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बजाज के ऑटोरिक्शा में लगा चौथा पहिया

इंडस्ट्री के लोग भले ही क्वाड्रिसाइकिल पसंद नहीं करते लेकिन राजीव बजाज तिपहिए में चौथा पहिया लगाकर खुद को चुनौती दे रहे हैं

उनकी बेबाकी से कई लोग सन्न रह सकते हैं. उन्होंने साफ कहा था कि रतन टाटा ने नैनो लाकर गलती की. उन्होंने धड़ल्ले से कई ऐसे 'मूर्खतापूर्ण और निरर्थक’ विचारों की सूची पेश कर दी जिसे मैनेजमेंट कंसल्टेंट बेचने की कोशिश करते हैं.

उन्होंने 'द हार्वर्ड बिजनेस स्कूल्स ऑफ  द वर्ल्ड’ पर आरोप लगाया कि ''वह ऐसी बकवास चीज पढ़ा रहा है जिसे एमबीए कहते हैं.” इतने साफगोई पसंद इनसान के बहुत दोस्त नहीं हो सकते. ''क्या इंडस्ट्री में अब आपका कोई दोस्त बचा है?”

राजीव बजाज कुछ देर चुप रहते हैं और फिर हंस पड़ते हैं. इस सवाल का मकसद कुछ दिलचस्प बयान हासिल करना था.

बजाज ऐसे सवालों के प्रति उदार रहे हैं. उनके परदादा जमनालाल बजाज ने 1926 में बजाज ऑटो की स्थापना की थी. बजाज अपने प्रिय बजाज ऑटो के रास्ते को जो भी काटने की कोशिश करता है, वे उस पर तत्काल हमला बोलते हैं.

अगर किसी ने उनके नए उत्पाद आरई60 में कोई खामी निकाली तो उसकी खैर नहीं. आरई60 भारत की पहली क्वाड्रिसाइकिल है. यह यूरोप की उन क्वाड्रिसाइकिल्स से काफी अलग है जो महंगे, कम बिकने वाले, असाधारण चीजों से बने खास किस्म की गाडिय़ां होती हैं. आरई-60 एक छोटी-सी गाड़ी है जो अच्छी तरह से तैयार किए गए ऑटोरिक्शा का एहसास देती है.
 
टैक्सियों के रूप में चलने वाली छोटी कारों के निर्माता आरई60 से डरे हुए हैं, क्योंकि इसकी कीमत काफी कम होगी, तिपहिया के 1.25 लाख रु. और मारुति सुजूकी के ऑल्टो की 2.5 लाख रु. के बीच में कहीं.

यह ईंधन के लिहाज से भी ज्यादा किफायती होगी, एक लीटर में 35 किमी की माइलेज के साथ. तिपहिया ऑटो के निर्माता भी डरे हुए हैं क्योंकि आरई60 तिपहिया वाहन से बेहतर दिखती है जिसमें दरवाजे, छत, बेहतर तकनीक (वाटर कूल्ड, ट्विन स्पार्क प्लग, पांच गियर) है और चार पहियों की वजह से ज्यादा स्थिरता है.

यह प्रति किमी सिर्फ  60 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ती है, जो किसी छोटी कार के मुकाबले आधा है.

हर साल घरेलू बाजार में करीब 4,50,000 तिपहिया बिकते हैं. अकेले दिल्ली की सड़कों पर ही 70,000 तिपहिया चलते हैं. बजाज कहते हैं कि मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अकसर उनसे यह शिकायत करती थीं कि बड़ी संख्या में राजधानी में आने वाले विदेशी पर्यटक इन ऑटो के बारे में क्या छवि लेकर जाते होंगे.

वे थोड़ा ज्यादा सम्मानित गाड़ी चाहती थीं. यदि उनकी तरह ही दूसरे राज्यों ने भी इसको तरजीह दी तो बजाज के औरंगाबाद फैक्ट्री की एसेंबली लाइन काफी व्यस्त हो जाएगी.

ऑटो में चौथा पहिया
टाटा मोटर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर कार्ल स्लिम ने क्वाड्रिसाइकिल लाने के औचित्य पर इस साल ट्विटर पर सवाल खड़ा किया:  ''आखिर क्यों? सरकार और इंडस्ट्री यातायात सुरक्षा और पर्यावरण को बचाने के प्रयासों को आगे बढ़ा रही है, अब हम क्वाड्रिसाइकिल पर विचार कर रहे हैं!

हम पीछे क्यों बढ़ रहे हैं?” इस पर बजाज ने एक बिजनेस अखबार से कहा कि आरई-60 लाने का मतलब है, तिपहिया वाहन इस्तेमाल करने वालों को चारपहिये की सुरक्षा देना. ''यह तर्क कि सभी तिपहिया वाहन मालिकों को इसकी जगह कार खरीद लेनी चाहिए, बिल्कुल ऐसा ही है कि लोगों से यह कहा जाए कि जो रोटी नहीं खरीद सकते वे केक खाकर पेट भरें. इस तरह के रवैए के पहले भी हम दुर्भाग्यपूर्ण नतीजे देख चुके हैं.”

कार्ल स्लिम असल में दोपहिया और तिपहिया वाहनों में बजाज की कांपिटिटर टीवीएस मोटर कंपनी के मुखिया वेणु श्रीनिवासन की भावना को ही दोहरा रहे थे. वेणु वैसे राजीव के पिता राहुल बजाज के दोस्त भी हैं.

श्रीनिवासन ने यह चिंता जताई थी कि क्वाड्रिसाइकिल से सुरक्षा और पॉल्यूशन स्टैंडर्ड में गिरावट आएगी. इस पर बजाज का जवाबी प्रहार था कि जब बड़ी कारों को ही सबसे सुरक्षित माना जा रहा है तो दूसरे सभी वाहनों—साइकिल, मोटरसाइकिल, स्कूटर, मोपेड, तिपहिया, छोटी कार, मीडियम साइज कार—पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए.

यह थोड़ी सख्त प्रतिक्रिया है, लेकिन राजीव बजाज के लिए बीच का कोई रास्ता नहीं है. मारुति के 79 वर्षीय सम्माननीय चेयरमैन और राजीव के पिता के एक और दोस्त आर.सी. भार्गव को इसका अंदाजा हो गया, जब उन्होंने यह कहा था कि यदि क्वाड्रिसाइकिल को एक ही रोड पर किसी कार के साथ चलाकर टेस्ट किया जाए तो यह चार गुना ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड छोडग़ी.

बजाज ने इस पर कहा, ''यदि मैं मिस्टर भार्गव की मारुति कार को लूं और इसे यूरोप के किसी कार ट्रैक पर चलाऊं, जहां सड़कें बड़ी और स्पीड ज्यादा होती हैं, तो देखते हैं, उससे कितना पॉल्यूशन होता है.”

इस साल ऑटो इंडस्ट्री के संगठन सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (सियाम) द्वारा आयोजित एक कॉन्फ्रेंस कॉल में यह विवाद और भी स्पष्ट हो गया. कुछ कंपनियों ने जोर-शोर से यह मांग की कि बजाज को फिलहाल आरई60 की लॉन्चिंग से रोका जाए.

तिपहिया बनाने वाली कंपनी पियाजियो के रवि चोपड़ा चाहते थे कि बजाज को तीन साल बाद ही इसे लॉन्च करने की इजाजत दी जाए ताकि सबको बराबरी का मौका मिले.

क्वाड्रिसाइकिल की परिभाषा में एक कसौटी यह है कि इसका वजन 500 किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए. स्लिम चाहते हैं कि यह दायरा बढ़ाकर 700 किलोग्राम तक किया जाए. संदर्भ के लिए बता दें कि आरई60 का वजन 397 किलो है और टाटा नैनो का 650 किलो.

लेकिन बजाज की क्वाड्रिसाइकिल नियम और कानून संबंधी अड़ंगों को पार कर रही है. 22 मई को सरकार ने शहर की सीमाओं के भीतर क्वाड्रिसाइकिल को पब्लिक ट्रांसपोर्ट के रूप में इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी.

इसके बाद 8 अगस्त को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने क्वाड्रिसाइकिल को वाहन की श्रेणी में शामिल करने के लिहाज से केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम में संशोधन करने के लिए एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया. इसके अनुसार क्वाड्रिसाइकिल को विशेष लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन की जरूरत होगी और उसकी बॉडी पर प्रमुखता से 'क्यू’ लिखना होगा.

बजाज ऑटो के बिजनेस डेवलपमेंट प्रमुख एस. शिवकुमार कहते हैं, ''हम मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं और (आरई60 की बिक्री) तत्काल  या बाद में शुरू कर सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि अंत में किस तरह का ब्यौरा मंजूर किया जाता है.” यदि सब ठीक रहा तो बजाज की नई गाड़ी अगले साल सड़कों पर दौड़ती दिख सकती है.

हालांकि इस मुद्दे ने ऑटो निर्माताओं को बांट दिया. काफी लंबे विचार-विमर्श के बाद सियाम के तत्कालीन महानिदेशक और फिलहाल नेशनल स्किल डेवलपमेंट काउंसिल के प्रमुख दिलीप चिनॉय ने परिवहन मंत्रालय को दो अलग-अलग प्रस्ताव भेजे.

पहला क्वाड्रिसाइकिल के पक्ष में था तो दूसरा इसके खिलाफ. मंत्रालय इन दोनों प्रस्तावों पर चुप्पी मारकर बैठ गया. कई साल बाद जब राजीव बजाज ने आरई60 का विकास किया और इसे बाजार में उतारने के लिए रास्ते की तलाश कर रहे थे तब सियाम के खुले रवैए से उन्हें मदद मिली.

तथ्य यह भी है कि उनकी क्वाड्रिसाइकिल तिपहिया ऑटो में सुधार के लिए है न कि कार जैसा कुछ लाने के लिए.

अध्ययन और अनुभव
राजीव बजाज के आलोचक जिस दूसरे व्यक्ति जॉन एफ. वालेस पर आरोप लगा सकते हैं, वे  1980 के दशक में राहुल बजाज के कंसल्टेंट थे. ब्रिटिश ऑटो इंडस्ट्री के पुराने जानकार वालेस जल्दी ही बजाज के विश्वासपात्र बन गए. यह वह समय था जब राजीव ने पुणे से मेकैनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी और ट्रेनिंग के लिए अपने पिता की कंपनी ज्वाइन की थी.

वह अपने परिवार में पहले इंजीनियर थे. उनके पिता, अंकल और भाई, सभी कॉमर्स के छात्र रहे और एमबीए किया था. बजाज ऑटो में अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद राजीव मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम्स इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री हासिल करने के लिए ब्रिटेन की वारविक यूनिवर्सिटी चले गए. वालेस उसके पास में ही रहते थे.

राजीव दिसंबर 1990 में बजाज ऑटो में वापस आ गए. लेकिन ऐसा लगता था कि वह लंबे समय तक नहीं रह पाएंगे. राहुल बजाज चाहते थे कि वह परिवार की परंपरा के मुताबिक एमबीए करने के लिए हार्वर्ड जाएं. इस बार फिर वालेस ने हस्तक्षेप किया और सख्त लहजे में किया.

उन्होंने राजीव के पिता के चेहरे के सामने उंगली दिखाते हुए कहा, ''यदि आपने इस लड़के को एमबीए करने के लिए भेजा तो जब तक यह वापस आएगा, कंपनी बची नहीं रहेगी.”

वालेस ने शायद थोड़ी नाटकीयता दिखाई थी, लेकिन थोड़ी ही. 1980 के दशक के मध्य में दोपहिया उद्योग में निरंकुश प्रतिस्पर्धा ने जड़ें जमानी शुरू कर दी थीं. होंडा, यामहा, सुजुकी सब मौजूद थीं. अब भी उसके स्कूटरों के लिए 18 महीने तक का वेटिंग पीरियड होता था, लेकिन कंपनी में हर कोई बेचैन था.

क्योंकि इस तरह की वेटिंग 10 साल पहले का चलन थी, जब बाजार में 100 सीसी की जापानी मोटरसाइकिलें नहीं आई थीं. सप्लाई चेन शुरुआती शब्द था. रिसर्च एवं डेवलपमेंट, टेक्नोलॉजी, क्वालिटी और प्रोडक्टिविटी जैसी चीजों पर कोई जोर नहीं था.

लेकिन वारविक का दौर राजीव के लिए आंखें खोलने वाला था. उन्होंने मैसी फर्रग्यूसन के ट्रैक्टर प्लांट और होंडा के कार कारखाने में कुछ समय गुजारा. उन्होंने इस बात पर गौर किया कि वहां इक्विपमेंट और कंपोनेंट एक निश्चित तरीके से रखे गए हैं.

लोग मल्टी स्किल्ड हैं. क्वालिटी से कोई समझौता नहीं किया जाता. बजाज ऑटो ने 1984 में कवासाकी के साथ टेक्नोलॉजी के लिए एक गठजोड़ किया जिसके तहत राजीव जापान के दौरे पर गए, जहां उन्होंने और प्रभावी मैन्युफैक्चरिंग देखी.

बजाज की शीर्ष टीम
(बजाज की शीर्ष टीम- केविन डि'सूजा, अब्राहम जोसेफ, प्रदीप श्रीवास्तव, एस. रविकुमार, के. श्रीनिवास और राकेश शर्मा)

साथियों का चयन
स्वाभाविक है कि बजाज ऑटो में जिस पहली चीज पर उनका ध्यान गया वह थी उसकी मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया. इस तरह 23 साल की उम्र में उन्होंने सिखाना शुरू कर दिया.

वे 20 से 30 के बैच में इंजीनियरों और सुपरवाइजरों की क्लास चलाने लगे. उन्होंने वारविक में अपने प्रोजेक्ट के तहत कस्टमर ओरिएंटेड मैन्युफैक्चरिंग पर 150 पेज का एक सिनॉप्सिस बनाया था और उन्होंने नए छात्रों के बीच इसकी प्रतियां वितरित कीं. इस तरह की क्लास शाम को चलाई जाती थीं. इसमें होमवर्क भी दिया जाता था.

ऐसी ही एक क्लास में राजीव ने जब मैन्युफैक्चरिंग पर एक सवाल पूछा तो उनसे एक साल छोटे 22 वर्ष के अब्राहम जोसेफ इसका जवाब देने के लिए खड़े हो गए. इसके आधे घंटे बाद तक जोसेफ  उनसे बात करते रहे.

भोपाल के रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज से मेकैनिकल इंजीनियरिंग ग्रेजुएट जोसेफ वह सब कुछ जानते थे जो राजीव को पता था, वारविक में पढ़ाई, मास्टर डिग्री हासिल करने या भारत से बाहर गए बगैर. राजीव ने कहा, ''मैं तत्काल समझ गया कि इस बंदे में कुदरती प्रतिभा है.”

जोय के नाम से लोकप्रिय जोसेफ उस शीर्ष टीम का हिस्सा बने जिसे राजीव ने मैन्युफैक्चरिंग में श्रेष्ठता हासिल करने के लिए तैयार किया था. कई साल तक जोय ने बजाज ऑटो के आरऐंडडी का काम संभाला और उन्होंने ''सब कुछ डिजाइन किया.”

इस नवजात कोर टीम में शामिल होने वाले अगले व्यक्ति थे प्रदीप श्रीवास्तव जो अब कंपनी के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर हैं. आइआइटी-दिल्ली और आइआइएम-बंगलुरू से पढ़ाई करने वाले प्रदीप चाहते तो कहीं भी जा सकते थे, लेकिन उन्होंने बजाज में काम करने का निर्णय लिया क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग को लेकर उनमें एक जुनून था.

जल्दी ही उनके साथ कई और लोग जुड़ गए जैसे डी.वी. रघुनाथ जो अब मटीरियल्स के प्रमुख हैं, संजय सारस्वत जो अब मार्केटिंग के वाइस प्रेसिडेंट हैं और माधव किनी जिन्हें इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी में स्पेशलाइजेशन हासिल है और वह बिजनेस डेवलपमेंट का काम संभाल रहे हैं.

स्कूटर का निर्माण बंद
राजीव ने अपनी कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए दूसरों की नकल करने का इरादा बिल्कुल छोड़ दिया और मार्केटिंग पर जोर दिया. इससे उन्हें फायदे हुए तो कुछ बलिदान भी करने पड़े. बजाज ने स्कूटरेट, मोपेड और हल्के कॉमर्शियल वाहनों से दूरी बनाए रखी है. सबसे बड़ा बलिदान स्कूटर का था जिसे कंपनी ने वर्ष 2010 की शुरुआत से बनाना बंद कर दिया है.

इससे बहुत लोग स्तब्ध रह गए थे. बजाज के दादा कमल नयन भारत में स्कूटर लेकर आए थे और पिता राहुल ने इसे दशकों तक पाला-पोषा था. उनके पिता अब भी इस निर्णय से खुश नहीं हैं और इसके लिए वह राजीव को नालायक कहते हैं.

राजीव कहते हैं, ''हमारी शुरुआत कंपनी के लिए भी एक नई शुरुआत थी. बजाज ऑटो का अस्तित्व तो पहले भी था. लेकिन हमारे आने के साथ ही स्कूटरों का अंत हो गया और मोटरसाइकिलों के नए दौर की शुरुआत हुई.”

और अब तिपहिए में चौथा पहिया जोड़कर राजीव आम लोगों को धूप-धूल और बारिश में भी कम कीमत में सफर का मौका देने वाले हैं. इससे उनकी कंपनी को भी बढ़त मिलने वाली है.
—रिसर्च ज्योतिंद्र दुबे

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