scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 29/- रुपये में

अब महारोग तनाव

क्यों यह भारत का महारोग बन गया, नए अनुसंधान बता रहे हैं, कैसे इसका असर शरीर पर पड़ता है, नए तरीके तनाव से छुटकारा पाने के

X
तनावः अवसाद में योगदान
तनावः अवसाद में योगदान

सोनाली आचार्जी

पश्चिम दिल्ली में रहने वाली मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव 41 वर्षीया कुसुम नेगी दफ्तर की मीटिंग में थीं कि तभी उन्हें गर्दन के पीछे तेज दर्द महसूस हुआ. फटाफट उन्हें इमरजेंसी रूम में ले जाया गया. गर्दन की पट्टी और दर्द की दवाओं से फौरी राहत मिली, पर डॉक्टरों को हड्डियों या मांसपेशियों में ऐसा कुछ न मिला, जिससे दर्द की वजह पता चल पाती. नेगी ने तनाव का जिक्र किया, और बात समझ आने लगी. चार महीने पहले हुई इस परेशानी को याद करके नेगी कहती हैं, ''हड्डियों के एक डॉक्टर ने मुझे बताया कि तनाव से सूजन हो सकती है, जिससे मांसपेशियों में जकड़न आ सकती है. मन शांत नहीं लग रहा था, पर कभी सोचा नहीं था कि इससे मांसपेशियों में ऐंठन आ सकती है.''

नेगी की तरह कई और लोगों को भी पता चल रहा है कि तनाव के उनके शरीर पर कैसे-कैसे असर पड़ सकते हैं. निमहांस (राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और स्नायु विज्ञान संस्थान) बेंगलूरू के पूर्व प्रमुख डॉ. बी.एन. गंगाधर बताते हैं, ''तनाव अब केवल मानसिक परेशानी नहीं रहा. यह ढेर सारी शारीरिक परेशानियों से जुड़ा है.'' पिछले दो साल में वैज्ञानिक अनुसंधानों ने हमें सचेत किया कि तनाव सीधे या घुमा-फिराकर हृदय रोग, ब्रेन स्ट्रोक, डायबिटीज, कैंसर, फेफड़े की बीमारियों, लीवर सिरोसिस और बांझपन के अलावा व्यसन, मोटापे और आत्महत्या की ओर ले जाने वाले अवसाद में योगदान दे रहा है और मौत के बड़े कारणों में एक है. फिर भी लोग तनाव को तब तक परेशानी नहीं मानते जब तक यह ज्यादा घातक बीमारियों में प्रकट नहीं होता. गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में एंडोक्राइनोलॉजी और डायबिटोलॉजी प्रैक्टिस के डायरेक्टर डॉ. सुनील कुमार मिश्रा कहते हैं, ''लोग आम तौर पर किसी चीज को तब तक गंभीरता से नहीं लेते जब तक वह संकट बनकर खड़ा नहीं हो जाता. शरीर में तनाव को माप नहीं सकते, इसलिए जब कोई बड़ी घटना घटती है तभी आपको अपनी बेहद तनावपूर्ण जीवनशैली का एहसास होता है.''

कोविड-19 महामारी—खुद वायरस और उससे निपटने के उपायों दोनों—ने पहले से तनावग्रस्त जिंदगी में तनाव और बढ़ा दिया, जो शरीर से भारी कीमत वसूल कर रहा है. फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट के चेयरमैन डॉ. अशोक सेठ कहते हैं, ''मसलन, हार्ट अटैक में अचानक बढ़ोतरी हुई है, जिसमें तनाव का अहम योगदान है.'' कोविड महामारी अभी खत्म हुई भी नहीं कि भारत एक और महारोग की चपेट में आ गया लगता है. यह चुपचाप आने वाली बीमारी है, जो तनाव से पैदा होती है. दिल्ली स्थित मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्लेटफॉर्म द सेंटर ऑफ हीलिंग (टीसीओएच) के दिसंबर, 2020 में किए गए देश में 10,000 लोगों के सर्वे में 74 फीसद ने तनाव की शिकायत की और 88 फीसद ने बेचैनी बनी रहने की. सर्वे में शामिल करीब 70 फीसद डॉक्टरों ने मरीजों के आने की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की; 55 फीसद ने कहा कि महामारी के बाद पहली बार आने वाले मरीज बढ़े हैं.

तनाव आदमी के लिए अजनबी नहीं है. यह शायद इनसान के वजूद जितना ही पुराना है. मानव शरीर इसे पहचानने और इससे निबटने दोनों के लिए तैयार होता है और ऐसा वह प्रतिक्रियाओं के संयोजन के जरिए करता है. यही मिलकर वह चीज बनाती हैं जिसे ''भागो या लड़ो'' तंत्र कहा जाता है. दरअसल, तनाव के जवाब में अत्यधिक प्रतिक्रिया से चीजें बिगड़ने लगती हैं और शारीरिक तथा मानसिक तौर पर भले-चंगे रहने के लिए उन्हें संभालना बेहद जरूरी हो जाता है. इसीलिए पिछले कुछ साल में तनाव के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया समझने में काफी वैज्ञानिक ऊर्जा लगी है—यह किस चरण में परेशानी बन जाता है और शारीरिक और मनोवैज्ञानिक जीवन पर नियंत्रण फिर हासिल करने के लिए इस पर कैसे काबू पाया जा सकता है. अलबत्ता पहले तनाव के पीछे का विज्ञान समझना जरूरी है, तभी यह आंका जा सकता है कि लंबे समय तक तनाव का रहना मानव शरीर पर क्या कहर बरपा सकता है.

तनाव का विज्ञान

तनाव के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया की कुंजी उसके एंडोक्राइन सिस्टम यानी अंत:स्रावी प्रणाली में है. साथ ही उसमें भी जिसे हाइपोथैलमिक-पिट्यूटरी एड्रीनल (एचपीए) एक्सिस कहा जाता है. हाइपोथैलमस मस्तिष्क का कमान सेंटर है, जो मनोदशा, शरीर का तापमान, हृदय गति, खान-पान, यौन इच्छा, ऊर्जा, प्यास और नींद का चक्र सरीखी कई सारी चीजों को दुरुस्त करता है. यह हॉर्मोन के स्राव को भी नियंत्रित करता है—यानी उन रसायनों को जो रक्तप्रवाह के साथ बहते हुए शरीर के तमाम ऊतकों और अंगों तक जाते हैं और कई कामों को सक्रिय करते और उनमें तालमेल बिठाते हैं.

जब मस्तिष्क को स्ट्रेसर या तनाव के कारणों का एहसास होता है, चाहे वह शारीरिक खतरा हो, या बॉस की डांट-फटकार, कोई बुरी खबर या महज रोजमर्रा का तनाव, तो वह योजनाबद्ध और समन्वित शारीरिक प्रक्रियाओं का सिलसिला शुरू कर देता है. हाइपोथैलमस एक कॉर्टिकोट्रॉफिन-रिलीजिंग हॉर्मोन (सीआरएच) छोड़ता है, जो एंडोक्राइन सिस्टम—यानी इसके ठीक नीचे स्थित मटर के आकार का पिट्यूटरी ग्लैंड या पीयूष ग्रंथि—के कंट्रोल रूम तक संदेश ले जाता है. फिर जैसे रिले रेस में होता है, पीयूष ग्रंथि छड़ी को आगे ले जाती है और एड्रीनोकॉर्टिकोट्रॉपिक हॉर्मोन (एसीटीएच) के जरिए रक्तप्रवाह से होते हुए किडनियों के ऊपर स्थित तिकोने आकार के एड्रीनल ग्लैंड या अधिवृक्क ग्रंथियों को एक और संदेश भेजती है. तनाव की साज-संभाल का असल केंद्र यही है. आपात संकेत मिलने पर एड्रीनल ग्लैंड स्टेरॉयड हॉर्मोन कॉर्टिसोल के रूप में रसद भेजता है. बदले में कॉर्टिसोल शरीर के संवेदी तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करता है, जिससे दिल ज्यादा तेज धड़कता है, नब्ज और रक्तचाप बढ़ जाता है और सांस ज्यादा तेज चलने लगती है. मस्तिष्क और रक्तप्रवाह में ज्यादा ऑक्सीजन और ग्लुकोज छोड़ दिए जाते हैं, जो शरीर में तनाव से लड़ने के लिए जरूरी ऊर्जा का विस्फोट पैदा करते हैं. खतरा गुजर जाने पर कॉर्टिसोल का स्तर गिर जाता है और शरीर सामान्य अवस्था में लौट आता है. 

समस्या तब पैदा होती है जब तनाव लंबे वक्त तक रहता है और शरीर में इतना ज्यादा कॉर्टिसोल होता है कि जरा-सी भी तनावपूर्ण स्थिति, फर्ज कीजिए ट्रैफिक जाम, होने पर इसका स्राव शुरू हो जाता है. डॉ. मिश्रा कहते हैं, ''कॉर्टिसोल हमारे जिंदा रहने का हॉर्मोन है और हमारे विचारों से नियंत्रित होता है. जब हमारे विचार तनावपूर्ण हो जाते हैं, तो शरीर अपनी रक्षा के लिए यह हॉर्मोन छोड़ता है. जब हम लंबे वक्त तक तनाव में रहते हैं, तो शरीर में बहुत ज्यादा कॉर्टिसोल हो सकता है, जो न तो हमारी सेहत के लिए अच्छा है और न हमारी कुशलता के लिए.''

इसे शरीर के थर्मोस्टेट की गड़बड़ी समझें, जो शरीर को गर्म बनाए रखती है. रोजमर्रा के तनाव से लड़ने के लिए अतिरिक्त रसायन यही करते हैं. दिल्ली के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. पी.एन. रंजन कहते हैं, ''कॉर्टिसोल की खोज बड़ी कामयाबी थी. मगर जल्द हमें एहसास हुआ कि स्टेरॉयड दोधारी तलवार हो सकते हैं. जब यह शरीर में बहुत ज्यादा होता है तो ठीक उसका उलटा करने लगता है जिसके लिए यह बना है—यानी शरीर की हिफाजत—और सूजन का कारण बन जाता है. कॉर्टिसोल की अधिकता को अब मस्तिष्क में स्थायी बदलाव या तंत्रिका तंत्र की कई बीमारियों के पूर्वलक्षणों से जोड़ा जाता है.'' अध्ययनों से तस्दीक होती है कि हाल के वर्षों में तनाव प्रतिक्रिया जरूरत से ज्यादा बार सक्रिय हो रही है. मसलन, वाशिंगटन डीसी स्थित सोसाइटी फॉर रिसर्च इन चाइल्ड डेवलपमेंट के जुलाई 2018 के अध्ययन से पता चला कि हाइस्कूल की परीक्षा में कम नबंर आने के कारण छात्रों में कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ गया. एक और अध्ययन से, जो ओरेकल और अमेरिकी रिसर्च फर्म वर्कप्लेस इंटेलिजेंस ने अक्तूबर 2021 में किया, पता चला कि इसमें शामिल 1,100 लोगों में भारतीय पेशेवर सबसे ज्यादा तनावग्रस्त थे.

अध्ययन में 80 फीसद के वैश्विक औसत के मुकाबले 91 फीसद भारतीय पेशेवरों ने कहा कि वे अत्यंत तनावग्रस्त हैं. तनाव की वजहें रुपए-पैसे की चिंता और भावनात्मक मसलों से लेकर करियर से जुड़ी परेशानियों और खुद अपनी जिंदगी से कट जाने तक कई थीं. फोर्टिस हेल्थकेयर में मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार विज्ञान के डायरेक्टर डॉ. समीर पारिख कहते हैं, ''हमारे शरीर की तनाव प्रतिक्रिया जीने-मरने की स्थितियों के लिए तैयार की गई होती है. मगर आज यह तंत्र दफ्तर देर से पहुंचने और बॉस की डांट-फटकार की चिंता या महज किसी की सालगिरह भूल जाने या कुछ ऑनलाइन पढ़ लेने सरीखी बहुत मामूली बातों से सक्रिय हो जाता है.'' बहुत ज्यादा सोच-विचार या हर बात की बहुत ज्यादा बखिया उधेड़ना हमारे वजूद के लिए अभिशाप और तनाव के ऊंचे स्तर का कारण बन गया है. डॉ. पारिख यह भी कहते हैं, ''आपके विचार आपके मस्तिष्क में तनाव की अनुभूति को नियंत्रित करते हैं. अगर कोई लगातार बदतरीन की आशंका से भयभीत है, तो वह अनजाने में ही अपने हाइपोथैलमस को गलत संकेत भेज रहा है.''

बीमारियों की जड़

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2016 में तनाव को ''21वीं सदी की स्वास्थ्य महारोग'' करार दिया था. तनाव निश्चित कारणों और लक्षणों वाली बीमारी भले न हो, पर समय के साथ शरीर के अंगों पर इतना कहर बरपाता है कि जिंदगी के लिए खतरा बन जाता है. मुंबई में मुलुंड स्थित फोर्टिस अस्पताल के सीनियर नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. अतुल इंगले कहते हैं, ''मेडिकल शब्दावली में हम तनाव को दीर्घकालिक सूजन की शारीरिक अवस्था के रूप में देखते हैं.'' किडनी पर इसके असर की बात करते हुए वे कहते हैं, ''यह असर सीधा नहीं होता, पर जिस तरह यह जीवनशैली को प्रभावित करता है, जिसमें लोग पानी कम पीते हैं, पोषक आहार से समझौते करते हैं और डायबिटीज या उच्च रक्तचाप की ज्यादा संभावना को न्यौता दे बैठते हैं. ये सब किडनी की गंभीर बीमारी के कारणों के रूप में जाने जाते हैं.'' डायबिटीज को भी तनाव से जोड़ा जाता है. पत्रिका पीएलओएस वन के 2017 के एक अध्ययन से पता चला कि तनाव टाइप 2 डायबिटीज का जोखिम-कारक है. डॉ. मिश्रा कहते हैं, ''तनावग्रस्त व्यक्ति की जीवनशैली इंसुलिन के प्रबंधन के लिहाज से स्वस्थ नहीं होती. वे कम खाते या ज्यादा जंक फूड खाते हैं और खाने के बीच बहुत ज्यादा फासला रखते हैं. वे कसरत के मामले में गड़बड़ी कर सकते हैं और अमूमन उनकी नींद भी उचट जाती है.''

शरीर के दूसरे अंगों, मसलन हृदय, मांसपेशियां, मस्तिष्क और प्रजनन प्रणाली, पर तनाव और भी गंभीर तरीकों से असर करता है. विशेषज्ञों को सबसे ज्यादा चिंता हृदय के जोखिम की है. स्वीडन की लिंकोपिंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के 2021 के एक अध्ययन से पता चला कि लोगों में दिल का दौरा पड़ने से पहले के महीनों में कॉर्टिसोल का स्तर साफ तौर पर ज्यादा था. 2004 में 'इंटरहार्ट' के ग्लोबल केस-कंट्रोल स्टडी में दर्ज किया गया कि उसमें हिस्सा लेने वाले 106 दक्षिण अफ्रीकी मरीजों में रुपए-पैसे की फिक्र की वजह से मायोकार्डिअल इनफ्रैक्शन का जोखिम 13 गुना बढ़ गया. डॉ. सेठ कहते हैं, ''हमें पता चल रहा है कि हम जितना सोचते थे, जोखिम उससे कहीं अधिक है. तनाव के नतीजतन पैदा होने वाली प्रक्रिया को आज अच्छी तरह पहचान लिया गया है—हृदय की आंतरिक परत में बदलाव और खून के थक्के जमने का ज्यादा जोखिम. दोनों से ही अचानक दिल का दौरा पड़ सकता है या धड़कन रुक सकती है.'' सिर्फ तनाव है तो दिल की बीमारियों का जोखिम ज्यादा होता है, पर समय से पकड़ लिया जाए तो सही किया जा सकता है. मगर, डॉ. सेठ कहते हैं, उच्च रक्तचाप या डायबिटीज सरीखे दूसरे जोखिम कारक भी हों, तो जोखिम नौ गुना ज्यादा बढ़ जाता है.

तनाव से बाद में मांसपेशियों और जोड़ों की बीमारियां भी हो सकती हैं. मसलन, लंबे वक्त के तनाव से उपजे और सूजन पैदा करने वाले साइटोकाइंस ओस्टियोपोरोसिस की रफ्तार तेज कर सकते हैं. हैदराबाद के यशोदा अस्पताल में सीनियर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. सुनील दाचेपल्ली कहते हैं, ''कॉर्टिसोल हॉर्मोन की कार्यप्रणाली में गड़बड़ी का बड़ा असर हड्डियों और मांसपेशियों की सेहत पर पड़ता है. मरीजों की मांसपेशियां कम और कमजोर हो जाती हैं और वजन बढ़ जाता है, जिससे खासकर रीढ़ की हड्डी और घुटनों पर दबाव आ जाता है. अत्यधिक सूजन के कारण जिन लोगों में हड्डी का बनना कम हो गया है, उन्हें जोड़ों में दर्द और चलने-फिरने में दिक्कत हो सकती है. यहां तक कि उन्हें ओस्टियोपोरोसिस भी हो सकता है.''

दिमाग भी तनाव से महफूज नहीं है. 2015 में न्यूरोलॉजी पत्रिका में छपे 1,38,782 लोगों के एक अध्ययन से पता चला कि बहुत ज्यादा समय, ऊर्जा और ध्यान की मांग करने वाली नौकरियों में काम से जुड़े तनाव खासकर महिलाओं में ब्रेन स्ट्रोक का जोखिम बढ़ा देते हैं. डॉ. रंजन कहते हैं, ''इससे रक्त के थक्कों का जोखिम बढ़ जाता है, जो फिर दिमाग में पहुंचकर और स्ट्रोक को जन्म देता है.'' इसके अलावा तनाव याददाश्त पर भी असर डालता है. आखिर में, एक हॉर्मोन की गडबड़ी का अनिवार्य असर दूसरे हॉर्मोन पर पड़ सकता है, जिससे प्रजनन क्षमता और हॉर्मोन से जुड़ी सेहत भी प्रभावित होती है. दिल्ली के मैक्स अस्पताल में मानसिक स्वास्थ्य विभाग के डायरेक्टर डॉ. समीर मल्होत्रा कहते हैं, ''अगर आप लंबे वक्त से तनावग्रस्त हैं, तो यह डोपामाइन, सेरोटोनिन और दूसरे प्रजनन हॉर्मोन में सीधे विघ्न डाल सकता है, जिससे फिर अवसाद, कम कामेच्छा, बांझपन, पोलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम सरीखी स्थितियां उत्पन्न होती हैं.'' 

नए तनावमोचन

हाल के बहुत-से शोध इन बारीकियों पर केंद्रित हैं कि मस्तिष्क खतरों के प्रति कैसे प्रतिक्रिया करता है और तनाव के इलाज में उनका इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है. 24 अक्तूबर को आयोवा यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पहली बार तस्दीक की कि तनाव प्रतिक्रियाएं पूरी तरह हमारे मस्तिष्क के नियंत्रण में होती हैं और एक निश्चित तंत्रिका मार्ग में हेरफेर तनाव का मुकाबला करने वाले हमारे तंत्र में सुधार ला सकता है. प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ सांइसेज (पीएनएएस) पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में उन्होंने उस तंत्रिका परिपथ या मार्ग की पहचान की जो तनाव में सक्रिय हो गया. यह खोज तनावग्रस्त मरीजों के इलाज और सहायता में असरदार और कामयाब होने की संभावना से भरपूर है. दिल्ली के मैक्स अस्पताल में मानसिक स्वास्थ्य के डायरेक्टर डॉ. समीर मल्होत्रा कहते हैं, ''अगर कोई निष्क्रिय रूप से तनाव का जवाब दे रहा है, अपनी तमाम भावनाओं को रोके हुए है और स्थिति को बदलने के लिए सक्रिय रूप से कुछ नहीं कर रहा है, तो इस तनाव का उसके मस्तिष्क और शरीर पर असर पड़ने की ज्यादा संभावना है. वहीं जो लोग ध्यानपूर्वक और सक्रिय रूप से तनाव पर काबू पा रहे हैं, उन पर इससे विपरीत असर होता है.''

साथ ही अनुसंधान तनाव को संभालने के तौर-तरीकों पर नई रोशनी डाल रहे हैं. अब दवाइयां और इलाज अकेला या पहला तरीका नहीं रह गया है. फरवरी 2022 में पीएलओएस वन में प्रकाशित एक आरंभिक अध्ययन के मुताबिक, यहां तक कि प्राकृतिक वातावरण में टहलकर तनाव के स्तर को काफी कम किया जा सकता है. क्रिस्टल हीलिंग से लेकर ध्यान तक, प्राणायाम से टहलने तक, अपनी सामाजिक व्यवस्था बनाने से पत्रिकाओं में लिखने तक, बागवानी से लेकर जिगसॉ पहेलियां हल करने तक—अलग-अलग और नई-नवेली तकनीकें अब तनावमुक्त होने में आपकी मदद कर सकती हैं. तनावमुक्ति बदले में आपको माइंडफुलनेस या पूर्ण सचेतनता—यानी संज्ञान की वह प्रक्रिया जो तनाव से निपटने के लिए बेहद जरूरी है—की तरफ ले जाती है. अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के मुताबिक, माइंडफुलनेस का अभ्यास मस्तिष्क में तनाव के दो मार्गों पर असर डालता है और इस तरह उन इलाकों में मस्तिष्क की बनावट और गतिविधि को बदल देता है जो एकाग्रता और भावना को नियंत्रित करते हैं. इसलिए तनाव के उत्प्रेरक या चुनौतीपूर्ण स्थिति सामने आने पर मस्तिष्क स्वचालित तनाव प्रतिक्रिया में अपने को बंद कर लेने के बजाए समाधान खोजता है. 

दिल्ली की मनोचिकित्सक डॉ. उपासना चड्ढा-विज कहती हैं, ''जब आप तनावमुक्त होते हैं और अपने दिमाग को किसी अलहदा गतिविधि में लगाने लगते हैं, तो समय के साथ आप तनाव को खतरा मानना बंद कर देते हैं और इसके बजाए उसे महज एक और स्थिति की तरह देखते हैं. हमें ज्यादा से ज्यादा एहसास हो रहा है कि लोगों को पल-पल की जागरूकता या माइंडफुलनेस पाने की जरूरत है.'' डॉक्टरों का कहना है कि तनाव का जवाब देने के लिए खुद तनाव से ही अपने को अलग करना होता है, क्योंकि जितना ज्यादा आप तनाव के बारे में सोचेंगे, उतना ही ज्यादा आपका शरीर तनाव के हॉर्मोन छोड़ेगा. चड्ढा-विज यह भी कहती हैं, ''तनाव के हॉर्मोन हर दूसरी चीज को अपनी छाया से ढक लेते हैं. आपके पेट में कुछ न कुछ गड़बड़ होने की अप्रिय भावना उठती है और मस्तिष्क उसका तर्कसंगत समाधान नहीं खोज पाता. जब आप तनावमुक्त होते हैं, तो इसका उलटा होता है.'' वाकई, मई 2022 में ब्रेन, बिहैवियर, ऐंड इम्यूनिटी—हेल्थ पत्रिका में छपे बेतरतीब चयन पर आधारित परीक्षण से पता चला कि माइंडफुलनेस बढ़ाने वाली गतिविधियों से दरअसल तनाव के अनुमानित स्तर में कमी आई और साथ ही शरीर में सूजन के संकेत भी कम थे.

डॉक्टरों का यह भी कहना है कि थोड़ा-सा तनाव आपके लिए अच्छा है. सकारात्मक तनाव, या अंग्रेजी में यूस्ट्रेस, जो डिस्ट्रेस का विलोम है, स्वास्थ्यवर्धक है और शरीर की प्रतिक्रिया प्रणाली को दुरुस्त रख सकता है. अलग-अलग लोग तनाव के प्रति अलग-अलग प्रतिक्रिया करते हैं, जो उनके व्यक्तित्व के प्रकार, प्रोत्साहन प्रणाली और सकारात्मक मानसिकता पर निर्भर करती है. मुकाबले का तंत्र भी हर व्यक्ति का अलग-अलग होता है. तनावमुक्त जिंदगी जैसी कोई चीज नहीं होती. डॉ. सेठ कहते हैं, ''ऐसा नहीं हो सकता कि कोई तनाव न हो. आप इतना कर सकते हैं कि आपके शरीर और दिमाग पर तनाव का असर कम हो.'' तमाम व्यायाम, चाहे आध्यात्मिक हों या भावनात्मक या शारीरिक, मस्तिष्क को आराम करने और ज्यादा जागरूकता से सोचने के लिए प्रशिक्षित करते हैं. ऑस्ट्रिया की यूनिवर्सिटी ऑफ इन्सब्रूक के 73 वयस्कों पर किए गए 2022 के अध्ययन से पता चला कि जो लोग ध्यान करते थे, वे नोटिफिकेशन आते ही फोन देखने की ललक को रोक सके. पुणे की 30 वर्षीया गृहिणी नेहा कपूर के लिए यही बदलाव बागवानी की बदौलत आया. वे कहती हैं, ''जब मैं पौधों के साथ होती हूं तो ध्यान की अवस्था में चली जाती हूं.

फिर मुझे एहसास होता है कि अब मैं उन चीजों की तरफ नहीं खिंच रही हूं जिनसे मेरे मन में चिंता पैदा होती है.''  इसने उच्च रक्तचाप और माइग्रेन के हमलों को कम करने में युवा पेशेवरों की भी मदद की. कोलकाता के 42 वर्षीय इंजीनियर आनंद दत्ता का कहना है कि जब भी वे अपने को बहुत ज्यादा सोचता पाते हैं, हर बार अपनी पत्रिका में लिखने या पियानो सुनने से उन्हें यही फायदा होता है. डॉ. चड्ढा-विज कहती हैं, ''विचार यह है कि जब भी आप तनावग्रस्त महसूस करें, तनावमुक्त होने के लिए खुद को हर बार संज्ञानात्मक रूप से तरोताजा करें. लोगों को अलग-अलग चीजें तनावमुक्त करती हैं.'' भले ही कुछ लोग इसे छद्म-विज्ञान कहकर खारिज कर दें.

मसलन, नेगी को लगता है कि क्रिस्टल हीलिंग उनके तनाव के हमलों का जवाब है. उन्होंने अपने घर में मुख्य दरवाजे के सामने टूरमैलीन का विशाल काला पिरामिड रखा है और इसके एक छोटे संस्करण के साथ रोज सुबह ध्यान करती हैं. इसके बाद वे मौन रखते हुए चॉकलेट के दो टुकड़े खाती हैं. खास बुरे दिन वे अपने पूरे चेहरे पर सुखाया हुआ लैवेंडर मलकर आराम करती हैं. इस सबसे उन्हें न केवल गर्दन के त्रासदायी दर्द से आराम मिला, बल्कि बेहतर नींद, अधिक भूख और ज्यादा ऊर्जा भी मिली. वे कहती हैं, ''तीन महीनों में मेरे शरीर ने हल्का महसूस किया.'' पति के साथ उनकी अनबन भी पहले से कम हो रही है.

जिन्हें मध्यम दर्जे का तनाव रहता है, उनके लिए विशेषज्ञ प्राणायाम या ध्यान की सिफारिश करते हैं जिससे वे बेहतर माइंडफुलनेस हासिल कर सकें. वैज्ञानिक पत्रिका सोशल साइकोलॉजिकल बुलेटिन मंं इस साल प्रकाशित अपने अनुभवों के आधार पर मॉन्ट्रियल, कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ क्यूबेक के शोधकर्ताओं की एक टीम ने तनाव की स्थितियों को बेहतर संभालने के लिए माइंडफुलनेस मेडिटेशन की सिफारिश की. निमहांस योगा फॉर स्ट्रेस मैनेजमेंट कार्यक्रम चलाने वाले डॉ. हेमंत भार्गव कहते हैं, ''आम तौर पर कॉर्टिसोल का स्राव स्वैच्छिक नहीं होता. लेकिन जब आप माइंडफुलनेस का अभ्यास करते हैं, तो एचपीए एक्सिस में उतार-चढ़ाव आते हैं.'' डॉक्टरों का यह भी कहना है कि संवेदी तंत्रिका तंत्र के बजाए, जिसके कारण आपका शरीर तनाव का जवाब देता है, माइंडफुलनेस आपके सह-संवेदी तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करता है. सह-संवेदी तंत्रिका तंत्र तनाव या खतरे के दौर के बाद तनावमुक्त होने में आपके शरीर की मदद करता है.

जर्नल ऑफ आयुर्वेद ऐंड इंटीग्रेटिव मेडिसिन में सितंबर 2022 में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला कि प्राणायाम से तनाव में कमी आई. डॉक्टरों का कहना है कि तनावमुक्ति एकाग्र और सचेत ढंग से सांस लेने के जरिए मस्तिष्क और शरीर में ज्यादा ऑक्सीजन पहुंचने का नतीजा हो सकती है. मसलन, 10 तक गिनते हुए भीतर सांस खींचने से शरीर भी हल्का और तनावमुक्त होता है.

अगर तनाव लंबा खिंचता है तो पेशेवर मदद लेनी चाहिए. डॉ. मल्होत्रा कहते हैं, ''आपको मनोचिकित्सक की मदद लेने के डर से उबरना हैं. कई लोग ऐंटी-एंग्जाइटी दवाइयां लेने से कतराते हैं, पर वे वैसे भी इलाज के पहले चरण में नहीं दी जातीं.''

तनाव तो खैर है और रहेगा. उसके बढ़ने की वजहों में इजाफा ही हुआ है—महामारी और सोशल मीडिया की दुश्चिंता से लेकर नौकरी की बढ़ती अनिश्चितताओं और पर्यावरण की मुसीबतों तक. पेशेवर और निजी जिंदगी के अंतहीन तकाजे भी लोगों को बेलगाम तनाव की मानसिक और भावनात्मक अवस्था में धकेल रहे हैं. तनाव से निबटने की दिशा में पहला कदम स्वीकार करना है कि यह सेहत का गंभीर मसला है. इसे खारिज करना खतरे को न्यौता देना होगा. 

तनाव को ऐसे समझें

खतरे की अनुभूति एचपीए या हाइपोथैलमस-पिट्यूटरी-एड्रीनल एक्सिस के साथ शारीरिक प्रतिक्रियाओं का सिलसिला शुरू करती है, जिससे शरीर की भागो या लड़ो प्रतिक्रिया तय होती है

...शरीर की प्रतिक्रिया

खतरा
इसकी अनुभूति मस्तिष्क में शुरू होती है

हाइपोथैलमस
मस्तिष्क का यह कमान सेंटर नीचे पिट्यूटरी ग्लैंड को सक्रिय करने के लिए कॉर्टिकोट्रोपीन-रिलीजिंग हॉर्मोन भेजता है

पिट्यूटरी ग्लैंड या पीयूष ग्रंथि
एंडोक्राइन प्रणाली का नियंत्रण कक्ष, यह एड्रीनल ग्लैंड को आगाह करने के लिए एड्रीनोकॉर्टिकोट्रॉपिक हॉर्मोन का स्राव करता है

एड्रीनल ग्लैंड या अधिवृक्क ग्रंथि
हमारी किडनियों के ऊपर स्थित यह तिकोना अंग तनाव से जुड़ा हॉर्मोन  छोड़ता है जिसे कॉर्टिसोल कहते हैं

कॉर्टिसोल
यह ऐंटी-इन्फ्लेमैटरी स्टेरॉयड शरीर को कुछ अतिरिक्त सहारा देता है और उसके संवेदी तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करता है

संवेदी तंत्रिका तंत्र
इसकी वजह से हृदय तेज धड़कने लगता है, रक्तचाप बढ़ जाता है और सांस इतनी तेज हो जाती है, जिससे शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन मिल जाती है

इन्फ्लेमैशन या सूजन
खतरा कम होते ही कॉर्टिसोल कम हो जाना चाहिए. मगर लंबे वक्त के तनाव के कारण इसका बहुत ज्यादा निर्माण होता है, जिससे सूजन होती है और शरीर के जीवनदायी अंगों को नुक्सान पहुंचता है

74% लोगों ने तनाव की शिकायत की और 88 फीसद ने बेचैनी की. यह  सेंटर ऑफ हीलिंग के दिसंबर 2020 के सर्वे का नतीजा है

91% भारतीयों ने ओरेकल स्टडी के 2018 के सर्वे में तनाव की शिकायत की, सबसे ज्यादा संख्या सर्वे में शामिल 1,100 प्रोफेशनल लोगों में थी

शरीर पर असर
मस्तिष्क

कॉर्टिसोल का उच्च स्तर सिनैप्स नियंत्रण यानी न्यूरॉन के बीच संचार की व्यवस्था में विघ्न डालकर मस्तिष्क को नुक्सान पहुंचा सकता है, जिससे सामाजिकता का हनन होता है. कुछ अध्ययनों से पता चला कि तनाव मस्तिष्क की कोशिकाओं को मार सकता है और मस्तिष्क का आकार भी छोटा कर सकता है. पता यह चला कि शरीर में तनाव से उत्पन्न कॉर्टिसोल की लहरें याददाश्त कमजोर कर देती हैं, क्योंकि तनाव के असर से प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सिकुड़ जाता है

हृदय
शरीर में कॉर्टिसोल के उच्च स्तर से पैदा सूजन कोरोनरी आर्टरी या हृदय की धमनियों को नुक्सान पहुंचाती है. लंबे समय तक कॉर्टिसोल के संपर्क से रक्तचाप, कोलेस्टेरॉल और ट्राइग्लीसराइड बढ़ते हैं. बीएमजे में 2019 का एक अध्ययन इस नतीजे पर पहुंचा कि तनाव का संबंध कार्डियोवैस्कुलर बीमारी की जल्द शुरुआत से है डायबिटीज

बीएमसी पत्रिका में 2018 के अध्ययन ने बताया कि जिन्हें टाइप 2 डायबिटीज थी, उनमें से 20-40 फीसद लोगों ने अपनी जिंदगी में तनावपूर्व घटनाएं भुगती थीं. 2020 में साइकोन्यूरोएंडक्राइनोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन ने तस्दीक की कि कॉर्टिसोल से टाइप 2 डायबिटीज वाले लोगों में रक्त शर्करा का स्तर बढ़ गया

किडनी
हालांकि सीधा असर नहीं पड़ता, लेकिन तनाव डायबिटीज का कारण बनता है, जो बदले में लंबे वक्त में किडनी की गंभीर बीमारी को जन्म देती है

मांसपेशियां और हड्डियां 
पता चला कि कॉर्टिसोल से मांसपेशियों का द्रव्यमान कम हुआ और ओस्टियोपोरोसिस (हड्डियों के नक्सान) का जोखिम बढ़ गया. इससे रीढ़ की हड्डी, घुटनों पर दबाव आ सकता है और ओस्टियो-अर्थराइटिस हो सकता है. तनाव के कारण जोड़ों में सूजन आ सकती है जिससे जोड़ और मांसपेशियों में दर्द हो सकता है

कैंसर
2021 में पबमेड में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला कि तनाव के हॉर्मोन प्रयोग के लिए इस्तेमाल किए गए चूहे के सुप्त कैंसर कोशिकाओं को जगा सकते थे, जिससे तनाव के कारण मनुष्यों में कैंसर के बार-बार होने की संभावना बढ़ जाती है

अनिद्रा
रोज के हल्के तनाव का पहला और सबसे सीधा नतीजा रैपिड-आइ-मूवमेंट (आरईएम) नींद में बढ़ोतरी होना है, जिससे मस्तिष्क में तीव्र गतिविधि उत्पन्न होती है. तनाव के कारण गैर-आरईएम या गहरी नींद कम आती है, जो मस्तिष्क के आराम और तरोताजा होने के लिए बेहद जरूरी है. तनावग्रस्त लोगों को नींद आ पाना ज्यादा मुश्किल हो जाता है क्योंकि शरीर में कॉर्टिसोल के बढ़ने के कारण मस्तिष्क आराम नहीं कर पाता

हॉर्मोन से जुड़ा स्वास्थ्य
तनाव को प्रजनन क्षमता और यौन इच्छा में कमी से सीधे जोड़ा गया है, क्योंकि कॉर्टिसोल सेक्स हॉर्मोन के उत्पादन में बाधा डालता है. यह ल्यूटीनाइजिंग हॉर्मोन के उत्पादन में भी बाधा डालता है, जो महिलाओं के मासिक धर्म के चक्र को सही रखने के लिए बहुत जरूरी है

पोषण
ब्रेन रिवार्ड सेंटर यानी इनाम या सुख की अनुभूति उत्पन्न करने वाला मस्तिष्क का हिस्सा भोजन के सेवन को तनाव प्रतिक्रिया के कम होने से जोड़ना शुरू कर देता है. तनाव से प्रेरित खाना आम है, जिससे पोषक आहार में कमी, खाने के गड़बड़ पैटर्न और अक्सर ज्यादा खा लेने के रूप में होता है

कैसे जानें कि आप तनाव में हैं

सोने और खाने के पैटर्न में बदलाव

सिर दर्द या मांसपेशियों में दर्द

थकान या शरीर में कमजोरी

रक्तचाप या दिल की धड़कन बड़ना

घबराहट के दौरे पड़ना या हमेशा खतरे का आभास होना

एकाग्रता की कमी

सामाजिक रिश्तों को कायम रखने में परेशानी

तनाव दूर करने के तरीके

दिमाग को सकारात्मक सोच में लगाएं
अपने दिमाग में यह सोचें कि ग्लास आधा खाली नहीं, आधा भरा है. दिमाग सकारात्मक सोचने लगता है तो तनाव के हॉर्मोन घट जाते हैं क्योंकि शरीर को खतरे का एहसास नहीं होता

कोई वैकल्पिक इलाज पद्धति आजमाएं
रेकी से लेकर फ्लावर थेरेपी जैसी वैकल्पिक पद्धतियां नकारात्मक विचार और ऊर्जा को घटाकर शरीर में तनाव कम करने में मदद करती हैं

कोई हमदर्द तलाशें
किसी से अपनी भावनाएं साझा करने से आप तनाव की स्थितियों से बाहर निकलते हैं या उन लोगों से दूर हो जाते हैं, जो तनाव देते हैं

खोजें कि हंसी कैसे आए
अध्ययनों से पता चला है कि हंसने से तनाव पैदा करने वाले हॉर्मोन का स्राव कम होता है

अपनी खुशी का काम करें
यह जरूरी है कि वही करें जो आपको पसंद हो और अपने लिए समय निकालें. जो कुछ आपको खुशी देता है, वह करने से अपने आप शरीर में तनाव के हॉर्मोन संतुलित हो जाते हैं

ध्यान और प्राणायाम करें
पता चला है कि ध्यान करने और सांस को नियंत्रित करने से तनाव का एहसास कम हो जाता है और बेतुके ख्याल आना बंद हो जाते हैं. धीमे और समझदारी से सांस के नियंत्रण से रक्तचाप भी घट सकता है

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें