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सज गई बिसात मिशन 350 की

भाजपा ने लोकसभा चुनावों से डेढ़ साल पहले ही अपने लिए मुश्किल 160 सीटों की पहचान की. 350 से ज्यादा के लक्ष्य के तहत 160 में से हर सीट जीतने की रणनीति तैयार.

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ध्यान से सुनें : भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा पटना में पार्टी विस्तारकों को संबोधित करते हुए
ध्यान से सुनें : भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा पटना में पार्टी विस्तारकों को संबोधित करते हुए

हम सब एक ऐसी यात्रा पर निकल चुके हैं, जिसका लक्ष्य भारत को परम वैभव दिलाना है. इस यात्रा में कोई आपकी पीठ थपथपाए, कोई शाबाशी दे या कोई उपेक्षा करे, आपको प्रसन्न होने या विचलित होने की जरूरत नहीं. आज आप विस्तारक हैं, कल आप प्रदेश के अध्यक्ष भी हो सकते हैं.

यह भारतीय जनता पार्टी में ही संभव है.’’ हौसले और आत्मविश्वास को भीतर से मजबूत करने वाला यह भाषण भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा अभी पिछले ही महीने पटना में पार्टी की भविष्य की रणनीति के लिहाज से एक बड़े अहम मौके पर दे रहे थे. 21-22 दिसंबर को हुए इस प्रशिक्षण शिविर में वे 100 विस्तारक शामिल थे जो चुनावों के लिहाज से पार्टी के लिए 19 राज्यों की मुश्किल सीटों पर काम करने जा रहे थे.

यह शिविर दरअसल ऐसे दो प्रशिक्षण शिविरों की कड़ी में पहला था. 28-29 दिसंबर को हैदराबाद में हुए दूसरे शिविर में 60 विस्तारकों का प्रशिक्षण हुआ. ये विस्तारक 12 राज्यों की मुश्किल सीटों पर काम करेंगे. इन शिविरों की गंभीरता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि दोनों में राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा के अलावा पार्टी के संगठन महामंत्री बीएल संतोष, सह संगठन मंत्री शिव प्रकाश, महासचिव सुनील बंसल और एक अन्य महासचिव तथा बिहार के प्रभारी विनोद तावड़े जैसे वरिष्ठ नेता मौजूद थे. जिन राज्यों में शिविर हो रहे थे, वहां के प्रदेश अध्यक्ष, सांसद, विधायक और पार्टी के दूसरे पदाधिकारी तो थे ही. अपनी पेप टॉक में नड्डा ने इन विस्तारकों को पीएम नरेंद्र मोदी के जनकल्याणकारी योजनाओं को जन—जन तक पहुंचाने की भी हिदायत दी.

इससे 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए सत्ताधारी पार्टी की चुपचाप जमीनी स्तर पर चल रही तैयारियों का सिर्फ अंदाज लगाया जा सकता है. ये तैयारियां नितांत जमीनी यथार्थ पर खड़े रहकर की जा रही हैं. यही वजह है कि गुजरात विधानसभा चुनावों में पिछले महीने पार्टी को मिली ऐतिहासिक जीत (182 में से 156 सीटें) के बावजूद उसने 2024 के 'मुश्किल सीटों’ की संख्या 144 से बढ़ाकर 160 कर दी. उसने अतिउत्साह में आने से पूरी तरह परहेज किया.

पार्टी ने कुछ उसी तर्ज पर अगले लोकसभा चुनावों में 350 से ज्यादा सीटें हासिल करने का लक्ष्य तय किया है जिस तरह से उसने 2022 के गुजरात विधानसभा चुनावों में 150 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य रखा था. इसे नाम दिया गया है 'मिशन 350’. 160 मुश्किल सीटों की पहचान करके उन पर अभी से सुनियोजित काम करना पार्टी के इसी मिशन का हिस्सा है. जरूरत पड़ने पर मुश्किल सीटों की संख्या 160 से भी आगे बढ़ाई जा सकती है.

दरअसल, पार्टी ने पहले चरण में देश भर में 144 मुश्किल सीटों की पहचान की थी. लेकिन दो वजहों से इन सीटों की संख्या 160 की गई. पहला, बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जनता दल यूनाइटेड का भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से किनारा करना. नीतीश के विपक्षी खेमे में जाने की वजह से ही भाजपा को बिहार में मुश्किल सीटों की संख्या चार से बढ़ाकर दस करनी पड़ी. और ये दस सीटें हैं: नवादा, वैशाली, वाल्मीकि नगर, किशनगंज, कटिहार, सुपौल, मुंगेर, झंझारपुर, गया और पूर्णिया.

इसी तरह से महाराष्ट्र में पार्टी का समीकरण थोड़ा गड़बड़ाया. भाजपा को उम्मीद थी कि महाराष्ट्र प्रदेश की सत्ता से बेदखल होने के बाद वहां सत्तारूढ़ महा विकास अघाड़ी में फूट पड़ेगी उद्धव ठाकरे, कांग्रेस तथा शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में फूट पड़ जाएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. तीनों की एकता बनी हुई है. अघाड़ी की उसी एकता को देखते हुए भाजपा ने महाराष्ट्र की 10 नई सीटों को अपनी मुश्किल सीटों की सूची में शामिल किया है. राज्य की बारामती, चंद्रपुर, रायगढ़, शिरूर और सतारा जैसी सीटों को पार्टी अपने लिए मुश्किल मानकर चल रही है.

भाजपा ने इन 160 सीटों की सिर्फ पहचान ही नहीं की है. इनके लिए अलग रणनीति बनाकर अभी से ही उन पर सघन काम शुरू हो गया है. क्या करना है, उस पूरे काम के समन्वय के लिए छह नेताओं की एक संयोजन समिति बनाई गई है. राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े उसके संयोजक हैं. उनके अलावा केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, भूपेंद्र यादव, जी किशन रेड्डी, राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल और राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा समिति के सदस्य हैं. और इन सभी 160 मुश्किल सीटों में से एक-एक की जिम्मेदारी गहन प्रशिक्षण की खुराक प्राप्त एक-एक विस्तारक को दी गई है.

इतनी बारीकी से काम! टीम, समिति, विस्तारक! भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गुरुप्रकाश पासवान सवाल का आशय समझते हुए जवाब देते हैं, ''यह भाजपा की कार्यपद्धति का सहज-स्वाभाविक हिस्सा है. चुनाव की दृष्टि से पार्टी के ध्यान में वे सीटें भी होती हैं, जहां हम मजबूत हैं और उन सीटों पर भी ध्यान दिया जाता है, जहां हमें अपेक्षाकृत ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है.

इन सीटों पर मोदी सरकार की योजनाओं का ठीक से प्रचार-प्रसार हो और लोगों को यह बताया जाए कि उनकी बेहतरी के लिए केंद्र सरकार किस तत्परता से काम कर रही है, इसी नजरिए से पार्टी ने अपनी एक व्यवस्था बनाई है. हमें यकीन है कि इन मुश्किल सीटों पर भी 2024 में जीत हासिल होगी.’’

लेकिन विस्तारकों वाला पहलू थोड़ा हटकर है. उसके सामने दिए गए नड्डा के भाषण से साफ हो जाता है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की उनसे क्या अपेक्षाएं हैं. पहली बात तो यह कि स्थानीय स्तर के नेताओं से अपेक्षित सहयोग और सम्मान मिले चाहे न मिले लेकिन उन्हें अपना काम करते रहना है. उन्हें किसी तरह के शिकवे-शिकायत की झंझट में नहीं फंसना है.

दूसरी बात जो उभरकर आती है वह यह कि विस्तारकों को जमीनी स्तर पर केंद्र सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना है. यहीं एक और पहलू जुड़ता है काशी थीम का. इन विस्तारकों को मुश्किल सीटों पर काशी थीम के आधार पर काम करने को कहा गया है. इसके तहत कश्मीर, अयोध्या, सरकार की योजनाएं, ऑनर यानी गौरव और ईमानदारी को आधार बनाकर भाजपा के लिए मजबूत जमीन तैयार करने की योजना बनी है.

मुश्किल सीटों के लिए बनाई गई रणनीति और उसके क्रियान्वयन में शामिल पार्टी के एक राष्ट्रीय महासचिव अपना नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ''इन मुश्किल सीटों को चार श्रेणियों में बांटा गया है. ये श्रेणियां हैं: सर्वोत्तम, अच्छी, सुधार योग्य और बेहद खराब. सर्वोत्तम के तहत वे सीटें हैं, जहां हमने पिछले चुनाव में जीत भले न हासिल की हो लेकिन पार्टी अगर थोड़ा परिश्रम करे तो जीतने की स्थिति में आ सकती है.

अत्यंत खराब श्रेणी में वे सीटें हैं, जहां पार्टी या तो कभी नहीं जीती या फिर बहुत लंबे समय से इन सीटों पर जीत नहीं हासिल कर पाई है. मुश्किल सीटों के जातिगत और सामाजिक समीकरणों को देखते हुए इन पर सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति अपनाई जाएगी. साथ ही इन चुनाव क्षेत्रों के असरदार लोगों का समूह बनाकर उनका ऑनलाइन या ऑफलाइन संवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह या पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ कराने की योजना बनाई गई है. इनमें से कम से कम 40 सीटों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी रैली आयोजित कराने की भी योजना है. बाकी सीटों पर या तो शाह की रैली होगी या नड्डा की.’’ 

इन मुश्किल सीटों के चयन के बारे में सीएसडीएस के प्रोफेसर और लोकनीति के सह-निदेशक संजय कुमार कहते हैं, ''भाजपा के लिए चुनौती वाली इन सीटों की सूची में सोनिया गांधी की रायबरेली, कमलनाथ के प्रभुत्व वाली छिंदवाड़ा और शरद पवार के असर वाली बारामती जैसी 20—25 सीटें शामिल हैं. 2019 में भाजपा ने राहुल गांधी की सीट अमेठी से जीत हासिल की थी. ये सिर्फ एक सीट नहीं होती बल्कि इनके जीतने से यह संदेश जाता है कि विपक्षी दलों का एक मजबूत किला ढहा दिया.’’

हर सीट पर पार्टी की गतिविधियां सघन तौर पर चल सकें, इसके लिए इन सीटों में से जहां पार्टी कार्यालय का निर्माण कार्य अभी चल रहा है, उसे जल्द से जल्द पूरा करने की रणनीति बनाई गई है. उल्लेखनीय है कि देश के हर जिले में भाजपा कार्यालय बनाने का काम अमित शाह के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते ही शुरू हुआ था और उसके लिए बाकायदा आठ सदस्यों की एक समिति बनाई थी. पार्टी को उम्मीद है कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले यह काम पूरा कर लिया जाएगा.

पार्टी की व्यापक रणनीति के तहत ही मुश्किल सीटों पर केंद्रीय मंत्रियों के रात्रि प्रवास कार्यक्रम की योजना भी बनाई है. इस काम में 40 केंद्रीय मंत्री लगाए जाएंगे. हर केंद्रीय मंत्री को 3-4 लोकसभा सीटों की जिम्मेदारी दी जा रही है और उन्हें 'क्लस्टर प्रभारी’ बनाया जा रहा है. कर्नाटक और ओडिशा की कुल चार लोकसभा सीटों की जिम्मेदारी उठा रहे एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बताते हैं, ''पार्टी को लगता है कि अगर केंद्रीय मंत्री खुद आम लोगों के बीच जाकर मोदी सरकार की योजनाओं के बारे में बताएंगे तो इससे लोगों का विश्वास बढ़ेगा और लोकसभा चुनावों में पार्टी को पहले के मुकाबले बेहतर जनसमर्थन मिल पाएगा.’’

मंत्रियों को यह भी हिदायत दी गई है कि योजनाओं के लाभार्थियों से जो फीडबैक मिले उसके आधार पर संबंधित राज्यों के राज्यसभा सांसदों और स्थानीय नेताओं के साथ मिलकर लोकसभा सीटों के भौगोलिक और सामाजिक-आर्थिक समीकरण पर एक रिपोर्ट तैयार करें. इससे पार्टी इन सीटों के लिए बेहतर रणनीति बना पाएगी.

भाजपा के 160 विस्तारकों की टुकड़ी अगर मकसद में कामयाब रही तो पार्टी की जमीन का विस्तार कर डेढ़ साल बाद अपने साथ कई नए सांसदों के दस्ते लेकर लौटेगी. सचमुच?

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