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खास रपटः गुमशुदा मौतें

अब यह जानी-मानी बात है कि कोविड से मरने वालों के सरकारी आंकड़े हकीकत से बहुत कम हैं, लेकिन ऐसा क्यों हुआ—यह महज तंत्र की खामी है या उससे बदतर कुछ और?

उथली कब्रें इलाहाबाद के उत्तर-पश्चिम शृंगवेरपुर में गंगा किनारे खुली कब्रों के बीच अपने रिश्तेदार का शव श्मशान ले जाते लोग, ये कब्रें कोविड मृतकों की बताई जाती हैं उथली कब्रें इलाहाबाद के उत्तर-पश्चिम शृंगवेरपुर में गंगा किनारे खुली कब्रों के बीच अपने रिश्तेदार का शव श्मशान ले जाते लोग, ये कब्रें कोविड मृतकों की बताई जाती हैं

अप्रैल के पहले हफ्ते में पुराने भोपाल की जेपी नगर कॉलोनी के दिहाड़ी मजदूर 40 वर्षीय मनोज तोमर को खांसी और बुखार चढ़ा, तो जाने का नाम ही नहीं लिया. सांसें उखड़ने लगीं तो तोमर को कोविड का शक हुआ. उन्होंने जांच केंद्र की तलाश की, पर नजदीक में कोई था ही नहीं. 7 अप्रैल को वे एक स्थानीय 'झोला छाप’ डॉक्टर के पास गए. रैपिड ऐंटीजन टेस्ट से उनके शरीर में कोविड वायरस होने का पता चला. लेकिन मनोज किसी भी सरकारी अस्पताल में दाखिला नहीं पा सके.

उसी शाम उनकी मौत हो गई. हफ्ते भर बाद उनके भाई 38 वर्षीय भाई जितेंद्र में भी कोविड के लक्षण दिखे. लेकिन वे सरकारी हमीदिया अस्पताल में किसी तरह दाखिला पा गए, जहां उनका कोविड टेस्ट पॉजिटिव आया. बाद में उनकी भी मौत हो गई. उनके परिवार को अस्पताल से जितेंद्र की मौत कोविड से होने का सर्टिफिकेट तो मिल गया, पर मनोज के मामले में उनकी किस्मत दगा दे गई.

भोपाल के दो भाइयों की यह कहानी देश में कोविड से हुई मौतों के आंकड़ों की विडंबना का उदाहरण है. मौतों की सही गिनती का मामला तब फिर सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को आदेश दिया कि कोविड से मरने वालों के परिवारों को मुआवजा दिया जाए (देखें बॉक्स: क्या कोविड से मौतों के आंकड़े में गड़बड़ी से मुआवजे में फर्क पड़ेगा?).

शीर्ष अदालत में दाखिल एक जनहित याचिका में कहा गया कि मौत की वजह कोविड नहीं बताने के चलते कई पीडि़त परिवारों को सरकारी मुआवजा देने से इनकार किया जा सकता है. लिहाजा, सरकारी तंत्र के लिए पीडि़तों के दावेदारों की सही और मुकम्मल फेहरिस्त बनाना कहीं ज्यादा बड़ी चुनौती है. मुआवजा देना अनिवार्य हो गया है, तो मनोज के परिवार सरीखे कई मौत का सर्टिफिकेट पाने की जद्दोजहद करते दिखेंगे. 

राज्यों में कितनी दर्ज हुई मौत
राज्यों में कितनी दर्ज हुई मौत

दुनिया की दूसरी सबसे ज्यादा आबादी वाले देश भारत में मौत के सरकारी आंकड़े से उन खौफनाक नजारों की झलक नहीं मिलती, जो खासकर दूसरी लहर के दौरान राष्ट्रीय टेलीविजन पर दिखाई दिए थे—ऑक्सीजन के लिए हांफते लोग, अस्पतालों और श्मशानों में लंबी कतारें, शव ले जा रहे वाहनों के सायरन और फिर उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा में तैरती लाशें. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का अनुमान है कि कोविड से हुई मौतें दुनिया भर में सरकारी आंकड़ों से 2-3 गुना ज्यादा हो सकती हैं.

जाहिर है, भारत भी कोई अपवाद नहीं. इकोनॉमिस्ट ने गणितीय मॉडल के जरिए भारत में 15 मई तक कोविड-19 से करीब दस लाख मौतें होने का अनुमान लगाया, जबकि सरकारी आंकड़ा 2,70,319 मौतों का है. न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे एक लेख में दावा किया गया कि सरकारी गिनती से 5-7 गुना तक ज्यादा लोग मरे हो सकते हैं.

केंद्र सरकार ने इन अध्ययनों को 'अपुष्ट विश्लेषण’ और 'महामारीविज्ञान सम्मत किसी सबूत के बगैर’ आंकड़े जोड़ने की कवायद कहकर खारिज कर दिया. लेकिन जब विभिन्न राज्यों ने मौत के आंकड़ों का मिलान किया तो पता चला कि कोविड से हुई मौतों की सरकारी गिनती और मृतकों के वास्तविक आंकड़ों के बीच भारी फर्क है.

मरीजों की मृत्यु की वजह क्या?
मरीजों की मृत्यु की वजह क्या?

जून में कम से कम छह राज्यों—महाराष्ट्र, बिहार, उत्तराखंड, गोवा, उत्तर प्रदेश और पंजाब—ने मौतों की अपनी गिनती में सुधार किया. इससे सरकारी आंकड़े अचानक बढ़ गए. और हर सुधार के साथ आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं. आंकड़ों का इस तरह मिलान करने वाला भारत अकेला देश नहीं है. अमेरिका में भी इंडियाना, ओकलाहोमा और मैरीलैंड सरीखे राज्यों ने पिछली मौतों को दर्ज किया है.

राज्यों में दोबारा गिनती कई वजहों से शुरू हुई. इनमें कोविड के मृतकों के लिए मुआवजे का ऐलान, अदालत के निर्देश और मौतों की कम गिनती का राजफाश करती मीडिया रिपोर्ट शामिल हैं. कई राज्यों की तरफ से मुआवजे के ऐलान के नतीजतन स्वाभाविक ही कोहराम मच गया, क्योंकि मौत का कोविड से होना दर्ज नहीं होने के कारण कई परिवारों को मुआवजा देने से इनकार कर दिए जाने की आशंका है.

मसलन, बिहार में पटना हाइकोर्ट ने एक जिले में आंकड़ों में विसंगतियों की तरफ ध्यान दिलाया तो सरकार को कोविड से हुई मौतों के ऑडिट के लिए 20 दिनों की कवायद करनी पड़ी. अदालत गंगा में बह रहे शवों से जुड़ी रिपोर्टों को लेकर एक जनहित याचिका की सुनवाई कर रही थी. महाराष्ट्र में कोविड से हुई अघोषित मौतों पर अखबारी रिपोर्टों के बाद दोबारा गिनती शुरू हुई.     

कोविड से आखिर कितनी मौतें हुईं?
हालांकि नवीनतम खुलासे भी सही तस्वीर नहीं दिखा सकते. देश की नागरिक पंजीकरण प्रणाली (सीआरएस) के विभिन्न राज्यों के आंकड़ों में सभी कारणों से होने वाली मृत्यु की संख्या में भारी उछाल दिखता है. यह उछाल संकेत है कि अतिरिक्त मृत्यु दर महामारी के कारण हो सकती है.

आम तौर पर एक वर्ष में किसी खास समय अवधि में देखी गई मौतों की संख्या और उसी समयावधि में दूसरे वर्ष में हुई मौतों की संख्या के बीच जो अंतर होता है उसे अतिरिक्त मौतों के रूप में परिभाषित किया जाता है. राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के लिए सीआरएस डेटा की तुलना से पता चलता है कि अप्रैल 2020 की तुलना में अप्रैल 2021 में 242 प्रतिशत अधिक मौतें हुईं.

दक्षिण में, तमिलनाडु सरकार के सीआरएस से पता चला है कि 1 जनवरी से 25 जून, 2021 में हुई मौतों के आंकड़ों की तुलना अगर इसी अवधि के गैर-कोविड वर्ष 2019 में हुई मौतों से करें, तो इस साल 1,42,000 अधिक जानें गई हैं. आधिकारिक स्वास्थ्य बुलेटिन के अनुसार, इन अतिरिक्त मौतों में से केवल 19,929 को कोविड के कारण हुई मौत के रूप में दर्ज किया गया था. इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि तमिलनाडु में मृत्यु दर में सबसे अधिक इजाफा अप्रैल और जून के बीच दर्ज किया गया जब कोविड की दूसरी लहर चरम पर थी.

इसी अवधि में, मध्य प्रदेश के सीआरएस आंकड़ों से 42 गुना अधिक मौतों का पता चला; आंध्र प्रदेश में 34 गुना और कर्नाटक में पांच गुना अधिक मौतों की जानकारी सीआरएस के आंकड़े दे रहे थे. चार राज्यों—तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में भारत की 21 प्रतिशत आबादी निवास करती है.

2021 के पहले पांच महीनों में इन चारों राज्यों ने कुल मिलाकर पांच लाख अधिक मौतों की जानकारी दी है लेकिन वे केवल 46,000 मौतों को ही कोविड के कारण हुई मौतों के रूप में दर्ज करते हैं. 2021 के पहले पांच महीनों में अकेले तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में पूरे राज्य के लिए आधिकारिक कोविड मौतों से 8.2 गुना अधिक मौतें हुईं.

हालांकि, कई विशेषज्ञ सीआरएस डेटा के आधार पर ‘बहुत अधिक अनुमान लगाने’ को लेकर आगाह भी करते हैं. मौतों में वृद्धि के पीछे एक कारण देश में मृत्यु पंजीकरण प्रक्रिया में निरंतर सुधार है, जिसके परिणामस्वरूप डेटा प्रबंधन बेहतर हो गया है. जनगणना विभाग से जारी हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि 2019 में 92 प्रतिशत मौतों को दस्तावेजों में दर्ज किया गया, जबकि 2011 में मात्र 66 प्रतिशत मौतें पंजीकृत हुआ करती थीं. यह लगातार नौवां वर्ष है जिसमें मृत्यु पंजीकरण दर में वृद्धि देखी गई है.

इसके अलावा, महामारी की वजह से ऐसे कई लोगों की जान गई है, जिन्हें कोरोना संक्रमण तो नहीं लगा था लेकिन दूसरी गंभीर बीमारियों से पीडि़त थे. अस्पताल वगैरह कोविड प्रबंधन में ही उलझे हुए थे, इसलिए संभव है, ऐसे बहुत से रोगियों की समय पर इलाज न मिलने से मौत हो गई हो. पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव के. सुजाता राव कहती हैं, ‘‘सीआरएस डेटा वायरस से हुई तबाही को समझने के लिए अच्छा संकेतक हो सकता है, लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस साल बड़ी संख्या में गैर-कोविड मौतें भी हुईं हैं. अस्पतालों में बिस्तरों की कमी के साथ-साथ लॉकडाउन के कारण आवाजाही पर प्रतिबंध के कारण बहुत से लोगों को समय पर इलाज नहीं दिया जा सका, जिससे कई जानें गईं.’’

मौत की लापता वजह 
राष्ट्रीय स्तर पर सुधार के बावजूद, देश में मृत्यु का पंजीकरण करते समय, मौत की वजह तय करने का मामला काफी ढीलाढाला रहा है. जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम,1969 के तहत पंजीकरण के लिए मृत्यु का कारण बताने वाले चिकित्सा प्रमाणपत्र अनिवार्य है. फिर भी, जैसा कि 2019 की वार्षिक रिपोर्ट से पता चलता है, देश में केवल 20.7 प्रतिशत या पांच में से एक पंजीकृत मौतों में ही मृत्यु के कारण का उल्लेख किया गया है.

यह बिहार में 40 में से एक, झारखंड में 30 में से एक और उत्तर प्रदेश में 25 में से एक से भी कम है. यहां तक कि केरल, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में भी केवल 11-12 प्रतिशत में ही मौत की वजह चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित होती है, जहां 100 प्रतिशत मौतों का पंजीकरण होता है. इससे भी चिंताजनक बात यह है कि देश भर में चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित मौतों की हिस्सेदारी में पिछले कुछ वर्षों में गिरावट देखी गई है. 2017 में 22 प्रतिशत मौतें चिकित्सीय रूप से प्रमाणित होती थीं लेकिन 2018 में यह आंकड़ा घटकर 21.1 प्रतिशत हो गया.

यहां तक कि उन मामलों में भी जहां मौत का कारण दर्ज किया गया है, ज्यादातर मामलों में मानदंडों का पूरा पालन नहीं किया जाता है. मृत्यु प्रमाणीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला फॉर्म डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों पर आधारित है, जो यह निर्धारित करता है कि मौत की तत्काल वजह और सभी दूसरी वजहों को कोई डॉक्टर बताए और प्रमाणित करे.

2016 में, जब नागरिक पंजीकरण की स्थिति का आकलन करने के लिए देश के रजिस्ट्रार जनरल (आरजीआइ) की एक विशेष टीम ने बिहार और असम का दौरा किया तो पाया कि मृत्यु को प्रमाणित करने वाले लगभग हर फॉर्म में, डॉक्टर ने ‘हृदय गति रुकने’ को व्यक्ति की मृत्यु का कारण लिखा है. टीम का नेतृत्व करने वाले पूर्व आइएएस अधिकारी गोपालन बालगोपाल ने अपनी टिप्पणी में लिखा था, ‘‘इसमें कुछ भी स्पष्ट नहीं किया गया. हृदय गति और सांस रुकने के अलावा मौत का दूसरा तरीका नहीं है.’’

इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं है कि महामारी वर्ष में, मौतों की संक्चया में अचानक वृद्धि के बावजूद, अधिकांश पंजीकृत मामलों में मृत्यु की वजह दर्ज नहीं है (विशेषकर जब मौत अस्पतालों/चिकित्सालयों के बाहर हुई हो). मृत्यु की वजह के प्रमाणपत्र के प्रावधान को 2012 में सभी चिकित्सा केंद्रों में लागू किया गया था, लेकिन इसका असलियत में ज्यादा असर नहीं दिखता. देश में, कुल पंजीकृत मौतों में से केवल 32 प्रतिशत संस्थागत या स्वास्थ्य केंद्रों में हुई मौतें हैं.

महामारी विज्ञानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य और नीति विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लहरिया कहते हैं, ‘‘अस्पतालों में होने वाली मौतों को हमेशा कारणों के साथ प्रमाणित किया जाता है. हालांकि, मृत्यु प्रमाणीकरण की गुणवत्ता और उसकी वजहों का विवरण आम तौर पर मानक के अनुरूप नहीं होता है. इनमें डब्ल्यूएचओ के मानदंडों का शायद ही पालन होता है. अस्पतालों के बाहर होने वाली मौतें, जैसे कि घर पर, केवल पंजीकृत होती हैं और आम तौर पर उसकी वजह के लिए चिकित्सा प्रमाणपत्र नहीं दिया जाता है.’’

संभव है, कोविड के कारण हुई कई मौतों में वजह के रूप में कोविड इसलिए भी नहीं दर्ज किया जा सका है क्योंकि केवल उन्हीं को कोविड मरीज मानने पर जोर दिया गया, जो जांच में कोरोना संक्रमित पाए गए हों. आइसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) के दिशानिर्देशों के अनुसार, यहां तक कि संदिग्ध मामलों (जिनकी जांच के जरिए पुष्टि नहीं हुई थी) को भी कोविड के कारण हुई मौत के रूप में रिपोर्ट किया जाना चाहिए. लेकिन कई राज्यों ने कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट न होने से कोविड मौत के रूप में दर्ज नहीं किया. 

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार मामलों के मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 9 अक्तूबर, 2020 को एक पत्र जारी किया था कि भले कोई अन्य बीमारियों से ग्रस्त हो, लेकिन निदान में कोविड-19 के लक्षण मिले हों तो उसकी मौत को कोविड-19 के कारण हुई मौत के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए. केंद्र ने घोषणा की कि जो कोई भी कोविड की मौतों को दर्ज करने में विफल रहेगा—यहां तक कि प्रमाणित करने वाले डॉक्टर भी—उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के तहत दंडात्मक परिणाम भुगतने होंगे.

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि डंडा लहराना इसका जवाब नहीं है, बल्कि इसके लिए वर्गीकरण के मानक तरीके का सख्ती से पालन कराया जाना चाहिए. अक्सर ऐसा नहीं होता है. मसलन, कई मौतें जिनके कारण का पता नहीं चलता उन्हें 'संक्रमण’ से मौत के रूप में प्रमाणित किया जाता है.

केरल जैसे राज्य में भी, जहां स्वास्थ्य जागरूकता सबसे बेहतर है, वहां भी मरने वालों की संख्या की जानकारी कम देने के मुद्दे पर बहस चल रही है. पलक्कड़ जिले में प्रेक्टिस करने वाले डॉ. अरुण एनएम ने सबसे पहले पिछले साल जुलाई में कोविड मौतों के सरकारी आंकड़ों को चुनौती दी थी. डॉ. अरुण ने इंडिया टुडे को बताया, ''राज्य सरकार ने कोविड के कारण हुई मौतों की रिपोर्ट करने की अपनी शैली बदल दी तो मुझे संदेह हुआ था. बाद में, मुझे पता चला कि मेरे क्षेत्र में कोविड से हुईं कम से कम छह मौतों को दर्ज ही नहीं किया गया.’’

पहली लहर के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में कोविड की मौतों को दर्ज नहीं किए जाने की शिकायत अधिक थी, जहां टेस्ट सुविधाओं की कमी थी. कोविड के कारण हुई मौतों से जुड़े कलंक के कारण भी खासकर गांवों में कई ने कोविड के कारण हुई उन मौतों की जानकारी छुपाई, जो घर पर हुई थीं. विशेषज्ञों का कहना है कि प्रति 1,000 लोगों पर सात की मौजूदा मृत्यु दर से, 1,000 की औसत आबादी वाले गांव से हर दो महीने में लगभग एक मौत की सूचना मिलनी चाहिए.

लेकिन अधिकांश भारतीय गांवों में कोविड-19 की दूसरी लहर के दो महीनों में कहीं अधिक उच्च दर से मौतें देखी गई हैं. पश्चिम बंगाल में एसोसिएशन ऑफ हेल्थ सर्विस डॉक्टर्स के महासचिव डॉ. मानस गुमटा कहते हैं, ''मौतों की वास्तविक संख्या निश्चित रूप से कम से कम तीन गुना अधिक है. बंगाल में ऐसे कई स्थान हैं जहां कोई संगठित श्मशान या कब्रिस्तान नहीं है और पंचायतें मृत्यु का कारण बताए बिना मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करती हैं.’’ 
संख्या कम रखने के राजनीतिक कारण भी थे. राव कहते हैं, ‘‘कुछ राज्य दिखाना चाहते थे कि वे महामारी का बेहतर प्रबंधन कर रहे हैं. वे मौतों के लिए वायरस को जिम्मेदार ठहराने से हिचके.’’ 

मौतों की संख्या इतनी अहम क्यों है?
विशेषज्ञों का कहना है कि मौत के सटीक कारणों की जानकारी नहीं दिए जाने से, कोविड के खिलाफ भारत की लड़ाई में भारी अवरोध पैदा हो सकता है. मृत्यु का कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों की उपयोगिता के आकलन में अत्यंत महत्वपूर्ण है. लहरिया कहते हैं, ''स्वास्थ्य क्षेत्र की योजना बनाने और स्वास्थ्य संसाधनों के पर्याप्त आवंटन के लिए मृत्यु के कारणों को समझना आवश्यक है. मौत के कारणों के पुक्चता आंकड़ों के अभाव में सरकारें अनुमानों पर निर्भर रहती हैं.’’

जबकि कई राज्यों ने अब कोविड के कारण हुई मौतों के आंकड़ों को दुरुस्त करना शुरू कर दिया है, लेकिन प्रणालीगत बदलाव जरूरी है. फौरी कदम 'वर्बल अटॉप्सी’ (मौखिक आधार पर सूचनाएं एकत्र करके मृत्यु के कारण का निर्धारण) होनी चाहिए, खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां मौत के कारणों की पहचान करने के लिए कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं होते. वहां मौत के कारणों का निर्धारण मृतक के परिजनों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों की जानकारी के आधार पर किया जाता है. 2003 में नमूना पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस) के तहत बीमारी का अनुमान लगाने के लिए आरजीआइ ने फिजिशियन कोडेड वर्बल अटॉनमी (पीसीवीए) की शुरुआत की थी.

झारखंड पहला राज्य है, जिसने महामारी के दौरान वर्बल अटॉप्सी की शुरुआत की. राज्य ने अप्रैल और मई 2021 में घर-घर जाकर गिनती कराई और लगभग कोविड-19 के कारण मौतों में 25,500 मौतों को जोड़ा गया, जो पहले दी गई जानकारी से 43 प्रतिशत अधिक है. झारखंड के उदाहरण ने साबित कर दिया है कि वर्बल अटॉप्सी काफी हद तक संभव है. राज्य ने केवल 10 दिनों में 66 प्रतिशत आबादी का सर्वेक्षण किया. केंद्र और अन्य राज्य सरकारों, दोनों को ऐसी प्रणाली अपनानी चाहिए. साथ ही, मृत्यु की वजह का अनिवार्य और सटीक प्रमाणीकरण की एक राष्ट्रीय पहल शुरू होनी चाहिए. 

मौत की वजह जानना स्वास्थ्य क्षेत्र की योजना बनाने और संसाधनों के पर्याप्त आवंटन के लिए जरूरी है. इस मद में सही आंकड़े के अभाव में सरकार को अनुमानों पर निर्भर होना पड़ता है’’
डॉ. चंद्रकांत लहरिया, महामारी तथा सार्वजनिक, स्वास्थ्य विशेषज्ञ

क्या मौत के आंकड़ों में गड़बड़झाले का असर मुआवजे पर पड़ेगा?

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक जनहित याचिका में दावा किया गया है कि मौत की वजह कोविड नहीं बताए जाने से वास्तविक कोविड ऌपीडि़तों के परिवारों को भी सरकार मुआवजा देने से इनकार कर देगी. इस याचिका में ध्यान दिलाया गया कि बहुत सारी मौतों की वजह दिल का दौरा या फेफड़ों का जवाब दे जाना बताया गया है. याचिका में मांग की गई कि हरेक कोविड शिकार के निकटस्थ परिजन को 4 लाख रुपए का फौरी मुआवजा आपदा प्रबंधन अधिनियम (डीएमए), 2005 के तहत दिया जाए, जो अधिसूचित आपदा के लिए होता है.

पिछले साल 14 मार्च को, केंद्र ने कोविड 19 को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया था. लेकिन इस पीआइएल के जवाब में सरकार ने जो हलफनामा दाखिल किया, उसमें बताया गया कि महामारी के दौरान मुआवजा देना मुमकिन नहीं है क्योंकि इससे आर्थिक स्थिति पर काफी बोझ पड़ेगा.

बहरहाल, शीर्ष अदालत ने इन सरकारी तर्कों को खारिज कर दिया और 30 जून को केंद्र को निर्देश दिया कि छह हफ्ते के भीतर, पीड़ित परिवारों को मुआवजे के भुगतान के लिए एक समान दिशानिर्देश तैयार करे. इसमें यह भी कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाला राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) मुआवजे की योजना लागू नहीं करके ''अपने वैधानिक कर्तव्य को पूरा करने में नाकाम रहा.’’

इस बीच, कुछ राज्यों ने कोविड मौतों के लिए खुद अपने स्तर पर मुआवजा देने का ऐलान कर दिया. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने ऑन्न्सीजन की कमी से जान गंवा बैठने वालों के परिजनों को 5 लाख रुपए की राशि देने का ऐलान किया है लेकिन अन्य कोविड मौतों के लिए महज 50,000 रुपए देने का घोषणा की गई है.

बिहार ने 4 लाख रुपए के मुआवजे की घोषणा की, मध्य प्रदेश और कर्नाटक ने यह राशि 1 लाख रुपए की, लेकिन कर्नाटक में इस मुआवजे के हकदार महज बीपीएल परिवार हैं. इस मामले में पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव के. सुजाता राव की चेतावनी वाजिब है. वे कहती हैं, ''मुआवजा यकीनन जरूरी है, खास तौर पर जब बच्चे अनाथ हो रहे हैं. लेकिन इसकी घोषणा तभी की जानी चाहिए जब हमारे पास मौतों का सटीक आंकड़ा हो. वरना, इसमें बड़े पैमाने पर जालसाजी होने की गुंजाइश बनी रह सकती है.’’

देश में कैसे दर्ज होती हैं मौतें
देश के जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 में सभी जन्म, मृत्यु और मृत प्रसवों का पंजीकरण आवश्यक है, जिसमें मृत्यु के कारण का मेडिकल प्रमाणपत्र होना जरूरी है. हर मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए मृत्यु का पंजीकरण कराना आवश्यक है. मौत का पंजीकरण 21 दिन के भीतर संबंधित स्थानीय निकायों में कराना आवश्यक होता है. इसके बाद समुचित सत्यापन के बाद प्रमाण-पत्र जारी किया जाता है. पहचान और पता के अन्य दस्तावेजों के साथ, आवेदन में मृत्यु का कारण बताने वाला चिकित्सकीय प्रमाणपत्र लगाना जरूरी होता है.

मृत्यु के अधिकतर मामलों में, खासकर घर पर या कुदरती परिस्थितियों में, मेडिकल प्रमाणपत्र न तो मांगा जाता है और न ही लगाया जाता है. सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस), जिसकी देखभाल रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (आरजीआइ) का कार्यालय करता है, सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में हुए जन्म और मृत्यु से जुड़े रिकॉर्ड का अभिलेखागार है. सीआरएस के जरिए तैयार हुआ महत्वपूर्ण सांक्चियकीय डेटा मेडिकल रिसर्च और हेल्थकेयर और इन्फ्रास्ट्रक्चर के नीति-निर्माण की दृष्टि से बेहद उपयोगी है.

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