scorecardresearch
 

दिल्ली में 'आप' की जीत ने आम आदमी की उम्मीदें कायम की

कड़ी मेहनत, चाकचौबंद योजना और प्रेरणादायी नेतृत्व के जरिए सियासत में अनाड़ी आप ने कांग्रेस, बीजेपी को सबक देते हुए जीता दिल्ली का दिल.

आठ दिसंबर को सुबह तकरीबन 11 बजे, जब टेलीविजन चैनलों ने दिल्ली में कांग्रेस पार्टी की करारी हार सुनिश्चित होने की खबर दिखाना शुरू किया तो उधर दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के अशोक रोड स्थित कार्यालय के बाहर जोश की लहर दौड़ गई. सुरक्षा बढ़ा दी गई थी, नेताओं के बैनर लगा दिए गए थे और चमकीले-लाल कपड़ों में सजे बैंड वाले ढोल-नगाड़े बजा रहे थे. सफेद कुर्ताधारी भाजपाई मिठाइयां बांट रहे थे. यह एक बड़े राजनैतिक दल का सुनियोजित उत्सव था.

वहां से चंद किलोमीटर दूर, कनॉट प्लेस में हनुमान मंदिर के पीछे एक जीर्ण-शीर्ण भवन में स्थित आम आदमी पार्टी (आप) के मुख्यालय के बाहर तकरीबन 200 लोग जमा थे. पहले तल की खिड़की से आप के नेता कुमार विश्वास ने उत्साह भरे स्वर में घोषणा की कि पार्टी 25 से ज्यादा सीटों पर आगे चल रही है. भीड़ से एक उल्लास भरा जयघोष-सा गूंज उठा. लोग पागलों की तरह हवा में झाडू (पार्टी का चुनाव चिन्ह) लहराने लगे.
कनॉट प्लेस स्थित आप के दफ्तर में जोश से भरे कार्यकर्ता
एक घंटे के भीतर भीड़ दोगुनी हो गई क्योंकि छात्र, मिड्ल क्लास प्रोफेशनल, प्रवासी मजदूर और मझेले दर्जे के सरकारी कर्मचारी—हर तरह के लोग खुशी मनाने के लिए इकट्ठा होने लगे. उनके हाथों में गिटार, ढोलक, फूलों की पंखुडिय़ां और गुलाल था. उनमें से कुछ लोग नजदीकी दुकानों से ब्रेड पकौड़े और मिठाइयां खरीद लाए.

भीड़ की उत्तेजना को अभिव्यक्त करते हुए 23 वर्षीय छात्र श्याम सतीश ने कहा, ''किसी ने नहीं सोचा था कि यह पार्टी इस चुनाव में कुछ कर पाएगी, लेकिन हमारी दुआएं कबूल कर ली गई हैं.” बीजेपी के नियोजित समारोह के मुकाबले यह स्वाभाविक खुशी थी.

दिन का अंत होते-होते, 28 सीटों पर जीत का परचम लहरा कर, महज एक साल पुराना दल 'आप’ इस चुनाव की सबसे बड़ी खबर बन चुका था. कुछ ही महीनों के भीतर इसने 15 सालों से शासन कर रही कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया और बीजेपी की बढ़त पर लगाम लगा दी.

सबसे महत्वपूर्ण बात, इसके समर्थकों ने यह साबित किया कि इन दो प्रमुख पार्टियों से हटकर भी राजनीति की जा सकती है और इसे किसी क्षेत्र या पहचान के जरिए परिभाषित किए जाने की जरूरत नहीं है. सच्चे अर्थों में यह एक आम आदमी की जीत थी. अंतिम नतीजों की घोषणा के बाद अरविंद केजरीवाल मुस्कुराते हुए भीड़ से मुखातिब हुए और कहा, ''यह लोगों की जीत है.”
दिल्ली में दलों का चुनावी प्रदर्शन
चार दिसंबर को दिल्ली में चुनाव खत्म होने के बाद विभिन्न टीवी चैनलों के एक्जिट पोल में आप को 8 से 10 सीटें दी गई थीं. कुछ ने तो इसको 5 सीटें मिलने का अनुमान लगाया था. दल के नेताओं को छोड़ कर किसी ने नहीं सोचा था कि उन्हें सफलता हासिल होगी.

जो बात विभिन्न एक्जिट पोल नहीं पढ़ पाए, वह था जमीनी माहौल और वह मेहनत जो आप टीम के कार्यकर्ताओं ने इस चुनाव में की थी. छात्रों, फैक्ट्रियों के कामगारों, नौकरियों से छुट्टी लेकर लगे युवक-युवतियों, कैब ड्राइवरों, प्रशासनिक सेवा से सेवानिवृत्त व्यक्तियों वगैरह से बनी .

7,000 से ज्यादा समर्पित कार्यकर्ताओं की इस टीम ने घर-घर जा कर लोगों को बताया कि सरकार बदलना दिल्ली के लिए क्यों इतना महत्वपूर्ण है. 45 वर्षीय केजरीवाल ने नेतृत्व की मिसाल पेश की और उनके विधानसभा क्षेत्र नई दिल्ली में कार्यकर्ताओं ने दिन-रात मेहनत की ताकि वे वहां स्थित 30,000 घरों तक अपनी बात पहुंचा सकें.

मालवीय नगर विधानसभा क्षेत्र से आप के टिकट पर जीतने वाले 39 वर्षीय सोमनाथ भारती कहते हैं, ''वे (केजरीवाल) बेहद प्रेरक नेता हैं. वे हर मामले में एकदम सामने नेतृत्व प्रदान करते हैं.” उनके शब्दों में, ''पार्टी के हर सदस्य को प्रचार के लिए घर-घर जाना होता था.

यह काम सुबह छह बजे से शुरू होकर रात 11 बजे तक चलता था.” प्रचार-अभियान में अक्सर नुक्कड़ सभाएं होती थीं जिनमें किसी मुहल्ले के लोग अपनी समस्याओं के बारे में बात करते थे. हर विधानसभा क्षेत्र के लिए घोषणापत्र के लिए मीटिंग होती थीं, जिन पर केजरीवाल खुद नजर रखते थे.

पार्टी में उनके एक करीबी नेता कहते हैं, “अरविंद एक मायने में बेहद जिद्दी स्वभाव के हैं. अगर वे दिमाग में कोई बात बिठा लेते हैं तो कोई भी उन्हें डिगा नहीं सकता. वे बेहद साफ सोच और फोकस वाले व्यक्ति हैं. वे अपने रास्ते में आने वाली हर तरह की बाधा से पार पा सकते हैं.”
नतीजों के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते अरविंद केजरीवाल
पार्टी का अथक प्रचार रंग लाया. दिल्ली के चुनाव की तैयारियों के दौरान ऐसा लगा कि जैसे शहर के सभी 70,000 ऑटो ड्राइवर अपने ग्राहकों के सामने आम आदमी पार्टी का प्रचार कर रहे हों. आप की लहर छात्रों के बीच नजर आई. यह पहली बार वोट देने वाले ऐसे लोगों में दिखी, जो बदलाव चाहते थे. साथ ही यह मध्य वर्ग के ऐसे पेशेवर लोगों में दिखी जो पार्टी के भ्रष्टाचार-विरोधी एजेंडे से आकर्षित हुए थे.

हालांकि बीजेपी के नेता अरुण जेटली ने स्वीकार किया कि चुनाव चिन्ह के तौर पर झाडू के चयन ने आप की सफलता में अहम भूमिका अदा की, पर कुछ दूसरे नेताओं ने इसे लेकर अंदेशा जताया था. चुनावों से ठीक पहले एक साक्षात्कार में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने आप को 'गाजियाबाद से झाडू हिलाने वाले लोगों का समूह’ कहते हुए खारिज कर दिया था. केजरीवाल ने नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र में दीक्षित का सीधा मुकाबला किया और उन्हें करीब 26,000 वोटों से हरा दिया.

जब एक मीडिया पोर्टल ने आम आदमी पार्टी के कुछ सदस्यों का स्टिंग कर उन पर अनैतिक तरीकों से पूंजी उगाहने का आरोप लगाया तो केजरीवाल मजबूती से डटे रहे और उन्हीं पर हमला बोल दिया. केजरीवाल ने दृढ़तापूर्वक कहा, ''हमारे खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन करने वालों के प्रति हम आभारी हैं क्योंकि इनकी वजह से हमारी रैलियों में भीड़ और बढ़ी है.”

कुछ लोगों ने इन्हें डॉर्क हार्स और किंगमेकर माना, लेकिन केजरीवाल और उनके सहयोगियों के इरादे कुछ और ही थे. एक रेडियो विज्ञापन में उन्होंने बेहद भरोसे के साथ दावा किया था कि उनकी पार्टी को 70 में से 50 सीटें मिलेंगी. एक अन्य रेडियो विज्ञापन में आप के नेता और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने लोगों से अपील की कि अगर दूसरी पार्टियां कहती हैं कि आम आदमी पार्टी को चुनने से आप का वोट बरबाद होता है, तो उनकी बात पर ध्यान न दें.

वे अपने दिल की बात सुनें और उनकी पार्टी को वोट दें. आम आदमी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''50 सीटें मिलने का अनुमान सही नहीं था, लेकिन यादव ने एक त्रिशंकु विधानसभा का अनुमान व्यक्त किया था. चूंकि आम आदमी पार्टी किसी दूसरी पार्टी के साथ गठजोड़ नहीं करना चाहती, ऐसे में उन्होंने छह महीने में फिर से चुनाव होने का अनुमान व्यक्त किया, जिसमें आप का प्रदर्शन इससे बेहतर रहेगा.”

यादव का विश्लेषण पूर्वानुमान के आधार पर था. आप के 15 उम्मीदवार 5,000 मतों से कम अंतर से हारे हैं. इनमें से कुछ महज 2,000 मतों से हारे हैं. पूर्व टीवी पत्रकार और आम आदमी पार्टी का जाना-माना चेहरा शाजिया इल्मी आरके पुरम सीट महज 318 मतों से हार गईं. पार्टी को भरोसा है कि फिर से चुनाव होने पर ये सीटें उन्हें मिल जाएंगी.

पार्टी के इस उम्मीद की एक वजह यह भी है कि उसके ऐसे उम्मीदवारों को भी शानदार जीत मिली है जिसका राजनीति से दूर-दूर तक का कोई नाता नहीं था. मिसाल के तौर पर देवली विधानसभा क्षेत्र से आप के उम्मीदवार 25 वर्षीय वाणिज्य स्नातक प्रकाश 30,000 से ज्यादा वोटों से विजयी हुए हैं.

सीआइएसएफ के पूर्व जवान और अब बॉडी बिल्डर चालीस वर्षीय राजू धिंगान त्रिलोकपुरी से जीते हैं. पैंतीस वर्षीय सुरेंद्र सिंह को दिल्ली कैंट से विजय मिली है. सिंह उन कमांडो में से एक थे जिन्हें 26/11 के मुंबई आंतकी हमले के दौरान ताज होटल पर हेलीकॉप्टर से उतारा गया था.

दिल्ली की 70 सदस्यीय विधानसभा में राखी बिरला, वीणा आनंद और बंदना कुमारी के रूप में जो तीन महिला विधायक चुनी गई हैं, वे भी आम आदमी पार्टी की ही हैं. 26 वर्षीया पूर्व पत्रकार बिरला ने मंगोलपुरी से तीन बार के कांग्रेसी विधायक और वरिष्ठ मंत्री राज कुमार चौहान को 10,000 से ज्यादा वोटों से हराया है.

वे कहती हैं, ''मुझे बिल्कुल डर नहीं लगा. मुझे हमेशा यह विश्वास था कि जो लोग इन नेताओं को आसमान पर चढ़ा देते हैं, जरूरत पडऩे पर इन्हें नीचे भी ला सकते हैं.” 39 वर्षीया बंदना कुमारी शालीमार बाग से विजयी हुई हैं. वे 'नई पहल’ नाम के सामाजिक संगठन की संयोजक हैं और नारी सशक्तीकरण के लिए काम करती रही हैं.

वे भी जन लोकपाल आंदोलन के दौरान केजरीवाल के साथ जुड़ीं. 47 वर्षीया वीणा आनंद को पटेलनगर से जीत हासिल हुई है. वे केजरीवाल के इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ी हुई थीं. वे कहती हैं, ''हमारी जीत यह दिखाती है कि लोग भ्रष्ट राजनीतिज्ञों से उकता चुके हैं और ईमानदार प्रतिनिधि चाहते हैं.”

दिल्ली में शानदार जीत मिलने के एक दिन बाद केजरीवाल ने अपने सभी नव-निर्वाचित विधायकों को कांस्टीट्यूशन क्लब में बुलाया. उन्होंने कहा, ''अगर चुनाव फिर से होते हैं तो इस बार हमें सरकार बनानी है. हमारे कई दुश्मन हैं और वे हमें तोडऩा चाहेंगे, लेकिन हमें अपनी एकता कायम रखनी है.

बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही आपको लुभाने की कोशिश करेंगे. उनके लिए आप एक मूल्यवान वस्तु हैं. आपको टूटना नहीं है. आप मत भूलिए कि आपको किसलिए चुना गया है. लोगों ने आप सब पर इसलिए विश्वास जताया है क्योंकि आप उनमें से ही एक हैं. हम सभी आम आदमी हैं.” जहां एक ओर वे इस बात पर डटे हुए हैं कि बीजेपी या कांग्रेस किसी के साथ वे गठजोड़ नहीं करेंगे, वहीं पार्टी के दूसरे नेता एक व्यावहारिक समाधान पर जोर दे रहे हैं.
चुनाव नतीजों का इंतजार करते आप समर्थक
पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रशांत भूषण ने 10 दिसंबर को कहा, ''अगर बीजेपी लिखित में यह देती है कि वह आम आदमी पार्टी के वादे के अनुरूप 29 दिसंबर तक जन लोकपाल विधेयक पारित करेगी और दिल्ली में जन सभाओं का गठन करेगी, तो हम उनका समर्थन करने पर विचार कर सकते हैं.” हालांकि साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह उनकी अपनी राय है.

केजरीवाल अब 2014 को लक्ष्य बना रहे हैं और उनके सहयोगियों का कहना है कि वे देश के प्रमुख शहरों पर ध्यान केंद्रित करेंगे. इन शहरों में मुंबई, कोलकाता, बंगलूरु, चेन्नै और नरेंद्र मोदी का गढ़ अहमदाबाद शामिल होंगे. दिल्ली में आप की सफलता ने दिखाया है कि इसके मिजाज वाली राजनीति खास तौर पर शहरी इलाकों में प्रभावी है.

जहां प्रवासी कामगारों, निम्न-आय वर्गों और मध्य वर्ग के कुछ धड़ों के लोग एक ऐसे दल से जुडऩा चाहते हैं जो उनकी उम्मीदों का प्रतिनिधित्व कर सके. दिल्ली में हुए जश्न के जलसे 2014 में देश भर में दोहराए जा सकते हैं.   

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें