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खास रपटः समुद्र तल की दौड़

भारतीय वैज्ञानिकों ने समुद्र की तलहटी की छानबीन की महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की. समुद्रतल से प्राकृतिक संसाधन निकालने के लिए भारत के गहन महासागर मिशन की अंदरूनी जानकारी.

एक छोटा सा कदम 30 अक्तूबर को समुद्रयान को झंडी दिखाने के कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह एक छोटा सा कदम 30 अक्तूबर को समुद्रयान को झंडी दिखाने के कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह

तीन भारतीय वैज्ञानिक 2024 में किसी वक्त मध्य-हिंद महासागर में एक अनुसंधान जहाज से मत्स्य 6000 नाम के एक पीले टाइटेनियम पनडुब्बी यान पर सवार होंगे. 25 टन का यह पनडुब्बी यान, जिसका नामकरण भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार पर किया गया है और जो तकरीबन मिनी वैन के आकार का है, जहाज से उठाकर समुद्र के भीतर छोड़ दिया जाएगा.

इसी के साथ समुद्र की गहराइयों का उसका सफर शुरू हो जाएगा. एक तार के जरिए ऊपर अपने मूल जहाज से बंधा मत्स्य 100 मीटर का निशान पार करके उस तल में प्रवेश करेगा जहां सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती और महासागर तारकोल के गड्ढे जैसा काला स्याह हो जाता है. करीब चार घंटों तक तेजी से नीचे उतरते हुए यह पनडुब्बी यान हिंद महासागर की तलहटी पर पहुंच जाएगा.

इतनी गहराई में जल दबाव 600 एटमॉस्फीयर्स होता है, जो मोटे तौर पर प्रति वर्ग इंच एक हाथी के बराबर है. पनडुब्बी यान के तंग हिस्सों के भीतर से वैज्ञानिक मत्स्य की बाहरी लाइटें जला देंगे, जिससे काला स्याह जगमगा उठेगा. फिर वे समुद्र की तलहटी के आसपास करीब छह घंटे तक इधर-उधर भटकते हुए एक्रीलिक व्यूपोर्ट यानी यान की खिड़कियों से पर्यावरण का जायजा लेंगे और केकड़े सरीखी रोबोटिक भुजाओं से नमूने एकत्र करेंगे.

यह भारत का पहला मानव अंतर्जलीय मिशन होगा. इससे भारत समुद्र की गहराई में मानव पनडुब्बी यान उतारने वाला अमेरिका, जापान, फ्रांस, रूस और चीन के बाद विश्व का छठा देश बन जाएगा. इससे पहले एनआइओटी (राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान) की मानवरहित मशीनें इन गहराइयों का सफर कर चुकी हैं. बीते मार्च और अप्रैल के बीच एनआइओटी के जहाज ओआरवी सागर निधि ने वराह-1 रोबोट मध्य हिंद महासागर में उतारा था.

ट्रैक किया जा रहा यह मिनी टैंक सरीखा वाहन पॉलीमैटेलिक नॉड्यूल की खोज का अपना मिशन पूरा करने के लिए 5,270 मीटर गहराई पर समुद्रतल को खंगालता रहा. यह किसी भारतीय मशीन का अब तक का सबसे गहरा गोता था. वराह मिशन से इतनी गहराइयों पर इसमें लगी इलेक्ट्रॉनिक्स और मैकेनिकल तथा सोनार प्रणालियों की तस्दीक हो सकी.

इन परीक्षणों के साथ भारत ने एक अहम मील का पत्थर पार किया और इतनी गहराइयों में समुद्रतल संचलन की संपूर्ण प्रणालियों का प्रदर्शन करने वाला पहला देश बन गया. पिछला रिकॉर्ड अमेरिका के नाम था, जिसके ग्लोमर एक्सप्लोरर ने 1970 के दशक में 4,000 मीटर गहराई पर ऐसे क्रॉलर उतारे थे.

केंद्रीय विज्ञान राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जितेंद्र सिंह ने 30 अक्तूबर को 4,000 करोड़ रु के समुद्रयान मिशन को हरी झंडी दिखाई. इसे डीप सी मिशन भी कहा जाता है. मिशन 2018 में प्रोजेक्ट मोड में लॉन्च किया गया था. अब इसे सरकार की देखरेख में मिशन मोड में बदल दिया गया है. पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सेक्रेटरी डॉ. एम. रविचंद्रन कहते हैं, ''यह हमारे डीप सी मिशन के छह हिस्सों का एक हिस्सा भर है. यह सबसे ज्यादा चुनौतियों से भरा होगा, क्योंकि इसमें जिंदगियां शामिल हैं.’’ 

समुद्रतल में सोने की खदान
चेन्नै स्थित एनआइओटी ने मत्स्य का आरंभिक डिजाइन पूरा कर लिया है. इसके निर्माण में इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन), आइआइटी मद्रास, डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) सरीखी संस्थाओं और एलऐंडटी सरीखी निजी क्षेत्र की दिग्गजों कंपनियों ने सहायता की है. यान का सबसे अहम हिस्सा, अंतरिक्ष-स्तरीय टाइटेनियम क्षेत्र, जिसमें तीन एक्वानॉट या समुद्रयात्री बैठेंगे, इसरो का विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र तैयार कर रहा है.

इसका स्टेनलेस स्टील का संस्करण तैयार करके 500 मीटर की गहराई पर उसका परीक्षण भी किया जा चुका है. जीवन रक्षक प्रणालियां, यान का ढांचा और नियंत्रण प्रणालियां, ध्वनि संचार प्रणालियां, अंतर्जलीय स्थिति-निर्धारण प्रणाली, समुद्र जल पंप और संचालक भुजाएं देश के भीतर डिजाइन की जा रही हैं. एनआइओटी के डायरेक्टर डॉ. जी.ए. रामदास कहते हैं, ''कई हिस्से देश में ही डिजाइन किए जा रहे हैं, वहीं कुछ अंतरराष्ट्रीय बाजार से मंगवाए जा रहे हैं क्योंकि महज मुट्ठी भर वाहनों के लिए उद्योग लगाना व्यावहारिक नहीं है.’’

एजेंसी अपने स्टेनलेस स्टील स्फीयर का परीक्षण कहीं ज्यादा गहराई पर अगले साल शुरू करेगी. उसे उम्मीद है कि वह 2023 की शुरुआत में मत्स्य का निर्माण शुरू कर देगी. विभाग स्फेरिकल टाइटेनियम ढांचे, महासागर सिक्वयूलेटर और गहन समुद्री कलपुर्जों के लिए रूस के क्रायलोव स्टेट रिसर्च सेंटर और मिशन पूर्व निरीक्षणों के लिए अमेरिका स्थित वुड्स होल ओशनोग्राफिक इंस्टीट्यूट से बात करेगा.

मगर समुद्रयात्रियों को क्यों भेजा रहा है जब रोबोट यह काम कर सकते हैं? जवाब समुद्रतल पर काम करने की चुनौतियों से जुड़ा है. एक तो कक्षा में चक्कर लगा रहे अंतरिक्षयान से संदेशों का आदान-प्रदान जितना आसान है, महासागर की तलहटी में मानवरहित रोबोट के साथ संदेशों का आदान-प्रदान उतना आसान नहीं है. ऐसा इसलिए कि विद्युतचुंबकीय तरंगें महासागर की जबरदस्त गहराई में नहीं पैठ सकतीं, क्योंकि रोबोटों को उनके मूल जहाज से लंबे, भारी अंतर्जलीय तारों के जरिए जोड़ा जाता है, जिससे उनकी पहुंच सीमित हो जाती है.

सरा, स्वतंत्र अंतर्जलीय यानों को न तो हाथ से नियंत्रित किया जा सकता और न ही उनके जुटाए डेटा उसी समय देखा जा सकता है. इन तारों के जरिए भेजी और प्राप्त की गई जानकारी तापमान और समुद्रजल के घनत्व की वजह से असुरक्षित होती है. रामदास कहते हैं, ''मानव पनडुब्बी यान भेजकर दोनों हासिल किए जा सकते हैं.’’

मत्स्य और वराह एक लिहाज से वही हैं जो इसरो के 2000 के दशक की शुरुआत में बनाए गए जीएसएलवी रॉकेट भारतीय अंतरिक्ष अन्वेषण मिशन के लिए थे—भावी मिशन के लिए महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी का प्रदर्शन. ये औद्योगिक संसाधनों के लिए समुद्रतल के अन्वेषण की ज्यादा बड़ी योजना का अंग हैं.

समुद्रतल तांबे, जस्ते और फॉस्फोरस सरीखे खनिजों और सोने तथा चांदी सरीखी बेशकीमती धातुओं के समृद्ध भंडार हैं. दो अन्य संसाधन कोबाल्ट और निकल हैं जो ई-वाहनों को चलाने वाली बैटरियां बनाने के लिए जरूरी हैं. समुद्रयान मिशन निकट भविष्य में ऐसे संसाधनों के व्यावसायिक दोहन की तैयारी के लिए समुद्रतल के अन्वेषण अध्ययन करेगा. अलबत्ता यह तभी शुरू हो पाएगा जब संयुक्त राष्ट्र की संस्था अंतरराष्ट्रीय समुद्रतल प्राधिकरण समुद्रतलों के उत्खनन की नीति विकसित कर लेगा. फिलहाल केवल खोजबीन की ही इजाजत है.

इस प्रोजेक्ट का एक बड़ा उद्देश्य भारत के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (ईईजेड) से अंतर्जलीय संसाधन खंगालने में आने वाली इंजीनियरिंग की समस्याओं को हल करने के लिए भरोसेमंद स्वदेशी टेक्नोलॉजी विकसित करना है. 23 लाख वर्ग किमी में फैला भारत का ईईजेड देश के जमीनी इलाके का करीब दो-तिहाई है. चेन्नै स्थित एनआइओटी पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत कार्यरत स्वायत्त संस्था है, जिसकी स्थापना 1993 में खास तौर पर महासागरों की तलहटी में छिपे संसाधनों की दौड़ की अगुआई के लिए की गई थी.

अमेरिका ने गहरे-पानी अन्वेषण के युग का सूत्रपात एल्विन से किया था, जो 1964 में बनाया गया और 4,500 मीटर की गहराई तक खोज कर सकता था. बीते दो दशकों में चीन ने मजबूत डीपवाटर अन्वेषण कार्यक्रम लॉन्च किया. पिछले नवंबर में उसने मानव पनडुब्बी यान फेंडाउझे 10,909 मीटर की गहराई पर मैरियाना गर्त के सबसे गहरे हिस्से में भेजा. इसके मुकाबले भारत का कार्यक्रम छोटा है और अभी तक हिंद महासागर क्षेत्र तक सीमित है, जहां उसे अगस्त 1987 में 1,50,000 वर्ग किमी का परिचालन क्षेत्र आवंटित किया गया था.

तब से यह और भी कम होकर 75,000 वर्ग किमी रह गया है. भारत ने 2002 में अंतरराष्ट्रीय समुद्रतल प्राधिकरण (आइएसए) के साथ हिंद महासागर में पॉलीमेटैलिक नॉड्यूल की खोजबीन के लिए 15 साल के अनुबंध पर दस्तखत किए थे. यह अनुबंध 2022 तक बढ़ा दिया गया है और सरकारी सूत्रों का कहना है कि वे इसे और आगे बढ़वाने के लिए काम कर रहे हैं.

गोवा स्थित राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान ने करीब दो दशक पहले महासागर की तलहटी से वैज्ञानिक नमूने निकाले थे. भुवनेश्वर स्थित खनिज और पदार्थ प्रौद्योगिकी संस्थान समुद्रतल से निकाले गए कोबाल्ट से बनी बैटरियों का परीक्षण पहले ही कर चुका है. एकीकृत खनन प्रणाली का विकास ही असल कुंजी होगी. एनआइओटी खनन स्थल पर नॉड्यूल पिकअप और पंपिंग प्रणाली का परीक्षण और विकास कर रहा है.

इसमें समुद्र सतह से 6,000 मीटर नीचे से चूरा किए हुए नॉड्यूल पंप करके मातृ जहाज तक लाने और फिर खनिजों को सतह पर लाने के लिए 'फ्लेक्सी राइजर’ नामक ट्यूब की प्रणालियां शामिल हैं. बाद में इस प्रणाली को अलग-अलग संसाधनों के हिसाब से ढाला जाएगा और आखिर में इनका पैमाना बढ़ाने पर काम होगा. समुद्रतल के सतत उत्खनन की कुंजी इसकी व्यवासायिक व्यवहार्यता में है. मोटा अनुमान यह है कि उद्योग समुद्रतल से कम से कम 30 लाख टन खनिज निकालेंगे तभी यह फायदेमंद होगा.

यही कारण है कि एनआइओटी समुद्रतल उत्खनन में भारतीय उद्योग की दिलचस्पी जगाने की कोशिश कर रहा है. अगले साल की शुरुआत से वह सक्रिय रूप से फर्मों के पास जाएगा और उन्हें समुद्रतल का सारा डेटा बताएगा, ताकि उन्हें भविष्य में संसाधन खनन के लिए गंभीरता से प्रतिबद्ध होने के लिए प्रोत्साहित कर सके. इसके लिए भी यह मानव पनडुब्बी यान अहम है.

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि एक बार मत्स्य जब पूर्ण आकार ग्रहण कर लेगा, तब दूसरे कामों के लिए भी उसका इस्तेमाल किया जा सकेगा. मसलन, खनिजों के लिए समुद्रतल खंगालने के लिए भी, जो डॉ. रविचंद्रन के शब्दों में ''(भूसे के) विशाल ढेर में कीमती सूई खोजने की तरह है.’’ 

मत्स्य और वराह एक लिहाज से वही हैं जो इसरो के जीएसएलवी रॉकेट अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए थे—ये महत्वपूर्ण तकनीक का प्रदर्शन है.

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