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जैविक खेती की अड़चनें दूर करने की कसरत

जैविक खेती के नए क्षेत्र में कुछ बदलाव आए, पर पैदावार और फसल की बिक्री से जुड़े किसानों के कुछ असल मुद्दों ने जैविक क्रांति की रफ्तार को रोका.

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मात्रा पर गुणवत्ता : भारी उत्तर प्रदेश के नोएडा में ऑर्गेनिक ब्रांड वेजी कल्चर्स का फार्म मात्रा पर गुणवत्ता : भारी उत्तर प्रदेश के नोएडा में ऑर्गेनिक ब्रांड वेजी कल्चर्स का फार्म

फरीदकोट जिले का उनींदा-सा कस्बा जैतों पंजाब की कैंसर पट्टी में है, जहां विशेषज्ञ मानते हैं कि उर्वरकों और कीटनाशकों के बहुत ज्यादा इस्तेमाल का असर कई पीढ़यों की सेहत पर पड़ा है. अप्राकृतिक ढंग से पैदा इस दु:स्वप्न के खिलाफ एक शख्स ने निजी जंग छेड़ रखी है और वे हैं उमेंद्र दत्त, जो खेती विरासत मिशन (केवीएम) के संस्थापक सदस्य और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं.

बीते दो दशकों में दत्त ने 20,000 छोटे और सीमांत किसानों और यहां तक कि किचन गार्डनों को भी कुल 15,000 एकड़ में जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया है. अपनी लहराती दाढ़ी पर उंगलियां फिराते हुए दत्त हमें मोटे अनाज के लहलहाते खेत घुमाते हैं, जहां फसल पकने के कगार पर है, और जैविक खेती को अपनाते वक्त किसानों के सामने आने वाले मसलों के बारे में बताते हैं.

कार्यशाला में जो दो सवाल सबसे पहले उनसे पूछे जाते हैं, वे काफी हद तक छोटे किसानों के वजूद से जुड़े हैं: पैदावार कितनी होगी? और फसल कौन खरीदेगा? वे कहते हैं कि तुरत-फुरत पैसे बनाने की उम्मीद करने वाले तो उसी वक्त छोड़कर चले जाते हैं. केवल वही लोग डटे रहते हैं जो जैतों के स्वास्थ्य संकट से हिल उठे हैं, पर वे भी बुनियादी अर्थशास्त्र से पल्ला नहीं झाड़ सकते.

दत्त जैविक कृषि और रसायन-मुक्त खेती पर उस कार्यबल का भी हिस्सा हैं जो केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पहला कार्यकाल शुरू होने के फौरन बाद बनाया था. जैविक खेती पर नए सिरे से जोर देने की बुनियाद रखते हुए समिति ने इस क्षेत्र के विस्तार के लिए साल में कम से कम 12,500 करोड़ रुपए रखने की सिफारिश की.

मगर असल दुनिया की तात्कालिक जरूरतों के बीच धन और जैविक खेती की बुआई इरादों के साथ रफ्तार कायम नहीं रख सकी. मसलन, पिछले वित्तीय साल नरेंद्र तोमर की अगुआई वाला कृषि मंत्रालय जैविक खेती के लिए रखे गए 687 करोड़ रुपए तक खर्च नहीं कर पाया.

नतीजा यह कि यह क्षेत्र अब भी शुरुआती चरण में ही है. भारत की करीब 2.78 मिलियन (27.8 लाख) हेक्टेयर (एमएचए) कृषि भूमि पर जैविक खेती हो रही है, पर यह देश के कुल 140.1 एमएचए (14.01 करोड़ हेक्टेयर) बुआई क्षेत्र का महज दो फीसद है, जो दुनिया के पांचवें सबसे बड़े और किसानों की संख्या—दुनिया की कुल 29 फीसद—के लिहाज से सबसे बड़े देश के लिए सागर में महज बूंद बराबर है. भारत का जैविक खाद्य बाजार मार्च 2021 तक कुल 11,400 करोड़ रु. का था, जिसमें 7,040 करोड़ रु. का निर्यात था. यहां से इसे आगे कैसे बढ़ाएं?

इस साल के केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पांच राज्यों में गंगा के दोनों किनारों पर रसायन मुक्त खेती का खाका सामने रखा. इसके तहत कुल 1.23 एमएचए (12.3 लाख हेक्टेयर) में जैविक/प्राकृतिक गलियारा बनाया जाएगा, जहां पूरी तरह फल, सब्जियां, जड़ी-बूटियां और चिकित्सकीय पौधे उगाए जाएंगे. इसमें शामिल राज्य—उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल—राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के 20,000 करोड़ रु. के सालाना बजट का लाभ ले सकेंगे.

अफसरों का कहना है कि 6,181 क्लस्टरों को 120.49 करोड़ रु. दिए भी जा चुके हैं. दिसंबर में प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) से आह्वान किया कि प्राकृतिक खेती की वैज्ञानिक ढंग से तस्दीक करे और इसे जनांदोलन बनाने के लिए बढ़ावा दे.

उन्होंने किसानों से कहा कि वे पहले अपने खेतों के छोटे-छोटे टुकड़ों में प्रयोग करें और फिर अंतत: पूरी जोत में उनका विस्तार करें. बिल्कुल ठीक समय पर आइसीएआर ने भी प्राकृतिक खेती और उससे जुड़ी जैविक तकनीकों पर विषय सामग्री विकसित करना शुरू कर दिया है.

छोटे से शुरुआत

कृषि मंत्रालय छोटे-छोटे और हासिल किए जा सकने वाले लक्ष्य तय कर रहा है. अफसरों का कहना है कि उनका जोर आदिवासी, पहाड़ी और कृषि-वानिकी क्षेत्रों में रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देना है. मेघालय, मिजोरम, उत्तराखंड और गोवा सरीखे छोटे राज्यों के पहाड़ी भूभागों की 10 फीसद कृषि भूमि जैविक खेती के लिए समर्पित की गई है.

पूरी तरह ठानकर 100 फीसद जैविक खेती के साथ सिक्किम इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर है. उत्तराखंड ने 2019 में कुछ कोशिश की और कानून बनाकर दस प्रखंडों—डुंडा, प्रतापनगर, जयहरिखाल, जाखोली, अगस्तमुनि, उखीमठ, देवल, सल्ट, बेतलघाट और मुंसियारी—को पूर्णत: जैविक घोषित किया था. इन प्रखंडों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की बिक्री और खरीद को भी अपराध बना दिया गया.

अलबत्ता बड़े राज्यों को अभी बहुत काम करना है. उनके जैविक खेती के आंकड़े शर्मसार करने की हद तक नाकाफी हैं. मध्य प्रदेश के 4.9 फीसद, राजस्थान के दो फीसद और महाराष्ट्र के महज 1.6 फीसद खेत जैविक उपज के लिए समर्पित हैं. इन आंकड़ों को बढ़ाने के लिए किसानों को अनेक तरह की सहायता देने का तंत्र स्थापित करने की जरूरत है, चाहे वह पैदावार हो, प्रमाणन हो या बाजार नेटवर्कों तक पहुंच. इस सब पर काम चल रहा है.

पंजाब अपने आप में कहानी है जिसके कुछ प्रसंग इसके अपने हैं. इसकी तकरीबन 85 फीसद फसलें—धान, गेहूं और कपास—भारतीय खाद्य निगम और भारतीय कपास निगम सरीखी केंद्रीय एजेंसियां खरीदती हैं. यहां के ज्यादातर किसान उन्हीं फसलों को उगाने पर जोर देते हैं जिन्हें यह गारंटीशुदा खरीद सुरक्षा जाल हासिल है.

यह ज्यादा उगाने को भी बढ़ावा देता है, जिससे वे ज्यादा तादाद में उगाने में पूरा जोर लगा देते हैं. नतीजा? कीटनाशकों और उर्वरकों पर दमघोंटू निर्भरता बढ़ती जाती है. यह स्वाभाविक ही जमीन, भूमिगत पानी और अंतत: लोगों के खून में मिल जाता है.

असल में उर्वरकों की खपत पूरे भारत में अच्छी-खासी बढ़ी है. 1969 में 12.4 किलो प्रति हेक्टेयर से हर साल लगभग छह फीसद बढ़ते हुए यह आज करीब 190 किलो प्रति हेक्टेयर पर पहुंच गई है. हरियाणा, बिहार और तेलंगाना ने बीते दशक में लगातार 200 किलो प्रति हेक्टेयर से ज्यादा उर्वरकों की खपत की.

जैविक एमएसपी की जरूरत

इसके मूल में मुश्किल बहुत बुनियादी है. जैविक खेती अपनाना महंगा पड़ता है. पीडब्ल्यूसी इंडिया में प्रैक्टिस लीडर, फूड और एग्रीकल्चर, अजय काकरा कहते हैं कि किसान जैविक खेती अपनाने से पहले खेतों को तीन साल बिना जोते छोड़ना गवारा नहीं करते, जो रासायनिक अवशेषों से खेतों को साफ करने के लिए जरूरी है.

वे कहते हैं, ''धीरे-धीरे जैविक खेती की तरफ बढ़ने की खातिर खेतों के कुछ टुकड़ों को बिना जोते छोड़ना बड़े किसानों के लिए फिर भी आसान है.’’ ज्यादातर राज्य सरकारें केंद्र से उम्मीद करती हैं कि वह किसानों को इस अतिरिक्त लागत का हर्जाना देने की व्यवस्था बनाए.

चरणजीत चन्नी जब पंजाब के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने केंद्र से जैविक उपज के लिए निश्चित एमएसपी देने पर विचार करने को कहा था. उन्होंने कहा, ''किसान जब जैविक उपज की तरफ जाते हैं तो पैदावार घटती है, इसलिए जैविक किसानों के लिए नई एमएसपी की व्यवस्था होनी चाहिए.’’ उनके उत्तराधिकारी भगवंत मान ने कृषि को लेकर अपना नजरिया अभी जाहिर नहीं किया है.

प्रमाणन एक और पेचीदा मसला है. छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में भूमगादी जैविक किसान उत्पादक संगठन चलाने वाले आकाश बादावे कहते हैं, ''पैदावार पर जैविक का औपचारिक ठप्पा लगवाना आदिवासी और छोटे किसानों के लिए बहुत मुश्किल होता है.’’ बादावे 10,000 किसानों के साथ काम कर रहे हैं, जो धान, बाजरा, मोटे अनाज, हल्दी, दलहन आदि की पारंपरिक प्रजातियां उगाते हैं और उन्हें आदिम ब्रांड नाम के तहत पश्चिम तथा उत्तर भारत के सुपर बाजारों में बेचते हैं.

किसानों को एक और विचित्र परेशानी यह पेश आती है कि उन्हें अपनी जैविक और प्राकृतिक उपज का दाम ज्यादा रखना पड़ता है, जबकि आकार और रंग से दिखने में वह अक्सर कम आकर्षक होती है. सोनीपत के जैविक किसान विजय सिंह कहते हैं, ''स्थानीय बाजारों में इसकी अच्छी प्रतिक्रिया नहीं होती.’’

उनके मुताबिक, किसान पैसा तभी बना सकते हैं जब वे पारंपरिक आपूर्ति शृंखलाओं में गतिरोध पैदा करके अपनी उपज की विशिष्ट पहचान बनाएं. कई राज्यों ने बीते तीन साल में अपने कृषि उपज विपणन समिति कानूनों में संशोधन करके किसानों को अनुबंध खेती करने और उपज सीधे उपभोक्ताओं को बेचने की इजाजत दी है. इस लिहाज से हाल में तीन कृषि कानूनों को रद्द करने का सबसे ज्यादा असर जैविक किसानों पर पड़ा है, क्योंकि उन्होंने वे रास्ते खोल लिए होते.

चूंकि जैविक खेती को पूर्णत: साकार करना चुनौतियों भरा है और इसकी लागत बहुत ज्यादा है, इसलिए बहुत-से फायदों वाले एक विकल्प पर विचार किया जा रहा है और वह है प्राकृतिक खेती. बुनियादी तौर पर इसमें और जैविक खेती में साझा यह है कि दोनों में शून्य रसायन का तरीका अपनाया जाता है, पर कुछ फर्क भी हैं (देखें: हरित खेती के मायने), खासकर इसमें बड़े पैमाने पर जैविक खाद के इस्तेमाल पर निर्भरता कम होती है.

पिछले पांच साल में प्रयासों का कुछ नतीजा दिखा है. राज्य प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय योजनाओं के आसरे हैं, जिनमें महत्वाकांक्षी मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थईस्टर्न रीजन (एमओवीसीडीएनईआर), परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाइ), नेशनल प्रोजेक्ट ऑन ऑर्गेनिक फार्मिंग, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और बागबानी एकीकृत विकास मिशन शामिल हैं.

एमओवासीडीएनईआर का बजट आवंटन योजना की शुरुआत में 134 करोड़ रु. से बढ़ाकर पिछले साल से 200 करोड़ रु. कर दिया गया. आठ उत्तरपूर्वी राज्यों में 2016 से 2021 तक लगभग 74,880 हेक्टेयर खेत रसायन मुक्त हुए और केंद्र 2024 के अंत तक और 0.1 एमएचए खेतों को बदलने का लक्ष्य लेकर चल रहा है. 

पीकेवीवाइ की रकम से अब तक नौ राज्यों में 0.4 एमएचए खेतों को जैविक खेती के लिए साफ करने में मदद मिली, वहीं आंध्र प्रदेश, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में राज्यों के अपने विशिष्ट कार्यक्रमों ने इसमें करीब 1 एमएचए खेत जोड़े. अन्य राज्य भी कदम उठा रहे हैं. छत्तीसगढ़ ने गोधन न्याय योजना लॉन्च की, जिसमें सरकार गाय का गोबर दो रुपए प्रति किलो की दर से खरीदती और किसानों को आठ रुपए प्रति किलो की दर से ßç×üखन कंपोस्ट खाद देती है.

ओडिशा अपनी जैविक नीति लेकर आया, जिसमें पांच जिलों में 30 मॉडल जैविक क्लस्टर की परिकल्पना की गई. एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन और जलवायु-लोचदार सिंचाई परियोजनाओं के जरिए सात जिले पहले ही इससे जुड़ गए—राज्य ने आदिवासियों के प्राकृतिक खेती से उगाए गए मोटे अनाजों को पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) से जोड़ दिया. राज्य पोषण कार्यक्रम, आइसीडीएस (एकीकृत बाल विकास सेवाएं), मिड-डे मील... सभी में इसका पुट है.

दूसरी दिक्कतें

कृषि मंत्रालय के अधिकारी देश के हर ब्लॉक में प्राकृतिक खेती का क्लस्टर बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं. उनका मानना है कि यह कारगर हो सकती है क्योंकि तकरीबन 52 फीसद खेती वर्षा सिंचित क्षेत्रों में होती है, जहां रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता अपेक्षाकृत कम है. रासायनिक हों या जैविक, उर्वरक इस बहस में प्रमुख हैं क्योंकि उनसे लागत बढ़ती है.

ज्यादातर जैविक किसान शिकायत करते हैं कि वे लागत के हिसाब से बढ़ी हुई कीमत वसूल नहीं कर पाते, जिससे रासायनिक से जैविक उर्वरकों की तरफ बढ़ना औचित्यपूर्ण हो. कर्नाटक के बेलगाम जिले के बेड़किहाल में जैविक किसानों का क्लब चलाने वाले सुरेश देसाई कहते हैं, ''हम स्थानीय बाजारों में जाएं तो हमें कुछ अतिरिक्त नहीं मिलता. हमें निजी खरीदारों या कॉर्पोरेट घरानों का मुंह ताकना पड़ता है.’’

जैविक किसानों की राह में और भी परेशानियां हैं. सितंबर 2017 से किसी को भी बिक्री, विपणन या वितरण या निर्यात के लिए जैविक खाद्यन्न मैन्यूफैक्चर करने, पैक करने, बेचने या पेश करने की इजाजत तब तक नहीं है जब तक वे खाद्य सुरक्षा और मानक (जैविक खाद्य) विनिमयन का पालन नहीं करते.

इंडिया टुडे ने जिन जैविक किसानों से बात की, उनमें से ज्यादातर ने कहा कि वे अपनी राज्य सरकारों की प्रमाणन प्रक्रियाओं में भरोसा नहीं करते. वे आरोप लगाते हैं कि कई किसान जैविक के साथ रासायनिक खेती को मिला देते हैं और जांच से पहले सिंथेटिक रसायनों के निशान मिटाने में कामयाब हो जाते हैं.

सरकार इन प्रमाणन प्रक्रियाओं से गुजरने के लिए किसानों को मनाने की कोशिश कर रही है—वह शुरुआती प्रमाणन में पैसा लगाती है पर उम्मीद करती है कि किसान नवीनीकरण का भारी खर्च खुद उठाएं. कर्नाटक के बेलवाडी इलाके के जैविक किसान राजदेव वी. कहते हैं, ''कई किसानों ने शुरुआती दौर के बाद अधबीच में छोड़ दिया.’’ यह जैविक खेती नीति लाने वाले राज्यों में पहला था, जिसका उद्देश्य 2022 तक कम से कम 10 फीसद खेतीयोग्य जमीन को बदलना था.

मगर 0.2 एमएचए के साथ यह उसके कुल बुआई क्षेत्र का महज 1.2 फीसद है. कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा, तेलंगाना और महाराष्ट्र में किसानों को जैविक गन्ना उगाने में मदद कर रहे देसाई कहते हैं कि अनिवार्य प्रमाणन भेदभावपूर्ण है. वे कहते हैं, ''रसायनों से पटे खाद्य उत्पादों के उत्पादकों को बगैर प्रमाणन के बाजारों में आने दिया जाता है. वहीं जिन किसानों ने पर्यावरण के अनुकूल खेती करना ठान लिया है, उन्हें इससे गुजरना पड़ता है.’’

अगर भारत को इन खेतों को ज्यादा पक्के तरीके से जोतना है, तो प्राकृतिक ढंग से ही किसानों की जरूरतों के हिसाब से समाधान देने होंगे. कई देश अत्यधिक रासायनिक अवशेषों का हवाला देकर भारतीय निर्यात ठुकरा देते हैं.

निर्यात के मोर्चे पर बेहतर अंक हासिल करने के लिए उर्वरकों पर होने वाला सब्सिडी का भारी बोझ कम करना होगा, किसानों की आमदनी बढ़ानी होगी और यह सब मिट्टी में नई जान फूंकते हुए और समग्रत: जैविक/प्राकृतिक खेती का पर्यावरण के लिहाज से टिकाऊ मॉडल पेश करके करना होगा. जैविक खेती को इन्हीं सब चुनौतियों से पार पाना है.

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