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खास रपटः दरकती आस्था सिमटता साम्राज्य 

उत्तर प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बसपा को विधानसभा चुनाव में मुकाबले से बाहर और मुख्य मुकाबला सत्ताधारी भाजपा और सपा के बीच होने के अफसाने में कितना दम है? क्या बसपा वाकई रेस से बाहर है या किसी नई रणनीति के साथ मैदान में सबको चौंकाने की तैयारी कर रही है? 

सजग सिपहसालार  मायावती की परछाई कहे जाने वाले पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश मिश्र ने अकेले चुनाव कमान संभाली  है  सजग सिपहसालार  मायावती की परछाई कहे जाने वाले पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश मिश्र ने अकेले चुनाव कमान संभाली  है 

दयाशंकर शुक्ला सागर

झांसी में गुजरते साल के आखिरी दिनों की खिली धूप आमतौर पर सकून देने वाली होती है. चारों तरफ बिखरी ऐसी ही धूप में काले पुलओवर पर नीला कोट पहने सतीशचन्द्र मिश्र मंच पर अकेले खड़े दिखते हैं. पीछे बैक ग्राउंड में मुस्कुराती हुई मायावती की तस्वीर के साथ बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का एक बड़ा-सा बैनर लगा है.

मंडल स्तर के रिजर्व सीट के कंडीडेट और कोऑर्डिनेटर गेंदे के फूलों की विशालकाय माला ब्राह्मण किंग मेकर के गले में डालते हुए तस्वीर खिंचवाते हैं. सामने सफेद चांदनी में कुसिर्यों पर नीली टोपी पहने बैठे कार्यकताओं को संबोधित करते हुए धाकड़ वकील मिश्र कार्यकर्ताओं को आश्वस्त करते हैं—''नया साल बहुजन समाज पार्टी का होगा और हम सब बहनजी को पांचवी बार मुख्यमंत्री बनते देखेंगे.’’

दलित-ब्राह्मण भाईचारे के तमाम कामयाब प्रयोग कर चुके सतीश मिश्र के कंधे पर एक बड़ी जिम्मेदारी का हिमालय है. पहले सूबे के दर्जनों जिलों में ब्राह्मणों का ताबड़तोड़ प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन फिर दिसंबर भर उत्तर प्रदेश के 18 मंडलों में रिजर्व सीटों पर जनसभाएं. मंच पर वे अकेले दिखते हैं. कोई बीस साल के राजनीतिक जीवन में इतना अकेलापन उन्होंने शायद कभी महसूस नहीं किया होगा.

उधर भाजपा और सपा के बड़े नेताओं ने अपनी पूरी उर्जा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में झोंक दी है. मोदी और योगी गोरखपुर, वाराणसी, बुंदेलखंड, समेत कई रैलियां कर चुके हैं. पिछले दस हप्ते में मोदी की एक दर्जन से ज्यादा जनसभाएं हो चुकी हैं. अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी भी प्रदेश भर में सभाएं और रोड शो कर रहे हैं जबकि मायावती पिछले साल 7 सितंबर को पहली दफा लखनऊ में प्रबुद्ध विचार संगोष्ष्ठी के समापन सम्मेलन में दिखाई दीं.

इसके बाद वे कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस के दिन 9 अक्तूबर 2021 को लखनऊ की एक बड़ी रैली में दिखीं. हर सभा, हर सम्मेलन में पत्रकार मिश्र से पूछा रहे हैं, ''बहनजी कहां हैं? वे क्यों नहीं नजर आ रहीं?’’ नतीजा यह हुआ है कि चुनाव से ठीक पहले ही एक नैरेटिव बनाने की कोशिश चल निकली कि 2022 का विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच लड़ा जा रहा है.

झांसी में सभा के बाद इलेक्ट्रानिक मीडिया की मिश्र पर सवालों की बारिश शुरू हो जाती है. एक स्थानीय पत्रकार  उनकी तरफ व्यंग्यात्मक लहजे में सवाल उछालता है, ''आप कहते हैं कि बसपा कोरोना गाइडलाइन का पालन कर रही है जबकि भाजपा कहती है मायावतीजी दो साल से क्वारंटाइन हैं’’ असुविधाजनक हालात में खुद को सहज रखने में माहिर मिश्र थोड़े तल्ख हो जाते हैं, ''वे कितने साल से क्वारंटाइन हैं, जरा ये भी तो पूछ लीजिए उनसे.

और नौ अक्तूबर को वे आंख पर पट्टी डाले हुए थे क्या, जब पांच लाख लोगों को बहनजी संबोधित कर रही थीं. 7 सितंबर को वे आंख बंद रखे थे क्या?’’ इन दो तारीखों के अलावा मिश्र के पास कोई तीसरी तारीख नहीं है जब मायावती किसी सार्वजनिक मंच पर आई हों. जिद्दी पत्रकार आगे पूछते हैं कि ''...ऐन चुनाव के वक्त मायावती निकलेंगी तो कहेंगी हमें प्रचार नहीं करने दिया गया?’’

मिश्र जवाब देते हैं, ''अमित शाहजी क्या कह रहे हैं और योगीजी क्या कह रहे हैं... ये सब हमारी मीटिंग में उमड़ रहे जनसैलाब को देखकर ऐसी बातें कर रहे हैं, जब बहुत जल्द बहनजी हर जिले में प्रचार के लिए निकलेंगी (तभी मंच से तबला-हरमोनियम बजने लगता है, मिश्र मंच की तरफ देखकर गुस्से में उंगलियों से 'ये क्या है’ की मुद्रा बनाते हैं. बाजा डर के बंद हो जाता है) तब किस तरह का तूफान आएगा देखिएगा.’’ 

लेकिन तूफान के इंतजार का वक्त किसे है. सोशल मीडिया प्लेटफार्म से लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया तक सपा-भाजपा में असली मुकाबला दिखा रहे हैं. जेएनयू के सेंटर फॉर स्टडी आफ सोशल सिस्टम के प्रो. विवेक कुमार कहते हैं कि, ''ये नैरिटव जानबूझ के बनाया जा रहा है ताकि बसपा लड़ाई से बाहर दिखे. अनुभवजन्य आंकड़ों को देखिए. ग्रास रूट पर कोई ये नहीं पूछ रहा है कि समाजवादी पार्टी का संगठन कहां हैं?

अगर संगठन है तो अखिलेश रोड शो क्यों कर रहे हैं? सब जानते हैं कि जिनका संगठन नहीं होता वही रोड शो करते हैं. 2012 में अखिलेश यादव की बैकडोर इंट्री हुई थी और वे इत्तेफाकन मुख्यमंत्री बने थे. दरअसल, ये चुनाव उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने बेनी प्रसाद वर्मा, आजम खान, अमर सिंह और शिवपाल यादव के संग लड़ा था.

आज अखिलेश के पास इनमें से कोई चेहरा नहीं है. वे अकेले हैं. दूसरा डेटा यह है कि 2017 में सपा को 1 करोड़ 89 लाख वोट मिले थे जबकि बसपा को 1 करोड़ 93 लाख वोट मिले थे. इस लिहाज से भी बसपा, सपा से आगे थी. इस तरह इम्पीरकल डेटा कहीं से भी ये प्रमाणित नहीं करता कि ये लड़ाई किनके बीच में है.’’ 

दलित चिंतक प्रो. विवेक आगे कहते हैं कि, ''वे यह नरैटिव इसलिए गढ़ना चाहते हैं ताकि भाजपा आसानी से आगे निकल जाए. समाजवादी पार्टी में 7 फीसदी यादव वोट और 16 फीसदी मुसलमानों के वोट का अगर पूरा ध्रुवीकरण हो भी जाए तो वे 23 या 24 फीसदी से आगे नहीं बढ़ते. तो ऐसे में भाजपा आगे निकल जाएगी.

लेकिन दूसरी तरफ बसपा की तरफ 17 फीसदी मुस्लिम वोट और 20 फीसदी दलितों वोट एकजुट हो जाते हैं तो 37 फीसदी वोट कहीं नहीं गए. इसमें तीन या चार फीसदी वोट ब्राह्मणों के भी जोड़ दीजिए. क्योंकि जहां ब्राह्मण खड़ा होगा 3 या 4 प्रतिशत वोट तो उसे मिलेंगे ही. ऐसे में कहीं मुस्लिम और अपर कास्ट बसपा के पाले में न खड़ा हो जाए इसलिए ये नैरिटिव गढ़ा जा रहा है कि चुनाव में टक्कर सपा और भाजपा में है.’’

दलित चिंतकों की ये स्थापना पूरी तरह गलत भी नहीं है. बीएसपी अप्रैल 1984 में अस्तित्व में आई. लेकिन कांशीराम की विरासत संभालते ही 2002 के चुनाव में दूरदर्शी मायावती ने एक बड़ा रणनीतिक यू-टर्न लिया. वे बहुजन से सर्वजन समाज की तरफ शिफ्ट हो गईं. हालांकि ये अवधारणा कांशीराम के सामाजिक परिवर्तन के चिंतन के खिलाफ थी.

जैसा कि बसपा के संस्थापंकसदस्यों में एक रहे पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद इंडिया टुडे से कहते हैं कि ''मान्यवर कांशीराम ये कभी नहीं चाहते थे कि सवर्ण उनकी पार्टी से जुड़ें. उनका कहना था कि सवर्णों की तो अपनी छह पार्टियां हैं. अगर वे मेरी पार्टी में आए तो सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया रूक जाएगी. ये उनके हित में है कि स्टेटस-को रहे.’’ इसका पार्टी के भीतर विरोध हुआ और बाहर विपक्ष भी आक्रामक हो गया.

विपक्ष ने प्रचार शुरू कर दिया कि 'तिलक, तराजू और तलवार...इनको मारो जूते चार’’ का नारा देने वाली पार्टी अब इन्हीं तीनों जातियों की शरण में चली गई है. (हालांकि डीएस4 के पुराने लोगों का दावा हैं कि ये नारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने दलित मूवमेंट को बदनाम करने के लिए गढ़ा था कांशीराम का असली नारा था, 'तिलक तराजू और तलवार, इनसे रहो सदा होशियार’).

लेकिन इन बातों की परवाह न करके 2002 में मायावती ने अपनी पार्टी के दरवाजे ब्राह्मण-ठाकुर जैसे सवर्णों और मुसलमानों के लिए खोल दिए और याद रहे तब तक सतीश मिश्र की राजनीति में इंट्री भी नहीं हुई थी. इस चुनाव में बसपा ने ब्राह्मण (38), ठाकुरों (36) मुसलमानों (82) और पिछड़े वर्ग के प्रत्याशियों (126) को दिल खोलकर टिकट बांटे. तब बसपा सवर्ण प्रत्याशियों को दिलचस्प पैकेज देती थी, जिसमें जीत की लगभग गारंटी होती थी.

बसपा के गैर दलित प्रत्याशियों को केवल अपनी बिरादरी के वोट जुटाने होते थे. चुनाव में दिलचस्पी लेने वाले नेताओं के लिए बसपा का टिकट एक ऐसा लाटरी टिकट हो गया था जिसका नंबर लगना तकरीबन तय था. जाहिर है इसके लिए प्रत्याशी को काफी संसाधन जुटाने पड़ते थे. पर यह समावेशी फार्मूला रंग लाया और 2002 के चुनाव में नीला हाथी पहली बार पूरे आत्मविश्वस से शतक (98 सीटें जीत कर) की दहलीज पर आकर लखनऊ एनेक्सी के सामने एक बार फिर खड़ा हो गया.

मायावती के सिर पर देश के सबसे बड़े सूबे की मुख्यमंत्री बनने का तीसरी बार ताज सज गया. फिर तो ये फार्मूला मायावती का ट्रेड मार्क बन गया. 2007 में तो इस फार्मूले ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर चमत्कार ही कर दिया. लेकिन 2012 और 2014 में मोदी लहर के बाद बसपा का जनाधार लगातार गिरता चला गया. और अब नौबत ये आ गई कि विरोधी दल बड़ी चतुराई से उन्हें लड़ाई से ही बाहर बता रहे हैं.

चैनसुख भारती बसपा के संस्थापक सदस्यों में एक रहे हैं. भारती ने 'इंडिया टुडे’ से कहा कि, ''बसपा के कार्यकर्ता कभी मुखर नहीं रहे. वे ग्रासरूट पर काम करते हैं. गांव स्तर पर मीटिंगें करते हैं. बहनजी हमेशा बाद में ही चुनाव प्रचार के लिए निकलती हैं.’’ किन बावजूद इसके ये नरैटिव इतनी तेजी से फैलने लगा कि सतीश मिश्र ने 29 दिसंबर को ट्वीट किया, बहनजी आने वाली है. पार्टी के सूत्र कहते हैं अगर कोविड के कारण रैलियों पर रोक नहीं लगी तो अपने जन्म दिन (15 जनवरी) से वे 75 जिलों में रैलियों का सिलसिला शुरू कर सकती है. 

फोकस रिजर्व सीटों पर
बसपा 2022 के चुनाव में 'जो है उसे समेटो’ के मंत्र पर काम कर रही है. उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं और ऐसा पहली बार हो रहा है कि दलित पार्टी के रणनीतिकारों ने बड़ी चतुराई से अपना फोकस सूबे की केवल 86 आरक्षित सीटों पर केंद्रित किया है. बसपा ने मिशन 2022 को दो चरणों में बांटा. एक 'प्रबुद्ध विचार संगोष्ठियां’ और दूसरे चरण में मंडल स्तर पर जनसभाएं.

इन दोनों चरणों के केंद्र में दलित-ब्राह्मण समीकरण को साधने की कोशिश है. जुलाई के सावन के महीने में 'प्रबुद्ध विचार संगोष्ठी की शुरूआत के लिए सतीश मिश्र ने राम की जन्मभूमि अयोध्या को चुना. लेकिन राम अब भाजपा के ट्रेड मार्क हैं. सो सतीश मिश्र अपने भाषणों में सीता मैया को तरजीह देते हैं. मिश्र कहते हैं, ''अयोध्या में आकर भाजपा नेता राम मंदिर की बात करते हैं. लेकिन वे सीता मैया की बात नहीं करते.’’

पौराणिक आख्यानों में राजनीतिक रसायन मिलाकर मिश्र सीता को सीधे वाल्मीकि से जोड़ देते हैं. वे बताते हैं कि कैसे मायावती ने अपनी पिछली सरकार में बिठूर के उस वाल्मीकि आश्रम को ठीक कराने में कई सौ करोड़ रुपए खर्च किए, जहां लव-कुश के साथ सीता मैया रहती थी. वहां सीता रसोई भी बनवाई. इस तरह उन्होंने ब्राह्मण सम्मेलनों में भी दलित और महिला वोटरों को रिझाने का कनेक्शन खोज लिया.

अब मिश्र अपने हर भाषण में सीता मैया को याद करते हैं. सितंबर में जिला स्तर पर हुए इन प्रबुद्ध सम्मेलनों के बाद सतीश मिश्र ने 8 दिसंबर से मंडल स्तर पर जनसभाएं शुरू की. इनमें फोकस केवल सुरक्षित सीटों पर था. जैसे मिल्कीपुर (अयोध्या), मनकापुर(गोंडा), खजनी (गोरखपुर), महादेवा(बस्ती), मऊरानीपुर (झांसी) नरैनी (बांदा) आदि. 

पार्टी थिंकटैंक को लग रहा है कि ब्राह्मणों को इन सीटों से जोड़ा जा सकता है इसीलिए मिश्र अपने हर भाषण में दोहरा रहे हैं कि ''अगर 13 फीसदी ब्राह्मण और 23 फीसदी दलित मिलकर भाईचारा कायम कर लें तो उनकी सरकार बनने से कोई रोक नहीं सकता.’’ इन सभी सीटों पर सतीश मिश्र का एक ही संदेश है- ब्राह्मण और दलित वोट बंटे नहीं, जैसे पिछले चुनाव में बंटे थे.

इन रिजर्व सीटों पर कब्जे के लिए मायावती ने चौतरफा घेरेबंदी की है. उन्होंने एक तरफ मिश्र को ब्राह्मण वोटों के लिए लगाया है, दूसरी ओर अति पिछड़े खासतौर से जाट और मुस्लिम इंचार्जों को दिसंबर के शुरूआती दिनों में ही लखनऊ बुलाकर समझा दिया कि कैसे वोटों को एकजुट करना है. ब्राह्मण पिछले चुनावों में बड़ी मुश्किल से भाजपा के पीछे एकजुट हुआ था.

इसे तोड़ने के लिए विपक्ष ने भाजपा सरकार में ब्राह्मणों की उपेक्षा और नाराजगी को जमकर हवा दी. मिश्र इसी को कैश करने की जुगत में हैं. लेकिन बसपा के लिए ब्राह्मïणों को जोड़ना इतना आसान भी नहीं होगा. लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ल कहते हैं कि, ''अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और काशी में कोरिडोर ने ब्राह्मणों के एक तबके को बहुत प्रभावित किया है. उसका असर इस चुनाव में दिखेगा.’’ 

बिदक गई हाथियों की सेना
नब्बे और नए सदी के पहले दशक में मायावती की कामयाबी के पीछे दलित-पिछड़े और अति पिछड़े-मुस्लिम नेताओं की एक वफादार फौज थी, जो मायावती की नई सोशल इंजीनियरिंग को जमीन पर बखूबी अंजाम देती थी. इन्हीं के बल पर मायावती ने सूबे में जमीनी स्तर पर ऐसे समीकरण तैयार किए थे जिनके बल पर कांग्रेस यहां आजादी के बाद से अस्सी के दशक के अंत तक राज करती आई थी.

बसपा की रणनीति को उसके पुराने नेता अभी तक याद करते हैं. अपने काफिले के साथ सपा के प्रचार के लिए वाराणसी कूच कर रहे कभी बसपा के कद्दावर नेता रहे राम अचल राजभर 'इंडिया टुडे’ से कहते हैं, ''साहेब (कांशीराम) हमें खूब दौड़ाते थे. पाल, निषाद, कुर्मी, मल्लाह, धोबी, पासी, केवट, राई, गद्दी, घोसी, राजभर जातियों के सारे नेता अपने लोगों के बीच जाते थे.

समाज के लोग उन्हें ही नेता मानते थे क्योंकि सरकार और उनके बीच की कड़ी यही नेता थे. अब नब्बे फीसदी राजभर और कुर्मी सपा के साथ है. मैंने इस समाज को 38 साल दिए हैं, इसके नुकसान की भरपाई अब बसपा कैसे करेगी?’’  

बसपा का सबसे ताकतवर समीकरण दलित-ब्राह्मण-मुसलमान के गठजोड़ का था. यानी 21 फीसदी दलित, 30 फीसदी सवर्ण और 17 फीसदी मुसलमान. दलितों को मानवीय गरिमा प्रदान करने वाला ये एक अजेय फार्मूला था जिसकी काट न भाजपा के पास है न सपा के पास. ब्राह्मण और मुसलमानों को करीब लाने के लिए मायावती के पास दो भरोसेमंद चेहरे थे.

एक उनके कानूनी सलाहकार पंडित सतीश चंद्र मिश्र और दूसरे उनके वफादार सिपहसालार नसीमुद्दीन सिद्दीकी. एक ताज गलियारे घपले में फंसी मायावती के संकटमोचक थे, दूसरा एक मुस्लिम नौजवान जिसे उनकी पार्टी में शुरूआती मुसलमान विधायकों में एक होने का तमगा मिला था. तब दलितों की पार्टी में नसीमुद्दीन की हैसियत उस गैर-अरबी मुसलमान हजरत बिलाल जैसी हो गई जिसे पैगम्बर ने मदीना की मस्जिद में पहली दफा अजान पढऩे की इज्जत बख्शी थी क्योंकि उस अफ्रीकी बाशिंदे की आवाज़ मीठी पर बुलंद थी.

सतीश मिश्र ने बसपा के चुनाव चिन्ह को 'हाथी नहीं गणेश’ है के नारे में बदला तो वालीबॉल के राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रह चुके दबंग नसीमुद्दीन ने पार्टी को सिखाया कि अनुशासन ही कैडर का मूल मंत्र है. मायावती ने इन दोनों को 2007 की शानदार जीत का रचनाकार बताया था. नसीमुद्दीन को मायावती ने 10 मई, 2017 को 'टेपिंग ब्लैकमेलर’ बताते हुए 'पार्टी फंड में हेराफेरी’ और ''अनुशासनहीनता’’ के इल्जाम में पार्टी से बर्खास्त कर दिया.

बसपा का दूसरा ताकतवर समीकरण दलित-अति पिछड़ा गठजोड़ था, जिसे अंबेडकर नगर इलाके में जमीनी सतह पर देखा जा सकता है. अयोध्या से 75 किमी. दूर अंबेडकर नगर संसदीय सीट कभी गाजियाबाद की रहने वाली मायावती का गढ़ थी. मायावती ने इस सीट से 1998,1999 और 2004 में चुनाव जीत कर हैट्रिक लगाई. यहां मायावती की ताकत के पीछे अति पिछड़े वर्ग के उनके दो भरोसेमंद क्षत्रप राम अचल राजभर और लालजी वर्मा हुआ करते थे.

कांशीराम से जुड़े राजभर को तो बसपा 'संगठन का शिल्पकार’ माना जाता था. वे अकबरपुर से पांच बार विधायक चुने गए. बसपा ने उन्हें न केवल प्रदेश अध्यक्ष बनाया बल्कि एक वक्त तो वे पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी बना दिए गए थे. कई राज्यों के प्रभारी रहे. इसी तरह लालजी वर्मा बसपा के राष्ट्रीय महासचिव और विधानसभा में विधानमंडल दल के नेता रहे. दोनों बसपा की हर सरकार में मंत्री रहे. 2017 में जब भाजपा की लहर थी, तब इन दोनों नेताओं ने न केवल अपनी सीट बचाई बल्कि इलाके की एक और सीट पार्टी की झोली में डाल दी.

वर्मा कुर्मी नेता हैं और अंबेडकर नगर में करीब ढाई लाख कुर्मी वोटर हैं. इन दोनों कद्दावर नेताओं को बहनजी ने बीते साल जून में बाहर का रास्ता दिखा दिया और सपा ने बिना वक्त गंवाए दोनों जनाधार वाले नेताओं को लपक लिया. अब ये दोनों नेता बसपा की जड़ें खोदने में जुट गए हैं. उधर राकेश पांडेय अंबेडकर नगर से बसपा के दबंग सांसद हुआ करते थे. मायावती ने उन्हें अपनी सीट से चुनाव जितवाया. पांडेय ने भी अभी 3 जनवरी को सपा का दामन थाम लिया.

इससे पहले भी ब्राह्मण नेताओं का बसपा से मोह भंग हो चुका है. बसपा के सांसद रहे ब्रजेश पाठक 2017 के विधानसभा चुनाव के ठीक एक साल पहले हवा का रुख भांप कर पार्टी छोड़कर न केवल भाजपा में शामिल हो गए बल्कि बहुत जल्द सूबे की योगी सरकार में मंत्री भी बन गए. अब वे भाजपा का ताकतवर ब्राह्मण चेहरा हैं. ब्रजेश पाठक ने 'इंडिया टुडे’ से कहा ''सिर्फ ब्राह्मण नहीं बल्कि सर्वसमाज भाजपा के साथ है. जहां तक इस चुनाव में हमारी लड़ाई का सवाल है वो किसी के साथ नहीं. विकास की आंधी में सारे गठबंधन तो पहले ही फेल हो चुके हैं.’’

इसी तरह ब्रिजेश मिश्र सौरभ प्रतापगढ़ के बसपा नेता हुआ करते थे. 2012 में उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी. सौरभ कहते हैं, ''2012 में पार्टी छोड़ते वक्त मैंने नसीमुद्दीन से साफ कहा था कि अब प्रतापगढ़ सदर की भूमि पर बसपा का कोई उम्मीदवार नहीं जीतेगा. एक वह दिन था और आज ये दिन है तब से बसपा का कोई नेता यहां से चुनाव नहीं जीता.’’

इसी तरह बसपा सरकार में ताकतवर ऊर्जा मंत्री रहे सादाबाद से पार्टी के विधायक रामवीर उपाध्याय दो साल पहले पार्टी से निलंबित कर दिए गए. पहले बसपा विधायक रहे उनके छोटे भाई मुकुल उपाध्याय भाजपा में शामिल हुए फिर उनका बेटा और फिर पत्नी सीमा उपाध्याय भी. रामवीर अब गले में जय श्री राम लिखा दुपट्टा डाले घूम रहे हैं.

इसी तरह बसपा के स्थापना काल से पार्टी का सांगठनिक ढांचा तैयार करने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य, आर.के. चौधरी, वीर सिंह, जुगल किशोर, बाबू सिंह कुशवाहा, दारा सिंह चौहान, दद्दू प्रसाद जैसे दिग्गज नेता बसपा छोड़ गए या पार्टी से निकाल दिए गए. अब सब बसपा को मटियामेट करने में लगे हैं. इटावा में कांशीराम के चुनाव प्रतिनिधि रहे बसपा के संस्थापक सदस्यों में एक डॉ. बाबू रामाधीन कहते हैं, ''ये डूबता जहाज है.

बसपा का पतन उसी दिन से शुरू हो गया था जब धन्नासेठों को टिकट मिलने लगा था.’’ तो 2007 में मायावती ने पूर्ण बहुमत की सरकार कैसे बना ली थी? जवाब में डॉ. रामाधीन कहते हैं, ''ये जीत 2006 में मान्यवर कांशीराम के निधन की सहानुभूति की लहर का नतीजा थी.’’ बसपा के संस्थापक लीडर के रूप में पहचान रखने वाले पूर्व कैबिनेट मंत्री दद्दू प्रसाद 2015 में बसपा से निकाले गए.

2017 के चुनाव में पूरे बुंदेलखंड से बसपा का सफाया हो गया. बसपा की ताकत केवल जाटव वोट नहीं हैं. उसमें बहुजन समाज का अति पिछड़ा वर्ग भी शामिल था (कांशीराम जिसे को-सफरर कहते थे), जिसकी मदद से बुंदेलखंड की सारी सीटें भाजपा के खाते में चली गईं. नाराज दद्दू प्रसाद कहते हैं, ''सच तो ये है कि मायावती ने कांशीराम की स्क्रिप्ट भाजपा को बेच दी है. ताकि उन्हें और उनके भाई-भतीजे को जेल न जाना पड़े.’’

कांग्रेस में चले गए नसीमुद्दीन ने इंडिया टुडे से कहा कि, ''अंत में आप पाएंगे पार्टी में सिर्फ मिश्र बचेंगे, आरएसएस का मैनेजमेंट गजब का है. उसने उन्हें बेहद सुनियोजित एजेंडे के तहत बसपा में भेजा है.’’ 

लेकिन दलित चिंतक इसे दगे हुए कारतूसों की खीझ बताते हैं. प्रो. विवेक कुमार कहते हैं, ''सड़े हुए अंडों से आमलेट नहीं बनाया जाता. अशोक सिद्धार्थ, रामजी गौतम, मुनकाद अली, भीम राजभर, ओजस्वी वक्ता धर्मवीर अशोक जैसे बसपा में कई नेता अभी भी हैं लेकिन उन्हें कोई नेता न माने तो कोई क्या किया जाए.’’ 

2007 में 206 विधायकों वाली पार्टी 2017 में 19 सीटों में सिमट कर रह गई. 37 साल की राजनीति में बसपा का इतना खराब प्रदर्शन पहली बार हुआ. इतने खराब नतीजों ने मायावती को दो साल बाद अपनी जानी दुश्मन पार्टी सपा से लोकसभा चुनाव में हाथ मिलाने को मजबूर किया. लेकिन हालात और बदतर हो गए.

न अकेले दम पर बात बन रही है न किसी से गठबंधन करके. 2022 का चुनाव बसपा के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है. लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान कहते हैं कि इस चुनाव में बसपा ने अगर कोई चमत्कार नहीं किया तो मायावती के पास राजनीतिक वानप्रस्थ की तरफ जाने के सिवा कोई और विकल्प नहीं बचेगा.

'तीसरा पक्ष अभी जिंदा है’
बद्रीनारायण, (दलित चिंतक)

ये जो नैरेटिव बनाया जा रहा है कि 2022 का चुनाव का मुकाबला केवल दो दलों के बीच सिमट गया है, ऐसा है नहीं. अभी तो मायावती ने कैंपेन शुरू ही नहीं किया है. जब वे निकलेंगी तो दलित मतदाताओं में उत्साह आएगा तो वे विजिबल होंगे. दूसरे समुदाय भी उनसे जुड़ेंगे.

सोशल मोबिलाइजेशन भी मायावती के निकलने के बाद शुरू होगा. दूसरी बात बसपा जैसी पार्टी में नेताओं के पार्टी छोड़ने या निकाले जाने से कोई असर नहीं पड़ता है. ये काडर बेस्ड पार्टी है. ये किसी को खड़ा कर देंगे वो नेता हो जाएगा. जो लीडर निकले हैं वो किसी भी दल में गए हों, वे खत्म हो गए हैं.

बसपा एक अलग तरह की पार्टी है, जिसका मूल्यांकन अन्य राजनीतिक दलों की तर्ज पर नहीं किया जा सकता. लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि बसपा का जनाधार घटा है. बहुजन समाज में भी जाटवों, कोरियों, धोबियों आदि का एक नया मिडिल क्लास पैदा हुआ है जिसकी अलग राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं.

रिजर्व सीट-सत्ता का गलियारा

दरअसल उत्तर प्रदेश में सत्ता का गलियारा दलित बहुल रिजर्व सीटों से होकर गुजरता है. इन रिजर्व सीटों पर बसपा का सर्वाधिक बेहतर स्कोर 2007 के चुनाव में रहा था जब रिकार्ड 62 सीटें मायावती की झोली में आकर गिरी थीं और उनके लिए राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का रास्ता बना था.

लेकिन पिछले दस साल में सब कुछ बदल गया. 2017 के विधानसभा चुनाव में 86 में से रिकार्ड 74 सीटें भाजपा की तकदीर से नत्थी हो गईं. इन 74 में से चार सीटें (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी 3 और 1 अपना दल (सोनेलाल) ) जैसे सहयोगी दलों ने जीती थीं. इस तरह 2017 के चुनाव में रिजर्व सीटों पर भगवा पार्टी का यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था.

और इस प्रदर्शन ने उसे न केवल पूर्ण बहुमत दिलाया बल्कि उसे राज सिंहासन तक पहुंचा दिया जहां आज योगी बैठे हैं. हैरत की बात ये थी कि पांच साल पहले 2012 के चुनाव में भाजपा ने केवल तीन रिजर्व सीटें जीती थीं. सपा के हिस्से यहां से 58 सीटें आईं और अखिलेश ने अपनी पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली थी.

और एक दिन ऐसा आया जब इन्हीं रिजर्व सीटों ने बसपा को अचानक अर्श से फर्श पर पहुंचा दिया. 2017 के पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा के हिस्से केवल दो रिजर्व सीटों आईं. तो यूपी की रिजर्व सीटें बसपा के लिए कितनी बड़ी चुनौती हैं इसे बखूबी समझा जा सकता है.

''अंत में आप पाएंगे पार्टी में सिर्फ मिश्र बचेंगे,आरएसएस का मैनेजमेंट गजब का है. उसने उन्हें बेहद सुनियोजित एजेंडे के तहत बसपा में भेजा है.’’
नसीमुद्दीन सिद्दीकी, (पूर्व कैबिनेट मंत्री, बसपा)

''सच तो ये है कि मायावती ने कांशीराम की स्क्रिप्ट भाजपा को बेच दी है. ताकि उन्हें और उनके भाई-भतीजे को जेल न जाना पड़े.’’
दद्दू प्रसाद, (पूर्व बसपा नेता).

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