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डाइटिंग: नाप-तौल कर एक एक कौर

भारत में डाइटिंग का नया जुनून छाया हुआ है. इसने हेल्थ ऐप, दुनिया भर की आहार योजनाओं के साथ पागलपन भरी सनक की पूरी भूलभुलैया को जन्म दिया, जो फायदा कम, नुक्सान ज्यादा पहुंचा रहीं.

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हितेश कुकरेजा
हितेश कुकरेजा

सोनाली आचार्जी

बंगलूरू की 32 वर्षीया एमबीए छात्रा नव्या अग्रवाल को इंटरनेट पर देखकर अपनाई गई एक डाइट प्रणाली के उलटी पड़ जाने से पढ़ाई छोड़कर साल भर घर बैठना पड़ा. चार महीने तक उन्होंने सिर्फ सब्जियां और अंडे खाए. वे दरअसल ग्लूटेन पूरी तरह से बंद करना चाहती थीं. गलती से नव्या इसे कार्बोहाइड्रेट का ही एक रूप समझ बैठीं और चावल भी खाना बंद कर दिया जो कि कुदरतन ग्लूटेन-फ्री है. नव्या बताती हैं, ''एक दिन तो मैं चक्कर खाकर गिर गई. मुझे थकान और भयंकर तनाव हो गया. साल भर तक मैं पढ़ाई नहीं कर पाई.’’

सेहत सुधारने के लिए पूरे एक साल तक एक डॉक्टर ने उनके खानपान पर गहरी नजर रखी. दूसरी ओर दिल्ली के 48 वर्षीय हितेश कुकरेजा अभी तक 20 अलग-अलग तरह के डाइट प्लान आजमा चुके हैं. अभी के प्लान में उन्हें नाश्ते में तीन में से बस एक चीज लेने की इजाजत है: पोहा, उपमा या इडली और साथ में खूब सारी सब्जियां.

दोपहर के खाने में वे कम नमक और तेल में बनी लौकी, और रात के खाने में बिना नमक का कद्दू का सूप ले सकते हैं. रोज यही मीनू होता है. 2020 में उन्होंने 30 किलो वजन घटाया और 136 किलो से 105 पर आ गए. वे कहते हैं, ''मुझे समझ आ गया है कि कोई एक डाइट प्लान मेरे लिए कारगर नहीं होगा. मैं बोर हो जाता हूं, मुझे वैराइटी चाहिए.’’

भारत में अग्रवाल और कुकरेजा सरीखे लोगों की तादाद बढ़ रही है, जिन्होंने बीते कुछ सालों में तंदुरुस्ती की अपनी खुराक में जबरदस्त बदलाव किए हैं. लंदन की मार्केट रिसर्च कंपनी यूरोमॉनीटर इंटरनेशनल के 2022 के एक अध्ययन से पता चला कि सर्वे में शामिल 1,000 शहरी भारतीयों में से 70 फीसद से ज्यादा ने कोविड-19 के बाद खानपान में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाई.

वजन कम करने और सेहत की साज-संभाल पर इतना ज्यादा ध्यान है कि निवेश बैंकिंग सर्विस फर्म एवेंडस कैपिटल की 2022 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हेल्थ फूड बाजार बन सकता है. इतना ही नहीं, विश्व औसत से तीन गुना ज्यादा तेजी से बढ़ते हुए 2026 तक इसके 30 अरब डॉलर के नेट वर्थ पर पहुंचने की उम्मीद है. मार्केट रिसर्च फर्म आइएमएआरसी का अनुमान है कि 2022-2027 के दौरान वजन की सार-संभाल के इस बाजार की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर 11.03 फीसद हो सकती है.

जानी-मानी क्लिनिकल न्यूट्रिशनिस्ट और लेखिका इशी खोसला इसे ''सर्कस ऑफ डाइट्स’’ करार देती हैं. ''1970 के दशक से ही डाइट की किस्में बढ़ी हैं, पर अब रफ्तार तेज हो गई है. इंडस्ट्री हर कुछ महीनों में एक नई डाइट, नई खुराक योजना, नया न्यूट्रीशन मंत्र उतार देती है क्योंकि लोग जीवनशैली की वजह से बढ़ती बीमारियों का जवाब तलाश रहे होते हैं.’’ राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 (2019-21) में हर चार में से एक भारतीय का वजन बढ़ा हुआ आया था जबकि 2015-16 में यह पांच में से एक था.

160 देशों और इलाकों के 240 से ज्यादा राष्ट्रीय डायबिटीज एसोसिएशनों के अगुआ संगठन इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की एक रिपोर्ट डायबिटीज एटलस के दसवें संस्करण में अनुमान लगाया गया है कि भारत में 7.4 करोड़ से ज्यादा वयस्कों (12 में से एक) को डायबिटीज है. पोलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (जो मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर के सर्वे के मुताबिक पांच में एक भारतीय महिला को है).

और हाइपोथायरॉइडिज्म (जो इंडियन थायरॉइड सोसायटी के अनुसार 10 में से एक भारतीय को है) के बढ़ते मामलों की ढेरों रिपोर्ट हैं और यह सब खराब पोषण तथा खान-पान के खिलाफ चेतावनी हैं. जाने-माने एंड्रोक्राइनोलॉजिस्ट और फोर्टिस में डायबिटीज तथा मेटाबॉलिक रोगों के सी-डीओसी सेंटर ऑफ एक्सेलेंस के चेयरमैन डॉ अनूप मिश्र कहते हैं, ''इस बात को लेकर जागरूकता बढ़ रही है कि जीवनशैली से जुड़ी कई बीमारियां खराब खान-पान का नतीजा हैं.’’ 

वैसे, भारत में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का बढ़ता बोझ सेहत से जुड़ी हमारी रोजमर्रा की आदतों को देखते हुए कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता है: खाने में कैलोरी तो खूब होती है लेकिन पोषक तत्वों और फाइबर का उसमें खासा अभाव होता है. ऊंची आय वाला औसत भारतीय यूं ही बहुत ज्यादा खा रहा है. 2020 में भारतीय आहार पर किए गए विशेषज्ञों के एक अध्ययन में सामने आया कि देश के सबसे अमीर परिवार दिन में 3,000 से भी ज्यादा कैलोरी ग्रहण कर रहे हैं—औसत आदर्श से 30 फीसदी ज्यादा. दिलचस्प यह कि आय समूहों के लिहाज से भारतीय भोजन रोज के औसत कैलोरी सेवन से बेहद असंतुलित पाया गया.

अध्ययन से पता चला कि ज्यादातर भारतीय कार्बोहाइड्रेट तो खूब लेते हैं लेकिन पर्याप्त प्रोटीन, फल और सब्जियां नहीं खाते. खोसला कहती हैं, ''यह किसी व्यक्ति की गलती नहीं कि खाना अब खाना नहीं रहा. हमारी खाने और खेती की प्रथाएं इतनी ज्यादा बदल गई हैं कि आज हम जो खाते हैं, वह हमारे पूर्वजों के खान-पान के कहीं से भी पास नहीं है.’’ ज्यादातर भारतीय—न्यूट्रीशन टेक ब्रांड हैबिट हेल्थ के 2020 में भारत के महानगरों में 2,428 वयस्कों पर कराए गए सर्वे के अनुसार 10 में 7—व्यायाम के बजाय नई डाइट अपना लेना  पसंद करते हैं.

इंटरनेट: दोधारी तलवार?
असंतुलित आहार के प्रति रुझान की वजह से जैसे-जैसे जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का जोखिम बढ़ता जाता है, ज्यादा से ज्यादा भारतीय उन ऑनलाइन ऐप और स्वास्थ्य सेवाओं के सामने डंडवत करने लगते हैं जो 24 घंटे निगरानी, हरेक की जरूरत के हिसाब से पौष्टिक खुराक, और खान-पान की आदतें सुधारने की प्रेरणा देने तक की पेशकश करती हैं. मगर ऐसी स्वास्थ्य सेवाओं की भरमार और इंटरनेट का ज्ञान खुद अपनी परेशानियां पैदा करने लगा है. बेंगलूरू के फोर्टिस अस्पताल में चीफ डायटीशियन शालिनी अरविंद कहती हैं, ''हम लोगों से कहते हैं कि गूगल ज्ञान को किनारे ही रखो. हमें ऐसे मरीज मिलते हैं जो इंटरनेट पर मिले ज्ञान के हिसाब से डाइटिंग करते हैं और खुद को भूखा मार लेते हैं. इससे सेहत के दूसरे मसले पैदा होने लगते हैं.’’

शक्ल-सूरत के थोड़ी भी बेडौल होने से इमेज खराब होने की खब्त को इंटरनेट ने बदतर बना दिया है. मुंबई में माहिम स्थित एसएल रहेजा अस्पताल में डाइटेटिक्स विभाग की प्रमुख राजेश्वरी वी. शेट्टी के मुताबिक, सोशल मीडिया उन्हंै भी सीमित कैलोरी का खान-पान अपनाने की तरफ धकेल देता है जिन्हें वजन कम करने की जरूरत नहीं. वे कहती हैं, ''कई लोग महज डाइटिंग की खातिर कम खाना चाहते हैं.

इसके पीछे न कोई लक्ष्य होता है, न तर्क, न पोषण का कोई पहलू, सिवा इसके कि डाइटिंग पर होने से अच्छा महसूस होता है और शायद कुछ वजन कम होता हो.’’ मार्केट रिसर्च फर्म मिन्टेल के 2021 में छपे एक अध्ययन से पता चला कि जिन 3,000 भारतीयों पर यह किया गया था, उनमें से 48 फीसद नेट पर 'प्राप्त स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान के उपभोक्ता’ थे.

खोसला के मुताबिक, ''सूचनाएं इतनी विरोधाभासी हैं कि उनमें सही-गलत का फर्क करने के लिए आपको विशेषज्ञ की जरूरत पड़ेगी.’’ सब ऐसा नहीं करते, और ज्यादा से ज्यादा होने यह लगा है कि खाने के पैटर्न गूगल और सोशल मीडिया तय करते हैं. लेकिन क्या ऑनलाइन अप्लीकेशंस किसी विशेषज्ञ का रोल अदा कर सकती हैं? ऑनलाइन ऐप पर जरूरत के हिसाब से तैयार स्वास्थ्य सेवाओं का रुख करने वालों के लिए भी—जिनकी तादाद बढ़ रही है.

यह चुनौतीपूर्ण हो सकता है. उपभोक्ताओं से राब्ता कायम करने वाले एक प्लेटफॉर्म मोइंगेज के मुताबिक दुनिया भर में 2020 की पहली और दूसरी तिमाहियों के बीच हेल्थ और फिटनेस ऐप 46 फीसद ज्यादा डाउनलोड किए गए; भारत में यह बढ़ोतरी सबसे ज्यादा थी—156 फीसद. यानी 5.8 लाख नए यूजर बने. महामारी के दौरान अग्रणी भारतीय हेल्थ ऐप हेल्दिफाइमी के यूजर 50 लाख बढ़े.

कुछ अन्य सेवाओं के इस्तेमाल में भी खासी बढ़ोतरी हुई. मसलन, ईटफिट के पांचेक लाख भारतीय यूजर हैं और यहां लोग रोज संतुलित खाना खरीद सकते हैं. डाइट प्लान देने के बजाय यह कटोरा भर चावल, मसूर की दाल और सब्जियों सरीखे डाइटिंग के अनुकूल खानों की पेशकश करता है. यह उन कामकाजी भारतीयों के लिए आदर्श है जिन्हें काम में मसरूफियत की वजह से खाना पकाने का वक्त नहीं मिलता.

ब्रांड ईटफिट के घराने क्योरफूड्स के संस्थापक और सीईओ अंकित नागोरी कहते हैं, ''हमारे एवरीडे मील/थाली सेग्मेंट के 2,50,000 यूजर हैं और हमारा कुल रिटेंशन रेट 30 फीसद है.’’ एक और हेल्थ ऐप लिवोफी (जिसे पहले कीटो इंडिया कहा जाता था) ने अपना पूरा ध्यान कीटोआहार से हटाकर हर व्यक्ति के हिसाब से वजन घटाने और रोग प्रबंधन सेवाओं पर केंद्रित किया. ईटफिट के उलट लिवोफी के पास पोषण विशेषज्ञों की टीम है जो यूजर की जरूरतों के हिसाब से आहार डाइट प्लान करती है.

वे खासकर वजन कम करने, डायबिटीज, थायरॉइड और पीसीओएस मरीजों पर ध्यान देते हैं. लिवोफी के संस्थापक साहिल प्रुथी कहते हैं, ''हमारे पोषण विशेषज्ञ बेहतर आदतें विकसित करना जानते हैं. इसलिए हम लोगों को महज डाइट प्लान नहीं देते बल्कि उसे आदत में बदलने का हौसला भी देते हैं.’’ पिछले साल प्रुथी बिजनेस रियलिटी शो शार्क टैंक इंडिया पर आए थे, जहां उनके ऐप को 1.6 करोड़ रु. का ऑफर मिला.

यूजर को अलबत्ता बेशुमार ऑनलाइन सेवाओं पर आंख मूंदकर यकीन नहीं कर लेना चाहिए क्योंकि सेहत अपने आप में बाजार बन गई है. राष्ट्रीय पोषण संस्थान के 2019 में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला कि वजन घटाने और कैलोरी गिनने वाले 20 में से 13 ऐप भारतीय सिफारिशों से मेल नहीं खाते. इन 20 में से हरेक ऐप ने अलग-अलग सुझाव दिए. बदतर यह कि फल और सब्जियां खाने, सैचुरेटेड फैटी एसिड्स को कम करने और रेशों से भरपूर फल खाने सरीखी सेहतमंद प्रथाओं को 20 में से केवल आठ ऐप ने बढ़ावा दिया.

सीधे-सादे फ्रेम में देखें
सूचनाओं के इस शगल में फंसने की बजाय यह याद रखना जरूरी है कि वजन कम करने के पीछे एक सीधा-सा विज्ञान है (देखें: डाइट करने पर क्या होता है). वसा कोशिकाएं ऊर्जा जमा करती हैं. कोई जरूरत से ज्यादा कैलोरी का सेवन करता है, तो शरीर वसा कोशिकाओं की संख्या और आकार बढ़ाकर ऊर्जा जमा करता है. जिस दौरान खाना कम खाया जा सकता है, जीववैज्ञानिक उपाय के तौर पर शरीर तय करता है कि वह मांसपेशियों, लीवर और अन्य अंगों पर वसा कोशिकाएं किस हद तक जमा करे.

जब आप कम कैलोरी लेना शुरू करते हैं, तो शरीर के लिए जरूरी ऊर्जा आपके वसा भंडार से ली जाती है. यह सिग्नल और हारमोनों के एक नेटवर्क के जरिए होता है, जिनमें मुख्य भूमिका इंसूलिन की होती है, जो ऊर्जा या भंडारण के लिए भोजन से ग्लूकोज लेकर आपकी कोशिकाओं को भेजता है. यह हर बार आपके खाना खाने पर निकलता होता है. जब आप कम खाते हैं, ग्लूकोज से रहित खाना खाते हैं, या बिल्कुल नहीं खाते, तब शरीर में ग्लूकोज अपने आप कम हो जाता है.

यह कमी मस्तिष्क को बताती है कि शरीर की ऊर्जा की जरूरतों को पहले से जमा वसा से पूरा करना पड़ेगा. फिर आपकी वसा कोशिकाएं फैटी एसिड्स के अणु छोड़ती हैं जो ऊर्जा में विखंडित हो जाते हैं. इस तरह डाइटिंग का मतलब सिर्फ यही नहीं है कि आपका शरीर जमा वसा को जलाने लगता है, इसका मतलब यह भी है कि वह समय के साथ ऊर्जा को पहले जमा करने के बजाय उसे भोजन से सीधे अंगों को भेजने लगता है.

इन सिद्धांतों के आधार पर ज्यादातर हेल्थ मैनेजमेंट सेवाएं सात कार्यक्रमों पर जोर देती हैं—कीटो या उच्च-वसा आहार, बीच-बीच में उपवास, अतिरिक्त चीनी रहित आहार, पत्तेदार आहार, उच्च-प्रोटीन उच्च-फाइबर आहार, आयुर्वेदिक दोष आहार और कम-कार्बोहाइड्रेट-कम-वसा आहार (देखें लोकप्रिय आहारों का विज्ञान). रेशों से भरपूर आहार दो अन्य हारमोन पैदा करते हैं, जो कैलोरी का सेवन कम करने में मददगार होते हैं:

लेप्टिन और ग्लूकागोन सरीखा पेप्टाइड-1. ये भूख को नियंत्रित करने वाले आपके मस्तिष्क के हिस्से को बताते हैं कि आपका पेट भर गया है. यही कारण है कि 'डुकन डाइट’ सरीखे कम कार्बोहाइट्रेट वाले सख्त आहार भी आपकी भोजन योजना में स्वस्थ फाइबर की कुछ मात्रा शामिल करने का सुझाव देते हैं. शेट्टी कहती हैं, ''वजन कम करने का विज्ञान सीधा-सादा है—कम कैलोरी खाएं या आप जितनी कैलोरी खाते हैं उससे ज्यादा मेहनत-मशक्कत करके घटा लें.’’

हालांकि एक आहार है जो चीजों को अलग ढंग से अंजाम देता है और वह है कीटोजेनिक आहार. इसे 1920 के दशक में मिर्गी के मरीजों के इलाज के लिए बनाया गया था. अंतत: 1990 के दशक के आसपास इसका इस्तेमाल मोटापे और डायबिटीज के खिलाफ मेटोबॉलिक या चयापचयी सुरक्षा देने के लिए किया जाने लगा.

यह आहार शरीर को ऊर्जा के लिए ग्लूकोज के बजाय वसा जलाने को मजबूर करता है. कीटोसिस के नाम से जानी जाने वाली यह अवस्था तब प्राप्त होती है जब आप कार्बोहाइड्रेट या प्रोटीन के मुकाबले तीन से चार गुना ज्यादा वसा की खपत करते हैं. तभी से इसकी लोकप्रियता बढ़ते-बढ़ते आज कीटो डाइट की इतनी मांग है कि कम कार्बोहाइड्रेट और तमाम किस्म के कीटो-अनुकूल डिब्बाबंद खानों के ब्रांड लो! फूड्स को एंजेल इन्वेस्टर्स ने 2019 में 5,00,000 डॉलर की पेशकश की. 2021 में भी इसने और 10 लाख डॉलर उगाहे.

कीटो की कोच और फॉलोवर 46 वर्षीया प्रिया डोगरा कहती हैं कि इस डाइट ने उन्हें एक साल में करीब 40 किलो—100 से 64 तक—घटाने में मदद की. मगर कीटो आहार वजन कम करने की जादुई तरकीब नहीं है. इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में सितंबर 2018 में छपे एक अध्ययन से पता चला कि कीटो आहार की वजह से छोटे वक्त में तो वजन कम करने में नाटकीय सुधार आया, पर लंबे वक्त इससे बीमारी और मौतें बढ़ सकती हैं.

इसे बरकरार रख पाना मुश्किल है. यही नहीं, डाइटिंग बंद करने के बाद ज्यादातर लोग फिर वजन बढ़ने के उसी चक्र में पड़ गए. कब्ज और पोषण की कमियों से जुड़ी परेशानियां भी थीं. मुंबई में मुलुंड स्थित फोर्टिस अस्पताल की सीनियर न्यूट्रीशन थिरैपिस्ट मीनल शाह कहती हैं, ''जरूरत इस बात की है कि कीटो का पालन देख-रेख में करें और लंबे वक्त तक न करें. यूजर को दूसरी सेहतमंद आदतें सीखने की भी जरूरत है ताकि डाइटिंग खत्म होने पर फिर वजन बढ़ने न लगे. अस्वस्थ खान-पान की आदतों वाले लोगों को महज मीनू नहीं बल्कि मानसिकता बदलने की जरूरत है.’’

अपने भोजन को समझें
अब जबकि हिंदुस्तानी अपनी खाने की आदतों पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं, उनके लिए यह समझना जरूरी है कि खाना और खासकर संयमित खाना आखिर काम कैसे करता है. विशेषज्ञों का कहना है कि कार्बोहाइड्रेट नहीं या कम खाने पर शरीर का मुख्य ईंधन वजन कम करने में भले मदद करे लेकिन यह आपके दिमाग और शरीर को निचोड़कर रख देता है. इसी तरह एक किस्म की खाने की चीजों पर टिके रहने और दूसरी तमाम चीजों को तिलांजलि दे देने से पोषण की कमियां पैदा हो सकती हैं. शेट्टी कहती हैं, ''आपको खुशी मिलती है तो कभी-कभार आइसक्रीम खाने में कोई हर्ज नहीं.’’ खाना जितनी जैविक जरूरत है उतनी ही भावनात्मक भी.

कइयों के लिए इन अवधारणाओं पर अब भी अज्ञान का परदा पड़ा है. इसके बजाय उनकी खान-पान की आदतें इंटरनेट से प्रभावित होती हैं, जहां वजन कम करने की सफलता की कहानियां हर कोई देख सकता है, पर बिना देख-रेख के लिए गए आहार के अंधेरे पहलू नहीं देख सकता. कई मिसालें हैं जिसमें लोग लंबे अरसे तक भूखे रहते हैं. डॉ. अरविंद कहती हैं, ''एक शख्स एक दिन तला खाना खाता है और फिर अगले दो दिन कुछ नहीं खाता.

इससे हाजमें की कई दिक्कतें शुरू हो जाती हैं. अंतड़ियों पर उभार बिगड़ने लगते हैं जिससे वहां के बैक्टीरिया और एसिडिटी को नुक्सान पहुंचता है.’’ फिर ऐसे लोग हैं जो लंबे वक्त तक उपवास करते या भूखे रहते हैं. वे कहती हैं, ''व्यक्ति एक दिन तला हुआ खाना खाता है और अगले दो दिन कुछ नहीं खाता. इससे पाचन के इतने सारे मसले पैदा हो जाते हैं, आंत के अस्तर का क्षरण होता है, आंत के बैक्टीरिया को नुक्सान पहुंचता है, एसिडिटी होती है.’’

कई लोगों ने सेहत के अपने तरीके निकाल लिए हैं. पुणे की 22 वर्षीया डिजाइन इंटर्न अश्वती बोस ने दो महीने में ही वजन 98 से 90 किलो कर लिया. वे तीन हेल्थ ऐप का इस्तेमाल करती हैं: एक मील प्लान के लिए, दूसरा कैलरी नापने को और तीसरा हौसला बढ़ाने को. ''मुझे कह दिया गया था कि अगर मैंने खाने की आदतें नहीं बदलीं तो बांझ हो जाऊंगी.’’ वे बर्गर, चिप्स, पिज्जा, और बिरयानी के पसंदीदा खाने से पत्तागोभी सूप, चावल का दलिया, उबले अंडे और तेल-मुक्त सलाद पर आ गईं. बोस को नहीं पता कि इससे उनकी हारमोन की सेहत सुधरेगी या नहीं पर वे डाइटिंग करना चाहती हैं क्योंकि ''सब कहते हैं कि इससे मदद मिलेगी.’’

राष्ट्रीय पोषण संस्थान हर साल नागरिकों के लिए दिशानिर्देश निकालता है. ज्यादा विशेषज्ञ उसकी सिफारिशों से सहमत हैं—संतुलित मौसमी आहार लें, ज्यादा प्रॉसेस्ड फूड न खाएं, चीनी और नमक को लेकर समझदारी से काम लें, थोड़े-थोड़े अंतराल से हल्की मात्रा में खाएं और रोज व्यायाम करें. शेट्टी कहती हैं, ''सबसे अच्छा डाइट प्लान वह है जो व्यावहारिक और टिकाऊ हो.’’ खोसला कहती हैं, ''भारतीयों को फिर से सिखाने की जरूरत है कि कैसे खाएं. हर आंत खास और अलग है. कोई एक नाप सब पर फिट नहीं बैठती.’’

स्वस्थ आहारों की भूलभुलैया और लगातार बढ़ते बाजार के शोर में बुनियादी बातें शायद दिख ही न पाएं. दूसरी ओर स्वघोषित डाइट प्लान और 'शॉर्टकट’ फायदे से ज्यादा नुक्सान पहुंचा सकते हैं. शेट्टी कहती ही हैं, कॉलीफ्लावर क्रस्ट पिज्जा की क्या जरूरत है! भोजन और मानव शरीर के साथ उसके खास रिश्ते की ज्यादा स्पष्ट और सूझ-बूझ भरी समझ बेहद जरूरी है. 

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''आहार का मिला-जुला संयोजन लंबे समय में मेरे लिए सबसे ज्यादा कारगर रहा है. वक्त भी कम है, इसलिए मुझे न्यूट्रीशनिस्ट के बगैर अपने आप आहार तय करना ज्यादा आसान लगता है. मैं 2020 में 136 किग्रा से 105 किग्रा पर आ गया, बस इतना नियंत्रण रखकर कि कितना और क्या खाना है.’’
हितेश कुकरेजा, 48 वर्ष
 (दिल्ली), फैशन कारोबारी

''मेरा वजन कीटो पर अमल से साल भर में 100 किलो से घटकर 64 किलो हो गया. पहले कुछ महीनों के बाद आपमें उसे जारी रखने का जज्बा पैदा होता है. उससे पहले यह थोड़ा कठिन है लेकिन कीटो आहार पर टिके रहना चाहिए, वरना यह कारगर नहीं होता.’’
प्रिया डोगरा, 46 वर्ष
शिमला,  संस्थापक, कीटो फॉर इंडिया डॉट कॉम

''मैंने 2020 में छह महीने में 25 किलो घटाया. किसी डाइटिशियन के यहां नहीं गया या कोई डाइट नहीं ली. बस अतिरिन्न्त शक्कर, चावल, कॉर्बोनेटेड पेय लेना बंद किया और खाने को नियंत्रित किया. मैंने पाया कि सारा मामला संतुलन का है. मेरे खाने का ढंग बदल गया.’’
अतुल महाराज, 31 वर्ष, हैदराबाद,  इंजीनियर तथा ब्लॉगर

''मुझे कोविड हुआ तो मैंने रक्त-शर्करा को नियंत्रित करने के लिए अपने भोजन का तरीका बदला. मेरे लिए आसानी यह रही कि मेरे डाइटिशियन ने ज्यादा कुछ फेरबदल नहीं बताया. मैं सामान्य भारतीय भोजन ही करता हूं, कुछ अलग किस्म का नहीं या पकाने में कठिन वाला नहीं. स्वस्थ फैट, कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन ही लेने पर फोकस है. यह काम कर रहा है क्योंकि इसका सेवन आसान है और ऐसा नहीं लगता कि कुछ छूट रहा है.’’
कल्याण कर्माकर, 52 वर्ष, मुंबई,  भोजन ब्लॉगर तथा लेखक

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लोकप्रिय आहारों का विज्ञान

कीटो आहार 
1920 के दशक में मिर्गी के मरीजों के इलाज के लिए बनाया गया यह आहार ईंधन के प्राथमिक स्रोत के लिए वसा के सेवन पर भरोसा करता है. वसा के तीन से चार हिस्सों के साथ कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन के मिला-जुले एक हिस्से से ज्यादा नहीं लेना चाहिए.

शरीर कीटोसिस की अवस्था में चला जाता है, जिसके जरिए वह ऊर्जा के प्राथमिक स्रोत के रूप में वसा को जलाने लगता है, कार्बोहाइड्रेट को नहीं.

इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च के 2018 के एक अध्ययन से पता चला कि छोटे वक्त में वजन कम होने में नाटकीय सुधार आया, लेकिन यदि लंबे वक्त तक पालन किया जाए तो वजन फिर से बढ़ने और पोषण से जुड़ी कमियों की काफी संभावना होती है.

पौध-आधारित आहार 
पौध-आधारित आहार में सभी पशु उत्पादों को तिलांजलि दे दी जाती है और सब्जियां, फल, मेवे, बीज और संपूर्ण अनाज लिए जाते हैं. इसमें स्वस्थ वसा और बिना अतिरिक्त शर्करा वाले उत्पाद ले सकते हैं. 

अध्ययनों से पता चलता है कि फाइबर से भरपूर भोजन से आंतों के बैक्टीरिया और पाचन में सुधार आता है. इससे खाने की ललक कम होती है और कुशलता बढ़ती है.

2022 में यूरोपीय कांग्रेस में प्रस्तुत मोटापे से संबंधित एक अध्ययन से पता चला कि 12 हफ्तों के लिए शुरू इस आहार से अधिक वजन वाले लोगों की रक्त शर्करा में कमी आई. वजन घटने के नतीजे भी सामने आए.

उच्च-प्रोटीन, उच्च-फाइबर और  कम-कार्बोहाइड्रेट आहार 
इसमें पशु मांस, मछली, अंडों, फलियों और डेयरी उत्पादों से प्रोटीन की अत्यधिक मात्रा शामिल होती है. बहुत कम कार्बोहाइड्रेट खाने की इजाजत होती है. फाइबर से भरपूर और कम शर्करा तथा वसा वाली सब्जियां खाने की इजाजत होती है. डेयरी उत्पादों के वसा को तिलाजंलि देनी होती है.

कार्बोहाइड्रेट कम करने से न केवल कुल कैलोरियों का सेवन कम होता है, बल्कि अध्ययनों से पता चलता है कि 20 से 30 फीसद प्रोटीन कैलोरी पाचन की प्रक्रिया में ही जल जाती है.

प्रोटीन भूख कम करने वाला हार्मोन जीएलपी-1 भी बढ़ाता है और भूख का हार्मोन घरेलिन कम करता है. उच्च-फाइबर वाली सब्जियां भूख को कम करने में मदद करती हैं.

अमेरिकन जर्नल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रीशन लिखता है कि उच्च-प्रोटीन का आहार वजन कम करने में सहायक है. हालांकि इससे यूरिक एसिड बढ़ने की और नियंत्रित न किया जाए तो किडनी की परेशानियां पैदा होने की आशंका होती है.

आयुर्वेदिक आहार 
यह आहार मानकर चलता है कि हर व्यक्ति के शरीर का गठन या 'दोष’ अलग और खास है. व्यक्तिगत दोष पर आधारित भोजन की सिफारिश की जाती है.

यह शरीर को ताप, वायु या पृथ्वी में बांटता है और भोजन इसी के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है. दोष को संतुलित करने के लिए व्यक्ति कुछ निश्चित खाने ही खाता है. मसलन, जिन्हें ताप दोष है, उनके लिए कहा जाता है कि ऊष्मा उत्पन्न करने वाले पदार्थ (मिर्ची, मांस, वसा, लहसुन) कम खाने से शरीर की सेहत बहाल करने में मदद मिलती है.

यह आहार कारगर है या नहीं, इसे साबित करने के लिए बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक अध्य्यन नहीं हुए हैं.


बीच-बीच में उपवास 
बीच-बीच में उपवास करने वाले लोग नियमित कार्यक्रम के अनुसार खाना खाते और उपवास करते हैं. सबसे सामान्य प्रथा यह है कि दिन में 16 घंटे उपवास करें और केवल आठ घंटे खाना खाएं. दूसरी योजना यह है कि सामान्यत: पांच दिन खाना खाएं पर हफ्ते में दो दिन खुद को 500-600 कैलोरी तक सीमित रखें.

कैलोरी सीमित रखने और लंबी समयावधियों तक नहीं खाने से मस्तिष्क को संकेत जाता है कि ऊर्जा के रूप में जमा वसा का इस्तेमाल शुरू करे.

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित 2022 के शोध से पता चला कि बीच-बीच में उपवास से वजन जरूर घटा, पर अनिवार्य तौर पर यह कैलोरी गिनने की तरह था.

अतिरिक्त चीनी रहित आहार 
चीनी-नहीं आहार अतिरिक्त शर्करा के सभी रूपों को रोकता है. इसका अर्थ न केवल मिठाइयों और केक को बल्कि शर्करा वाली दूसरी डिब्बाबंद चीजों को भी तिलांजलि देना है. कुछ कठोर संस्करण फ्रुक्टोज की अत्यधिक मात्रा वाले फल भी हटा देते हैं.

सीधी-सादी चीनी न केवल इंसूलिन का स्तर बढ़ाती है बल्कि ग्रहण की गई कैलोरियों की संख्या भी बढ़ाती है. दूसरी तरफ, जटिल चीनी, जो संपूर्ण अनाजों में पाई जाती है, फाइबर को पचने में ज्यादा वक्त लेने देती है और जिसके कारण रक्तधारा में शर्करा धीरे-धीरे छोड़ी जाती है. इससे खाने की ललक और साथ ही कैलोरी के कुल सेवन में कमी आती है.

बीएमजे में 2013 में प्रकाशित परीक्षण तथा अवलोकन अध्ययनों के विश्लेषण से पता चला कि आहार में अतिरिक्त शर्करा कम करने से—दिन में 10 ग्राम से 71 ग्राम के बीच कितनी भी—शरीर का वजन घटा (जब तक कि उन कैलोरियों की जगह कुछ और न लिया जाए).

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