scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

सूनी कक्षाएं, लेट-लतीफ डिग्रियां

बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था इन दिनों कहीं आंदोलन से पस्त, कहीं स्थायी कुलपति के अभाव में ठप, कक्षाओं से छात्र नदारद, सत्र दो से चार साल तक लेट, राज्य के अलग-अलग विश्वविद्यालयों की यात्रा में मिली कई पीड़ादायक कहानियां.

X
नाम लिखाकर गायब : मुजफ्फरपुर शहर में स्थित नीतीश्वर महाविद्यालय में 132 छात्रों वाली हिंदी की कक्षा में उपस्थित सिर्फ 4 छात्र. नाम लिखाकर गायब : मुजफ्फरपुर शहर में स्थित नीतीश्वर महाविद्यालय में 132 छात्रों वाली हिंदी की कक्षा में उपस्थित सिर्फ 4 छात्र.

पुष्यमित्र

अगर किसी रोज कॉलेज के सभी 1,400 छात्र एक साथ पहुंच जाएं तो उन्हें कहां बिठाएंगे? कॉलेज में तो बमुश्किल बने-अधबने सात-आठ कमरे ही हैं.’’ यह सवाल जब मधेपुरा के बाबा सिंहेश्वर राधाकृष्ण महाविद्यालय के प्राचार्य सुरेंद्र नीरज से पूछा गया तो वे सकपका गए.

उन्हें ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी. वे मान बैठे थे कि कभी कॉलेज में दाखिला लिए छात्रों का दस फीसद भी एक साथ नहीं आएगा. यहां छात्रों का कॉलेज से रिश्ता सिर्फ डिग्री पाने का है. वे एडमिशन कराने, फॉर्म भरने और एडमिट कार्ड लेने ही कॉलेज आते हैं. 

यह कॉलेज मधेपुरा विश्वविद्यालय से बमुश्किल चार-पांच किमी दूर है. खेतों के बीच बना है और पगडंडियों से चलकर वहां पहुंचा जा सकता है. इस छोटे से परिसर वाले कॉलेज में स्नातक स्तर के 16 विभाग हैं, जिनमें 70 से अधिक शिक्षक नियुक्त हैं. इनके अलावा 50 से अधिक शिक्षकेतर कर्मी हैं. छात्र तो दूर, ये शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मी भी कभी एक साथ कॉलेज में आ जाएं तो उन्हें बिठाने की व्यवस्था परिसर में नहीं है. इसलिए वे भी कभी-कभार ही आते हैं. 

दिलचस्प है कि यह कॉलेज 1983 से चल रहा है. इसे विवि 1990 से लगातार हर साल अस्थायी मान्यता देता रहा है और पिछले साल तो स्थायी मान्यता भी मिल गई. कॉलेज को कुल 1,408 छात्रों को पढ़ाने की स्वीकृति मिली है और हर सत्र में यहां से एक हजार से अधिक छात्र ग्रेजुएट होते हैं, बिना कक्षा में आए. इस कॉलेज के पूर्व प्राचार्य महीनों से गायब हैं, स्टाफ दबी जुबान में कहते हैं कि वे यूपी के प्रयागराज में फर्जी डिग्री बेचने के किसी मामले में गिरफ्तार हो गए हैं! 

खुद कॉलेज के सचिव ओमप्रकाश बाहेती मानते हैं कि उनके यहां कभी-कभार ही कक्षाएं लगती हैं. वे कहते हैं, ''कक्षाएं तो विवि के बड़े-बड़े कॉलेजों में नहीं लग पातीं, हमारे कॉलेज को तो पिछले साल ही स्थायी मान्यता मिली है.’’ बाहेती की बातों में वह तल्ख सच्चाई है जो आज बिहार की उच्च शिक्षा की हकीकत बयान करती है.

राज्य के कुछ चुनिंदा कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के पीजी विभागों को छोड़ दिया जाए तो पूरे बिहार में शायद ही कोई ऐसा कॉलेज है, जहां नियमित कक्षाएं लगती हों. यहां तक कि राजधानी पटना के सबसे प्रतिष्ठित साइंस कॉलेज में भी कभी हाजिरी 50-60 फीसद तक नहीं पहुंच पाती.

पिछले दिनों मुजफ्फरपुर के एक सरकारी कॉलेज नीतीश्वर महाविद्यालय के सहायक प्राध्यापक लल्लन कुमार ने यह कहते हुए अपने प्रिंसिपल को 23 लाख रुपए का चेक देने की कोशिश की थी कि जब उनकी कक्षा में छात्र आते ही नहीं हैं, तो उन्हें वेतन लेने का क्या हक है? हालांकि बाद में उन्होंने यह कहकर माफी मांग ली कि आवेश में यह कदम उठा लिया था. 

नीतीश्वर महाविद्यालय में इस संवाददाता को किसी भी कक्षा में दहाई की संख्या में छात्र नहीं मिले. एमए समाजशास्त्र द्वितीय सत्र की कक्षा के 55 छात्रों में सिर्फ आठ उपस्थित थे. पीजी समाजशास्त्र की ही एक अन्य कक्षा में 62 की जगह पांच छात्र बैठे थे. लल्लन कुमार जिस हिंदी विभाग से जुड़े हैं, उसकी कक्षा एक अतिथि शिक्षक अविनाश ले रहे थे. 132 दाखिले वाली उनकी कक्षा में उस रोज सिर्फ तीन छात्राएं और एक छात्र उपस्थित था. यह कोई दूरदराज का नहीं, मुजफ्फरपुर शहर के बीचोबीच स्थित पुराना और प्रतिष्ठित कॉलेज है. 

पटना, मुजफ्फरपुर, मधेपुरा, भागलपुर और गया विवि के अलग-अलग कॉलेजों और पीजी विभागों में घूमते हुए इस संवाददाता ने यही देखा कि ज्यादातर कक्षाएं या तो खाली हैं, या फिर कक्षा में गिने-चुने छात्र ही उपस्थित हैं. 

क्या खाली पड़ी कॉलेज की कक्षाएं ही बिहार की उच्च शिक्षा की हकीकत हैं? इस सवाल पर पटना साइंस कॉलेज की सहायक प्राध्यापक डॉ. रंजना प्रकाश कहती हैं, ''कॉलेज की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था छात्रों को फटाफट नौकरी दिलाने का भरोसा नहीं दिलाती, इसलिए वे कॉलेज के बदले कोचिंग संस्थानों का रुख करते हैं.’’ लेकिन नौकरी के लिए डिग्री जरूरी है तो उन्हें कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की शरण में जाना पड़ता है. यही वजह है कि बिहार के ज्यादा छात्र डिग्री के लिए कॉलेजों में नाम लिखा लेते हैं और नौकरी पाने के लिए कोचिंग संस्थानों की शरण लेते हैं.

छात्र कक्षा में नहीं आ सकते तो प्राध्यापक क्या करें? यह बात दबे स्वर में लगभग हर शिक्षक कहता है. मगर बिहार के कॉलेजों में छात्रों की गैर-हाजिरी की क्या यही इकलौती वजह है? भागलपुर विवि के पीजी हिंदी विभाग में हाल तक पढ़ाने वाली शुभम श्री का कहना है कि इसके लिए सिर्फ छात्र ही नहीं, शिक्षक भी बराबर के दोषी हैं. वे कहती हैं, ''ज्यादातर शिक्षकों की कक्षा लेने में कोई रुचि नहीं. वे खुद को प्रशासनिक कार्य, विवि की राजनीति और अपने पैसों के हिसाब में व्यस्त रखते हैं. समय बच जाए और कक्षा लेनी पड़े तो वे नोट्स लिखवाकर और गेस क्वेश्चन बताकर जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं.’’

शुभम श्री बताती हैं कि जब वे आई थीं, तो उनकी कक्षा में भी छात्र न के बराबर आते थे. मगर उन्होंने नए तरीके से पढ़ाना शुरू किया. छात्रों को समझाया कि नोट्स और गेस क्वेश्चन के सहारे डिग्री ले भी लेंगे तो करियर नहीं बनेगा. वे जेएनयू की छात्रा रह चुकी हैं. उन्होंने वहां के तरीके से छात्रों को पढ़ाना शुरू किया. फिर उनकी कक्षाओं में छात्र आने लगे. वे कहती हैं, एक समय आया जब उनकी कक्षा में 70 फीसद से अधिक छात्र नियमित आते थे. लड़कियां रोज 60-70 किमी की यात्रा करके कॉलेज आएं तो समझ आता था कि पढ़ाई सार्थक हुई. 

ऐसा ही एक प्रयोग मुजफ्फरपुर विवि के पीजी हिंदी विभाग में भी हुआ. वहां के सहायक प्राध्यापक राकेश रंजन और उज्ज्वल बताते हैं कि वे लोग बच्चों की बेहतर पढ़ाई के साथ-साथ उनके लिए लगातार सेमिनार और प्रतियोगिताएं आयोजित करते हैं. मंथली टेस्ट लेते हैं. छात्रों की सक्रियता के आधार पर उन्हें इंटरनल मार्क्स देते हैं.

इसके साथ-साथ विभाग के शिक्षकों ने कक्षा के बाद छात्रों को नेट-जेआरएफ की तैयारी के लिए मुफ्त कोचिंग देनी शुरू की. 2020 में 36 छात्रों को कोचिंग दी गई, जिसमें 18 छात्रों ने जेआरएफ निकाला. इस वक्त कोचिंग में 60 छात्र नियमित आते हैं. इससे भी कक्षाओं में उपस्थिति बढ़ी है.

मगर ज्यादातर जगहों की तस्वीर मधेपुरा के बाबा सिंहेश्वर कॉलेज और मुजफ्फरपुर के नीतीश्वर कॉलेज जैसी ही है. मुजफ्फरपुर में उच्च शिक्षा के मसलों पर लगातार सक्रिय रहने वाले ब्रजेश कहते हैं, ''जितने सीनियर शिक्षक हैं वे या तो परीक्षा नियंत्रक हैं, या रजिस्ट्रार या यूनिवर्सिटी के किसी प्रशासनिक पद पर. विभागाध्यक्ष और प्रिंसिपल भी अब कक्षा लेने में रुचि नहीं लेते. उनका मन प्रशासनिक कार्यों में अधिक लगता है.’’ 

यहां डिग्री पाना भी आसान नहीं

भागलपुर विवि के एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक के सामने तीन लड़कियां रुआंसी खड़ी नजर आती हैं. ये तीनों अपनी ग्रेजुएशन की डिग्री लेने आई हैं. खुशबू कुमारी शेखपुरा से आई हैं, हेमा अभयपुर से और तीसरी, जिसका नाम भी खुशबू है, धरहरा से. दो दिन बाद उनकी बीएड की काउंसिलिंग होने वाली है.

मगर वे देखती हैं कि उनके विवि के प्रशासनिक भवन पर ताला जड़ा है और बाहर बैठे छात्र स्थायी कुलपति की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरना दे रहे हैं. मूल प्रमाणपत्र के बिना उन्हें शायद ही एडमिशन मिल पाए. मगर प्रमाणपत्र देने वाले गैर-हाजिर हैं. हालांकि वे होते भी तो उन्हें डिग्री दे भी नहीं पाते, क्योंकि विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति के दस्तख्त होने थे और वे मुजफ्फरपुर में रहते हैं और पिछले सात महीनों में एक बार भी भागलपुर नहीं आए.

ऐसे में पिछले सात महीने में जो छात्र यहां डिग्री लेने आए, अमूमन उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा. सिर्फ वे छात्र ही डिग्री ले पाए, जिन्होंने खुद किराये की गाड़ी की, परीक्षा विभाग के एक कर्मी को साथ लिया और मुजफ्फरपुर जाकर डिग्री पर साइन करा लाए. प्रशासनिक भवन के आगे धरने पर बैठे छात्रों के नेता दिलीप कुमार कहते हैं, ''ऐसी दस हजार के करीब डिग्रियां पेंडिंग रखी हैं, क्योंकि उन पर कुलपति महोदय के दस्तख्त नहीं हुए हैं. हम इसलिए तो स्थायी कुलपति की मांग कर रहे हैं.’’

मगध विवि, गया में 28 जून से लगातार आंदोलन कर रहे छात्रों का भी एक बड़ा मसला यही है. वहां भी कोई पूर्णकालिक कुलपति नहीं है. पिछले दिनों मगध विवि की एक छात्रा अनुष्का डिग्री पाने के लिए काफी परेशान रहीं. उनका इसरो के एक पाठ्यक्रम में एडमिशन होना था, मगर विवि से डिग्री नहीं मिल रही थी. कई लोगों के दखल के बाद इसरो ने दस दिनों का वक्त दिया और विवि से पूरी कोशिश करने का वादा मिला.

गया में आंदोलन कर रहे छात्रों के नेता दीपक कुमार दांगी कहते हैं, ''यहां अमूमन आवेदन करने के एक-एक, दो-दो साल बाद छात्रों को प्रमाणपत्र नसीब होता है.’’ दांगी एक अनूठे केस के बारे में बताते हैं, जिसमें आवेदक ने 2002 में आवेदन किया था, मगर उसे डिग्री 2022 में मिली.

हालांकि प्रमाणपत्र मिल जाने पर भी छात्रों की आफत कम नहीं होती. अक्सर यहां डिग्री या अंकपत्र में अशुद्धियां रह जाती हैं, फिर उन्हें सुधरवाने का चक्कर होता है. इसलिए विश्वविद्यालयों में कक्षाएं भले ही सूनी रह जाएं, मगर परीक्षा विभाग हमेशा खचा-खच भरा रहता है. वहां छात्र परीक्षा फॉर्म भरने, अंक पत्र लेने, डिग्री लेने, अंक पत्र सुधरवाने के लिए लगातार आते-जाते रहते हैं. मुजफ्फरपुर विवि के छात्र राजद नेता चंदन यादव कहते हैं, ''ऐसा जान-बूझकर किया जाता है, ताकि अतिरिक्त कमाई के अवसर मिलते रहें.’’

बिहार की उच्च शिक्षा का सबसे पीड़ादायक सवाल है समय पर पाठ्यक्रमों का पूरा न हो पाना. मगध विवि, गया के आंदोलनकारी छात्रों की यही पहली मांग है. दांगी कहते हैं, ''ज्यादातर पाठ्यक्रम अपने समय से दो से तीन साल लेट चल रहे हैं. 2016 में जिन छात्रों ने ग्रेजुएशन में एडमिशन लिया था, उनके स्नातक का फाइनल रिजल्ट आज तक नहीं आया है...

ओएमआर शीट पर जो वस्तुनिष्ठ परीक्षा ली गई, जिसकी मार्किंग कंप्यूटर को करनी थी, उसका रिजल्ट आठ महीने बाद भी क्यों नहीं आया, यह समझ से परे है.’’ पटना हाइकोर्ट भी एक जनहित याचिका पर मगध विवि में स्थायी कुलपति की नियुक्ति और समय पर रिजल्ट देने का निर्देश जारी कर चुका है. इन्हीं मांगों को लेकर मगध विवि के सैकड़ों छात्र मार्च करते हुए राजभवन भी पहुंचे, मगर उन्हें वहां भी आश्वासन नहीं मिला. 

समय से पढ़ाई पूरी न हो पाना बिहार के तकरीबन हर विश्वविद्यालय की समस्या है. भूपेंद्र नारायण मंडल विवि, मधेपुरा के छात्र नेता हर्षवर्धन सिंह राठौर कहते हैं, ''विश्वविद्यालय के तीस साल के इतिहास में दो-तीन साल ही ऐसे रहे होंगे जब यहां छात्रों को ग्रेजुएशन की डिग्री तीन साल में और पीजी की डिग्री दो साल में मिली हो.’’ इसी तरह मुजफ्फरपुर विवि के छात्र नेता चंदन यादव कहते हैं कि उनके विवि में ग्रेजुएशन तीन साल लेट चल रहा है, 2019 वाले अभी तक पीजी की डिग्री नहीं ले पाए हैं.

स्थिति इतनी विकराल हो चुकी है कि हाल ही में बिहार सरकार के शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी ने राज्य के सभी विवि के अधिकारियों की बैठक बुलाई. अधिकारियों ने वादा किया है कि वे इस साल के आखिर या अगले साल की पहली तिमाही तक सत्र नियमित करने की पूरी कोशिश करेंगे. इंडिया टुडे से बातचीत में मुजफ्फरपुर और मधेपुरा विवि के परीक्षा नियंत्रकों ने इस साल के आखिर तक सत्र नियमित करने का दावा किया है. भागलपुर विवि के प्रो वीसी डॉ. रमेश कुमार ने कहा है कि अप्रैल, 2023 तक हम लोग सत्र नियमित कर लेंगे.   

अराजक माहौल

यह संवाददाता जब भागलपुर विवि पहुंचा तो देखा कि प्रशासन का सारा काम वीसी आवास से हो रहा है. उस रोज यूजीसी के ग्रांट के बारे में फैसला होना था. सभी कॉलेजों के प्राध्यापक पहुंचे थे. बैठक के बाद प्रो वीसी डॉ. रमेश कुमार ने इंडिया टुडे को बताया कि विवि पर आंदोलनकारी छात्रों का कब्जा है.

उन्होंने सात दिन से प्रशासनिक भवन की तालाबंदी कर रखी है. हमारा सारा काम ठप है. इसके अलावा शिक्षकेतर कर्मियों का अलग आंदोलन चल रहा है, उन्होंने सभी कॉलेजों पर ताला लगा दिया है. एक प्रिंसिपल ने अनौपचारिक बातचीत में बताया कि अपने ही कागजात निकालने के लिए रात के अंधेरे में चोरी-छिपे कॉलेज जाना पड़ता है. इसके दो दिन बाद प्रो वीसी पर विश्वविद्यालय परिसर में दो छात्रों ने स्याही फेंक दी.

भागलपुर विवि के कुलपति का भार मुजफ्फरपुर विवि के कुलपति हनुमान प्रसाद पांडेय के पास है. भागलपुर विवि के प्रो वीसी स्वीकार करते हैं कि हनुमान प्रसाद पांडेय यहां आखिरी बार पिछले साल दिसंबर महीने में आए थे, उसके बाद नहीं आए हैं.

दिक्कत यह है कि बिना कुलपति के हस्ताक्षर के विवि का कोई जरूरी प्रशासनिक काम नहीं हो सकता. ऐसे में हर अत्यावश्यक फाइल पर दस्तख्त कराने भागलपुर विवि का हरकारा अक्सर मुजफ्फरपुर जाता है. इस यात्रा पर अब तक ढाई लाख रुपए से अधिक खर्च होने का अनुमान है.

इस वजह से कई जरूरी काम लंबित हैं. छात्रों के प्रमाणपत्र पर दस्तख्त नहीं हो रहे, रिटायर कर्मियों की पेंशन शुरू नहीं हो रही, परीक्षा से जुड़े कई काम ठप हैं. छात्र नेता दिलीप कुमार का कहना है कि विवि में तीन साल से कोई स्थायी कुलपति नहीं है. 7 मई, 2022 को भागलपुर विवि के कुलपति की नियुक्ति के लिए साक्षात्कार हो चुका है. इसके बावजूद अब तक क्यों यहां कुलपति नहीं भेजा गया है, यह समझ से परे है.

हालांकि स्थायी कुलपति होने से मामला सुलझ जाए, ऐसे उदाहरण भी नहीं हैं. जिन हनुमान प्रसाद पांडेय को भागलपुर विवि का प्रभार मिला है, वे अपने मूल स्थान मुजफ्फरपुर विवि में भी न के बराबर काम कर रहे हैं. अभी हाल ही में एक खबर आई कि वे पिछले 29 महीनों में अपने दफ्तर सिर्फ चार दिन के लिए ही गए हैं. उनके बारे में विवि के रजिस्ट्रार ने बताया कि वे बीमार रहते हैं, इसलिए दफ्तर नहीं आ पा रहे.

यह संवाददाता जब मुजफ्फरपुर में था तो उनसे मुलाकात का वक्त लेने की कोशिश की. संदेशा आया कि कुलपति आज अपना चेकअप कराने डॉक्टर के पास जाएंगे. हालांकि थोड़ी देर बाद यह संवाददाता जब मुजफ्फरपुर के रामदयालु कॉलेज में पहुंचा तो पता चला कि वीसी महोदय कॉलेज के स्थापना दिवस समारोह में भाग लेने आए हुए थे. उन पर यूपी में बिहार के राज्यपाल महोदय के पुत्र के चुनाव अभियान में शामिल होने के भी आरोप हैं.

भागलपुर विवि शिक्षक संघ, भुस्टा के महासचिव पवन कुमार सिंह कहते हैं, ''वे मेडिकल लीव लेकर गए थे. उनके पास इस तरह की गतिविधियों के लिए वक्त होता है, मगर विवि के काम में उनकी रुचि नहीं रहती. उनके विवि न आने से कई शिक्षकों का सेवांत लाभ शुरू नहीं हो पाया है.’’ वे इसके लिए राष्ट्रपति से लेकर हर जिम्मेदार व्यक्ति को पत्र लिख चुके हैं. अगर इस माह के आखिर तक समाधान नहीं हुआ तो वे भी 1 अगस्त से तालाबंदी कराएंगे.  
मगध विवि के कुलपति पद का प्रभार अभी पाटलिपुत्र विवि के कुलपति प्रो. आर.के. सिंह के पास है. इससे पहले मगध विवि के कुलपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद पर वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोप थे. उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. इसी तरह दरंभगा स्थित मिथिला विवि के कुलपति पर भी कई गंभीर आरोप लगते रहे हैं. माना जाता है कि बिहार के विश्वविद्यालयों में फैली अराजकता के पीछे यहां नियुक्त होने वाले कुलपतियों की बड़ी भूमिका है. (इस मसले पर इंडिया टुडे के 9 फरवरी, 2022 के अंक में विस्तृत स्टोरी प्रकाशित हो चुकी है.)

यह अराजकता सिर्फ प्रशासनिक नहीं है. आंदोलनकारी छात्र भी अक्सर अराजक हो जाते हैं. कुछ माह पहले भागलपुर विवि के पीजी विभाग में कक्षा ले रहे सहायक प्राध्यापक दिव्यानंद देव के साथ छात्र राजद से जुड़े लोगों ने मारपीट की. देव कहते हैं, ''मैं अपनी कक्षा ले रहा था, जबकि वे छात्र विवि को बंद कराना चाहते थे.’’

इस मामले में देव के पक्ष में अभियान चलाने वाली उनकी सहयोगी शुभम श्री से तो छात्र इतने नाराज हो गए कि उनका पीछा कर उन्हें परेशान करने लगे. ऐसे में शुभम को मजबूरन नौकरी छोडऩी पड़ी. देव खुद कशमकश में हैं कि नौकरी करें या छोड़ दें. ये दोनों 2017 में बिहार लोकसेवा आयोग की परीक्षा पास कर भागलपुर विवि में पढ़ाने आए थे. इसके लिए दोनों ने ओएनजीसी की अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी थी.

ऐसी स्थिति 2017 में नियुक्त हुए ऐसे कई शिक्षकों के साथ है जो जेएनयू, बीएचयू और दूसरे प्रतिष्ठित संस्थानों से आए हैं.

हालांकि बिहार का शिक्षा विभाग पिछले कुछ दिनों से सत्र नियमित करने की कोशिश कर रहा है. अब विभाग ने तय किया है कि उनके अधिकारी सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों का निरीक्षण करेंगे. हालांकि यह देखने वाली बात होगी कि शिक्षा विभाग के ये प्रयास कितने कारगर होते हैं.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें