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खास रपटः सहकारी संस्थाओं को हड़पने का खेल?

नए सहकारिता मंत्रालय ने राज्यों में बजाई खतरे की घंटी और इस पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाया अंकुश, लेकिन 'राष्ट्रीय सहकारी ढांचा’ पूरी तरह गलत भी नहीं.

नया दांव नए सहकारिता मंत्री अमित शाह के साथ प्रधानमंत्री मोदी नया दांव नए सहकारिता मंत्री अमित शाह के साथ प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 जुलाई को सहकारिता का नया मंत्रालय बनाकर सबको हैरत में डाल दिया. सरकारी प्रेस रिलीज में कहा गया कि नया मंत्रालय ठेठ निचले स्तर तक लोगों पर आधारित सच्चे आंदोलन के तौर पर विकसित होने (‘सहकार से समृद्धि’) में राज्यों की सहकारी संस्थाओं की मदद करेगा.

अगले दिन केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल के वक्त केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को इस नए सहकारिता मंत्रालय की भी जिम्मेदारी सौंप दी गई. उम्मीद के मुताबिक, इस कदम से विपक्ष में हाहाकार मच गया. दरअसल, विपक्ष को आशंका है कि केंद्र सरकार के इस कदम के पीछे सहकारी संस्थाओं की भलाई से कहीं ज्यादा, सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी के शब्दों में, ‘कुटिल एजेंडा’ हो सकता है. 

मगर काम ज्यों ही आगे बढ़ा, नए मंत्रालय के दक्रतर बनने लगे और एक नए ‘राष्ट्रीय सहकारी ढांचे’ की चर्चा उठने लगी, सुप्रीम कोर्ट इस पर ब्रेक लगाने के लिए आगे आया. शीर्ष अदालत ने 20 जुलाई को दो-टूक कहा कि केंद्र के पास केवल बहुराज्यीय सहकारी सोसाइटी (जो केवल एक राज्य तक सीमित न हों) के संबंध में ही कानून बनाने का अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि राज्य सूची के विषयों में कानून बनाने का अधिकार केवल राज्यों के पास है.

यह इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि सहकारिता राज्य का विषय है. इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाइकोर्ट के आठ साल पुराने फैसले को सही ठहराया है. हाइकोर्ट ने सहकारी क्षेत्र में केंद्र के अधिकार की सीमा बांध दी थी. संयोगवश, यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे जिन्होंने साल 2013 में गुजरात के मुख्यमंत्री के नाते उस 97वें संविधान संशोधन के कुछ निश्चित प्रावधानों को चुनौती दी थी, जिसने सहकारी क्षेत्र के लिए ढांचा बनाने का अधिकार केंद्र को दिया था.

बैंकिंग विशेषज्ञ विद्याधर अनास्कर कहते हैं कि केंद्र अगर सहकारी क्षेत्र के लिए 'राष्ट्रीय ढांचा’ बनाना चाहता है तो अब उसे देश के सभी 28 राज्यों से इजाजत लेनी होगी. हालांकि, यह तब तक नामुमकिन होगा जब तक कि महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश सरीखे राज्यों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विरोधी सत्ता में हैं.

इन राज्यों में सहकारी आंदोलन भी मजबूत है. यह अमित शाह की मेधा का इम्तिहान भी होगा, हालांकि बहुराज्यीय सहकारी संस्थाओं (जो साल 2002 के बहुराज्यीय सहकारी सोसाइटी अधिनियम के दायरे में आती हैं) तक पहुंच के साथ उन्होंने अपने लिए थोड़ा-सा दरवाजा खोल रखा है.

शाह का एक और कमाल?
गृह मंत्री अमित शाह के लिए इस तरह की लड़ाइयां बेगानी नहीं हैं, खासकर सहकारिता के क्षेत्र में. हकीकत तो यह है कि शाह की यात्रा गुजरात के सहकारी बैंकों से ही शुरू हुई थी. यहां तक कि शाह कई वर्षों तक अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक (एडीसीबी) के बोर्ड के अध्यक्ष भी रहे. कहा जाता है कि शाह ने एडीसीबी का कायापलट कर दिया. साल 2002 में जब उन्होंने इसकी कमान संभाली, इसने 20 करोड़ रुपए का विशुद्ध घाटा दर्ज किया था.

लेकिन, अगले ही वित्तीय साल में एडीसीबी 6 करोड़ रुपए के मुनाफे में आ गया (यह कामयाबी उन्होंने जाहिरा तौर पर बैंक को प्रतिभूतियों के कारोबार में लाकर हासिल की थी).
शाह ने 2001 में डूबने की तरफ बढ़ रहे मधेपुरा मर्केंटाइल सहकारी बैंक को बचाने में भी बहुत बड़ी भूमिका अदा की थी.

इसके लिए तब भाजपा के राज्य और केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी पीठ भी थपथपाई थी. एडीसीबी की अध्यक्षता उन्होंने तब छोड़ी जब 2002 में गुजरात के नए मुख्यमंत्री मोदी ने उन्हें गृह राज्यमंत्री बनाकर अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया था. अलबत्ता उन्होंने राज्य के जिला सहकारी बैंकों पर अपनी करीबी नजर बनाए रखी. साल 2016 आते-आते भाजपा ने गुजरात के सभी 33 जिला सहकारी बैंकों से कांग्रेस को निकाल फेंका.

गुजरात की मशहूर डेयरी सहकारी संस्थाओं के बारे में भी यही सच है. इनमें अमूल भी है. 2017 तक भाजपा ने इन सभी पर कब्जा जमा लिया था. यह दुर्जेय राजनैतिक हथियार भी है. खासकर जब हम सस्ते कर्ज की सुविधा के साथ यह भी देखते हैं कि गुजरात के 17,000 में से 97 फीसद गांवों में डेयरियां अर्थव्यवस्था का विशाल अंग हैं.

शाह ने राजनैतिक तीन-तिकड़म के अपने सबक गुजरात के सहकारिता क्षेत्र से अपने जुड़ाव के दौरान ही सीखे. यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि राज्य के विभिन्न हिस्सों से विपक्ष का सफाया करने में सहकारिता के नेटवर्क ने भाजपा की काफी मदद की.

विपक्ष को डर है कि नवगठित केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय ‘गुजरात मॉडल’ को देश के दूसरे राज्यों में ले जाने का जरिया है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से विपक्ष को थोड़ा बल मिलेगा. संविधान की सातवीं अनुसूची के मुताबिक, सहकारी संस्थाओं को निगमित और विनियमित करना और यहां तक कि उनका समापन भी राज्य का विषय है; केंद्र की इसमें सीमित भूमिका है. महाराष्ट्र सरीखे राज्य, जहां राजनीति में सहकारी क्षेत्र निर्णायक है, खास तौर पर—चिंतित हैं.

पूर्व कृषि मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के मुखिया शरद पवार 16 जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी से मिले और ‘‘सहकारिता मंत्रालय के गठन तथा बैंकिंग विनियमन अधिनियम में संशोधन’’ को लेकर अपनी आशंकाओं से उन्हें अवगत कराया (महाराष्ट्र की चीनी सहकारी संस्थाओं और सहकारी बैंकों पर एनसीपी और कांग्रेस का शिकंजा है). इनमें से कुछ आशंकाएं सुप्रीम कोर्ट के नए अंकुश के बाद भी जायज हैं, क्योंकि कई सहकारी बैंक बहुराज्यीय संस्थाएं हैं और शाह के नए मंत्रालय के तहत आएंगे.

केरल के पूर्व वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने भी सहकारी बैंकों के मुद्दे पर लाल झंडी दिखाई है. उन्होंने बताया कि राज्य में 870 पंजीकृत सहकारी संस्थाएं हैं, जो केरल में ‘हिंदू बैंक’ चलाना चाहती हैं (उनका घोषित नारा है ‘हिंदू धन हिंदुओं का है’). उनमें से कुछ बहुराज्यीय सहकारी संस्थाएं हैं और इसाक को डर है कि इन संस्थाओं में जल्द ही शाह के नए मंत्रालय का हुक्म चलेगा. इनमें से कई चिट फंड भी चलाते हैं और इसका मतलब है अच्छा-खासा बड़ा ग्राहक आधार, जिसे संभवत: प्रभावित किया जा सकता है.

सहकारी क्षेत्र पर कब्जे की लड़ाई का मतलब लेन-देन की वह व्यवस्था भी है जिसमें एक हाथ से खैरातें बांटी जाती हैं और दूसरे हाथ से भरोसेमंद वोट बैंक का समर्थन लिया जाता है. महाराष्ट्र इसका अव्वल उदाहरण है, जहां सहकारी संस्थाओं का मजबूत नेटवर्क है. एनसीपी के मुखिया पवार, उनके भतीजे और राज्य के उपमुख्यमंत्री अजित पवार और पार्टी के दूसरे नेताओं की राज्य के सहकारी क्षेत्र में बहुत बड़ी हिस्सेदारी है.

असल में, कांग्रेस और एनसीपी का दशकों से इस पर कब्जा रहा है. भाजपा यहां एक दशक से इस आधिपत्य को तोडऩे में जुटी है. इस वक्त महाराष्ट्र में करीब 2,25,000 सहकारी संस्थाएं हैं. इनमें कोल्हापुर की डेयरी इकाई गोकुल सरीखी कुछ संस्थाओं को विधायक या सांसद के ओहदे से भी ज्यादा असरदार माना जाता है.

सहकारिता की शक्ति 
भारत में सहकारी संस्थान अधिकतर जमीनी स्तर के संगठन हैं जिन्हें एक समान लक्ष्यों के लिए सामूहिक रूप से सौदेबाजी की शक्ति का उपयोग करने के लिए बनाया गया है. कृषि, डेयरी, चीनी, कपड़ा और अन्य क्षेत्रों में सहकारी समितियों का गठन किसानों और अन्य श्रमिकों के संचित संसाधनों से किया गया है. वित्त, चीनी और डेयरी क्षेत्रों में कार्यरत सहकारी समितियां राज्य निधि और सब्सिडी की सबसे बड़े लाभार्थी रही हैं.

चालू वित्त वर्ष (वित्त वर्ष 22) में, कृषि ऋण लक्ष्य को बढ़ाकर 16.5 लाख करोड़ रुपए और ग्रामीण बुनियादी ढांचा विकास कोष को 40,000 करोड़ रुपए कर दिया गया था. इसमें से अधिकांश धनराशि सहकारी समितियों के माध्यम से भेजी जाती है. इसके अलावा कई राज्य, सहकारी समितियों के माध्यम से कृषि के बुनियादी ढांचे के निर्माण, सूक्ष्म सिंचाई व्यवस्था और बीज, उर्वरक तथा खाद जैसे कच्चे माल की खरीद के लिए भी धन प्रदान करते हैं.

कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत में वर्तमान में 1,94,195 सहकारी डेयरी समितियां और 330 सहकारी चीनी मिलें हैं. 2019-20 में, देश भर की डेयरी क्षेत्र की सहकारी समितियों ने 1.7 करोड़ सदस्यों से 4.8 करोड़ लीटर दूध खरीदा और हर दिन 3.7 करोड़ लीटर तरल दूध बेचा. जहां तक सहकारी चीनी मिलों का संबंध है, वे भारत में बनने वाली चीनी का 35 प्रतिशत उत्पादन करती हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए-1 सरकार ने साल 2002 में एक कानून पारित किया था जिसमें बहु-राज्य सहकारी समितियों (एमएससीएस) की अनुमति दी गई थी. ऐसा सहकारी समितियों में विविधता लाने और उन्हें अपने गृह राज्य के बाहर भी संचालन करने में सक्षम बनाने के लिए किया गया था.

वित्त के लिए, किसान संघों की ओर से गठित और जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (डीसीसीवी) के साथ मिलकर चलने वाली ग्राम-स्तरीय प्राथमिक कृषि ॠण समितियां (पैक्स), जमीनी स्तर के ऋण प्रवाह का निर्धारण करती हैं (पैक्स किसी गांव के लिए ऋण की मांग का अनुमान लगाते हैं और उसे डीसीसीबी के समक्ष रखते हैं). नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक) की 2019-20 की वार्षिक रिपोर्ट में देश में 95,238 पैक्स, 363 डीसीसीबी और 33 राज्य सहकारी बैंकों की पहचान की गई है.

यह 1,482 शहरी और 58 बहु-राज्य सहकारी बैंकों के अतिरिक्त है. कुछ लोग एक अलग मंत्रालय के गठन और आरबीआइ की निगरानी को इस आधार पर सही ठहराते हैं कि अतीत में कई सहकारी समितियों में घोटालों के आरोप लगे हैं और नियमों के अभाव में राजनेताओं, नौकरशाहों और कई मामलों में तो स्वयं सहकारी संस्थाओं के नेताओं के व्यवसायों के लिए फंड का इंतजाम करने के लिए धन का गबन किया गया.

साल 2019 में मुंबई में 6,500 करोड़ रुपए के पीएमसी (पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी) बैंक घोटाले के सामने आने के बाद से केंद्र, वित्तीय क्षेत्र की सहकारी समितियों में सुधार पर जोर दे रहा है. पिछले साल सितंबर में बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में संशोधन किया गया था और आरबीआइ को शहरी और बहु-राज्य सहकारी बैंकों के संचालन को विनियमित करने का अधिकार दिया गया.

इस साल 25 जून को, आरबीआइ ने शिकंजा कस दिया और निजी बैंकों के मानदंडों के अनुरूप, सहकारी बैंकों के सीईओ और पूर्णकालिक निदेशकों की नियुक्ति के लिए भी मानक निर्धारित कर दिए. इसका मतलब है कि इन पदों पर मुख्यधारा के किसी भी राजनेता—राज्य विधानसभा या संसद के निर्वाचित सदस्य—की नियुक्ति नहीं की जा सकती है.

पवार इसे संघवाद और राज्य की शक्तियों का अतिक्रमण बताते हुए इस पर पहले ही आपत्ति जता चुके हैं. मोदी को लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा था कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम, विशेष रूप से 97वां संविधान संशोधन, राज्य सहकारी समिति अधिनियम और सहकारी सिद्धांतों का हनन करता है. संशोधित अधिनियम सहकारी अधिनियम के बोर्ड के गठन और अध्यक्ष के चुनाव, प्रबंध निदेशक की नियुक्ति आदि से जुड़े विभिन्न प्रावधानों को एक प्रतिवाद के माध्यम से समाप्त करता है. 
 
सहकारिता की अड़चनें 
सहकारिता मंत्रालय के गठन से पहले, केंद्र सहकारी क्षेत्र को कृषि मंत्रालय के एक अंग के रूप में देखता था. लेकिन पिछले कुछ दशकों में सहकारी समितियों में आई विविधता और उनके आवास, शहरी वित्त और श्रम जैसे गैर-कृषि क्षेत्रों में प्रवेश को देखते हुए उन्हें कृषि मंत्रालय के अधीन बनाए रखना व्यावहारिक नहीं रहा.

आइआइएम अहमदाबाद के पूर्व प्रोफेसर और हनी बी नेटवर्क के संस्थापक अनिल के. गुप्ता कहते हैं, ‘‘कुछ राज्यों को छोड़कर, भारत में सहकारी आंदोलन विफल रहे हैं. लेकिन अगर देश को समावेशी विकास पथ पर चलना है तो सहकारिता को सफल होना होगा. केंद्रीय मंत्रालय कई मंत्रालयों के प्रयास में तालमेल बिठाकर और अंतर्विरोधों को दूर करके सकारात्मक भूमिका निभा सकता है.’’

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस साल की शुरुआत में अपने बजट भाषण में सहकारिता को मजबूत करने के लिए मंत्रालय की प्रतिबद्धता की घोषणा की थी. आरएसएस से जुड़ा संगठन सहकार भारती भी इसके लिए लगातार दबाव डाल रहा था. सहकार भारती का नेतृत्व करने वाले और आरबीआइ बोर्ड के सदस्य सतीश मराठे कहते हैं, ‘‘क्षमता निर्माण, प्रबंधन कौशल के विकास, बुनियादी ढांचे के उन्नयन के साथ-साथ पूंजी बाजार तक पहुंच बढ़ाने की आवश्यकता है.’’

एक अलग केंद्रीय मंत्रालय बनाने के लिए दूसरी वजह यह है कि सहकारी संस्थाएं वर्तमान में केंद्र से पूंजी प्राप्त करती हैं जो या तो इक्विटी या कार्यशील पूंजी के रूप में होती है और उसके लिए राज्य सरकारें गारंटर होती हैं. इस फॉर्मूले के कारण अधिकांश फंड महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक जैसे कुछ राज्यों में जा रहे हैं, जबकि अन्य राज्य इसकी बाट जोहते रह जाते हैं. नया केंद्रीय मंत्रालय बनने के बाद, सहकारी संरचना में संभवत: फिर से जान आ सकती है और नई पूंजी तक पहुंच को लेकर अधिक स्पष्टता मिल सकती है.

इसके अलावा, सहकारी समितियों में कुछ सबसे बड़े नाम गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ (अमूल) और तमिलनाडु हैंडलूम वीवर्स को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड (को-ऑप्टेक्स) हैं. एक अच्छी बैलेंस शीट होने के बावजूद, सहकारी क्षेत्र से जुड़ी बहुत-सी जटिलताओं के कारण ये संस्थाएं स्टॉक एक्सचेंजों में सूचीबद्ध नहीं हो सकी हैं.

अब चूंकि सहकारिता से जुड़े मामलों को देखने के लिए अलग से एक केंद्रीय मंत्रालय बन गया है तो हितधारकों को लगता है कि सहकारी समितियों के लिए पूंजी बाजार तक पहुंचने के दरवाजे (कानूनों में जरूरी बदलाव के साथ) खुल सकते हैं.

मराठे और गुप्ता दोनों, इन उदाहरणों का हवाला देकर एक राष्ट्रीय सहकारी ढांचे के निर्माण की जरूरत बताते हैं. मराठे कहते हैं, ‘‘अगर इसे सही तरीके से लागू किया जाता है, तो यह उद्यमशीलता के अधिक अवसर पैदा कर सकता है, यहां तक कि किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य भी मिल सकता है.’’ उनका कहना है कि सहकारिता आंदोलन को मजबूत करके बिचौलियों की ओर से होने वाले शोषण को भी कम किया जा सकता है.

वहीं, गुप्ता कहते हैं, ‘‘वास्तविक लाभ प्राप्त करने के लिए अन्य मंत्रालयों की ओर से शासित अधिनियमों को इसके तहत लाने की आवश्यकता है. उदाहरण के लिए, अगर वन अधिकार अधिनियम को इसके साथ जोड़ दिया जाए तो यह आदिवासियों के लिए कृषि वानिकी उद्योग के द्वार खोल सकता है.’’ 

लेकिन क्या यह प्रयास सही रास्ते पर है, इसके जवाब में मराठे और गुप्ता, दोनों कहते हैं कि वे तब तक कुछ नहीं कहना चाहेंगे जब तक कि वे इसकी बारीकियों को पढ़ नहीं लेते. 

साल 2017 तक भाजपा ने गुजरात की सभी डेयरी सहकारी संस्थाओं पर भी कब्जा जमा लिया. यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि राज्य के विभिन्न हिस्सों से विपक्ष का सफाया करने में सहकारिता नेटवर्क ने भाजपा की मदद की.

‘‘कुछ राज्यों को छोड़कर, भारत में सहकारी आंदोलन विफल रहे हैं...केंद्रीय मंत्रालय कई मंत्रालयों की कोशिशों में तालमेल बिठाकर और अंतर्विरोधों को दूर करके एक सकारात्मक भूमिका निभा सकता है’’
ए.के. गुप्ता
पूर्व प्रोफेसर, आइआइएम अहमदाबाद; संस्थापक, हनी बी नेटवर्क

‘‘अगर राष्ट्रीय सहकारिता ढांचे को सही तरीके से लागू किया जाता है, तो यह उद्यमशीलता के अधिक अवसर पैदा कर सकता है, यहां तक कि किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य भी मिल सकता है’’
सतीश मराठे
सहकार भारती के प्रमुख और आरबीआइ बोर्ड के सदस्य

194,195
भारत में सहकारी दुग्ध समितियों की संख्या
330
सहकारी चीनी मिलों की संख्या; वे भारत में कुल चीनी का 35 फीसद उत्पादन करती हैं
1,482
शहरी सहकारी बैंकों की संख्या
58
बहु-राज्य सहकारी बैंकों की संख्या
 

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