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खास रपटः तो बीमा किस काम का?

महामारी में एक तो इलाज मुश्किल, ऊपर से बीमा कंपनियों से उसका खर्च वसूल पाने में मरीजों का पसीना छूट रहा. तरह-तरह के नुक्ते निकालकर कंपनियों ने हजारों करोड़ रु. के क्लेम अटकाए.

खर्च कौन देगा? दिल्ली के एक अस्पताल में कोरोना मरीज का इलाज करते डॉक्टर खर्च कौन देगा? दिल्ली के एक अस्पताल में कोरोना मरीज का इलाज करते डॉक्टर

लखनऊ के आलमबाग इलाके के रहने वाले  50 वर्षीय राजेश यादव हाल ही में कोविड-19 की दूसरी लहर की चपेट में आ गए. पहले घर पर इलाज चलता रहा और जब तबीयत बिगड़ी तो करीब हफ्ताभर अस्पताल में रहने के बाद वे कोरोना के खिलाफ तो लड़ाई जीत गए लेकिन सिस्टम से हार गए. अपनी आपबीती सुनाते हुए वे कहते हैं, ‘‘अस्पताल जाने की बारी आई तो भारी मशक्कत के बाद भी पांच घंटे तक सीएमओ ऑफिस से यह पता नहीं चल पाया कि किस कोविड हॉस्पिटल में बेड खाली है.

ऑक्सीजन का लेवल घर पर ही 79 आ गया था. आखिरकार अपनी जान पहचान से लखनऊ के एक निजी अस्पताल में भर्ती हो गए.’’ इन्हीं दिनों के लिए राजेश ने अपने परिवार के लिए 10 लाख रुपए सम एश्योर्ड का हेल्थ इंश्योरेंस ले रखा था. कायदे में भर्ती होते समय इंश्योरेंस कार्ड देकर बिना कोई पैसा दिए (कैशलेस) इलाज शुरू हो जाना चाहिए था. लेकिन बेड की मारामारी के बीच अस्पताल ने पहले ही एडवांस रखवा लिया.

कोविड वार्ड में हफ्तेभर के इलाज का बिल करीब 3,00,000 रुपए बना, जिसका क्लेम इंश्योरेंस कंपनी ने इस तर्क के साथ रिजेक्ट कर दिया कि मरीज का इलाज घर पर रहकर ही हो सकता था, अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं थी. राजेश कहते हैं, ‘‘सरकार, अस्पताल, इंश्योरेंस कंपनी किसकी कहें? सबका हाल बुरा है.’’

पर राजेश अकेले नहीं हैं जिन्हें कोरोना की महामारी के दौरान सरकारी बदइंतजामी, अस्पतालों की मनमानी और इंश्योरेंस कंपनियों के दकियानूसी रवैये से गुजरना पड़ा. जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक, 5 मई, 2021 तक कोविड के कुल 47,898 मामले ऐसे थे जहां मरीजों को इलाज का पैसा नहीं मिला. वहीं, 6,848 करोड़ रुपए के 1,87,754 दावे विचाराधीन हैं. 

कैशलेस को क्या हुआ?
सामान्य स्थिति में बीमाधारकों को अस्पताल में भर्ती होने के 24 से 48 घंटे के भीतर बीमा कंपनी को सूचना देनी होती है. इसके बाद दो विकल्प होते हैं. पहला, कैशलेस यानी अस्पताल के सभी बिलों का भुगतान सीधे बीमा कंपनी करेगी और पॉलिसीधारक को कुछ नहीं देना पड़ेगा. दूसरी स्थिति में मरीज खुद अस्पताल के सभी बिलों का भुगतान कर उसे बाद में बीमा कंपनी को भेजकर पैसा लेता है. ऐसे समय में जब अस्पतालों में बेड की मारामारी चल रही है तब स्वास्थ्य बीमा में कैशलेस की शर्त महज कागजों में लिखी रह गई है.

भर्ती होने के लिए अस्पताल कम से कम एक से दो दिन के खर्च बराबर राशि एडवांस में रखवा रहे हैं. दिल्ली-एनसीआर की एक हॉस्पिटल चेन के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘‘मौजूदा परिस्थिति में कई इंश्योरेंस कंपनियां नए-नए बहाने ढूंढकर किस्म-किस्म के नुक्ते लगा रही हैं. ऐसे में किसी मरीज का इलाज बिना एडवांस के शुरू कर दिया जाए और बाद में मरीज पैसा दे पाने की स्थिति में न हो तो फिर तो अस्पताल फंस जाता है.

इंश्योरेंस कंपनी की ओर से अगर भुगतान कर दिया जाता है तो हम एडवांस का पैसा मरीज को वापस कर देते हैं.’’ पीपीई किट, सैनिटाइजर, मास्क, दस्ताने समेत उपयोग में आने वाली कई ऐसी चीजें होती हैं जो स्वास्थ्य बीमा में कवर नहीं होतीं. इंश्योरेंस कंपनी की ओर से भुगतान मिल जाने के बावजूद इसका पैसा तो मरीज से ही वसूला जाता है. वे यह भी बताते हैं, ‘‘यह सामान्य समय नहीं है एक-एक बेड के लिए लंबी वेटिंग चल रही है. ऐसे में नकद भुगतान करके इलाज कराने वाले मरीजों, सरकारी या बड़ी कंपनियों के कर्मचारियों को खुद-ब-खुद वरीयता मिल जाती है.’’

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 22 अप्रैल को बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (इरडा) के चेयरमैन से बीमा कंपनियों के ‘कैशलेस’ दावे खारिज करने की शिकायतों पर फौरन कार्रवाई करने को कहा था. उनका ट्वीट था, ‘‘...रिपोर्ट मिल रही है कि कुछ अस्पताल ‘कैशलेस’ बीमा को मना कर रहे हैं. इरडा के चेयरमैन एस.सी. खुंटिया से बात कर इस पर तुरंत कदम उठाने को कहा है. मार्च, 2020 में कोविड को व्यापक स्वास्थ्य बीमा में शामिल किया गया. कैशलेस सुविधा नेटवर्क अस्पतालों के साथ अस्थायी अस्पतालों में भी उपलब्ध है.’’ 

एक दिन बाद ही 23 अप्रैल को इरडा ने एक परिपत्र जारी किया. यह नेटवर्क में शामिल अस्पतालों की ओर से इलाज के लिए ऊंची दर और बीमा कंपनियों के साथ कैशलेस व्यवस्था के बावजूद कोविड-19 संक्रमित रोगियों के इलाज के लिए पॉलिसीधारकों से नकद भुगतान पर जोर देने की खबरों के मद्देनजर था. नियामक ने कहा, ‘‘प्रावधानों के अनुपालन में, स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी के तहत कैशलेस दावों के मामले में बीमा कंपनियों को सलाह दी जाती है कि वे अस्पतालों के साथ सेवा स्तर समझौतों (एसएलए) के अनुसार कैशलेस आधार पर ऐसे दावों का तेजी से निबटान पक्का करें.’’

इस बीच एक अलग बयान में इरडा ने यह भी कहा कि पॉलिसीधारकों से अतिरिक्त दरों की वसूली, अग्रिम जमा राशि की मांग करना और कैशलेस उपचार से इनकार करना न केवल पॉलिसीधारकों के हितों पर चोट पहुंचाता है, बल्कि यह सेवा प्रदाता अस्पतालों और बीमा कंपनियों के बीच सेवा स्तर समझौते का भी उल्लंघन हो सकता है. 

कहां लटक रहे क्लेम? 
बीमा कंपनियों के पास कोविड से जुड़े अब तक कुल 11 लाख से ज्यादा दावे पहुंचे हैं. इनमें से 1,87,000 दावे विचारधीन हैं. बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस के हेल्थ क्लेम प्रमुख भास्कर नेरुरकर कहते हैं, ‘‘जब तक किसी मरीज का इलाज चलता है उसका क्लेम ओपन रहता है.’’ इसे यूं समझें कि किसी कोविड मरीज ने अस्पताल में भर्ती होते ही बीमा कंपनी को सूचित किया.

इसके बाद उसे आठ से 21 दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहने की जरूरत पड़ रही है. ऐसे में दावे अस्पताल से छुट्टी होने पर भुगतान के बाद ही पूर्ण माने जाते हैं. भास्कर बताते हैं, ‘‘अस्पतालों पर दबाव बहुत ज्यादा है क्योंकि कोविड सामान्य परिस्थिति नहीं है. चूंकि कोविड मरीजों की संख्या बढ़ रही है, इसलिए दावों की संख्या भी बढ़ रही है. यह अस्पतालों की ओर से दावे से जुड़ी कागजी कार्यवाही में देरी का एक कारण हो सकता है.’’

राजधानी दिल्ली में ऑक्सीजन, दवाओं, बेड और वेंटिलेटर की कमी के संबंध में कई याचिकाओं की सुनवाई करते हुए दिल्ली हाइकोर्ट ने 28 अप्रैल को एक आदेश में कहा कि बीमा कंपनियां कोविड-19 मरीजों के बिलों को मंजूरी देने में 6-7 घंटे नहीं ले सकतीं क्योंकि इससे अस्पतालों से रोगियों को छुट्टी मिलने में देरी होती है और बेड की जरूरत वाले लोगों को अधिक देर तक इंतजार करना पड़ता है.

न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह ने कहा कि अगर अदालत को इस बात की जानकारी मिलती है कि किसी बीमा कंपनी या तीसरे पक्ष के प्रशासक (टीपीए) की ओर से बिलों को मंजूरी देने में 6-7 घंटे लगते हैं, तो उनके खिलाफ अवमानना ​​की कार्रवाई की जाएगी. इस आदेश के कुछ ही मिनट बाद न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति रेखा पल्ली की पीठ ने भी ऐसा ही निर्देश पारित किया. इसमें बीमा कंपनियों और टीपीए को यह पक्का करने का निर्देश दिया गया है कि बिलों को मंजूरी देने में लगने वाले समय घटाया जाए क्योंकि अस्पतालों के बाहर लोग बेड का इंतजार कर रहे हैं. न्यायमूर्ति सिंह ने कहा कि अस्पतालों से अनुरोध मिलने के बाद बीमा कंपनियों या टीपीए को बिल मंजूरी में 30-60 मिनट से ज्यादा नहीं लेना चाहिए.

रिजेक्ट क्यों हो रहे क्लेम? 
कोविड से जुड़े 47,000 से ज्यादा मामले ऐसे भी हैं जो या तो कंपनी की ओर से रिजेक्ट कर दिए गए या फिर पॉलिसीधारक की ओर से इन्हें वापस ले लिया गया. मरीजों के क्लेम रिजेक्ट होने की वजह समझाते हुए नई दिल्ली के होली फैमिली हॉस्पिटल में टीपीए डिपार्टमेंट के रेजिडेंट डॉ. फराहींम खान कहते हैं, ‘‘कोविड की पहली लहर के समय क्लेम पास होने में ज्यादा दिक्कत नहीं आती थी. लेकिन अब इंश्योरेंस कंपनियों की ओर से आसानी से क्लेम पास नहीं हो रहे.’’

डॉ. खान क्लेम के रिजेक्ट होने की तीन-चार बड़ी वजह बताते हैं जो ज्यादातर स्थितियों में सामने आ रही हैं. मसलन, अगर कोई मरीज आरटी-पीसीआर टेस्ट में पॉजिटिव आने के बाद अस्पताल में भर्ती हुआ है तो कंपनियां मरीज का ऑक्सीजन लेवल पूछती हैं. यह लेवल 94-95 के स्तर से ऊपर है तो कंपनियां यह मानकर क्लेम रिजेक्ट कर दे रही हैं कि मरीज को भर्ती होने की जरूरत न थी, उसका घर पर इलाज संभव था.

इसके अलावा, कोविड की रिपोर्ट नेगेटिव होने के बाद अगर कोई मरीज अस्पताल में भर्ती हुआ है तो कंपनियां सीटी स्कैन की रिपोर्ट मांगती हैं. रिपोर्ट में अगर स्कोर 8 तक आता है तो कंपनियां इसे माइल्ड केस (मामूली) मानकर क्लेम रिजेक्ट कर दे रही हैं. सीटी का स्कोर 16 से 25 के बीच गंभीर माना जाता है, जिसका क्लेम बीमा कंपनियां मंजूर कर देती हैं.

कोविड के किसी पेशेंट की रिपोर्ट में अगर डॉक्टर कोविड के अलावा किसी और बीमारी का जिक्र कर देते हैं तो कंपनियां को-मॉर्बिडिटी (कोविड के साथ कोई और बीमारी भी) का केस मानकर यह देखती हैं कि पॉलिसी शुरुआती वर्षों में तो नहीं है या फिर मरीजों ने पॉलिसी खरीदते वक्त बीमारी उजागर की थी? 

कोविड-19 के इलाज के लिए जुलाई 2020 में खास तौर पर लॉन्च की गई कोरोना कवच और कोरोना रक्षक पॉलिसी के संबंध में इंश्योरेंस समाधान के सह-संस्थापक और बीमा प्रमुख शैलेश कुमार कहते हैं, ‘‘दोनों ही पॉलिसी में लाभ लेने के लिए आरटी-पीसीआर की पॉजिटिव रिपोर्ट और अस्पताल में 72 घंटे भर्ती होना जरूरी है.’’ अब अस्पताल में कौन भर्ती होगा, कौन नहीं, यह मरीज कैसे तय कर सकता है?

और रिपोर्ट नेगेटिव आने के बाद भी तमाम ऐसे केस हैं जहां लोगों को समस्याएं हो रही हैं. ऐसे में इन पॉलिसियों का अपेक्षित लाभ पॉलिसीधारकों को नहीं मिल पा रहा. इंश्योरेंस समाधान ने कोविड से जुड़े करीब 100 मामले सुलटाए हैं जिनमें शैलेश कुमार का अनुभव रहा है कि कोविड रक्षक के ज्यादातर मामले रिजेन्न्ट हुए हैं जबकि कोविड कवच में बिल बड़ा होने पर कंपनियां आनाकानी करती हैं.

कोरोना कवच एक क्षतिपूर्ति की पॉलिसी है और कोरोना रक्षक लाभ आधारित योजना है. कवच के तहत अस्पताल में भर्ती होने पर खर्च की भरपाई बीमित राशि तक सीमित होगी जबकि रक्षक पॉलिसी में कोरोना पॉजिटिव को उपचार के लिए एकमुश्त राशि का भुगतान किया जाएगा. कोरोना कवच और रक्षक की यही कोई 3.5 लाख पॉलिसियां बिकी हैं.

कौन उठाएगा होम ट्रीटमेंट का खर्च
अस्पतालों में बेड और ऑक्सीजन सिलेंडर की मारामारी के बीच तमाम अस्पताल मरीजों को उनके घर पर कोविड होमकेयर पैकेज दे रहे हैं. ऐसे में तमाम बीमाधारकों के मन में यह सवाल आना स्वाभाविक है कि उनकी पॉलिसी घर पर रहकर इलाज कराने का खर्च उठाएगी या नहीं?

रीन्युबाय के सहसंस्थापक इंद्रनील चटर्जी कहते हैं, ‘‘यह साफ दिशानिर्देश है कि सभी बीमा पॉलिसियों के अंतर्गत घर पर कोविड पैकेज के जरिए इलाज कराना भी कवर होगा. हो सकता है कि कुछ पुरानी पॉलिसी इस दायरे में न आती हों पर सभी नई पॉलिसी के तहत बीमाधारकों को घर पर कोविड ट्रीटमेंट पैकेज का भुगतान होगा.’’

आइसीआइसीआइ लॉम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस के क्लेम, अंडरराइटिंग और रीइंश्योरेंस के प्रमुख संजय दत्ता कहते हैं, ‘‘होम ट्रीटमेंट की स्थिति में बीमा पॉलिसी में दवाएं, नर्स और डॉक्टर का खर्च, सीटी स्कैन, कोविड और एक्स-रे जैसे जरूरी टेस्ट सभी खर्च कवर होते हैं. ये खर्च मरीज के कोविड नेगेटिव आने तक कवर किए जाते हैं. हालांकि घर पर इलाज में अस्पताल में भर्ती होने से पहले और बाद के खर्च जैसा कोई प्रावधान नहीं होता.’’ घर पर इलाज की स्थिति में भी मरीज को पॉजिटिव होने के बाद कंपनी को सूचना देनी होती है.

बीमा के बाद भी जेब हो रही ढीली
बीमा पॉलिसी के बाद भी मरीजों को जेब से पैसा क्यों देना पड़ रहा है? जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के सेक्रेटरी जनरल एम.एन. सरमा बताते हैं, ‘‘बीमा कंपनियां मरीज के दावे में वास्तविक और यथोचित खर्च का पूरा भुगतान करती हैं. पर अगर अस्पताल मरीज के बिल में ऊलजुलूल खर्च जोड़ देंगे तो उनका भुगतान कैसे होगा?’’ किसी चीज की कीमत 10 रुपए है और अस्पताल 20 रुपए या उससे ज्यादा चार्ज करते हैं तो उसको कैसे तर्कसंगत माना जा सकता है?’’

सरमा एक बेहद अहम मुद्दे की ओर ध्यान खींचते हुए कहते हैं, ‘‘यह दुखद है कि इस कठिन घड़ी में भी लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है लेकिन आम जनता के अधिकार सुरक्षित हों, इसकी जिम्मेदारी किसकी है? देश में दवा, बीमा कंपनी, बैंक, टेलीकॉम हर क्षेत्र के लिए नियामक हैं तो निजी अस्पतालों की मनमानी के लिए भी कोई नियामक हो जो एक मानक तय करे.’’ अभी स्थिति यह है कि देश के विभिन्न निजी अस्पतालों में आपको एक जैसी सेवाओं के लिए अलग अलग रेट मिल जाएंगे.

 देश की एक दिग्गज इंश्योरेंस के प्रमुख अधिकारी स्पष्ट करते हैं, ‘‘अस्पतालों के साथ तय टैरिफ पर भुगतान में कोई दिक्कत नहीं. पर अस्पताल नॉर्मल हाइजीन का भी बिल मरीज के बिल में जोड़ रहे हैं.  कई राज्यों में सरकार या कुछ संगठन अस्पतालों की प्राइसिंग रेगुलेट कर रहे हैं जिन्हें अस्पताल नहीं मान रहे, इससे भी सेटलमेंट में दिक्कतें आ रही हैं.’’ बीमा कंपनी की ओर से पूरा क्लेम सेटल न होने पर अस्पताल मरीजों से बकाया राशि की वसूली करते हैं.

बीमा कंपनी वालों का तर्क है कि अस्पताल वाले बुनियादी साफ-सफाई का बिल भी मरीज के बिल में जोड़ देते हैं. कई राज्यों में सरकार या कुछ संगठन अस्पतालों का खर्च रेगुलेट कर रहे. इससे सेटलमेंट में दिक्कतें आ रहीं.


जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के पास कोविड-19 से जुड़े दावों का हाल
11,39,274 - कुल दावे
15,988 - करोड़ रुपए के
9,51,520 - सेटल हुए दावे
9,141 - करोड़ रुपए के

कंपनी की ओर से खारिज या मरीज की ओर से वापस लिए दावे
47,898 - 

1,87,754
विचाराधीन मामले
6,848

करोड़ रुपए के क्लेम रिजेक्ट होने के बड़े कारण?

● आरटी-पीसीआर की रिपोर्ट नेगेटिव और सीटी स्कैन का स्कोर 8 तक होने पर
● अगर इंश्योरेंस कंपनी को लगता है कि मरीज को हॉस्पिटल में एडमिट होने की जरूरत नहीं थी. घर पर इलाज संभव था. 
● ऑक्सीजन लेवल 94 या उससे ऊपर होने पर की स्थिति में 
● कोमॉर्बिडिटी की स्थिति में अगर मरीज ने बीमा खरीदते वक्त इसे उजागर नहीं किया है

स्रोत: जनरल इंश्योरेंस काउंसिल और बातचीत के आधार पर

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