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खास रपटः तेजपाल बनाम राज्य अब हाइकोर्ट में

पत्रकार-लेखक तरुण तेजपाल को कथित यौन उत्पीड़न के सनसनीखेज मामले में बरी करने के फैसले को गोवा सरकार ने चुनौती दी है. मील का पत्थर माने जाने वाले इस मामले में आखिर क्यों एक और ट्रायल होने जा रहा है

फैसले की घड़ी तरुण तेजपाल और उनकी पत्नी 21 मई को गोवा की मापुसा सत्र न्यायालय में जाते हुए फैसले की घड़ी तरुण तेजपाल और उनकी पत्नी 21 मई को गोवा की मापुसा सत्र न्यायालय में जाते हुए

कार्यस्थल पर कथित बलात्कार और यौन उत्पीड़न के भारत के सबसे सनसनीखेज मामले में 21 मई को उतना ही नाटकीय फैसला आया. गोवा में मापुसा की एक सत्र अदालत के 527 पन्नों के आश्चर्यजनक फैसले में मुख्य आरोपी पत्रकार और लेखक तरुण तेजपाल को आरोपों से बरी कर दिया.

लंबे-से, पोनीटेल रखने वाले तेजपाल ने 2001 में रक्षा सौदों और राजनीतिक भ्रष्टाचार के खुलासे के साथ स्टिंग पत्रकारिता के युग की शुरुआत की थी. फिर 18 नवंबर, 2013 को तहलका पत्रिका में काम करने वाली एक पत्रकार ने गोवा के पांच सितारा होटल में पत्रिका के साहित्यिक कार्यक्रम में अपने प्रधान संपादक तेजपाल पर दो बार यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया. प्रबंध संपादक शोमा चौधरी को भेजे ई-मेल की एक शृंखला में आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि दोनों हमले 7 और 8 नवंबर, 2013 की रात को होटल की लिफ्ट में किए गए.

तेजपाल ने पीड़िता के शिकायती पत्र का जवाब दो माफी पत्रों के साथ दिया. पहला 19 नवंबर को लिखा गया. 20 नवंबर को प्रतिवादी को औपचारिक ई-मेल में तेजपाल ने लिखा कि ''निर्णय की शर्मनाक भूल पर मैं बिना शर्त माफी मांगता हूं. इसके चलते मुझे आपकी स्पष्ट अनिच्छा के बावजूद 7 और 8 नवंबर, 2013 को दो मौकों पर मैंने आपसे यौन संबंध बनाने की कोशिश की, जबकि आप मुझसे ऐसी अपेक्षा नहीं रखती थीं.''

गोवा पुलिस ने मामले की सोशल मीडिया रिपोर्टों का स्वत: संज्ञान लेते हुए तेजपाल को तीन दिन बाद गलत तरीके से बंधक बनाने, बलात्कार और हमले के कई आरोपों में गिरफ्तार किया. छह महीने बाद उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया.

अपने 21 मई, 2021 के फैसले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश क्षमा एम. जोशी ने तेजपाल को संदेह का लाभ दिया, ''क्योंकि अभियोजन पक्ष (पीड़ित) के आरोपों का समर्थन करने वाला कोई सबूत नहीं है''. मामले का मुख्य आधार यह आरोप था कि तेजपाल ने पीड़िता से छेड़छाड़ करते हुए दो मंजिला इमारत की लिफ्ट चालू रखी. जज जोशी ने जोर देकर कहा कि ऐसा नहीं था. फैसला कहता है, ''भूतल की अतिथि लिफ्टों के सीसीटीवी फुटेज स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि बाईं तरफ की लिफ्ट (जो अहम है) 7 नवंबर, 2013 को कथित घटना के दो मिनट के दौरान गति में थी और बाईं लिफ्ट के दरवाजे भूतल पर कम से कम दो बार खुले.'' इसका अर्थ या तो यह हो सकता है कि जब दरवाजा खुला तो आरोपी और युवती लिफ्ट के अंदर थे या अंदर नहीं थे.

जज ने तेजपाल को बरी करने से पहले कहा कि पीड़िता का बयान ''सुधार और भौतिक विरोधाभासों और चूकों व संस्करणों के परिवर्तन को भी दर्शाता है, जिस पर विश्वास नहीं होता है''. 2013 में शुरुआती बयान में युवती ने कहा कि तेजपाल ने घेरे में रखने के लिए लिफ्ट में कई बटन दबाए थे. लेकिन 2020 में जिरह के दौरान कहा कि उसे नहीं पता था कि लिफ्ट स्थिर थी या चल रही थी और आरोपी ने केवल एक बटन दबाया था. फैसले में कहा गया है कि जांच अधिकारी (आइओ) ने सीसीटीवी फुटेज और उसके बयानों में स्पष्ट विरोधाभासों पर अभियोजक से सवाल नहीं किया.

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने केवल यह स्थापित किया कि तेजपाल, तहलका के प्रधान संपादक के रूप में भरोसे या अधिकार की स्थिति में थे और पीड़िता पर नियंत्रण या प्रभुत्व जमा सकते थे. यह आइपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत पांच अन्य महत्वपूर्ण आरोपों को साबित करने में विफल रहा, जिसमें गलत ढंग से नियंत्रण, शील भंग करने के इरादे से हमला और बलात्कार करने वाले व्यक्ति की स्थिति शामिल है.

जज ने कहा कि एक महत्वपूर्ण सबूत—तेजपाल और पीड़िता गलती से पहली मंजिल पर लिफ्ट से निकल रहे थे, जो हमले के आरोप का खंडन कर सकता था—उसे पुलिस ने नष्ट कर दिया. फैसले में कहा गया कि युवती को लिखे तेजपाल के माफीनामे को दोषी ठहराने के लिए सही नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि यह किसी अपराध की स्वीकृति या दोष स्वीकारोक्ति नहीं थी, बल्कि तहलका को एक पत्र था कि वे आरोपों के कारण प्रधान संपादक के पद को छोड़ रहे हैं.

महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों का कहना है कि सत्र अदालत ने आरोपी के बजाए पीड़िता का ट्रायल कर दिया. मुंबई के महिला अधिकार समूह बेबाक कलेक्टिव की प्रमुख हसीना खान कहती हैं, ''घटना की पूछताछ के बाद उनकी गरिमा और व्यवहार को देखकर स्तब्ध हूं.''

फैसले के चार दिन बाद 25 मई को गोवा सरकार ने बॉम्बे हाइकोर्ट की राज्य पीठ में अपील दायर की. हाइकोर्ट के जस्टिस एससी गुप्ते ने 2 जून को तेजपाल को नोटिस जारी कर 24 जून या उससे पहले जवाब देने को कहा है. जज ने निचली अदालत से सारे रिकॉर्ड मांगे हैं. समाचार एजेंसी पीटीआइ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायालय ने फैसले को 'बलात्कार पीड़ितों के लिए मैनुअल' कहा, क्योंकि इसमें बताया गया है कि ऐसे मामलों में पीड़िता को कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए.

इंडिया टुडे से गोवा सरकार के अफसरों ने कहा कि वे सत्र अदालत के फैसले में ''तथ्यात्मक और तार्किक खामियों'' को चुनौती देने की योजना बना रहे हैं. उनका मानना है कि कोर्ट ने तेजपाल के लिखित ई-मेल माफी जैसे महत्वपूर्ण पुष्टिकारक सबूतों की अनदेखी की.

तेजपाल मामला ऐतिहासिक घटना है, जो महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों में दो महत्वपूर्ण मील के पत्थर-दिसंबर 2012 में नई दिल्ली में 23 वर्षीया 'निर्भया' से सामूहिक बलात्कार और हत्या तथा 2017 के वैश्विक #मी टू आंदोलन के बीच में है. यह केस निर्भया कांड के बाद मार्च, 2013 में भारत में बलात्कार कानूनों में बदलाव के तहत जांच किए जाने वाले पहले बड़े अभियोगों में से एक था. 2013 के फौजदारी कानून (संशोधन) अधिनियम ने यौन संबंधों को बलात्कार के व्यापक कृत्यों के साथ स्थापित किया, जिनमें से कुछ इस मामले में भी सामने आए.

फैसले में आरोप लगाने वाले के यौन इतिहास की गहराई में जाने से वकील और कार्यकर्ता हैरान हैं. सुप्रीम कोर्ट की वकील करुणा नंदी का कहना है कि इस फैसले में शीर्ष अदालत की मिसाल और वैधानिक कानून के कई उल्लंघन हैं. ''सबसे पहले, ट्रायल कोर्ट के जजों को कई स्पष्ट निर्देश हैं कि वे चिकित्सा साक्ष्य की अनुपस्थिति को 'सहमति' नहीं मानें और अभियोक्ता को 'आदर्श शिकार' होने की मांग न करें. दूसरी बात, आप अभियोक्ता के यौन इतिहास का परीक्षण नहीं कर सकते—यह उसकी निजता का उल्लंघन है. और अंत में, बचाव पक्ष के साक्ष्य के मूल्यांकन के लिए जिस तरह का मुफ्त पास दिया गया, वह चौंकाने वाला है. आपके पास एक पत्र था, जिसमें आरोपी कहता है कि वह गैर-सहमति से यौन संबंध बनाने के लिए गहराई से माफी मांगता है.''

अपील की राजनीति

सत्र अदालत के फैसले के खिलाफ गोवा सरकार की अपील पर बॉम्बे हाइकोर्ट की पणजी पीठ में सुनवाई के एक दिन पहले 1 जून को इसमें संशोधन किया गया. पहले, अपील पीड़िता की पहचान और घटना के बाद के उसके व्यवहार के बारे में सवालों के संदर्भों को हटाने पर केंद्रित थी. संशोधित अपील में अब सत्र अदालत की ओर से तेजपाल के माफी संबंधी ई-मेल की अनदेखी का भी जिक्र किया गया है. सरकार का मानना है कि मामला फिर से सुनवाई के लायक है.

गोवा सरकार की अपील में कहा गया है, ''ट्रायल कोर्ट ने बचाव पक्ष के गवाहों के सबूतों को परम सत्य माना, लेकिन बिना किसी निष्कर्ष के अभियोजन पक्ष के गवाहों के सबूतों को खारिज कर दिया.''

सत्र अदालत द्वारा 21 मई को तेजपाल को बरी करने के कुछ घंटों बाद, गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने फैसले को चुनौती देने की राज्य की मंशा जताई. सावंत ने उसी दिन शीर्ष कानूनी अधिकारियों की बैठक बुलाई और उन्हें अपील दायर करने का निर्देश दिया. जब गोवा सरकार ने केंद्र के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (देश के दूसरे सबसे वरिष्ठ कानूनी अधिकारी) को हाइकोर्ट में अपील पर बहस करने के लिए नियुक्त किया, तो कानूनी समुदाय में भौंहें तन गईं.

एक राजनीतिक सूत्र का कहना है कि तेजपाल को बरी करने पर गोवा सरकार में दो तरह के विचार हैं. पहला तो यह कि सावंत व्यापक संदेश देना चाहते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराध को हल्के में नहीं लिया जाएगा. राजनीतिक रूप से, भाजपा भी तेजपाल के खिलाफ अपील को अपने आलोचकों को जवाब देने का क्षण मानती है. 2018 में कई पूर्व महिला सहकर्मियों की ओर से यौन उत्पीड़न के आरोपों ने भाजपा के केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर को पद छोड़ने के लिए मजबूर किया था.

भाजपा का मानना है कि तेजपाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुखर आलोचक, 'लुटियंस मीडिया' (मोदी आलोचक) की पहचान हैं. तहलका ने 2001 में पहले स्टिंग ऑपरेशन में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को रिश्वत लेते हुए उजागर किया था. 2007 में, उन्होंने गुजरात दंगों पर एक खुलासा किया था, जिसमें संघ परिवार के कार्यकर्ताओं ने अपने नजरिये से दंगों का वर्णन किया था.

एक भाजपा नेता ने बताया, ''गोवा विधानसभा चुनाव नौ महीने दूर है (फरवरी, 2022 में). चुनावी साल में मुख्यमंत्री मोदीजी या गोवा की महिलाओं को नाराज नहीं कर सकते. हम पूरी ताकत के साथ हाइकोर्ट में केस लड़ेंगे.'' आखिरकार, मामला तरुणजीत तेजपाल बनाम गोवा राज्य का है.

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