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दिल्ली में फांसी के बाद वादी में मातम

अफजल गुरु की फांसी ने कश्मीरी युवाओं को और अलग-थलग कर दिया है. भारत विरोधी आतंकवादी उनकी नजर में शहीद बन चुका है.

जब 14 वर्षीय गालिब सोपोर के सीर जागीर गांव में अपने दोमंजिला पुश्तैनी मकान के सामने खेल रहा होता है तो वह किसी और लड़कों की तरह ही लगता है. उस गांव के तीन तरफ झेलम नदी खामोशी से बहती है. चिनार के नंगे पेड़ों के इर्दगिर्द बर्फ की चादर अभी हटी नहीं है और बहार का मौसम शुरू होने वाला है.

खाकी जींस, गहरे रंग के नीले जैकेट और ढिनीकर में गालिब खुशी में दौड़ता है और अपने दोस्तों के साथ हंसता है, शोर मचाता है. वह अपने स्कूल वेल्किन हायर सेकंडरी के बारे में बात करके खुश होता है जो वहां से 10 किमी की दूरी पर है, और बताता है कि कैसे वह रोज वहां साइकिल से जाता है. आठवीं क्लास में पढऩे वाले उस लड़के को साइंस पसंद है और वह डॉक्टर बनना चाहता है. लेकिन जैसे ही आप उससे उसके पिता अफजल गुरु के बारे में पूछते हैं, उसकी हंसी काफूर हो जाती है.

नदी के पार कच्ची सड़क पर करीब 100 मीटर की दूरी पर गांव वाले अफजल की मौत के शोक का तीसरा दिन मनाने के लिए इकट्ठा हो रहे हैं जिसे दिल्ली की अत्यंत सुरक्षा वाली तिहाड़ जेल में 9, फरवरी को फांसी दे दी गई और वहीं दफना दिया गया. वहां इंसाफ और आजादी के नारे बुलंद होते ही गालिब उस विरोध में शामिल हो जाता है. अफजल के बड़े भाई और उसके चाचा ऐजाज गुरु उसे अपने कांधे पर बिठा लेते हैं. उस ऊंची जगह से अन्य विरोध प्रदर्शनकारियों में गालिब गुस्सैल बागी बन जाता है. उसका बदलाव अचानक और झकझोर देने वाला है.

अफजल की विधवा तबस्सुम गहरे सदमे में है. वह कमरे के अंदर कंबल ओढ़कर खामोशी से बैठी है, और उसके इर्दगिर्द दूसरी महिलाएं बैठी हैं. अफजल के चचेरे भाई और एक स्थानीय स्कूल में अध्यापक यासीन गुरु कहते हैं कि तबस्सुम मीडिया से बात नहीं करना चाहती है. ‘‘उसका कहना है कि वह अपने शौहर की कब्र देखने के लिए तिहाड़ नहीं जाएगी. यह हालात से समझौता करना है. हम चाहते हैं कि हुकूमत उसकी लाश हमें यहां भेज दे.’’ घर के कमरे में एक दीवार पर बिना धूल वाली एक खाली जगह है. एक रिश्तेदार ने बताया कि कुछ दिन पहले तक वहां अफजल की तस्वीर टंगी थी लेकिन अब परिवार वालों ने उसे उतार लिया है.afzal guru

घर के बाहर एक शामियाने में कुछ रिश्तेदार और गांववाले बैठे हैं. गुरु परिवार को और अधिक शोक मनाने वालों के आने की उम्मीद थी क्योंकि अलगाववादियों ने ‘सोपोर चलो’ का नारा दिया था. लेकिन फांसी वाले दिन से ही कश्मीर में कर्फ्यू लगा हुआ है इसलिए शायद ही कोई शख्स उसके गांव तक पहुंच पाया. वह गांव एक ही रास्ते से बाकी दुनिया से जुड़ा है और उसी रास्ते पर बेहद सुरक्षा वाला सेना का शिविर है.

इंडिया टुडे की टीम कर्फ्यू को गच्चा देते हुए राज मार्ग-1 पर पाटन और पलहालन में पत्थर फेंकने वाले समूहों से बचते-बचाते किसी तरह एक किश्ती में सवार होकर 12 फरवरी को सीर जागीर पहुंची. वहां अफजल की फांसी पर गुस्सा साफ नजर आ रहा था, लेकिन उससे भी ज्यादा लोगों का गुस्सा फांसी के तरीके पर था.

अफजल की भाभी सलीमा ऐजाज का कहना है कि परिवार फांसी को तो मान सकता है लेकिन लाश को न भेजने के ‘‘भारत’’ सरकार के अमानवीय व्यवहार को कबूल करने को तैयार नहीं है. उन्होंने गुस्से से कहा, ‘‘अफजल ने अपनी जिंदगी की राह चुनी. वह यही करना चाहता था. वह माफी नहीं चाहता था. वह हमारे लिए शहीद है. लेकिन हमें उसका लाश चाहिए ताकि हम उसका कफन-दफन कर सकें.’’

दूरी जो कभी कम नहीं होती
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर लोगों को गुस्सा ज्यादा है और यह सिर्फ सीर जागीर तक ही सीमित नहीं है. घाटी के लोगों का मानना है कि केंद्र के खिलाफ न खड़े होकर उन्होंने कश्मीरियों को मायूस किया है. कश्मीर यूनिवर्सिटी के छात्र आबिद ने कहा, ‘‘उसने साबित कर दिया कि वह केंद्र सरकार का पिट्ठू है.’’ कर्फ्यू लगाए जाने के बाद से ही यूनिवर्सिटी बंद है.

छात्र अपनी राय का इजहार करने के इरादे से बाहर आ गए. इंडिया टुडे ने उनमें से करीब 20 छात्रों से बात की. वे बात करना चाहते थे लेकिन बदले की कार्रवाई के डर से अपना नाम उजागर नहीं करना चाहते थे. कानून के एक छात्र ने कहा, ‘‘अगर पहले भारत और कश्मीर में छोटा-सा फासला था तो अब अफजल की फांसी ने उसे बेहद बढ़ा दिया है. मुझे नहीं लगता कि अब कोई मेल-मिलाप हो सकता है.’’

उन सबका मानना है कि अफजल की फांसी के मामले में नाइंसाफी की गई है. उनका मानना है कि उसे अदालत में अपना पक्ष रखने का सही मौका नहीं दिया गया. एक अन्य छात्र जलील ने कहा, ‘‘उनके पास एक रहम की अपील को रिव्यू किए जाने का मौका था, जिससे उन्हें महरूम कर दिया गया. उनके खिलाफ परिस्थितिजन्य सबूत थे. फांसी दिए जाने वाले लोगों में उसे अपनी बारी से पहले क्यों फांसी दी गई? हम उसे नहीं भूलेंगे. वह हमारा हीरो बन गया है. आज अफजल तो कल हम में से कोई भी हो सकता है.’’

सभी का मानना है कि कांग्रेस ने अफजल को फांसी देने का इस्तेमाल कश्मीर के जरिए राजनैतिक बढ़त हासिल करने के लिए किया है. एक अन्य छात्र रसूल का कहना है, ‘‘कांग्रेस यह दिखाना चाहती थी कि वह मजबूत हुकूमत की रहनुमाई कर रही है. वे नरेंद्र मोदी और उन्हें दिल्ली यूनिवर्सिटी में मिले रेस्पांस से डरे हुए हैं.’’

एक अन्य छात्र फरहान ने कहा, ‘‘साल में आधे समय वादी में कर्फ्यू लगा रहता है. अब वे हमें बाहर की दुनिया से पूरी तरह काट देना चाहते हैं. इंटरनेट बंद कर दिया गया है. न्यूज चौनल दिखाए नहीं जा रहे हैं. मकामी अखबारों से हुटिंग रोकने को कहा गया है. हमें फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग पर जाने से रोक दिया गया है. प्री-पेड कनेक्शन पर अभी तक एसएमएस की इजाजत नहीं है. क्या यही है 21वीं सदी का भारत? यह तो स्टोन एज से भी बुरा है. और तब भारत हमें यह कहना चाहता है कि हम उसके अभिन्न अंग हैं.’’

सोशल मीडिया के तार
एक स्थानीय साप्ताहिक के पत्रकार 26 वर्षीय जहांगीर अली उन कुछ खास लोगों में हैं जिन्हें अपने दफ्तर में ब्रॉडबैंड कनेक्शन की बदौलत इंटरनेट की सुविधा प्राप्त है. उनका कहना है कि अफजल की फांसी के बाद से उन्हें उनकी फेसबुक पर दर्जनों लोगों ने फ्रेंड बनने की ख्वाहिश जाहिर की और सभी ने अपने प्रोफाइल फोटो पर अफजल की तस्वीर लगा रखी थी. उनका कहना है, ‘‘वह फांसी की वजह से हीरो बन चुका है. अवसरों की कमी से परेशान कश्मीर के बेरोजगार युवकों के लिए अफजल एकजुट होने का बहाना बन जाएगा. इस तरह एक और पीढ़ी इंतिहापसंद हो जाएगी.’’capital punishment

कुछ नवयुवक श्रीनगर के संवेदनशील इलाके ईदगाह में 12 फरवरी की रात को कर्फ्यू तोडऩे में कामयाब हो गए और उन्होंने एक कब्र के पास अफजल के लिए कब्र खोदी. दूसरी कब्र जम्मू कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के नेता मकबूल बट्ट के शव के लिए 11 फरवरी, 1984 से खुली पड़ी है. बट्ट को भी तिहाड़ जेल में फांसी देने के बाद वहीं दफना दिया गया था. जब 13 फरवरी की सुबह सुरक्षा कर्मियों ने वह गड्ढा देखा जिस पर अफजल के नाम का कतबा या यादगार पत्थर लगाया गया था तो उसे फौरन हटा लिया, हालांकि बाद में स्थानीय पुलिस ने हंगामे की आशंका की वजह से दूसरा कतबा लगा दिया. संयोगवश अफजल को तिहाड़ में बट्ट के पास ही दफन किया गया है.

पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की नेता महबूबा मुफ्ती का कहना है कि उन्होंने भी सोशल नेटवर्क पर अफजल से हमदर्दी के ढेर सारे पोस्ट देखे हैं. 13 फरवरी को गुप्कर रोड पर अपने बड़े से घर में उन्होंने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, ‘‘मैंने और मेरी बेटी ने देखा कि फेसबुक और ट्विटर पर बहुत सारे लोगों ने अफजल की तस्वीर लगा रखी है. सिस्टम के साथ मोहभंग साफ नजर आ रहा है. एक संदेश में कहा गया था कि जो कोई भी चुनाव में वोट डालेगा, वह अफजल को हजार बार मारेगा.’’

उन्होंने कहा कि बच्चों को अब बहुत एक्सपोजर है. ‘‘लावा जमा हो रहा है उनके दिल में. आज के नौजवान भले ही अपने हाथों में बंदूक उठाए न हों लेकिन उनके अंदर तशदुद (हिंसा) है. यह ज्यादा खतरनाक है. आप नहीं जानते कि कब और कैसे यह फूट पड़ेगा. आप उनकी आवा-जाही पर पाबंदी लगा सकते हैं, उनकी बंदूक छीन सकते हैं, लेकिन उनके दिमाग का क्या करेंगे?’’

उन्होंने सवाल किया कि राजीव गांधी और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारों को अभी तक फांसी क्यों नहीं दी गई. उन्होंने कहा कि यहां तक कि इंदिरा गांधी के हत्यारों को भी फांसी से पहले अपने परिवार वालों से मिलने की इजाजत दी गई थी. उनका सवाल है, ‘‘आखिर कश्मीर के साथ ऐसा सलूक क्यों?’’

2010 की गर्मी से कश्मीर में हालात सामान्य हो रहे थे और बड़ी संख्या में पर्यटक आने लगे थे. 2012 में 55 लाख सैलानी कश्मीर पहुंचे. घाटी के एक व्यापारी 35 वर्षीय हाशिम हामिद ने कहा, ‘‘यह कश्मीर के लिए बहुत ही अहम मौका है. टूरिस्ट सीजन शुरू होने वाला है. बड़ी तादाद में पर्यटक गुलमर्ग में स्की के लिए आ रहे थे. अगर मार्च तक हालात ऐसे ही रहे तो कोई भी नहीं कह सकता कि आगे क्या होगा.’’ उनका मानना है कि घाटी के युवक बहुत ही राजनैतिक हो चुके हैं और अफजल की फांसी पर प्रतिक्रिया जरूर होगी.

सज्जाद लोन की पार्टी पीपल्स कॉन्फ्रेंस के जिला स्तर के अध्यक्ष 28 वर्षीय जुनैद अहमद मटटू का कहना है कि कुछ दिनों तक प्रतिक्रिया होगी, लोग सड़कों पर आएंगे जैसा कि वे कर्फ्यू के विरोध में पहले से ही कर रहे हैं. लेकिन उनका कहना है कि इसका दीर्घकालीन प्रभाव कश्मीर के लिए ज्यादा नुकसानदेह होगा. उन्होंने कहा, ‘‘पॉलिटिकल प्रतिक्रिया आग में घी का काम करेगी क्योंकि लोगों में अलगाव की भावना पहले से ही है.’’ उनके मुताबिक, राज्य और केंद्र सरकार से बात कर रहे अलगाववादियों के लिए उनसे बातचीत जारी रखना मुश्किल होगा.

कड़ी कार्रवाई, जबरदस्त प्रतिक्रिया
नॉर्थ ब्लॉक के सूत्र स्वीकार करते हैं कि अफजल की फांसी जिस समय और तरीके से दी गई, वह केंद्र सरकार के लिए ‘‘बेहद जरूरी’’ थी. केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपनी पहचान गुप्त रखने की गुजारिश के साथ इंडिया टुडे को बताया, ‘‘यह हमारे लिए ग्लोबल मुद्दा बन गया था. हम अमेरिका से डेविड कोलमैन हेडली को सौंपने की मांग कर रहे थे ताकि हम उसके खिलाफ यहां मुकदमा चलाकर उसे सजा-ए-मौत दे सकें, जिसके वह लायक है. वे पलटकर यह कह सकते थे कि अफजल गुरु का क्या किया? लिहाजा, हमें उसे फांसी देनी थी और दुनिया को संदेश देना था.’’

इस फैसले से पहले कई तरह के एहतियाती कदम उठाए गए. सारे अलगाववादी नेता कश्मीर से बाहर थे. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारूक दिल्ली में थे, और उन्हें फौरन नजरबंद कर दिया गया. जेकेएलएफ चेयरमैन यासीन मलिक पाकिस्तान में थे. अफजल को फांसी देने के दो दिन पहले ही उत्तर कश्मीर में रसूख रखने वाले नईम खान को गिरफ्तार कर लिया गया था. जम्मू ऐंड कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी के संस्थापक शब्बीर शाह श्रीनगर में थे लेकिन अब उन्हें अलगाववादी नेता के रूप में गंभीरता से नहीं लिया जाता.

मुख्यमंत्री अब्दुल्ला खामोशी ओढ़े हुए हैं. उनके दोनों मोबाइल फोन स्विच्ड ऑफ हैं. अफजल को फांसी दिए जाने के बाद अब्दुल्ला ने मीडिया को दिए अपने इंटरव्यू में कहा था कि अफजल की फांसी से अलगाव की भावना भड़क सकती है.

उन्होंने कहा था, ‘‘मेरी चिंता फौरी कानून और व्यवस्था की स्थिति से परे है. मुझे इसके व्यापक असर की काफी चिंता है...दीर्घकालिक असर ज्यादा चिंताजनक हैं. वे कश्मीरियों की नई नस्ल की सोच से जुड़े हैं, जो शायद भले ही मकबूल बट्ट से हमदर्दी न रखें, लेकिन अफजल गुरु के साथ हमदर्दी रखेंगे.’’

श्रीनगर में छोटा-सा इंटरनेट कैफे चलाने वाले 26 वर्षीय तारिक हुकूमत से अपने मोहभंग को नहीं छिपाते: ‘‘जब उमर वजीरे-आला बने थे तो हमने अमन की उम्मीद की थी. लेकिन शायद हम हमेशा के लिए उससे महरूम हो जाएंगे. हम बदकिस्मत लोग हैं.’’

-साथ में नसीर गनई

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