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खास रपटः मुनाफाखोरी का मकडज़ाल

घटे हुए जीएसटी का फायदा उपभोक्ता को नहीं देने वाली कंपनियों की मुनाफाखोरी एनएएए ने पकड़ी और उनसे रकम निकलवाई. एनएए के आदेश के खिलाफ कंपनियां हाइकोर्ट चली गई हैं. मुनाफाखोरी के जंजाल की एक पड़ताल.

मुनाफाखोरी के जंजाल की एक पड़ताल मुनाफाखोरी के जंजाल की एक पड़ताल

उद्योगों के शीर्ष संगठन फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (फिक्की) ने बीते साल दिसंबर के दूसरे पखवाड़े में वित्त मंत्री को बजट के लिए भेजी अपनी अनुशंसा में जीएसटी के तहत मुनाफाखोरी रोधी (ऐंटी प्रॉफिटियरिंग) प्रावधानों को हटाने की अपील की है. उद्योग चाहते हैं कि जीएसटी की धारा 171 खत्म कर दी जाए. इतना ही नहीं दर्जनों कंपनियां राष्ट्रीय मुनाफाखोरी रोधी प्राधिकरण (एनएए) के आदेशों के खिलाफ दिल्ली हाइकोर्ट में केस लड़ रही हैं.

ये प्राधिकरण धारा 171 के तहत ही गठित हुआ है. दरअसल, देश में मुनाफा कमाने पर कोई नियंत्रण नहीं है, एक जैसे दो उत्पादों की कीमतों में जमीन आसमान का फर्क होता है पर इसे किसी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती. लेकिन सरकार उपभोन्न्ता हित में फैसला लेकर जब टैक्स घटाती है तो उपभोक्ता को उसका उतना ही लाभ देना कंपनियों के लिए जीएसटी लागू होने के बाद से बाध्यकारी हो गया है. यही कंपनियों की तकलीफ का सबब है. अब तक एनएए एफमसीजी, रियल एस्टेट, रेस्तरां, इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी दर्जनों कंपनियों को करीब 1,800 करोड़ रुपए की मुनाफाखोरी का दोषी ठहरा चुका है जो उपभोक्ताओं के हिस्से के थे.

सीजीएसटी ऐक्ट 2017 की धारा 171 (1) कहती है कि माल या सेवा की किसी भी सप्लाइ पर टैक्स दरों में कटौती या इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ उसी अनुपात में कीमतें घटाकर ग्राहक को दिया जाएगा. इसी कानून की आगे की धाराएं कहती हैं कि ग्राहक को जीएसटी दरों में कटौती या इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ जीएसटी के तहत रजिस्टर्ड व्यक्ति ने दिया है या नहीं, इसकी जांच एक अथॉरिटी (एनएए) करेगी. अथॉरिटी देखेगी कि रजिस्टर्ड व्यक्ति या फर्म ने मुनाफाखोरी की है या नहीं. मुनाफाखोरी साबित होने पर मुनाफाखोरी की रकम उपभोक्ता कल्याण कोष (सीडब्ल्यूएफ) में जमा कराएगा. 30 दिन के भीतर मुनाफाखोरी की रकम जमा नहीं की तो 10 प्रतिशत अर्थदंड का प्रावधान है. 

मुनाफाखोरी की शिकायतों की छानबीन के लिए राज्यों में स्क्रीनिंग कमेटी और केंद्र में स्टैंडिंग कमेटी है. शिकायतों की जांच डायरेक्टरेट जनरल ऐंटी प्रॉफिटियरिंग (डीजीएपी) की तरफ से की जाती है. डायरेक्टरेट जनरल जांच में किसी भी एजेंसी से राय ले सकता है. जांच पूरी होने के बाद छह महीने के भीतर नेशनल ऐंटी प्रॉफिटियरिंग अथॉरिटी (एनएए) अपना फैसला सुनाती है. अथॉरिटी का सबसे चर्चित और महत्वपूर्ण फैसला एफएमसीजी कंपनी हिंदुस्तान लीवर लिमिटेड (एचयूएल ) का रहा है.

एचयूएल का कहना था कि मुनाफाखोरी का आरोप लगाते वक्त इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कंपनी ने उपभोक्ताओं को अतिरिक्त मात्रा में सामान, कीमतों में छूट का फायदा दिया है. सीजीएसीटी के नियम 126 के मुताबिक, मुनाफाखोरी की गणना की पद्धति और प्रक्रिया (मेथडोलॉजी ऐंड प्रोसीजर) तय करने का अधिकार अथॉरिटी को है लेकिन उसने पद्धति तय नहीं की है. कंपनी ने सीडब्ल्यूएफ में 124.04 करोड़ रुपए जमा करा दिए हैं जो जीएसटी घटने के बाद से उसने अतिरिक्त तौर पर कमाए थे. ये पैसे जांच शुरू होने से पहले स्वत: संज्ञान लेते हुए जमा करा दिए गए. 

फैसले में लिखा कि 10 नवंबर, 2017 को हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक में दरें घटाने का फैसला हुआ जो कि 15 नवंबर से प्रभावी हुआ. अतिरिक्त मात्रा में सामान देकर उपभोक्ता को घटे हुए टैक्स का फायदा पहुंचाना एक तरीका हो सकता है क्योंकि बहुत कम कीमत के उत्पादों के दाम घटाना मुश्किल होता है (एक रु. के शैंपू का दाम घटाकर 92 पैसे नहीं किया जा सकता). अथॉरिटी ने कहा कि अगर आप ग्रामेज बढ़ाएंगे तो उसी तारीख से ग्रामेज बढ़ाएंगे. उसी अनुपात में जितने रुपए का टैक्स घटा है ग्रामेज बढ़ाएंगे. ये आपकी पहले से चल रही किसी व्यावसायिक योजना का हिस्सा नहीं होगा. ग्रामेज के मामले में अथॉरिटी ने अधिकारक्षेत्र से बाहर जाकर व्यवहारिक नजरिया अपनाया है.

अथॉरिटी का मानना है कि कीमतों में भारी कटौती कंपनी का व्यावसायिक निर्णय हो सकता है और जीएसटी कटौती का फायदा इससे बिल्कुल अलग है. यह फायदा कंपनी को हर वस्तु पर अलग-अलग देना होगा. गणना की मेथडोलॉजी और प्रोसीजर वेबसाइट पर जारी किया गया है. अथॉरिटी अपने फैसलों में स्पष्ट कर चुकी है कि उसे पद्धतियां तय करने का अधिकार है. गणना में अनेक पद्धतियां अपनाई जाती हैं. एफएमसीजी, रेस्तरां, कंस्ट्रक्शन और सिनेमा अलग-अलग सेक्टर हैं और इनके लिए गणना की अलग पद्धतियां अपनाई जाती हैं.

एचयूएल के फैसले में कहा गया कि एचयूएल ने कीमतें न घटाने का फैसला करते हुए तब स्वेच्छा से सीडब्ल्यूएफ में पैसा जमा करा दिया जब उसे एहसास हो गया कि अब उसके खिलाफ मुनाफाखोरी की शिकायत हो चुकी है. पैकेजिंग मटीरियल में दाम बदलने पर कानून के मुताबिक नई कीमत का स्टिकर चिपकाया जा सकता है.

एफएमसीजी इंडस्ट्री में वजन, मात्रा या संख्या के आधार पर छूट देने की योजनाएं जैसे, बाइ वन गेट वन, दो की कीमत में तीन, पांच ग्राम की कीमत में सात ग्राम या एक लीटर की कीमत में दो लीटर, चलती रहती हैं. इसे निर्माता और उपभोन्न्ता दोनों कीमतें घटाना ही मानते हैं. लेकिन अथॉरिटी का कहना है कि टैक्स घटेगा तो टैक्स ही घटाना होगा, बेचने की स्कीम से इसका कोई संबंध नहीं है. 

रियल एस्टेट पर भी जीएसटी कटौती का अच्छा खासा असर हुआ लेकिन बिल्डरों ने बिल्डर बायर एग्रीमेंट की आड़ में उपभोक्ताओं से पुरानी कीमत वसूली. अथॉरिटी ने कई फैसलों में सैकड़ों ग्राहकों को घटी हुई कीमत का लाभ दिलाया. 

एनएए और इसके आदेशों के खिलाफ दर्जनों शीर्ष कंपनियों ने दिल्ली हाइकोर्ट, बॉम्बे हाइकोर्ट और पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट में याचिकाएं लगाई हैं. सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्टों में दाखिल याचिकाओं को दिल्ली हाइकोर्ट ट्रांसफर कर दिया है. दिल्ली हाइकोर्ट में सुनवाई के दौरान अनेक आपत्तियां कंपनियों की तरफ से एनएए और उसके फैसलों पर उठाई गईं. सभी पक्षों की सहमति के बाद 14 बिंदुओं पर बहस होना तय हुआ है.

इनमें जीएसटी की धारा 171 को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) यानी व्यापार या कारोबार की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 14 के तहत समानता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाली बताया गया है. साथ ही इसे जीएसटी के भी प्रावधानों के विपरीत बताया गया है. फिलहाल इन बिंदुओं पर दिल्ली हाइकोर्ट में बहस शुरू भी नहीं हुई है.

हाइकोर्ट में 51 कंपनियों के वकील और खेतान ऐंड कंपनी के पार्टनर अभिषेक रस्तोगी कहते हैं, ‘‘सेक्शन 171 में कमंसुरेट रिडक्शन कहा गया है, यह एक्चुअल नहीं है. इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं है. इन्होंने गणना की पद्धति निर्धारित नहीं की है. एक उत्पाद कई तरह की चीजों से मिलकर बनता है और सब पर अलग-अलग टैक्स लगता है. प्रॉफिट की गणना की पद्धति तय नहीं है इसलिए इसका नतीजा तो गलत आएगा ही. रियल एस्टेट के लिए अलग और एफएमसीजी के लिए अलग गणना पद्धति है.

किसी भी कारोबार को अपने उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार है और प्राधिकरण के आदेश इस अधिकार का भी उल्लंघन करते हैं. हम कीमत घटाने की गणना कैसे करें, लेकिन इसकी पद्धति नहीं बताई इसलिए कंपनियां उपभोक्ताओं को इसका फायदा सीधे नहीं दे पाती हैं. पूरे मामले में स्थिति स्पष्ट नहीं है.’’ इंडस्ट्री के तरफदार कहते हैं कि अगर जीएसटी काउंसिल एनएए को नहीं हटा सकती है तो वह कम से कम मुनाफाखोरी की गणना की पद्धति तय कर दे.

जानकार कहते हैं कि जब कीमत तय करने का अधिकार कंपनियों को है और उस पर कोई नियंत्रण नहीं है तो फिर इसमें कारोबार करने की स्वतंत्रता का कहां से हनन हो गया. अगर सरकार 500 करोड़ रुपए का टैक्स घटाती है तो यह एक तरह से डीबीटी है. अगर प्रोडक्ट ऐसा है जिसमें कंज्यूमर आइडेंटिफाइ हो सकता है तो उसे अथॉरिटी सीधे न्याय दिलाती है. जैसे कार के मामले में तो कंज्यूमर की पहचान होती है इसलिए उसे सीधा फायदा दिया दिलाया गया. जहां कंज्यूमर की पहचान नहीं होती वहां पैसा उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा कराया जाता है.

उपभोक्ता मामलों की प्रक्चयात लेखिका पुष्पा गिरिमाजी का कहना है, ''एनएए कतई गैर संवैधानिक नहीं है. जीएसटी से पहले भी जब ड्यूटी बढ़ती थी तो कंपनियां तुरंत उत्पाद महंगे कर देती थीं लेकिन जब करों में कटौती होती थी तो कंपनियां कीमतें घटाकर उपभोक्ताओं को राहत नहीं देती थीं. तब बहुत शिकायतें हुईं. यह पुराना झगड़ा है. 1992 के बाद ड्यूटी में कटौती तेजी से शुरू हुई थी.

बहुत सारे उद्योगों ने दाम नहीं घटाए या काफी कम घटाए. सालों पहले एक संसदीय समिति ने भी इस पर चिंता जताई थी.’’ गिरिमाजी यह भी कहती हैं, ''ड्यूटी घटाने के लिए कंपनियों की निगरानी का पहले कोई तंत्र नहीं था. उपभोक्ता के लिए यह पता करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि किसी उत्पाद पर टैक्स घटा है या नहीं. एनएए जैसी संस्थाओं की बहुत जरूरत है. कंज्यूमर कोर्ट के फैसले तो इक्का-दुक्का हुए हैं लेकिन इनका व्यापक असर नहीं था.’’ 

राजस्थान हाइकोर्ट में जीएसटी डिपार्टेमेंट के सीनियर स्टैंडिंग काउंसिल सिद्धार्थ रांका कहते हैं, ''जीएसटी का फायदा कंज्यूमर को होना चाहिए न कि कारोबारी को और अगर कंज्यूमर का फायदा कंपनियां डकारेंगी तो जीएसटी बेमतलब हो जाएगा. पहले इस तरह की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं थी. टैक्स चूंकि कंज्यूमर देता है इसलिए उसमें कटौती का फायदा भी उसे होना चाहिए. अगर कंपनी को ज्यादा मुनाफा कमाना है तो उत्पाद की कीमतें बढ़ा सकती है.’’

एनएए का कार्यकाल नवंबर 2021 को खत्म हो जाएगा. इस पर गिरिमाजी कहती हैं, जहां तक सनसेट क्लॉज की बात है तो शायद सरकार को उम्मीद रही होगी कि समय के साथ इंडस्ट्री खुद ही उपभोक्ता को इसका फायदा दे देगी. लेकिन इंडस्ट्री अपने आप ऐसा नहीं कर रही है. वे बहानेबाजी कर रहे हैं और मुकदमेबाजी पर आमादा हैं. वे कहती हैं, ''हमने पहले भी यह मांग की थी कि एमआरपी पर पर अंकुश लगाया जाए. उदाहरण के लिए, कुछ चीजों पर एमआरपी 900 रु. लिखी होगी लेकिन दुकानदार उसे 400 रु. में बेचता है.

हमने पहले भी सरकार से मांग की थी कि वस्तुओं पर एक्स फैक्टरी प्राइस लिखने की मांग की थी ताकि पता चल सके कि इस पर कितना मार्जिन और टैक्स उत्पादन लागत के बाद लिया जा रहा है. लेकिन यह मांग नहीं मानी गई. हमें ये पता होना चाहिए कि दुकानदार किसी उत्पाद पर कितना कमा रहा है. इससे उपभोक्ता कीमत घटाने का दबाव बना सकेंगे.’’ सरकार कहती है कि प्रतिस्पर्धा से कीमतें घटेंगी लेकिन ऐसा होता नहीं दिखता क्योंकि सभी महंगा सामान बेच रहे हैं.  

जानकार कहते हैं कि नवंबर 2021 के बाद मुनाफाखोरी तो बंद होगी नहीं तो या तो इस काम को किसी और बॉडी को दे दिया जाएगा या फिर मुनाफाखोरी की छूट मिल जाएगी. जरूरत कंज्यूमर के हित में इसे और मजबूत करने की है. बहरहाल, अगर आपको किसी कंपनी से मुनाफाखोरी की शिकायत है तो इसे एनएए की वेबसाइट पर ऑनलाइन सीधे भेज सकते हैं, राज्य के जीएसटी कमिशनर को भेज सकते हैं, प्लेन पेपर पर लिखकर भेज सकते हैं और जब शिकायती नहीं होता है तो एनएए खुद ही मुनाफाखोरी का संज्ञान ले लेता है.

मुनाफाखोरी रोधी प्राधिकरण ने चलाया कंपनियों पर डंडा

-200 से ज्यादा फैसले सुनाए अब तक  
-1,300 करोड़ रु. रुपए की मुनाफाखोरी सिद्ध की 
-600 करोड़ रुपए कंज्यूमर की जेब में या कंज्यूमर वेल्फेयर फंड में आ गया

मुनाफाखोरी पर चर्चित फैसले
एनएए ने एफएमसीजी से लेकर रियल एस्टेट और रेस्तरां से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों को मुनाफाखोरी का दोषी पाया है. कुछ चुनिंदा फैसले:

एचयूएल 
दिसंबर 2018 में हिंदुस्तान यूनीलीवर लिमिटेड (एचयूएल) के मामले में दिए निर्णय में कंपनी को कुल 535 करोड़ रु. की मुनाफाखोरी का दोषी पाया गया. इसमें 26 नवंबर 2017 को एक शिकायतकर्ता ने नाम छिपाने के अनुरोध के साथ शिकायत की कि जीएसटी दरों को 28 से 18 प्रतिशत किए जाने के बावजूद कंपनी ने अनेक उत्पादों के दाम नहीं घटाए हैं और उल्टे वस्तुओं की मूल कीमत बढ़ा दी है.

जब केस एनएए पहुंचा तब तक कंपनी ने मुनाफाखोरी की रकम की गणना खुद की और बड़ी रकम उपभोक्ता कल्याण कोष (सीडब्ल्यूएफ) में जमा करा दी. डीजीएपी ने अपनी पड़ताल में पाया कि कंपनी करीब 3,200 तरह के उत्पाद बनाती है और इनमें से करीब 900 पर 15 नवंबर 2017 को जीएसटी घटाने का असर पड़ा. कंपनी ने कुछ वस्तुओं के पैक में मात्रा बढ़ाकर लाभ दिया जिससे मुनाफाखोरी की रकम से 62 करोड़ रु. घटाए गए. 

सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स  
सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स ने 32 इंच के टीवी, मॉनिटर और एक पावरबैंक पर 1 जनवरी 2019 से 28 प्रतिशत से 18 प्रतिशत किए गए जीएसटी का फायदा ग्राहकों को नहीं दिया. इसकी शिकायत की जांच डीजी ऐंटी प्रॉफिटियरिंग ने की और पाया कि देशभर में 32 इंच के टीवी और पावरबैंक बढ़ी टैक्स दरों पर ग्राहकों को बेचकर कंपनी ने 37.85 लाख रु. की मुनाफाखोरी की है. एनएए ने मुनाफाखोरी की रकम सीडब्ल्यूएफ में जमा कराने का आदेश दिया. सैमसंग ने डीजीएपी की गणना पर सवाल उठाए लेकिन अथॉरिटी ने टीवी की औसत कीमत और इनवॉइस के आधार पर गणना की पद्धति को सही पाया. यह फैसला 27 फरवरी, 2020 को आया.

मैकडोनॉल्ड्स रेस्तरां 
हार्डकैसल रेस्टोरेंट प्रा. लि. दक्षिण और पश्चिमी भारत के 10 राज्यों में मैकडोनॉल्ड्स रेस्तरां संचालित करती है. कंपनी ने 15 नवंबर 2017 से रेस्तरां पर 18 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत किए गए जीएसटी का फायदा ग्राहकों को नहीं दिया. मैकडोनॉल्ड्स ने मैकेफे रेगुलर लाते (एक तरह की कॉफी) 7 नवंबर को 142 रु. में बेची और जीएसटी 18 से 5 फीसद हो जाने के बाद भी इसी कीमत पर बेची. डीजीएपी ने कहा कि 1,844 उत्पाद बेचने वाली इस कंपनी ने जीएसटी तो 5 फीसद ही लिया लेकिन 93 प्रतिशत से ज्यादा (1730) उत्पादों की बेस प्राइस बढ़ाकर वही कीमत वसूली जो कि जीएसटी घटाने से पहले थी. इसमें मुनाफाखोरी की रकम 7.49 करोड़ रु. थी.

डोमिनोज 
31 जनवरी, 2019 के आदेश में एनएए ने डोमिनोज पिज्जा की कंपनी जुबिलिएंट फूड्स को गार्लिक ब्रेड और मीडियम वेज पिज्जा की कीमतों में टैक्स कटौती का लाभ उपभोक्ताओं को न देने पर 41 करोड़ रु. से ज्यादा की मुनाफाखोरी का दोषी पाया. 

नेस्ले 
मैगी जैसे लोकप्रिय उत्पाद बनाने वाली कंपनी नेस्ले को एनएए ने करीब 90 करोड़ रु. की मुनाफाखोरी का दोषी पाया और रकम सीडब्ल्यूएफ में जमा कराने का आदेश दिया.

प्रॉक्टर ऐंड गैंबल 
23 नवंबर, 2020 के फैसले में एनएए ने प्रॉक्टर ऐंड गैंबल होम प्रोडक्ट्स0, प्रॉक्टर ऐंड गैंबल हाइजीन ऐंड हेल्थकेयर और जिलेट इंडिया लिमिटेड को 28 से घटकर 18 फीसद हुई जीएसटी दरों का लाभ उपभोक्ताओं को न देने का दोषी माना और मुनाफाखोरी की 241 करोड़ रु. की रकम सीडब्ल्यूएफ में जमा कराने को कहा.

हीरानंदानी रियल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड   
नवंबर 2019 में सुनाए फैसले में एनएए ने कंपनी को चेन्नै के प्रोजेक्ट में इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ खरीदारों को न देने का दोषी पाया और मुनाफाखोरी के 3.7 करोड़ रु. खरीदारों को वापस करने के आदेश दिए.

पतंजलि 
मार्च 2020 में जब पतंजलि पर मुनाफाखोरी साबित हुई तो पतंजलि का कहना था कि प्रोडक्ट पर जब टैक्स बढ़ा तो हमने बढ़ाया नहीं अब घटा तो हम क्यों घटाएं. इस पर अथॉरिटी का कहना था कि सरकार ने अगर टैक्स बढ़ाया और आपने नहीं बढ़ाया तो ये आपका बिजनेस डिसिजन है. इससे टैक्स कटौती का कोई संबंध नहीं है. पतंजलि पर 75 करोड़ रु. की मुनाफाखोरी सिद्ध हुई.

एम्मार एमजीएफ 
25 जून 2020 को दिए आदेश में एम्मार एमजीएफ पर अतिरिक्त इनपुट टैक्स क्रेडिट के तौर पर 19 करोड़ रु. से ज्यादा की मुनाफाखोरी का दोषी पाया गया. ग्राहकों को इनपुट टैक्स क्रेडिट का फायदा देने का आदेश कंपनी को दिया गया और निगरानी जीएसटी कमिशनर से करने को कहा गया.

स्टारबक्स  
28 अक्तूबर, 2020 को आए फैसले में इस रेस्तरां सर्विस पर 18 फीसद से घटाकर 5 फीसद किए गए जीएसटी का फायदा ग्राहकों को नहीं देकर 1 करोड़ रु. से ज्यादा की मुनाफाखोरी करने का दोषी माना.  

पीवीआर 
पीवीआर सिनेमा ने तेलंगाना में घटे जीएसटी का फायदा उपभोक्ताओं को नहीं दिया और 13 लाख रु. से ज्यादा की मुनाफाखोरी की. एनएए ने अगस्त 2020 में यह आदेश दिया.  

जॉनसन ऐंड जॉनसन  
एनएए ने 23 दिसंबर, 2019 को सुनाए फैसले में जॉनसन और जॉनसन को विभिन्न उत्पादों पर जीएसटी कटौती का फायदा उपभोक्ताओं को न देने पर 230 करोड़ की मुनाफाखोरी का दोषी माना था. 

ई-कॉमर्स 
ई-कॉमर्स पर भी एनएए का ऑर्डर आ चुका है. जुलाई 2018 में ऋषि गुप्ता बनाम फ्लिपकार्ट के केस में ऑर्डर के समय अलमारी पर जीएसटी 28 फीसद था लेकिन डिलिवरी के वक्त 18 फीसद हो गया. इसे एनएए ने मुनाफाखोरी नहीं माना क्योंकि खरीदते वक्त जो जीएसटी था वही वसूला गया और जितनी रकम का फर्क था वह खरीदार को लौटा दी. विशेषज्ञ कहते हैं कि ट्रांजैक्शन के वक्त की दर लागू होगी, अगर कैश ऑन डिलिवरी का मामला होगा तो डिलिवरी के वक्त का जीएसटी लागू होगा. 

इलेक्ट्रॉनिक्स मार्ट 
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सक्रिय इस स्टोर ने मॉनीटर समेत अन्य उत्पादों पर घटे जीएसटी का फायदा उपभोक्ताओं को न देकर 34 लाख की मुनाफाखोरी की. अथॉरिटी ने रकम उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा कराने का आदेश 26 नवंबर 2020 को दिया.  

एमआरपी और जीएसटी
देश में उत्पादों का अधिकतम खुदरा मूल्य या एमआरपी बाजार यानी कंपनी या कारोबारी तय करते हैं और टैक्स (जीएसटी) सरकार तय करती है

मुनाफा और मुनाफाखोरी 
मुनाफा कमाना जायज काम है और किसी वस्तु या सेवा को बेचने में मुनाफा कमाया जा सकता है. लेकिन तय मूल्य पर जीएसटी की दर सरकार या जीएसटी काउंसिल तय करती है. इसमें कटौती का मतलब है, सरकार अपना हिस्सा उपभोक्ताओं के लिए छोड़ रही है और कंपनियों का दायित्व है कि वे वस्तुओं पर घटी टैक्स दर का फायदा उपभोक्ताओं को दें. जब कंपनियां घटी दरों का फायदा उपभोक्ताओं को नहीं देती हैं और मुनाफा कमाती हैं तो उसे ही मुनाफाखोरी या अंग्रेजी में प्रॉफिटियरिंग कहते हैं.

उपभोक्ता की शिकायत  
कोई भी व्यक्ति या संस्था सादे कागज पर शिकायत लिखकर या डीजी ऐंटी प्रॉफिटियरिंग की वेबसाइट पर जाकर शिकायत कर सकते हैं 
राज्य स्क्रीनिंग कमेटी/स्टैंडिंग कमेटी  
स्थानीय स्तर की शिकायतें राज्य स्क्रीनिंग कमेटी के पास और राष्ट्रीय स्तर की शिकायतें स्टैंडिंग कमेटी के पास जाती हैं. दोनों कमेटियां तय करती हैं कि प्रथम दृष्ट्या मुनाफाखोरी हुई है या नहीं

डायरेक्टरेट जनरल ऑफ ऐंटी प्रॉफिटयरिंग (डीजीएपी) मुनाफाखोरी के आरोपों की जांच करते हैं 
नेशनल ऐंटी प्रॉफिटयरिंग अथॉरिटी जांच रिपोर्ट और प्रतिवादी को सुनने के
बाद फैसला सुनाती है
नेशनल ऐंटी प्रॉफिटियरिंग अथॉरिटी (एनएए) 
डीजीएपी की जांच रिपोर्ट और प्रतिवादी का पक्ष सुनने के बाद एनएए (राष्ट्रीय मुनाफाखोरी रोधी प्राधिकरण) फैसला देता है कि कंपनी ने मुनाफाखोरी की है या नहीं. एनएए इस बात का फैसला करता है कि घटी हुई जीएसटी दरों का फायदा कंपनियों ने उपभोक्ताओं को दिया या नहीं. अगर नहीं दिया है तो वह कंपनियों से मुनाफाखोरी की रकम वसूल कर या तो पीडि़त को दिलवाता है. अगर पीडि़त को पहचाना नहीं जा सकता है तो यह रकम राज्य व केंद्र के उपभोक्ता कल्याण कोष (सीडब्ल्यूएफ) में जमा कराई जाती है. एनएए को जीएसटी रद्द करने का अधिकार भी है. 

 1 दिसंबर 1017 को गठन हुआ
 30 नवंबर 2021 तक कार्यकाल (सनसेट क्लॉज के तहत)
 

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