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ढहाने की राजनीति

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली सरीखे राज्यों में मकानों पर बुलडोजर चलाकर हिंसक प्रदर्शनों के 'मुजरिमों’ और 'सरगनाओं’ के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा रही है. बिल्डिंग कानूनों की आड़ में और राज्य पुलिस की मदद से किए जा रहे ये विध्वंस कितने कानूनी हैं?

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कानून की धमक : प्रयागराज में 12 जून को  जावेद मोहम्मद का घर ढहाता एक बुलडोजर कानून की धमक : प्रयागराज में 12 जून को  जावेद मोहम्मद का घर ढहाता एक बुलडोजर

उत्तर प्रदेश में कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) ने 11 जून को शहर के स्वरूप नगर इलाके में एक व्यावसायिक इमारत ढहा दी जिसका मालिक मोहम्मद इश्तियाक नामक शख्स था. उसी दिन 135 किमी दूर सहारनपुर में जिला प्रशासन ने दो व्यक्तियों मुजम्मिल और अब्दुल वकीर के ''अवैध आवासीय निर्माण’’ ढहा दिए.

अगले दिन प्रयागराज विकास प्राधिकरण (पीडीए) ने एक और मकान करेली इलाके में ढहा दिया. आधिकारिक तौर पर यह घर वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया (डब्ल्यूपीआइ) नामक राजनैतिक दल के राज्य जनरल सेक्रेटरी जावेद मोहम्मद की पत्नी का था.

चौबीस घंटों के भीतर बुलडोजरों से धराशायी कर दिए गए ये सभी मकान उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन और विकास कानून 1973 में निर्धारित नियमों का कथित तौर पर उल्लंघन करके बनाए गए थे. मगर उनके मालिकों में एक और बात समान थी. वे सभी पिछले महीने एक टेलीविजन डिबेट में पैगंबर मुहम्मद के बारे में भाजपा की निलंबित प्रवक्ता नूपुर शर्मा की अपमानजनक टिप्पणियों के खिलाफ 3 जून और 10 जून को जुम्मे की नमाज के बाद उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में भड़की हिंसा के मास्टरमाइंड थे या कथित मुख्य षडयंत्रकारियों से जुड़े थे.

विरोध प्रदर्शन यूपी के हाथरस, मुरादाबाद, फिरोजाबाद और आंबेडकर नगर में भी हुए पर हिंसा कानपुर, सहारनपुर और प्रयागराज में ही हुई, जहां भीड़ ने कुछेक मोटरसाइकिल और गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया और पुलिस के एक वाहन में आग लगाने की कोशिश की, जिसमें 13 पुलिसजन घायल हो गए. राज्य पुलिस के मुताबिक, मुजम्मिल और अब्दुल वकीर सहारनपुर की हिंसा में शामिल थे और जावेद मोहम्मद को प्रयागराज में दंगों की साजिश रचने के लिए गिरफ्तार किया गया है.

जावेद की बेटी आफरीन फातिमा नागरिकता (संशोधन) कानून 2019 के खिलाफ हुए आंदोलन का प्रमुख चेहरा रही थीं. मकान ढहाए जाने के दौरान पुलिस को कथित तौर पर देसी कट्टा, कारतूस और ''आपत्तिजनक’’ दस्तावेज मिले. इश्तियाक कानपुर हिंसा के प्रमुख आरोपी हयात जाफर हाशमी का रिश्तेदार है. 

कागजों पर तो ये मकान भवन निर्माण कानून के उल्लंघन के आधार पर तोड़े गए हैं, पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुआई में राज्य सरकार ने यह छिपाने की कोई कोशिश नहीं की कि ये राजनैतिक बदले की कार्रवाइयां थीं. मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार मृत्युंजय कुमार ने 11 जून को कानपुर में बुलडोजरों की तस्वीर ट्वीट की और उसके साथ कहा कि ''हर शुक्रवार के बाद शनिवार आता है.’’

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी चेतावनी दी कि सभ्य समाज में ''अराजक तत्वों’’ की कोई जगह नहीं है. विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने न केवल इमारतें ढहाने बल्कि संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को धता बताने के लिए भी राज्य सरकार की तीखी आलोचना की. 

उत्तर प्रदेश में हिंसक प्रदर्शनों को लेकर 300 से ज्यादा लोग गिरफ्तार किए गए. नियमों का उल्लंघन करके बनाई गई संपत्तियों की जांच के लिए लोगों की एक प्रारंभिक सूची पुलिस ने पीडीए को सौंपी है.

बुलडोजर: 'लोकप्रिय’ औजार

आलोचना एक तरफ, अपराधियों पर निशाना साधने और आलोचकों तथा प्रतिद्वंद्वियों के मुंह बंद करने के लिए भाजपा को बुलडोजर के रूप में नया हथियार मिल गया लगता है. सत्ता के हठ के प्रतीक के तौर पर इसने उसके समर्थकों में भी लोकप्रियता हासिल कर ली है.

यह सब आदित्यनाथ सरकार की तरफ से जुलाई 2020 में भगोड़े गैंगस्टर विकास दुबे की संपत्तियां ढहाने के साथ शुरू हुआ. पुलिस ने दावा किया कि हथियारों और विस्फोटकों की तलाश में यह कार्रवाई की गई. बाद में एक मुठभेड़ में दुबे की मौत की जांच के लिए न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान की अगुआई में बनाई गई समिति ने पुलिस की यह दलील स्वीकार कर ली. अपराधियों के अवैध कब्जे से जमीनें छुड़ाने के लिए योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और समाज विरोधी गतिविधि (रोकथाम) कानून 1986 का—जिसे आम तौर पर गैंगस्टर ऐक्ट कहा जाता है—उदारता  से इस्तेमाल किया है.

इसके तहत संबंधित प्राधिकारी उन गैंगस्टरों की संपत्तियां कुर्क कर सकते हैं जिनके बारे में उनका मानना है कि उन्होंने इस कानून के तहत मुकदमा चलाने योग्य अपराध के नतीजतन कोई भी चल या अचल संपत्ति हासिल की है. इस कानून में हालांकि संपत्ति ढहाने का प्रावधान नहीं है, पर आदित्यनाथ सरकार ने कई गैंगस्टरों के खिलाफ इसे लागू करते हुए उन पर जिन संपत्तियों को गैरकानूनी ढंग से हासिल करने का आरोप था, उन्हें जब्त किया या ढहा दिया.

सच तो यह है कि अपनी हुकूमत के बीते पांच साल में जमीन माफिया के शिकंजे से 67,000 एकड़ से ज्यादा सरकारी जमीन छुड़ाने के लिए बुलडोजरों का बेतहाशा इस्तेमाल करके आदित्यनाथ ने 'बुलडोजर बाबा’ का उपनाम हासिल कर लिया.

इस कार्रवाई को व्यापक जनसमर्थन हासिल था और विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान आदित्यनाथ ने बुलडोजरों की वापसी का ऐलान किया. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक मुख्यमंत्री ने 58 जगहों पर अपनी जनसभाओं में 'बुलडोजर’ शब्द का जिक्र किया. ये सभी सीटें भाजपा ने जीतीं. मध्य प्रदेश, गुजरात और असम सरीखे भाजपा शासित राज्यों में आदित्यनाथ के समकक्षों ने भी इसी मॉडल को दोहराने की कोशिश की, जहां उपद्रवों के आरोपियों के मकान ढहाने के लिए बुलडोजरों का इस्तेमाल किया गया.

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में 22 मार्च को जब दो समुदायों के बीच टकराव में एक नौजवान की मौत हो गई तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आरोपियों के कथित अवैध मकानों और दुकानों को ढहाने का आदेश दे दिया. राज्य के खरगौन जिले में रामनवमी पर जब टकराव हुए तो बुलडोजर एक बार फिर बाहर निकल आए. रिपोर्टों के मुताबिक कथित पत्थरबाजों के 16 मकान और 29 दुकानें ढहा दी गईं. समर्थकों ने सोचा कि चौहान की कार्रवाइयां भी इसी से मिलते-जुलते उपनाम की हकदार थीं और इस तरह 'बुलडोजर मामा’ उपनाम का जन्म हुआ.

गुजरात में स्थानीय निकाय अफसरों ने आणंद जिले के खम्भात में रामनवमी के दिन एक धार्मिक जुलूस पर हमला करने के आरोपी व्यक्तियों के सात कियोस्क और ठेला गाड़ियों को ढहा दिया गया. राष्ट्रीय राजधानी में भाजपा संचालित दिल्ली नगर निगम ने हनुमान जयंती की शोभायात्रा के दौरान हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हुए टकराव के बाद जहांगीरपुरी में ''अवैध ढांचों’’ को ढहाने का अभियान छेड़ दिया.

इस अभियान को सुप्रीम कोर्ट ने रोका और एमसीडी से अगले आदेश तक यथास्थिति कायम रखने को कहा. असम के नौगांव जिले में 22 मई को अधिकारियों ने एक दिन पहले पुलिस थाने में आग लगाने की घटना में कथित तौर पर लिप्त पांच परिवारों के घर ढहा दिए.

इन सभी घटनाओं में इमारतें या ढांचे गिराने के लिए आधिकारिक तौर पर यही वजह बताई गई कि वे या तो भवन निर्माण कानूनों का उल्लंघन या सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करके बनाए गए थे. इनमें शामिल सभी अफसरों ने सिविक प्राधिकारियों के हाथों मकान ढहाने और पुलिस की जांच में इनके मालिकों के किसी अपराध, विरोध प्रदर्शन या उपद्रवों में शामिल पाए जाने के बीच कोई संबंध होने से इनकार किया.

उन्होंने दावा किया कि मकान मालिकों को अग्रिम नोटिस देने सहित तमाम उचित प्रक्रियाओं का पालन किया गया है. वहीं 'पीडि़तों’ का कहना है कि उन्हें वक्त रहते कोई नोटिस नहीं मिला और न ही उन्होंने कभी किसी कानून का उल्लंघन किया है. विडंबना यह है कि मध्य प्रदेश में ढहाए गए कुछ मकान प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए गए थे.

क्या सरकार घर गिरा सकती है?

कानूनी और नागरिक प्राधिकरणों का कहना है कि ये विध्वंस कितने वैध हैं, इसको लेकर स्पष्टता नहीं है. भवन निर्माण से जुड़े कानूनों में अस्पष्टता और नागरिकों द्वारा मानदंडों के सख्ती से पालन करने की अनिच्छा के परिणामस्वरूप, अधिकांश निजी और वाणिज्यिक संरचनाओं में नियमों का उल्लंघन होता है. नियमों का उल्लंघन इतना धड़ल्ले से होता है और ये अक्सर इतने मामूली होते हैं कि सरकारी एजेंसियां भी ज्यादातर उनकी उपेक्षा कर देती हैं.

लेकिन अगर वे ठान ही लें, तो फिर अधिकांश निर्माणों में खामी निकाल सकते हैं. दिल्ली के वरिष्ठ वास्तुकार दीपांकर मजूमदार कहते हैं, ''शहरों में, नगर निर्माण विभाग के अधिकारियों से नक्शा पास कराए बिना घर या व्यावसायिक भवन बनाना संभव नहीं है. हालांकि, अक्सर ऐसा होता है कि लोग पास किए गए नक्शे में भी फेरबदल करके निर्माण कार्य कराते हैं. जब तक फेरबदल बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण नहीं होता, या इसको लेकर कोई विशिष्ट शिकायत नहीं की जाती, सरकारी एजेंसियां इसकी अनदेखी कर देती हैं.

क्योंकि व्यावहारिक रूप से उनके सामने ऐसे मामलों का अंबार लगा होता है.’’ यूपी में कई टाउन प्लानरों (नगरों के योजनाकारों) ने स्वीकार किया कि कम ही लोग घर बनाते समय स्वीकृत योजना का पालन करते हैं. उदाहरण के लिए, नगर निगम या विकास प्राधिकरण दो मंजिलों के निर्माण के लिए मंजूरी देते हैं, लेकिन लोग अक्सर उसके ऊपर अतिरिक्त मंजिलों का निर्माण कर लेते हैं.

हालांकि, आदित्यनाथ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनकी सरकार का नियमों का उल्लंघन करके हुए निर्माण ध्वस्त करने का अभियान चलाने का कोई इरादा नहीं है—विशेष रूप से गरीबों द्वारा किए गए निर्माण के खिलाफ तो बिल्कुल नहीं—लेकिन अपराधियों और असामाजिक तत्वों के घरों पर बुलडोजर चलेंगे. और, सारे संकेत यही कहते हैं कि कौन अपराधी है और कितना बड़ा अपराधी है, इसका फैसला यूपी पुलिस करेगी.

उदाहरण के लिए, पुलिस ने जावेद मोहम्मद पर गैंगस्टर ऐक्ट लगाया है जिससे अधिकारियों को उसके खिलाफ कार्रवाई करने का अवसर मिल गया है. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि गैंगस्टर अधिनियम विध्वंस की अनुमति नहीं देता है. वकील मनोजकांत राय कहते हैं, ''पुलिस गैंगस्टर अधिनियम के तहत केवल संपत्ति को कुर्क कर सकती है, उस पर बुलडोजर नहीं चला सकती.

यह अवैध है.’’ लेकिन इस अवैधता की काट निकालने के लिए, सरकार ने उत्तर प्रदेश (निर्माण कार्य विनियमन) अधिनियम 1958 और उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन और विकास अधिनियम, 1973 जैसे कानूनों का सहारा लिया है, जिसमें नगरीय विभाग की एजेंसियों को अवैध रूप से निर्मित भवनों को गिराने के अधिकार हैं. 

इस तरह जब नागरिक एजेंसियों ने घरों को ध्वस्त करने की कार्रवाई की तो उससे पहले हर बार मकान मालिकों को पुलिस की ओर से आरोपी या अपराध में शामिल बताया गया. हालांकि दर्शाया यह जा रहा है कि उनके खिलाफ भवन कानूनों के उल्लंघन या सरकारी जमीन पर अतिक्रमण से जुड़ी कार्रवाई पहले से ही चल रही थी और हालिया कदम उसी पुरानी प्रक्रिया का परिणाम है. उदाहरण के लिए, जावेद के मामले में, पीडीए का कहना है कि घर बिना नक्शा पास कराए बनाया गया था.

उत्तर प्रदेश पुलिस के एडीजी लॉ ऐंड ऑर्डर प्रशांत कुमार ने कहा, ''पीडीए ने बुलडोजर का इस्तेमाल कानून के दायरे में रहकर किया था. वहां पहले भी हिंसक घटनाएं हुई थीं, इसलिए भारी पुलिस तैनाती थी.’’ इसी तरह, केडीए के सचिव शत्रुघ्न वैश्य ने कहा कि इश्तियाक ने इमारत का इस्तेमाल व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया था, जबकि उन्होंने मंजूरी आवासीय उद्देश्यों के लिए मांगी थी. 

हालांकि, इन दावों को ध्वस्त इमारतों के मालिकों ने खारिज कर दिया है. उनका कहना है कि विध्वंस का आदेश निकालने में किसी भी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था. जावेद की तरफ से कोर्ट में पक्ष रख रहे एडवोकेट के.के. राय का कहना है कि उनके मुवक्किल को कोई अग्रिम नोटिस नहीं दिया गया था. 11 जून की शाम को घर पर तोडफ़ोड़ का नोटिस चस्पां किया गया था. अगले दिन, इसे मलबे में तब्दील कर दिया गया.

जावेद की पार्टी डब्ल्यूपीआइ का दावा है कि घर, जावेद के नाम पर नहीं बल्कि उनकी पत्नी के नाम पर था और दीवार पर चिपकाए गए नोटिस में कई तथ्यात्मक गलतियां थीं. पार्टी ने ट्वीट किया, ''उन्होंने जानबूझकर रविवार को चुना, ताकि कोई कानूनी मदद न ली जा सके.’’ 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर ने भी इन विध्वंसों को अवैध बताया है. जस्टिस माथुर कहते हैं, ''यह मान भी लिया जाए कि निर्माण अवैध था, तो भी इसे छुट्टी के दिन गिराना उचित नहीं था. पीड़ित को अदालत का दरवाजा खटखटाने और राहत की गुहार लगाने के लिए अवसर दिया जाना चाहिए. यह कानून के शासन के खिलाफ है.’’ ध्वस्त इमारत में एक सिलाई की दुकान चलाने वाले इश्तियाक के बेटे इफ्तिखार ने बताया कि उन्हें केडीए ने कोई नोटिस नहीं दिया. उन्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि इमारत का कौन सा हिस्सा अवैध था और क्यों? 

उत्तर प्रदेश (भवन निर्माण विनियमन) अधिनियम 1958 की धारा 10 कहती है कि निर्धारित प्राधिकारी किसी भी अवैध निर्माण के मालिक को दो महीने के भीतर स्वयं ही अवैध निर्माण को ध्वस्त करने का आदेश दे सकता है. अवधि बीत जाने पर भी अगर अवैध निर्माण नहीं हटाया गया हो तो प्राधिकरण खुद विध्वंस कर सकता है.

दूसरी बात, इस धारा के तहत उस भवन के मालिक को सुनवाई का मौका दिए बिना ऐसा कोई आदेश नहीं दिया जा सकता. धारा 15 के तहत भवन का मालिक जिसके खिलाफ धारा 10 के तहत आदेश दिया गया है, वह अधिनियम के तहत आदेश आने के 30 दिनों के भीतर नियामक प्राधिकरण के समक्ष अपील कर सकता है. उस मामले में, आदेश पर इसलिए रोक लगा दी जाती है क्योंकि यह अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष निर्णय के लिए लंबित है. 

इसी प्रकार उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 27 के अंतर्गत संबंधित विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की ओर से अनधिकृत निर्माण के स्वामी को 15 से 40 दिन की अवधि में अनाधिकृत निर्माण को स्वयं हटाने का आदेश दिया जाएगा. अवधि की समाप्ति पर ही उपाध्यक्ष विध्वंस का निर्देश दे सकते हैं.

यह भवन मालिक को आदेश के 30 दिनों के भीतर, विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष से अपील करने की अनुमति देता है. कानूनी प्रावधान कहते हैं कि अगर उपाध्यक्ष के आदेश के खिलाफ अध्यक्ष के समक्ष अपील की गई है तो उस आदेश को विचाराधीन मानते हुए विध्वंस के आदेश पर रोक बनी रहेगी. 

पीडीए के एक अधिकारी का कहना है कि प्राधिकरण को 4 मई को जावेद के घर में अवैध निर्माण की जानकारी मिली थी. जावेद को 10 मई को नोटिस भेजकर 24 मई को अपना पक्ष रखने को कहा गया था. 1973 के अधिनियम की धारा 27(1) के तहत 24 मई को उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था.

अधिकारी का कहना है, ''नोटिस घर पर चिपका दिया गया था क्योंकि मालिक ने इसे लेने से इनकार कर दिया था.’’ चूंकि न तो जावेद और न ही उनके वकील आए और न ही कोई दस्तावेज पेश किया गया इसलिए 25 मई को विध्वंस का आदेश जारी किया गया था. घर के स्वामित्व के विवाद पर पीडीए के उपाध्यक्ष अरविंद कुमार चौहान का कहना है कि अगर संपत्ति ही अवैध है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका स्वामी कौन है. 

जावेद और पांच वकीलों की एक टीम ने अब इलाहाबाद हाईकोर्ट में घर पर बुलडोजर चलाए जाने के खिलाफ अपील की है. सुप्रीम कोर्ट में कई जनहित याचिकाएं भी लंबित हैं, जिनमें विभिन्न राज्यों में नगरीय अधिकारियों की ओर से मनमाने ढंग से किए जा रहे विध्वंस के खिलाफ निर्देश देने की मांग की गई है. 2014 में, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली सरकार को एक इमारत के मालिक को 2 लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया था, जिसे दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने बिना किसी पूर्व सूचना के ध्वस्त कर दिया गया था.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत कहते हैं, ''प्रभावित पक्षों को रिट अदालतों का रुख करना चाहिए था. लेकिन जब नोटिस के साथ ही बुलडोजर भी आ जाते हैं तो प्रतिक्रिया का समय ही नहीं मिलता. इसके अलावा, कुछ प्रभावित पक्ष समाज के निचले तबके से आते हैं जिनकी कानूनी समाधानों तक पहुंच बहुत कम है. इसलिए इन कठोर प्रक्रियाओं को अंजाम देते समय कुछ न्यायिक निरीक्षण जरूरी है.’’

राजनैतिक विरोधियों के खिलाफ हथियार

कानून अपना काम करेगा. बहरहाल, आलोचकों का कहना है कि इन विध्वंस कार्यों का नेतृत्व पुलिस बल कैसे कर रहे हैं, जबकि उनकी उपस्थिति की जरूरत केवल नगरीय अधिकारियों की कार्रवाई के दौरान कानून और व्यवस्था बनाए रखने में मदद करने के लिए है. कई रिपोर्टों के अनुसार, कानपुर पुलिस आयुक्त ने केडीए को 100 से अधिक इमारतों की एक सूची भेजी है, जिसमें उनकी जांच करने के बाद यह चिन्हित करने को कहा गया है कि इनमें से कौन-कौन सी इमारतें अवैध हैं या जहां नियमों का उल्लंघन हुआ है. उसके बाद प्रशासन अवैध इमारतों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर सकता है.

इसके अलावा, सरकार राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ भी बुलडोजर का इस्तेमाल कर रही है. अप्रैल में, समाजवादी पार्टी के विधायक शहजील इस्लाम अंसारी के एक पेट्रोल पंप को बरेली में ध्वस्त कर दिया गया था. बरेली विकास प्राधिकरण (बीडीए) के मुताबिक इसका निर्माण नक्शे की मंजूरी लिए बिना किया गया है. अंसारी को 2019 में निर्माण शुरू होने पर निर्माण को रोकने के लिए एक नोटिस दिया गया था.

कई सुनवाई के बाद मार्च 2021 में विध्वंस का आदेश पारित किया गया. हालांकि कार्रवाई मानदंडों के अनुसार हुई, पर इसमें लोगों को इसलिए कुछ राजनैतिक इरादा भी नजर आया क्योंकि यह कार्रवाई अंसारी की ओर से कथित तौर पर सीएम आदित्यनाथ के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के कुछ ही दिनों बाद हुई थी. आरोप है कि इस राजनैतिक कार्रवाई को कानून कार्रवाई का जामा पहना दिया गया.

बताया जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों, उच्च न्यायालयों और वरिष्ठ वकीलों के एक समूह ने भारत के प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर उनसे यूपी सरकार की कथित 'दमन’ की हालिया घटनाओं का स्वत: संज्ञान लेने का आग्रह किया है.

हालांकि सरकार ने तकनीकी आधार पर अपने कृत्यों को कानूनी रूप से कवर भले ही कर लिया हो, जैसा कि अधिकांश कानूनी विशेषज्ञ सहमत हैं, लेकिन दंड प्रावधानों को लागू करते समय न्याय के सभी सिद्धांतों का भी अनुपालन होना चाहिए. फिलहाल तो ऐसा ही लगता है कि यूपी सरकार और कुछ अन्य लोग कानूनों की खामियों का इस्तेमाल करके जज, जूरी और जल्लाद की भूमिका निभा रहे हैं. 
 बुलडोजर से समाधान

भाजपा शासित कुछ राज्यों ने इस मशीन का इस्तेमाल कथित तौर पर अपराधियों और विरोध प्रदर्शनों व दंगों के आरोपियों को दंडित करने के लिए किया है. दस्तावेजों में इन भवनों को नेस्तोनाबूद करने का कारण इनका भवन निर्माण नियमों को ताक पर रखकर बनाया जाना या अतिक्रमण कर सरकारी जमीन पर बनाना बताया गया 

उत्तर प्रदेश,  जून :
3 और 10 जून को शुक्रवार की नमाज के बाद पैगंबर मोहम्मद पर निलंबित भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा की असम्मानजनक टिप्पणी के खिलाफ हिंसा भड़क उठी. 11 और 12 जून को नगर निकाय अधिकारियों ने इसमें शामिल रहे लोगों के घर ढहा दिए

असम, मई: नागांव जिले में उन पांच परिवारों के घर ढहा दिए गए जिन पर जिले के एक पुलिस थाने में आग लगाने का आरोप है

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गुजरात,  अप्रैल: आणंद जिले के खंभात में नगर निकाय अफसरों के दल ने रामनवमी के धार्मिक जुलूस पर हमला करने के आरोपियों के सात कियोस्क और ठेले तहस-नहस कर दिए 

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मध्य प्रदेश, मार्च : रायसेन जिले मे सांप्रदायिक संघर्ष में एक युवक की मौत के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आरोपियों के घर ढहाने के आदेश दिए
—साथ में आशीष मिश्र और प्रशांत श्रीवास्तव

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