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सियासी मात खाती कांग्रेस

भाजपा न केवल राज्यों में कांग्रेसी सरकार को ध्वस्त करने में सफल हो रही है बल्कि दूसरी पीढ़ी के कांग्रेसी दिग्गजों को भी अपने खेमे में शामिल कर रही.

अंतिम लक्ष्य सत्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जे. पी. नड्डा अंतिम लक्ष्य सत्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जे. पी. नड्डा

नई नवेली भारतीय जनता पार्टी जब 1984 के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारी थी तब अटल बिहारी वाजपेयी का बयान था, ‘‘हम चुनाव हारे हैं हिम्मत नहीं.’’ यह बयान पार्टी की पहली पीढ़ी के नेताओं का हुआ करता था. 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद पार्टी के दूसरी पीढ़ी के नेताओं ने जिस रणनीति पर अमल शुरू किया है उसका मूल वाक्य है, ''चुनाव से ज्यादा, सियासत जीतना जरूरी है.’’ पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और मौजूदा गृह मंत्री अमित शाह इसका जिक्र पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में यदा-कदा करते रहे हैं और संभवत: 'कांग्रेस मुक्त भारत’ का स्लोगन यहीं से निकला है.

सियासत जीतने की भाजपा की इस ललक को कांग्रेस जब तक समझती, उसके हाथ से न सिर्फ चुनाव में भाजपा से जीते गए राज्य बल्कि कई प्रतिभाशाली युवा नेता फिसल गए और जो शेष बचे हैं वे कभी भी फिसल सकते हैं. राजनैतिक टीकाकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, ''कांग्रेस गंभीर संकट में है, दुर्भाग्य से कांग्रेस प्रधानमंत्री और अमित शाह के 'कांग्रेस मुक्त भारत’ नारे को सिर्फ जुमला समझती रही, और भाजपा अपने इस अभियान में लगातार सफल होती जा रही है.’’

वे कहते हैं, ''जिस खतरे को आज छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भांपते हुए कांग्रेस के 15 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया उस खतरे को यदि कांग्रेस पहले भांप गई होती तो मध्य प्रदेश हाथ से नहीं निकलता और राजस्थान निकलने की कगार पर नहीं पहुंचता.’’

बहरहाल, सचिन पायलट के बागी होने के बाद भी राजस्थान सरकार पर नंबर के हिसाब से कोई खतरा फिलहाल नहीं दिख रहा है. लेकिन बहुमत का आंकड़ा इतना सिकुड़ जरूर गया है कि भाजपा के लिए यहां ‘ऑपरेशन कमल’ (विधायकों को तोडऩा) चलाने के लिए मुफीद माहौल बन गया है. भाजपा यहीं रुकने वाली नहीं है. पार्टी के तेवर से साफ है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस की दूसरी पीढ़ी के बहुत सारे नेताओं के लिए भाजपा ने अपने द्वार खोल रखे हैं.

पार्टी के उपाध्यक्ष ओम माथुर कहते हैं, ''भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है. इसके दरावाजे खुले हैं तभी यह सबसे बड़ी पार्टी बनी है.’’ माथुर परोक्ष रूप से यह दावा करते हैं कि आने वाले दिनों में कांग्रेस के कई लोग भाजपा का रुख कर सकते हैं क्योंकि कांग्रेस में वे घुटन महसूस कर रहे हैं. कांग्रेस के ऐसे कौन से नेता हैं जो भाजपा का रुख कर सकते हैं?

पार्टी के एक महासचिव कहते हैं, ''आप कांग्रेस की दूसरी पीढ़ी के नेताओं के ट्वीट या बयान से समझ सकते हैं कि हरियाणा में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर, दीपेंद्र सिंह हुड्डा, पंजाब में प्रताप बाजवा, विजय इंदर सिंह, सुनील जाखड़, नवजोत सिंह सिद्धू, मध्य प्रदेश में जीतू पटवारी, छत्तीसगढ़ में टी.एस. सिंहदेव, असम में गौरव गोगोई, सुष्मिता देव, कर्नाटक में दिनेश गुंडुराव, उत्तर प्रदेश में जितिन प्रसाद, आंध्र प्रदेश में पल्लम राजू, महाराष्ट्र में अशोक चह्वाण, मिलिंद देवड़ा, प्रिया दत्त जैसे नेताओं की उपेक्षा की जा रही है.’’

क्या भाजपा इन्हें पार्टी में शामिल कराने की कोशिश में हैं? पार्टी महासचिव अरुण सिंह कहते हैं, ''भाजपा कुछ नहीं कर रही. कांग्रेस में जिन नेताओं में दमखम है, वे घुटन महसूस कर रहे हैं. पार्टी में कौन शामिल होगा या कौन नहीं, यह पार्टी तय करेगी लेकिन इतना तय है कि कांग्रेस की वंशवादी राजनीति से कांग्रेस के अंदर ही लोग परेशान हैं.’’

भगवा योजना

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले देश के सियासी मानचित्र से भगवा रंग फीका पडऩे लगा था. कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब जैसे राज्यों में कांग्रेस ने शानदार वापसी की थी. पर चुनावी हार के बावजूद भाजपा इन राज्यों में भगवा रंग भरने को बेताब थी. कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस ने भाजपा को पटखनी देते हुए जेडी(एस) के साथ मिल कर सरकार बना ली थी.

लेकिन भाजपा ने सियासी मैदान नहीं छोड़ा और साल बीतते-बीतते उसने कांग्रेस-जेडी(एस) को सत्ता से बाहर कर दिया. अगला स्ट्राइक मध्य प्रदेश में हुआ. यहां कांग्रेस में खुद को असहज महसूस कर रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया को भाजपा साधने में सफल रही और कमलनाथ सरकार गिर गई. इसके बाद भाजपा ने राजस्थान में गहलोत सरकार से नाराज चल रहे उप-मुख्ययमंत्री सचिन पायलट पर नजर जमा दी. पायलट के बागी रुख के बीच भाजपा, सधे हुए रुख के साथ चल रही है.

पार्टी के मीडिया विभाग के उप-प्रमुख संजय मयूख कहते हैं, ''गहलोत के पास बहुमत है या नहीं, यह तय नहीं है, इतना तो साफ दिख रहा है कि बहुमत के जादुई आंकड़े 101 से एक-दो ज्यादा विधायक ही गहलोत की बैठक में दिखे.’’ क्या भाजपा यहीं रुक जाएगी? पार्टी के एक महासचिव कहते हैं, ''बिल्कुल नहीं. पहले गहलोत को बहुमत तो साबित करने दीजिए.’’ भाजपा नेता दावा कर रहे हैं, ''महाराष्ट्र में गठबंधन में कई पेच है और वहां सरकार कब गिर जाए, पता नहीं. कांग्रेस के अंदर इतनी खामियां हैं कि छत्तीसगढ़ और पंजाब में भी असंतुष्टि चरम पर है. अंतर्विरोधों से घिरी सरकार अल्पायु होती है इसलिए कांग्रेस की सरकार जिन राज्यों में है वह कितने दिन चलेगी यह कहना कठिन है. वह कार्यकाल पूरा कर पाएगी, इसकी संभावना नहीं दिख रही.’’

कांग्रेस की चुनौती

कांग्रेस अजीब पसोपेश में दिख रही है. पार्टी का पूरा फोकस नेतृत्व के संकट को सुलझाने में है और इस चक्कर में एक के बाद एक राज्यों से सरकार उसके हाथ से निकलती जा रही है. सिंधिया और पायलट, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के सबसे करीबी रहे हैं, पर दोनों ने दामन छोड़ दिया है. सोनिया गांधी, कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष हैं. राहुल युवाओं को तरजीह देने की बात करते हैं तो सोनिया का भरोसा पुराने नेताओं में अधिक दिख रहा है.

वहीं, राहुल पार्टी अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं दिख रहे हैं और दूसरी कतार के नेताओं की राष्ट्रीय राजनीति में दखल देखने को नहीं मिल रही है. मनमोहन ङ्क्षसह, पी. चिदंबरम, ए.के. एंटनी, मल्लिकार्जुन खडग़े, कपिल सिब्बल जैसे नेताओं पर ही सारा दारोमदार है. मणिकांत ठाकुर कहते हैं, ''यदि पार्टी का अध्यक्ष गांधी परिवार से इतर के व्यक्ति को देने का फैसला भी होता है तो इन्हीं चार-पांच लोगों में से कोई होगा क्योंकि नए लोगों में सिर्फ सिंधिया या पायलट ही दिख रहे थे जो अब कांग्रेस में नहीं हैं.’’

राजनैतिक मामलों के जानकार एन. अशोकन का आकलन है, ''कांग्रेस अभी और नीचे जा सकती है क्योंकि सहयोगी दल उस पर भरोसा नहीं कर रहे हैं.’’ अशोकन कहते हैं, ''क्षेत्रीय दलों को भी कांग्रेस बोझ जैसी दिखने लगी है. महाराष्ट्र में सरकार यदि बची है और चलेगी तो शरद पवार जैसे नेताओं की हुनर से, न कि कांग्रेस की वजह से.’’ कांग्रेस ने तेलंगाना विधानसभा चुनाव से पहले टीडीपी के साथ गठजोड़ किया था लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ.

तमिलनाडु में भी डीएमके को कांग्रेस से ज्यादा फायदा होता नहीं दिख रहा है, इसलिए पार्टी अगले चुनाव में कांग्रेस के साथ जाएगी या नहीं, कहना मुश्किल है. किसी भी राज्य में कांग्रेस इस स्थिति में नहीं है कि दूसरी पार्टी उससे गठजोड़ को उत्सुक हो. बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में से कहीं वह अभी इतनी दमदार नहीं है कि वहां की क्षेत्रीय पार्टियां उसके बूते चुनावी जीत का समीकरण तैयार कर सके.

वहीं, कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला कहते हैं, ''भाजपा लोकतंत्र की हत्या करने पर तुली है. धनबल और सत्ताबल से वह चुनी हुई सरकार को गिराने पर तुली है.’’ पर कांग्रेस अपना घर क्यों नहीं बचा पा रही? वे इस मुद्दे पर चुप्पी साध जाते हैं. जाहिर है, अभी कांग्रेस के सामने चुनावी हार से ज्यादा सियासी हार को टालने की चुनौती है, जिसमें वह सफल होती नहीं दिख रही.

अब इन कांग्रेसियों पर निगाहें

दीपेंद्र सिंह हुडा हरियाणा

गौरव गोगोई

असम

सुनील जाखड़

पंजाब

सुष्मिता देव

असम

जीतू पटवारी

मध्य प्रदेश

जितिन प्रसाद उत्तर प्रदेश

टी.एस. सिंहदेव

छत्तीसगढ़

मिलिंद देवड़ा

महाराष्ट्र

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