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दिन बहुरे इन कुत्तों के

अपनी खूबसूरती और जंगलीपन की वजह से बेशकीमती रखवाले कुत्तों की पश्मी और कारवां सरीखी नस्लें ठीक-ठाक मुनाफे की खातिर महाराष्ट्र में लातूर के गांवों में पाली जाती हैं

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शानदार तस्वीर कारवां नस्ल का जॉनसन कैमरे के सामने बिल्कुल सहज रहता है सबसे अव्वल कुत्ते शानदार तस्वीर कारवां नस्ल का जॉनसन कैमरे के सामने बिल्कुल सहज रहता है सबसे अव्वल कुत्ते

जब कुत्तों के झुंड लोगों के साथ नए देशों में आ जाएं, तो कुकुर वंशावलियों में भी इनसानी उद्यम के निशान खोजे जा सकते हैं. दक्कन के पठार के एक सूखाग्रस्त कोने में इसी से मिलती-जुलती घटना के हैरतअंगेज नतीजे सामने आए हैं. वहां कुत्तों की एक खास नस्ल ने खस्ताहाल अर्थव्यवस्था में नई जान फूंक दी है.

संकरी-सी थूथन पर टंकी उत्सुक नजरें, दुबले-पतले लेकिन मजबूत पैरों के दम पर गौरवशाली और कद्दावर चाल-ढाल, अंग्रेजी के 'एस’अक्षर की शक्ल में अंदर की तरफ मुड़ा पेट और भीतर छिपा खूंखारपन जिसे दिखाकर वह बहुत खुश होता है—आपने ठीक पहचाना, यह पश्मी ही है. इसकी डरावनी गुर्राहट में मालिक लोहकवच की गारंटी महसूस करता है.

महाराष्ट्र के लातूर जिले के जांवल गांव में किसान तानाजी पवार का पत्थर की दीवारों से बना घर सोयाबीन और ज्वार के बोरों से पटा है. पानी की पहली बौछार के साथ खरीफ के सीजन की बुआई शुरू होगी. मगर जहां देश भर के किसान फिक्रमंद हैं कि महंगाई से उर्वरकों और कीटनाशकों की कीमतें कहीं बढ़ न जाएं, पवार खेती की जरूरी चीजों के लिए अपने 'हाथ में नकदी’को लेकर परेशान नहीं हैं. यह मोर्चा पश्मी नस्ल के उनके पालतू कुत्ते 'मल्हार’ने संभाल रखा है.

मल्हार के साथ जनवाने या प्रजनन के लिए पश्मी कुतियाओं को लेकर आने वाले ग्रामीणों से पवार 5,000 रुपए वसूलते हैं. बढ़िया नस्ल का गबरू मल्हार पवार की सालाना आमदनी में 2-2.5 लाख रुपए का योगदान देता है. जनने का सीजन दशहरे से शुरू होकर दीवाली तक चलता है. उम्र के चालीसे में चल रहे, चार लोगों के परिवार के मुखिया और 45 एकड़ खेतों के मालिक पवार कहते हैं, ''प्रजनन की कमाई से मेरे मजदूरी सरीखे खेती के करीब 25 फीसद खर्च पूरे हो जाते हैं. मुझे बैंक के कर्ज पर ज्यादा निर्भर नहीं रहना पड़ता.’’

जांवल और नजदीकी क्वहालांगी गांव के करीब 50 परिवारों में कुत्तों के प्रजनन की आंत्रेप्रेन्योरशिप की ऐसी ही कहानियां ठेठ सूखाग्रस्त जिला होने की लातूर की शोहरत को नए सिरे से गढ़ रही हैं. 2016 में यह तब सुर्खियां में आया जब पीने का पानी 300 किमी से भी दूर सांगली से रेल के डिब्बों में ढोकर लाना पड़ा. (दो सामान्य मॉनसून की बदौलत हालांकि जलपिपासु गन्ने की खेती फिर लौट आई.) 

जांवल और उसके आसपास के इलाके पश्मी के साथ कारवां की ब्रीडिंग के लिए जाने जाते हैं. कारवां भी पश्मी की तरह दिखते हैं—वही लंबी थूथन, वैसी ही दुबली-पतली काया में बल खाती मांसपेशियां, पर पश्मी की हल्के रोएं वाली खाल इनमें नहीं होती. पैदाइशी शिकारी और रखवाले कुत्ते दोनों 'नजरों के शिकारी’हैं, यानी जो गंध के बजाए नजर से शिकार की पहचान करते हैं और उसके पीछे पड़ते हैं.

कहते हैं, कारवां बिजली की तरह तेज है. इस पीले-धूसर ग्रामीण फलक पर छलांगें भरते इन फुर्तीले और लचकदार जंतुओं का शानदार नजारा देखने के लिए अब देश भर के श्वान प्रेमी यहां खिंचे चले आते हैं. इसने 10,000 लोगों के इस धूल-धूसरित गांव में रोकड़े का सारा गुणा-भाग बदल दिया है.

व्यापार का यह तरीका अब कुछेक गांवों तक सीमित नहीं रहा और बाहर भी फैल रहा है, वहीं इन नस्लों की सेहत को लेकर चिंताएं भी पैदा हो गई हैं. इनकी शुद्धता और गुणवत्ता खतरों से जो घिर गई है. इनकी शोहरत जैसे-जैसे बाकी भारत में फैल रही है और लोग इन बेशकीमती पिल्लों के लिए लालायित रहने लगे हैं, अब समय आ गया है कि सरकार और स्थानीय लोग कुछ ज्यादा कोशिश करें.

भौंकने से बढ़ता कारोबार
पवार के परिवार को पश्मी पालते 80 से ज्यादा साल हो गए हैं. वे कहते हैं, ''पश्मी सदाबहार कुत्ता है. इसकी खाल रोएंदार है इसलिए यह तीनों मौसम अच्छे-से झेल लेता है.’’पवार की बत्तखें और मुर्गियां आजादी से बेधड़क यहां-वहां घूमती हैं और बाहर जाते वक्त वे ताला भी नहीं लगाते, क्योंकि मल्हार वहां किसी को फटकने तक नहीं देता. वे कहते हैं, ''पश्मी को बस अपने मालिकों की साज-संभाल पसंद है. यह इतनी जोर से भौंकता है और इसकी मुद्रा इतनी आक्रामक होती है कि इसके आसपास होने पर अजनबियों को डर के मारे सांप सूंघ जाता है.’’

पिल्ला सहवास के 62 दिन बाद पैदा होता है. प्रजनन करवाने वाले पिल्ले को दो महीने अपने पास रखकर बेच देते हैं. पवार कहते हैं, ''लोग दो महीने पहले पिल्ले की एडवांस बुकिंग करवाने आते हैं. लोगों को हर साल इंतजार करना पड़ता है.’’पिल्ला 12,000 रुपए से 15,000 रुपए के बीच बेचा जाता है. ज्यादातर खरीदार मुंबई, दिल्ली, गुजरात, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के हैं. कुछ अफसरशाह और राजनेता नियमित खरीदार हैं.

कीमत और ढुलाई मिलाकर वे एक पिल्ले पर औसतन 50,000 रुपए खर्च करते हैं. पवार कहते हैं, ''दो साल पहले मैंने एक पिल्ला अमेरिकी नागरिक को बेचा. किसी से पश्मी नस्ल के बारे में सुनकर वे जांवल आई थीं.’’ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के छोटे बेटे तेजस ने भी आठ साल पहले जांवल से 23,000 रुपए में काला पश्मी खरीदा. पवार ने कई बार ब्रीडिंग के लिए पैसा नहीं लिया. इसके बजाए वे बेचने या तोहफे में देने के लिए पिल्ला ले लेते हैं.

दो नर और एक मादा कुल तीन पश्मी कुत्तों के मालिक रणजीत पाटील कहते हैं कि खाने-पीने की सीधी-सादी आदतों और साफ-सुथरे स्वभाव के कारण इनकी इतनी मांग है. तीनों में उनका सबसे मुंहलगा शेरा है. वे कहते हैं, ''ये कुत्ते हमारी तरह रोटी और अंडे खाते और दूध पीते हैं. घर में कभी शौच नहीं करते.’’पाटील भी ब्रीडिंग का पैसा नहीं लेते, बल्कि अपने गबरू की सेवाएं लेने वालों से सिर्फ पिल्ला लेते हैं. इनकी और खूबियां गिनाते हुए वे कहते हैं, ''पश्मी को डिहाइड्रेशन नहीं होता. उन्हें टीके तक नहीं लगाने पड़ते, क्योंकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता प्राकृतिक रूप से मजबूत है.’’

किराना दुकानदार जगन्नाथ पवार को अपने कारवां नस्ल के कुत्ते जॉन पर खासा नाज है. गर्व से भरे दिख रहे जगन्नाथ कहते हैं, ''एक बार शिकार पर नजर जम गई तो चाहे कुछ हो यह उसे पकड़कर ही रहेगा.’’खरगोश और हिरण इसके पसंदीदा शिकार हैं. जगन्नाथ कहते हैं, ''कारवां लैब्राडोर से ज्यादा अक्लमंद है. यह अपने पैने दांतों में खरगोश को भींच लेता है और शिकार को मारे बिना ही पा लेता है.’’जगन्नाथ भी तीन महीने के ब्रीडिंग सीजन में प्रजनन के लिए 3,000-5,000 रुपए वसूल करते हैं. वे कहते हैं, ''कारवां का पिल्ला औसतन 15,000-20,000 रुपए में बिकता है. इसी रकम से मैं दुकान चलाता हूं. मुझे कर्ज नहीं लेना पड़ता.’’

पश्मी: आज और गुजरा कल

पश्मी अफगान नस्ल है. कुछ पश्तून और पश्तूनों से जुड़े रोहिल्ला 19वीं सदी के आखिरी सालों में अंग्रेजों के साथ काम करने भारत आए तो इन कुत्तों को भी ले आए. जांवल के गांव वाले पुरखों से सुनी कहानियों का जिक्र करते हैं कि कैसे जब ब्रिटिश परली (करीब 60 किमी दूर) और हैदराबाद के बीच रेलवे लाइन बिछा रहे थे, उन्हीं दिनों ये कुत्ते पहली बार उनके गांव में भटकने लगे. लातूर आजादी से पहले हैदराबाद निजाम का हिस्सा हुआ करता था. हैदराबाद में निजाम के यहां काम करने के लिए जाते वक्त पश्तून इन्हें यहीं छोड़ गए. तभी से गांव वालों ने इन्हें अपना मानकर अपना लिया.

कारवां 1900 के दशक की शुरुआत में तत्कालीन मढोल रियासत के शासक नानासाहेब घोरपड़े अमेरिका से लाए थे. ये मढ़ोल शिकारी भी कहे जाते हैं. जांवल में मिलने वाली कारवां की नस्ल को बंगड़ी कारवां भी कहते हैं, क्योंकि कहा जाता है कि इनका पतला सिर बंगड़ी या लाख की चूड़ी से भी निकल सकता है.

उन दिनों कुत्तों को मुख्यत: शिकार और जंगली जानवरों से हिफाजत के लिए पाला जाता था. लातूर जिला कभी वन्यजीवों की जन्नत हुआ करता था, जहां बाघों की विशाल आबादी रहती थी, जिन्हें स्थानीय मवेशी पालक अनिवार्य तौर पर खतरा मानते थे. उस वक्त गांव वालों को जाहिरा तौर पर लगा कि पश्मी और कारवां उनके लिए भगवान ने भेजे हैं. किंवदंती यह है कि उनकी बेलगाम आक्रामकता बाघों को भी दूर रख सकती थी.

मगर यह सब स्थानीय दंतकथा और परिपाटी ही थी. भारतीय नस्लों को बढ़ावा देने वाली हैदराबाद की एथनिक इंडिका कैनाइन सोसाइटी ने 2002 में जांवल में ग्रामीण डॉग शो आयोजित किया और उसमें कुत्ता प्रेमियों की नजर पश्मी और कारवां पर पड़ी. पश्मी इस शो के स्टार थे. तभी से पश्मी सबके पसंदीदा बने हुए हैं.

विरली नस्लों को खतरा

लेकिन इन नस्लों की शुद्धता और उनकी उत्तरजीविता पर काले बादल मंडरा रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की उदासीनता और ग्रामीणों की ज्यादा पैसों की भूख ने इन नस्लों के विलुप्त हो जाने का खतरा पैदा कर दिया है. डॉग ब्रीडर और लातूर कैनाइन क्लब के पूर्व अध्यक्ष प्रमोद सालुंखे कहते हैं कि अंत:प्रजनन यानी पवार के मल्हार सरीखे कुछेक बेशकीमती गबरू कुत्तों पर अत्यधिक निर्भरता की वजह से इन कुत्तों की गुणवत्ता में गिरावट आई है.

वे कहते हैं, ''कारवां शिकार के लिए जाना जाता है. ग्रामीणों ने कारवां से ज्यादा बढ़ावा पंजाब ग्रेहाउंड (अक्सर दौड़ के लिए पाले जाने वाले) को दिया क्योंकि वे ज्यादा तेज दौड़ते हैं. ध्यान नहीं रखा गया तो पश्मी और कारवां नस्लें जल्द विलुप्त हो जाएंगी.’’

गांव के लोग इन जानवरों को व्यापार के लिए पाल रहे हैं. वे कुत्ते खरीदने वालों का कोई रिकॉर्ड भी नहीं रखते, लिहाजा कोई भरोसेमंद डेटाबेस नहीं है जिसके आधार पर उनकी वंशावली तय की जा सके. चेन्नै का केनल क्लब ऑफ इंडिया (केसीआइ) हरेक स्वदेशी नस्ल का रिकॉर्ड रखता है. केसीआइ की समिति कुत्तों की नस्लों को परखती और उनकी सच्चाई तथा अहमियत की प्रामाणिकता की जांच करके प्रमाणपत्र देती है. सालुंखे कहते हैं, ''हम पश्मी और कारवां के लिए केसीआइ से प्रमाणपत्र लेने की कोशिश कर रहे हैं. इससे हमें ज्यादा अच्छे ढंग से उनकी ब्रांडिंग में मदद मिलेगी.’’

साल 2009 में तब मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र विधानसभा में लातूर के प्रतिनिधि विलासराव देशमुख की सरकार ने पश्मी और कारवां का प्रजनन केंद्र स्थापित करने के लिए लातूर शहर के बाहरी छोर पर दो एकड़ जमीन आवंटित की. यह प्रजनन केंद्र कभी नहीं बना. सालुंखे कहते हैं, ''इन दुर्लभ नस्लों पर वैज्ञानिक अनुसंधान और उन्हें लुप्त न होने देने के तरीके अपनाने की जरूरत है. उनकी घटती तादाद हमारी सामूहिक नाकामी है.’’

अंतत: 2020 में अक्ल के दरवाजे खुले, जब महाराष्ट्र सरकार ने मराठावाड़ा इलाके में मवेशियों की देशज प्रजातियों और पालतू जानवरों के जेनेटिक अध्ययन की पहल की. लातूर भी इसी इलाके में है. इसमें पश्मी और कारवां, उस्मानाबाद बकरियों, लाल कंधारी गायों और देवणी बैलों की जेनेटिक खूबियों का अध्ययन करने की योजना थी. बदकिस्मती से यह परियोजना अब धन की कमी से लडख़ड़ाती मालूम देती है.

पश्मी नस्ल की 'गुणवत्ता’बनाए रखने को लेकर तानाजी पवार भी परेशान हैं, मगर बस उतने ही जितनी उनकी फौरी जरूरतें हैं. अपना मुनाफे का प्रजनन कारोबार चलाते रहने के लिए पवार को मल्हार के बूढ़ा होने पर अच्छा नर पश्मी खोजना होगा. वे कहते हैं, ''अभी यह नौ साल का है, पर मुझे भविष्य की योजना बनानी होगी. गांव में कुछ ही नर पश्मी बचे हैं.’’ 

 

पश्मी, कारवां, सलूकी

पश्मी: इसका नाम अफगानिस्तान के बांशिदे 'पश्तून’से निकला. इस रोएंदार नस्ल को दक्कन में एक सदी से ज्यादा वक्त हुआ. तेज दिमाग और वफादार पश्मी जंगली सूअर का भी मुकाबला कर सकता है


कारवां: इकहरी कमर और गहरी छाती वाला यह दुबला-पतला कुत्ता शिकारियों का पसंदीदा है. यह चिंकारा हिरण को पीछे छोड़ सकता है और जर्मन शेफर्ड से भी तेज है.


सलूकी: इसे कारवां का उन्नत संस्करण माना जाता है, जिसे पॢशयन ग्रेहाउंड भी कहते हैं. लातूर और उस्मानाबाद के ग्रामीण हाल के सालों में सलुकियों के मुरीद हो गए हैं.

ग्रामीणों ने लालच की वजह से इन कुत्तों की जरूरत से ज्यादा अंत:प्रजनन  शुरू कर दिया है जिससे उत्तरजीविता खतरे में पड़ गई है

ये पैदाइशी शिकारी और रखवाले 'नजरों के शिकारी’हैं, यानी जो गंध के बजाए नजर से शिकार की पहचान करते हैं और उसके पीछे पड़ते हैं.

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