ही हैं. भारत से हर साल 2.5 करोड़ से ज्यादा लोग विदेश घूमने जाते हैं. इस साल इसकी उम्मीद धुंधली है. आशीष को आशा है कि ''सितंबर के बाद स्थिति अगर सुधरी तो अक्तूबर से मार्च के दौरान ये पर्यटक देश के ही विभिन्न गंतव्यों का रुख कर सकते हैं. भारतीय पर्यटक ही आतिथ्य क्षेत्र (हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री) के लिए इकलौती उम्मीद नजर आते हैं.'' पर्यटन के साथ आतिथ्य उद्योग देश में सेवा क्षेत्र की वृद्धि में अहम भूमिका निभाता है.

वर्ल्ड ट्रैवल ऐंड टुरिज्म काउंसिल के मुताबिक, 2019 (जनवरी से दिसंबर) में देश की जीडीपी में पर्यटन क्षेत्र की हिस्सेदारी 6.8 प्रतिशत (194 अरब डॉलर) रही. यह क्षेत्र देश में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से पांच करोड़ रोजगार मुहैया करता है. एक अनुमान के मुताबिक, कुल पर्यटन में होटल इंडस्ट्री की भागीदार 50 फीसद के करीब है.

वैश्विक संपत्ति परामर्श कंपनी जेएलएल के ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक, होटल चलाने वाली ज्यादातर कंपनियों को लगता है कि उनके होटलों के हर खाली कमरे पर आने वाली कमाई पिछले साल के स्तर पर वापस लौटने में करीब 13 से 24 महीने का वक्त लगेगा. इस सर्वेक्षण में देश की 14 प्रमुख होटल परिचालन कंपनियों ने हिस्सा लिया. सर्वेक्षण के मुताबिक, केवल 20 प्रतिशत होटल संचालकों को लगता है कि उनके होटलों की आय अगले छह से 12 महीने में 2019 के स्तर पर वापस लौट आएगी. जबकि 60 प्रतिशत का मानना है कि इसमें कम से कम 13 से 24 महीनों का वक्त लगेगा. लग्जरी या महंगे होटलों के बारे में सर्वेक्षण कहता है कि उनकी आय के वापस 2019 के स्तर पर पहुंचने की दर और धीमी रह सकती है. यानी इसमें दो साल से ज्यादा का भी समय लग सकता है.

यह तथ्य काबिलेगौर है कि कोविड-19 का संक्रमण रोकने के लिए लगे लॉकडाउन में सबसे पहले प्रभावित होने वाला क्षेत्र भी पर्यटन और होटल उद्योग था और अर्थव्यवस्था में वापसी भी सबसे अंत में यहीं होगी. उद्योगों की मांग को ध्यान में रखते हुए सरकार को कुछ ऐसे कदम उठाने होंगे जिससे बड़ी संख्या में रोजगार देने वाला यह क्षेत्र फिर उठ बैठे.

इसे शायर जावेद अख्तर के शब्दों में यूं बयान कर सकते हैं: जरा मौसम तो बदला है मगर पेड़ों की शाखों पर नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे; बहुत-से जर्द चेहरों पर गुबार-ए-गम है कम बे-शक पर उनको मुस्कुराने में अभी कुछ दिन लगेंगे.

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