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शहबाज सरकार की दुश्वारियां

पहली लड़ाई तो जीत ली, पर नई चुनौतियां पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम शहबाज शरीफ के सामने मुहंबाए खड़ी हैं—गठबंधन, अर्थव्यवस्था, वक्त और बौखलाए इमरान खान

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वक्त का तकाजा : पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ 11 अप्रैल को नेशनल असेंबली को संबोधित करते हुए वक्त का तकाजा : पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ 11 अप्रैल को नेशनल असेंबली को संबोधित करते हुए

हसन जैदी, कराची में

अक्सर दिली ख्वाहिश बिन मांगे पूरी होती है. अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में छाए और हफ्ते भर चले सियासी ड्रामे के खत्म होने के बाद 11 अप्रैल को जब 70 वर्षीय मियां मुहम्मद शहबाज शरीफ को पाकिस्तान के 23वें प्रधानमंत्री की शपथ दिलाई गई तो आप समझ सकते हैं कि यह तीन बार पंजाब के वजीर-ए-आला रहे शख्स के लिए जिंदगीभर के सपने का पूरा होना था. 

सियासत में 30 से ज्यादा उथल-पुथल भरे बरसों के दौरान वे अपने बड़े भाई और तीन बार मुल्क के वजीर-ए-आजम रहे नवाज शरीफ के साये में रहे. जब उनके बड़े भाई इर्द-गिर्द मौजूद थे, यह अक्सर नामुमकिन माना जाता था कि वे कभी सत्ता के शिखर पर पहुंच पाएंगे. मगर 2017 में जब सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने बड़े शरीफ को ताउम्र अयोग्यता की सजा सुनाई, तो शहबाज के लिए अपनी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) का सदर बनने और अंतत: दलीय गठबंधन के प्रमुख के नाते मुख्य कर्ताधर्ता की हैसियत में आने के दरवाजे खुल गए. पार्टियों के इसी गठबंधन ने अविश्वास प्रस्ताव पर मत विभाजन में पूर्व वजीर-ए-आजम इमरान खान को सत्ता से बेदखल करने का तानाबाना बुना.

शहबाज में अपने भाई जैसा करिश्मा नहीं है. उनकी तकरीरों को अक्सर रूखा और जबरिया कहा जाता है. पर उन्होंने 'काम करने वाले शख्स', अमल-पसंद और व्यावहारिक तजुर्बेकार प्रशासक की इज्जत कमाई है. 2013 से 2018 तक मुल्क के सबसे ज्यादा आबादी वाले सूबे के वजीर-ए-आला के अपने आखिरी कार्यकाल में चीनियों ने एक बार फटाफट काम करवा लेने की काबिलियत के लिए उनके कसीदे काढ़े और उनकी शासन शैली को 'पंजाब स्पीड' के तमगे से नवाजा था. वजीर-ए-आजम चुने जाने के बाद संसद में पहली तकरीर में शहबाज ने उम्मीदें बंधाने की कोशिश की. उन्होंने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पटरी लाने और भारत सहित दुनिया से रिश्ते सुधारने का वादा किया. सत्ता से बेदखल इमरान की तरफ सीधा इशारा करते हुए उन्होंने ऐसा नेता होने का वादा भी किया जो पाकिस्तानियों को बांटने के बजाए एक साथ लाएगा. 

शहबाज सरकार के सामने अनिश्चितताएं

अव्वल तो यही साफ नहीं है कि मौजूदा निजाम कितने वक्त चलेगा. उनका बचा हुआ संसदीय कार्यकाल अगस्त 2023 तक है. हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी सरीखे पीएमएल-एन के कुछ बड़े नेताओं ने इशारा किया है कि वे तब तक खींचने की कोशिश करेंगे, पर सत्ता से बेदखल इमरान खान की तरफ से सियासी अस्थिरता के खतरे को देखते हुए जल्द चुनाव के खिलाफ दांव लगाना जोखिम भरा होगा.

पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने कहा है कि पिछली जनगणना के बाद निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन में देर की वजह से चुनाव करवाने के लिए कम से कम सात महीनों का वक्त चाहिए. लिहाजा चुनाव अक्तूबर से पहले नहीं हो सकते, पर उसके बाद कभी भी हो सकते हैं.

मौजूदा सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा नवंबर 2022 में सेना प्रमुख का अपना बढ़ा हुआ कार्यकाल पूरा करेंगे. इमरान के मातहत उन्हें तीन साल का दूसरा कार्यकाल दिया गया था. पाकिस्तान सरीखे देश में जहां सेना प्रमुख ही असलियत में सबसे ताकतवर शख्स होता है, नए सेना प्रमुख की नियुक्ति का नतीजा अनेक किस्म की अनिश्चितताओं के रूप में दिख सकता है.

अभी तक संकेत यही हैं कि जनरल बाजवा की दिलचस्पी आगे सेवा विस्तार में नहीं है, पर उनकी तरफ से ऐसी कोई भी कोशिश, जो यकीनन लोगों की नजरें बचाकर की जाएगी, अपनी तरह के मसले पैदा कर सकती है. इससे फौज के शीर्ष जनरलों की पदोन्नतियां रुक जाएंगी जिससे उनके बीच नाराजगी तो पैदा होगी ही. इसके अलावा इमरान खान को बेदखली की तरफ ले जाने वाले हालिया सियासी तमाशे ने भी जनरल बाजवा की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाई है, खासकर इमरान के जुनूनी समर्थकों में तो पहुंचाई ही है, जो फौज को अपने नेता के साथ 'विश्वासघात' करने वाले की तरह देखते हैं.

नवाज शरीफ की अप्रत्याशित वापसी इस अनिश्चितता को और बढ़ाती है. नवाज अक्तूबर 2019 से जाहिरा तौर पर इलाज के लिए लंदन में हैं, हालांकि अदालत की तय समय सीमा के भीतर नहीं लौटने की वजह से उन्हें 2020 में भगोड़ा घोषित किया गया था. उनकी 10 साल की जेल की सजा इस्लामाबाद हाइ कोर्ट के आदेश पर फिलहाल स्थगित है. पीएमएल-एन के कुछ सूत्रों का दावा है कि वे बहुत जल्द ईद के बाद मई की शुरुआत में ही लौट सकते हैं. जब भी लौटें, वे अपनी जेल की सजा, अपनी बेटी मरियम की सात साल जेल की सजा और साथ ही सार्वजनिक ओहदे ग्रहण करने से अपने को अयोग्य ठहराए जाने को पलटवाने की कोशिश करेंगे. इन सजाओं को 'राजनीति से प्रेरित' बताते हुए इसका दोष उन्होंने फौज के मत्थे मढ़ा है. फिलहाल स्थिति यह है कि नवाज ताउम्र और मरियम 10 साल के लिए अयोग्य हैं. पीएमएल-एन चाहेगी कि कम से कम करिश्माई मरियम अगला चुनाव लड़ने के योग्य हों. कानूनी लड़ाइयां सनसनीखेज सुर्खियों का बायस बनेंगी. नतीजे चाहे जो हों, उन्हें लेकर जबरदस्त विवाद होना तय है और उनसे शहबाज सरकार के सामने मौजूद सियासी अनिश्चितता को खुराक मिलेगी.

मुश्किल गठबंधन, गिरती अर्थव्यवस्था

निजी स्तर पर अपने परिवार के सदस्यों के साथ खुद शहबाज धनशोधन के एक बड़े मामले में इल्जामों से घिरे हैं. मामला इमरान खान के कार्यकाल में शुरू हुआ. मुकदमे के दौरान कुछ वक्त वे जेल में भी गुजार चुके हैं. उनके और उनके परिजनों पर फर्जी लेन-देनों के जरिए 7.3 अरब पाकिस्तानी रुपए से ज्यादा रकम के शोधन का आरोप है और नए वजीर-ए-आजम फिलहाल जमानत पर बाहर हैं.

शहबाज आठ पार्टियों और चार निर्दलीयों के बेढब गठबंधन को एक साथ थामे रखने की मुश्किल संभावना से भी घिरे हैं. इन पार्टियों और संसद सदस्यों का एक ही साझा लक्ष्य था—इमरान से निजात पाना. वे मानते थे कि उन्हें 2018 में फौज की जोड़-तोड़ के जरिए नाजायज तरीके से स्थापित किया गया था. तिस पर भी तौर-तरीकों और रणनीति को लेकर अक्सर उनमें झगड़े हो जाते थे. सत्ता खुद अपनी चाल-ढाल लेकर आती है और कुछ महीने भी सबको साथ लेकर चल पाना मुश्किल साबित हो सकता है.

मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट और बलूच नेशनल पार्टी-मेंगल सरीखे कुछ छोटे घटक दलों की उम्मीदें मंत्रालयों के सीधे-सादे बंटवारे तक महदूद नहीं. वे उससे आगे 'गुमशुदा लोगों', स्थानीय सरकार को हस्तांतरण और संसाधनों के प्रांतीय आवंटन सरीखे लंबे वक्त से अनसुलझे मुद्दों तक जाती हैं. ये अहम मुद्दे हैं पर साफ नहीं कि इस अल्पकालिक सरकार के पास जितना वक्त है, उसमें वह उन्हें सुलझा सकती है या नहीं, तब तो और भी जब इनमें से कुछ मुद्दों पर सर्वशक्तिमान फौज और दूसरी सियासी पार्टियों की रजामंदी जरूरी होगी.

हकीकत यह भी है कि गठबंधन के ज्यादातर साझीदारों का इरादा अंतत: एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने का है और वे पसंद नहीं करेंगे कि उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ समझौता करते देखा जाए. इस्लामाबाद के गठबंधन में पीएमएल-एन के अलावा सबसे बड़ी घटक पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) है, जिसकी सिंध प्रांत में भी हुकूमत है.

नई सरकार ने चुनाव करवाने से पहले जरूरी चुनाव सुधारों को पूरा करने की कसम खाई है. इनमें से कुछ में चुनावों को ज्यादा समावेशी और पारदर्शी बनाना भी है, ताकि 2018 में और उससे पहले जिस किस्म की चुनावी कारस्तानियों के आरोप लगे थे, उनकी गुंजाइश कम की जा सके. मगर इनमें कुछ ऐसे सुधार भी हैं, जिनमें पिछली सरकार के बगैर सोचे-समझे और संसद में जोर-जबरदस्ती से पारित कानूनों को रद्द करना या बदलना होगा. इनमें विवादित इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की शुरुआत और पाकिस्तान के नब्बे लाख से ज्यादा प्रवासियों को वोट देने की इजाजत भी शामिल है. इन सुधारों के लिए आम सहमति की जरूरत होगी. संभावित टकराव का ये एक और पिटारा है.

सियासी अनिश्चितता का असर अलबत्ता उस असल चुनौती पर पड़ेगा जो नए वजीर-ए-आजम और उनके सहयोगी दलों के सामने है. वह है अर्थव्यवस्था की चुनौती. संभावित नए वित्त मंत्री मिफ्ताह इस्माइल ने प्रेस से पहली बातचीत में दावा किया कि इमरान सरकार तबाह अर्थव्यवस्था छोड़कर गई है, जिसमें रिकॉर्ड राजकोषीय और व्यापार घाटा, कर्ज का बोझ, दहाई अंकों में महंगाई, बेकाबू गिरता रुपया और छीजता विदेशी मुद्रा भंडार है.

इस्माइल ने माना कि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए आइएमएफ के कार्यक्रम को फिर चालू करना होगा. मगर इसे फिर शुरू करने के लिए सरकार को पिछले दो-एक महीनों में लागू इमरान के कुछ लोकलुभावन उपायों को खत्म करना होगा. इसका एक मतलब तो यह होगा कि पेट्रोल की कीमतें बढ़ने पर लगी रोक हटानी होगी, जिस पर दी जा रही सब्सिडी से खजाना खाली होता जा रहा है. मगर इससे फिर महंगाई और कारोबार करने की लागतें और बढ़ेंगी. ये बेहद अलोकप्रिय उपाय होंगे, सो अलग.

यही सोचकर शहबाज के पहले ऐलानों में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाना, पेंशन में 10 फीसद का इजाफा और रमजान के दौरान सस्ता गेहूं का आटा देना शामिल था. साफ नहीं है कि इन लोकलुभावन उपायों के लिए पैसा कहां से आएगा.

एक अजीब मुश्किल स्थिति भी सरकार के सामने मुहंबाए खड़ी होगी. इमरान की आर्थिक बदइंतजामी को दुरुस्त करने की उसकी कोशिशें अगर नाकाम हो जाती हैं, तो खतरा यह है कि पिछली सरकार के खिलाफ जो जनाक्रोश था, उसका रुख इस सरकार की तरफ हो जाएगा. एक अर्थशास्त्री के मुताबिक, ''कोई भी सरकार आर्थिक तूफान का इंतजार करते हुए जिंदा नहीं रह सकती.''

बगावत की मुद्रा में इमरान

उधर, इमरान खान ज्यादा अस्थिरता पैदा करने की धमकी दे रहे हैं. उन्होंने अपनी बेदखली के खिलाफ पूरे पाकिस्तान में प्रदर्शन कार्यक्रमों का ऐलान कर दिया है. पाकिस्तान तहरीक-ए-इनसाफ (पीटीआइ) के मेंबरान ने नेशनल एसेंबली से सामूहिक इस्तीफों की पेशकश की है. पीटीआइ ने वजीर-ए-आजम के चुनाव का भी बहिष्कार किया, जिससे शहबाज सदन में 174 के मुकाबले 0 वोट से चुने गए. हालांकि खबरों से संकेत मिलता है कि पीटीआइ के अधिकांश सदस्य इस्तीफा देने को उत्सुक नहीं हैं, इमरान ने स्पष्ट कहा कि वे और उनकी पार्टी 'चोरों और लुटेरों' के साथ नहीं बैठेगी.

यह पहला मौका नहीं जब इमरान और पीटीआइ ने सड़कों पर उतरने का रास्ता अपनाया है. दरअसल, कई लोगों का मानना है कि इमरान शासन प्रमुख से ज्यादा इसी भूमिका में आराम महसूस करते हैं. ज्यादातर पर्यवेक्षक नहीं मानते कि पीटीआइ के पास अपने प्रदर्शनों को कायम रखने की ताकत है, खासकर तब जब उसने फौज के समर्थकों को अपने से दूर कर दिया है और अमीर धनदाताओं से मनमुटाव कर लिया है.

विडंबना यह है कि इमरान उसी आर्थिक संकट को कोस रहे हैं जो कुछ हद तक उन्होंने ही पैदा किया है. मगर मौजूदा फलक को कहीं ज्यादा खतरनाक बनाने वाली बात यह कि वे तीखी पश्चिम और खासकर अमेरिका विरोधी लफ्फाजी का सहारा ले रहे हैं और कह रहे हैं कि 'अमेरिकी साजिश' की वजह से उन्हें हटाया गया. इससे पाकिस्तान के रिश्ते और खासकर व्यापारिक संबंध बिगड़ने का खतरा है. 'पाकिस्तान के खिलाफ साजिश में' 'गद्दारों' के होने के आरोप उनके ज्यादातर युवा और भोले-भाले समर्थकों में जुनून भड़का सकते हैं. सेना ने '(फौज और) समाज के बीच विभाजन पैदा करने के' उनके 'प्रचार अभियान' का नोटिस लिया है.

पाकिस्तान की डांवांडोल आर्थिक हालत को देखते हुए इमरान शहबाज सरकार के तमाम अलोकप्रिय उपायों या हालत के और बिगड़ने को तेजी से झपट लेंगे और असंतोष को तीव्र करने के लिए इस्तेमाल करेंगे. जैसा कि उपन्यासकार मोहम्मद हनीफ ने द गार्जियन में लिखा है, इमरान मानते हैं कि ''अगर घर की कमान उनके हाथ में नहीं है, तो वे उसे भस्म भी कर सकते हैं.''

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