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लाल आतंक का तोड़

पूर्व यूपीए सरकार के उलट, एनडीए सरकार की नई नक्सल विरोधी नीति में हिंसा से ज्यादा प्रभावी तरीके से निपटने का दावा.

नरेंद्र मोदी सरकार ने अपनी कथनी के मुताबिक नक्सलवाद से निपटने के लिए नई नीति तैयार की है जिसमें वामपंथी अतिवाद के खिलाफ  लड़ाई में ‘‘अल्पकालिक लक्ष्यों’’ की प्राप्ति पर ज्यादा जोर होगा. यह कथित लाल गलियारे के प्रति पिछली यूपीए सरकार की नीतियों से इतर आगे बढऩे की दिशा में एक नया कदम है. 

इंडिया टुडे के पास मौजूद एनडीए की नक्सल विरोधी नीति के दस्तावेज बताते हैं कि यह यूपीए सरकार के प्रभावी तबकों की ओर से रखी गई दीर्घकालिक रणनीति के बिल्कुल उलट है, जिसमें भूमि सुधार और पंचायत (अधिसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) कानून, 1996 (पेसा) के क्रियान्वयन के माध्यम से नक्सलवाद की समस्या के समाधान की वकालत की गई थी.

गृह मंत्री राजनाथ सिंह की यह नई नीति वामपंथी अतिवाद से ग्रस्त देश के उन 88 क्षेत्रों में सर्वाधिक प्रभावित 23 जिलों पर केंद्रित है. सरकार इन समस्याग्रस्त क्षेत्रों में अपने सबसे योग्य और प्रतिभासंपन्न अफसरों को नियुक्त करने की योजना बना रही है. इस योजना के तहत उन अधिकारियों के लिए विशेष प्रोत्साहन भी शामिल होगा.

इस नीति के मुताबिक, ‘‘राज्य सरकारें सबसे कुशल जिलाधिकारियों, पुलिस अधीक्षकों, एसडीओ और एसएचओ को तीन साल की स्थायी अवधि के लिए इन क्षेत्रों में नियुक्त करेंगी. प्रोत्साहन के तौर पर उन्हें अपनी पसंद के इलाके में पोस्टिंग, अतिरिक्त भत्ते, विदेश यात्राएं और केंद्र में प्रति-नियुक्ति दी जाएगी.’’ जबकि यूपीए सरकार के दौरान नक्सल विरोधी नीति खास तौर से चार राज्यों छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार और ओडिसा में केंद्रित थी, जिनमें कुल 50 जिले शामिल थे.

एनडीए सरकार की ओर से इस दिशा में किया जाने वाला एक अहम बदलाव एकीकृत कार्य योजना (आइएपी) का क्रियान्वयन है जो योजना आयोग की प्रमुख नक्सल विरोधी पहल थी. नई योजना में जिलावार विकास के पुराने तरीके को त्याग दिया गया है और अब इसे ब्लॉक स्तर पर योजनाएं लागू करने के लिए केंद्रित किया जाएगा. इसका उद्देश्य उन सर्वाधिक नक्सल ग्रस्त क्षेत्रों में विकास को गति देना है.
नक्सल प्रभावित जिले
आदिवासियों तक पहुंच
राजनाथ सिंह ने इंडिया टुडे को बताया कि आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने के लिए यह योजना कहीं ज्यादा कारगर होगी. उन्होंने आदिवासी प्रतीकों और उनके आदर्शों को ज्यादा मान्यता देने की रणनीति का खाका खींचा है, मसलन, उनके प्रतीकों के नाम पर हवाई अड्डों और सड़कों का नामकरण और उनकी जयंतियों पर बड़ा आयोजन किया जाएगा.

गृह मंत्री ने कहा कि इस नीति का मकसद आदिवासियों तक पहुंच बनाना है जिसके तहत राज्य सरकारों से आदिवासी त्योहारों को मनाने के लिए अनुदान बढ़ाने की मांग की जाएगी और उनके लिए समर्पित संग्रहालय व सांस्कृतिक केंद्र बनाए जाएंगे. नीति के तहत केंद्रीय पुलिस बलों में आदिवासियों के लिए नियुक्ति की प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी, जिसमें घोषणा की जाएगी कि ‘‘योग्यता के पैमाने पर खरा उतरने वाले आदिवासी युवकों की सामान्य श्रेणी में भर्ती पर कोई अडंग़ा नहीं होगा, बशर्ते वे अन्य तय मानकों को पूरा करते हों.’’

जबकि यूपीए शासन में केंद्रीय बलों के भीतर आदिवासी युवकों की भर्ती के कई उदाहरण ऐसे थे जिन्हें अलग-अलग वजहों से खारिज कर दिया गया. राजनाथ सिंह ने बताया, ‘‘यह एक संतुलित तरीका है. इसमें एक तरफ हमारा प्रयास आदिवासियों को मुख्यधारा में लाना है तो दूसरी तरफ उनसे कड़ाई से निपटना है जो हिंसा में लिप्त हैं.’’

नई विकास योजना में सर्वाधिक नक्सल ग्रस्त हर जिले में तीन से चार जगहों की पहचान की जाएगी, जहां विकास के केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव है. प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की जबरदस्त तैनाती के साथ सड़कों के निर्माण में तेजी लाने की योजना है. इस योजना के तहत सीआरपीएफ में एक इंजीनियरिंग प्रकोष्ठ का तेजी से गठन किया जाएगा जो इन इलाकों में उग्रवाद निरोधक बलों को रास्ता दिखा सके.

 भूतल परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय व योजना आयोग का कहना है कि यूपीए शासन में सड़क निर्माण योजना के तहत पहले चरण में 5,477 किलोमीटर में से सिर्फ  3,200 किलोमीटर सड़कें ही बनाई गई हैं, जबकि दूसरे चरण में निर्माण कार्य अनुदानों की कमी के कारण अटक गया था. दूसरे चरण में 5,600 किलोमीटर सड़कें व 48 पुल बनाने के काम में अनुमानित 9,500 करोड़ रु. की लागत आनी थी. अब मोदी सरकार की योजना इस राशि को मंजूरी देने की है.
नक्सली हमलों में मौत
गृह मंत्रालय की इस नई नीति के मुताबिक, इन कार्यों की निगरानी के लिए केंद्रीय स्तर पर मंत्रियों का एक कोर ग्रुप भी गठित किया जाएगा जिसके अध्यक्ष खुद राजनाथ सिंह होंगे और सदस्यों में वित्त, आदिवासी, ग्रामीण विकास, पंचायती राज और पर्यावरण व वन विभागों के मंत्रियों को शामिल किया जाएगा. इस समूह में विशेष आमंत्रित सदस्यों के तौर पर नक्सलवादी हिंसा  से सर्वाधिक प्रभावित सभी 10 राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल किए जाएंगे. 

हालांकि इस नई नक्सल विरोधी मुहिम को कामयाब बनाने के लिए सरकार को कई चुनौतियों से भी पार पाना होगा. प्रभावित क्षेत्रों में तैनात सुरक्षा बलों का स्पष्ट तौर पर कहना है कि वहां के पुलिस थाने बदहाल हैं. यहां तक कि बेहद बुनियादी गुप्तचर सूचनाएं तक नहीं होतीं, जैसे किसी क्षेत्र विशेष में सक्रिय माओवादी काडरों पर डॉसियर भी कई थानों में उपलब्ध नहीं कराया जाता है. कुछ जिलों में तो पुलिस और आबादी का अनुपात जरूरत से काफी कम है. राज्य पुलिस बल को नक्सलवादियों से निपटने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण भी नहीं दिया गया है.

वैसे, राजनाथ सिंह अपनी इस योजना को सफल बनाने की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं और नई नीति के असर को लेकर उन्हें काफी उम्मीदें हैं. लेकिन इन उम्मीदों को उन जमीनी सचाइयों से चुनौती मिलने वाली है जिनसे सुरक्षा बलों को रोजाना दो-चार होना पड़ता है.

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