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खास रपटः महामारी में जमकर मुनाफाखोरी

जीवनरक्षक दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कमी तो थी ही, उनकी डिलिवरी में भी आ रही मुश्किलों ने कोविड मरीजों के हैरान-परेशान परिजनों को लार टपकाते काला बाजारियों के हवाले कर दिया.

शर्म नहीं आती नवनीत कालरा को जांच के लिए दिल्ली पुलिस दिल्ली में खान मार्केट लाती हुई, जहां उसका रेस्तरां खान चाचा स्थित है; (नीचे) रेस्तरां में बरामद ऑक्सीजन कंसंट्रेटरों का ढेर शर्म नहीं आती नवनीत कालरा को जांच के लिए दिल्ली पुलिस दिल्ली में खान मार्केट लाती हुई, जहां उसका रेस्तरां खान चाचा स्थित है; (नीचे) रेस्तरां में बरामद ऑक्सीजन कंसंट्रेटरों का ढेर

नई दिल्ली के 53 वर्षीय उद्यमी असीम भाटिया 26 अप्रैल की रात 41 वर्षीया कोविड पॉजिटिव बहन के लिए रेम्डेसिविर इंजेक्शन का बेताबी से इंतजार कर रहे थे. बहन का ऑक्सीजन स्तर 80 से नीचे आ गया था और डॉक्टरों ने कह दिया था कि कुछ घंटों के भीतर रेम्डेसिविर देना जरूरी है.

शहर में दवा की अनेक दुकानों के चक्कर लगा रही भाटिया की टीम रात 2 बजे बाद लौटी. उनके पास इंजेक्शन की दो खुराक (तीन शीशियां) थीं जो उन्होंने रोहिणी के एक मॉल के बाहर खड़े एक ‘सप्लायर’ से 80,000 रुपए में खरीदी थीं. मगर भाटिया हतप्रभ रह गए जब उन्होंने देखा कि ये शीशियां नकली हैं और दवा का नाम तक उन पर गलत लिखा है.

भाटिया याद करते हैं, ‘‘हमें उस रात रेम्डेसिविर की बेइंतहा जरूरत थी. हमने हर मुमकिन केमिस्ट से पता किया और ड्रग कंट्रोलर के दफ्तर भी गए जहां एक कर्मचारी तक न था.’’ उन्होंने दूसरी दवाइयां भी एमआरपी से कई गुना ज्यादा पर खरीदीं. भाटिया की बहन को अगली सुबह अस्पताल में भर्ती करना पड़ा जहां उन्हें प्लाज्मा दिया गया. वे अब घर लौट आई हैं और कहती हैं कि यह ‘‘नर्क से गुजरने’’ जैसा था.

तबाही मचा देने वाली कोविड महामारी ने हमारी तैयारी और रणनीति को उघाड़कर रख दिया. अस्पताल भारी बोझ से दबे थे, श्मशानों और कब्रिस्तानों में जगह कम पड़ गई, मांग के मुताबिक कोविड की जांच नहीं हो पा रही थी और टीका अभियान तो अब भी पटरी से उतरने के जोखिम से घिरा है.

बदतर यह कि रेम्डेसिविर और टॉसिलिजुमैब जैसी अहम दवाइयों और ऑक्सीजन सिलिंडर तथा कंसंट्रेटर सरीखी जीवनरक्षक चीजों की आपूर्ति में भारी कमियों और खामियों ने जबरदस्त कालाबाजारी को बढ़ावा दिया. इससे हजारों लोगों को जिंदगी बचाने वाली अहम दवाइयों और उपकरणों के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी.

संकट की विकरालता सोशल मीडिया पर जाहिर हुई. दिल्ली और दूसरे महानगरों के हताश अस्पताल प्रशासकों ने ट्विटर का सहारा लेकर ऑक्सीजन की कमी की तरफ ध्यान दिलाया. बदहाल नागरिक फेसबुक और व्हाट्सऐप पर मिलने वाली सूचनाओं के सहारे प्लाज्मा, कोविड की दवाइयों और ऑक्सीजन सिलिंडर की खोज में बेतहाशा दौड़े.

आम तौर पर कुछ सौ रुपए में मिलने वाला 5-10 लीटर मेडिकल ऑक्सीजन का सिलिंडर कई हताश परिवारों को 30,000 से 60,000 रु. में बेचा गया. ऑक्सीजन सिलिंडरों की कमी के चलते शहरों में आयातित ऑक्सीजन कंसंट्रेटर का अब तक मंद पड़ा कारोबार खूब फला-फूला. उनकी मांग जब उपलब्धता से बहुत ज्यादा बढ़ गई, तो कालाबाजारियों की बन आई.

बेहिसाब मुनाफा
दिल्ली पुलिस ने 29 अप्रैल को एक गिरोह से 170 ऑक्सीजन सिलिंडर बरामद किए. वह इन्हें 1 लाख रु. तक में बेच रहा था. भारतीय दंड संहिता और महामारी रोग कानून 1897 के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज करके चार लोगों को गिरफ्तार किया गया. पुलिस के छापामार दस्ते प्रमुख कारोबारियों के दरवाजों पर पहुंचे.

दिल्ली पुलिस ने 7 मई को उद्यमी नवनीत कालरा की मिल्कियत वाले तीन रेस्तरांओं से 500 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर जब्त किए. पुलिस का कहना है कि कालरा जीवन-रक्षक साबित हो रहे ऑक्सीजन कंसंट्रेटरों की जमाखोरी और कालाबाजारी में लिप्त था.

दो अदालतों ने गिरक्रतारी से अंतरिम बचाव की कालरा की याचिकाएं खारिज कर दीं. 16 मई को उसे उसके साले के गुरुग्राम स्थित फार्महाउस से गिरक्रतार कर लिया गया. इससे पहले दिल्ली की मेट्रोपोलिटन अदालत ने मामले की जांच कर रहे अफसरों के खिलाफ तीखी टिप्पणियां कीं. अदालत ने कहा, ‘‘आप लोगों को महज इसलिए गिरफ्तार नहीं कर सकते क्योंकि हम हाइ कोर्ट को खुश करना चाहते हैं.

आपने एमआरपी से ज्यादा दाम पर न बेचने का आदेश 7 मई को दिया. यह एफआइआर 5 मई की है. उस दिन कोई अपराध नहीं हुआ. कोई नियम नहीं था. अपनी नाकामी छिपाने के लिए आप दिखा रहे हैं कि हम लोगों को गिरफ्तार कर रहे हैं. आप सजा का आतंक पैदा कर रहे हैं. यह सरकार का काम नहीं. नहीं है तो पहले कानून बनाएं.’’

इसी तरह रेम्डेसिविर की कालाबाजारी तब भी जारी रही जब 17 अप्रैल को केंद्र सरकार की नियामक एजेंसी राष्ट्रीय दवा मूल्य निर्धारण प्राधिकरण ने ऐलान कर दिया था कि सात प्रमुख दवाओं की कीमतें (करीब 70 फीसद) घटा दी गई हैं, ताकि उनकी 100 मिलीग्राम की शीशी 1,000 से 2,700 रुपए के बीच मिल सके. कैडिला हेल्थकेयर रेमडैक 899 रुपए में दे रही है, जो अब सबसे सस्ती है.

रेम्डेसिविर के फायदों को लेकर दुनिया भर में बहस छिड़े होने के बाद भी भारत में कोविड के गंभीर मरीजों के इलाज में इसका इस्तेमाल जारी है. मैन्युफैक्चरर इसकी बेतहाशा बढ़ती मांग पूरी करने के लिए जूझ रहे हैं. रेम्डेसिविर की भारी मांग के चलते भोले-भाले ग्राहक बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी के शिकार हुए. नजफगढ़ के 38 वर्षीय अभिषेक जैन अपने बीमार चचेरे भाई के लिए रेम्डेसिविर खोजते हुए धोखाधड़ी के फेर में पड़ गए.

उन्होंने इन इंजेक्शनों के लिए किसी ‘सिप्ला फाउंडेशन लिमिटेड’ को 20,400 रुपए चुकाए, पर इंजेक्शन नहीं आए. उन्होंने फोन पर ‘कंपनी के एक नुमाइंदे’ का पीछा किया, पर बाद में उसने फोन उठाना ही बंद कर दिया. जैन ने जब दूसरे फोन नंबर से फिर रेम्डेसिविर बुक की तो उन्हें भुगतान के लिए दूसरा एकाउंट नंबर दिया गया. वे बताते हैं कि नजफगढ़ पुलिस थाने पर कुछ हफ्ते पहले दर्ज की गई उनकी शिकायत का कोई जवाब उन्हें नहीं मिला.

हल्के/ बगैर लक्षण वाले कोविड मरीजों के होम आइसोलेशन के लिए अप्रैल के आखिर में जारी संशोधित दिशानिर्देशों में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि रेम्डेसिविर केवल अस्पताल की व्यवस्था में ही दी जानी चाहिए. मगर बेहद गंभीर मरीजों के लिए भी अस्पताल के बिस्तरों की घोर कमी के चलते कई डॉक्टरों को मजबूर होकर घर पर ही यह इंजेक्शन लेने की सलाह देनी पड़ी.

कई बार अस्पताल खुद अपने मरीजों के लिए इंजेक्शन हासिल नहीं कर पाए और उन्होंने परिजनों ने इन्हें जुटाने के लिए कहा. एक निजी हॉस्पिटल चेन के बड़े डॉक्टर ने इंडिया टुडे से कहा कि हरियाणा स्थित उनका अस्पताल 100-150 रेम्डेसिविर की अर्जी रोज प्रदेश सरकार को भेजता है मगर आम तौर पर महज 5-6 की ही मंजूरी मिलती है (तभी तीमारदारों से इंजेक्शन लाने के लिए कहा जाता है). वैसे, अधिकारियों की सफाई होती है कि फार्म सही ढंग से भरे नहीं गए.

कानूनी पहलू
कोविड के लिए जरूरी चीजों की अंधाधुंध जमाखोरी और कालाबाजारी को लेकर अदालतों ने भी तल्ख टिप्पणियां कीं. दिल्ली हाइ कोर्ट ने कहा कि कालाबाजारी ने लोगों के नैतिक तानेबाने को ‘तार-तार कर दिया.’ उसने केंद्र और दिल्ली सरकार से अदालतों के कहे बगैर कार्रवाई करने को कहा.

केंद्र सरकार भी अपनी चिंताएं जाहिर करती रही. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 अप्रैल को राज्य सरकारों से आग्रह किया कि वे दवाइयों और ऑक्सीजन सिलिंडर सरीखी कोविड से जुड़ी जरूरी चीजों की जमाखोरी और कालाबाजारी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें. 14 मई को पीएम-किसान योजना के लाभार्थियों की नई किस्त जारी करते वक्त भी उन्होंने यह अपील दोहराई.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय भी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जमाखोरों को दबोचने के लिए कहता रहा. अप्रैल के पहले हफ्ते में राज्यों के मुख्य सचिवों को भेजे एक नोट में केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव अजय भल्ला ने राज्य सरकारों से कहा कि अनिवार्य चीजों की सुचारु आपूर्ति बनाए रखने के लिए वे अनिवार्य वस्तु कानून 1955 के प्रावधानों का सहारा लेने पर विचार कर सकते हैं. (इस कानून के तहत अपराधों के लिए सात साल तक की कैद का प्रावधान है.) भल्ला के नोट में कहा गया कि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश उल्लंघन करने वालों को कालाबाजारी की रोकथाम और अनिवार्य वस्तु आपूर्ति रखरखाव निवारण अधिनियम 1980 के तहत हिरासत में लेने पर भी विचार कर सकते हैं.

पिछले माह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कोविड संकट पर खुद-ब-खुद लिए गए एक मामले में एमिकस क्यूरी बनाए गए वरिष्ठ वकील जयदीप गुप्ता कहते हैं, ‘‘कालाबाजारी आर्थिक अपराध का ही रूप है. महामारी रोग कानून से जुड़े होने पर भारतीय अदालतें इससे कड़ाई से निबटती हैं. आर्थिक अपराधों से कहीं ज्यादा कड़ाई से निपटा जाना चाहिए क्योंकि वे ज्यादा लोगों को प्रभावित करते हैं.’’

कालाबाजारी की रोकथाम से जुड़े 1980 के कानून के तहत अनिवार्य वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा डालने वाले शख्स को अधिकतम छह माह की कैद भुगतनी होती है. पिछले साल सरकार ने इस कानून की अनिवार्य वस्तुओं की फेहरिस्त में महामारी के दौरान मास्क, सैनिटाइजर और दवाई सरीखी चीजें भी जोड़ दीं.

बेहयाई का बाजार
बेहयाई का बाजार

अगर अस्पष्ट बातों को साफ न किया जाए तो कानूनों का ज्यादा मतलब नहीं रह जाता. सुप्रीम कोर्ट की वकील अपर्णा भट कहती हैं, ‘‘क्या किसी ऐसे व्यक्ति को हिरासत में लिया जा सकता है जो फर्ज कीजिए कि ‘अनिवार्य’ घोषित की गई कोई निश्चित वस्तु हासिल करने में लोगों की मदद करना चाहता है? कोई (साफ) प्रोटोकॉल नहीं है कि किसी को कैसे गिरफ्तार किया जा सकता है.’’

उम्मीद की किरण
केंद्र इस दौरान पूरे समय दावा करता रहा कि देश में कोविड की दवाइयों और मेडिकल ऑक्सीजन की कमी नहीं है और इनकी सुचारू आपूर्ति बनाए रखने की कोशिशें की जा रही हैं. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में जो कहा, उसके मुताबिक, 21 अप्रैल को देश के इस्पात संयंत्रों के स्टोरेज टैंकों में कुल मेडिकल ऑक्सीजन बहुत ज्यादा कोविड मामलों वाले 12 राज्यों की कुल मांग से तीन गुना—4,880 मीट्रिक टन मांग के मुकाबले करीब 16,000 मीट्रिक टन तरल ऑक्सीजन—मौजूद थी.

हाल में सरकार ने आयातित ऑक्सीजन और उससे जुड़े साजो-सामान पर सीमा शुल्क और स्वास्थ्य उपकर माफ कर दिया. इसके अलावा विदेशों से क्रायोजेनिक ऑक्सीजन कंटेनर लाने के काम में भारतीय वायु सेना और भारतीय नौसेना को लगा दिया. रेम्डेसिविर के मामले में केंद्र ने अप्रैल में ऐलान किया कि इन्हें बनाने वाले सात मैन्युफैक्चरर की कुल क्षमता प्रति माह करीब 39 लाख शीशियों से बढ़ाकर करीब 79 लाख शीशी की जा रही है.

इसकी खातिर सात अतिरिक्त उत्पादन इकाइयां लगाने को छह मैन्युफैक्चरर्स को फास्ट-ट्रैक मंजूरियां दी गईं. घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए 11 अप्रैल को रेम्डेसिविर एपीआइ और फॉर्मूलेशन के निर्यात पर रोक लगा दी गई.

ये बेशक सरकार की तरफ से उठाए गए स्वागत योग्य कदम हैं. मगर कोविड से जुड़ी चीजों की कालाबाजारी मजबूती के साथ बंद करने के लिए डिलिवरी और डिस्ट्रीब्यूशन की बाधाओं को भी दुरुस्त करना होगा. खासकर गोवा और दिल्ली सरीखे परेशान हाल राज्यों में, जहां अस्पतालों में मेडिकल ऑक्सीजन की कमी के चलते मौतों का तांता लग गया. 

आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत अपराध में सात साल तक की जेल की सजा हो सकती है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सब कुछ इस कानून को ठीक से लागू किए जाने पर निर्भर करता है.

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