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गफलत की महामारी

कहीं ऐसा न हो कि आप ओमिक्रॉन की हल्की लहर, बेहतर तैयारी और महामारी की ऊब के झांसे में आ जाएं. कोविड अभी गया नहीं है.

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कोई एहतियात नहीं : मास्क न पहनने पर फिर से जुर्माना लगाने के बावजूद पुरानी दिल्ली के सदर बाजार में लोग इसके बिना घूमते नजर आए कोई एहतियात नहीं : मास्क न पहनने पर फिर से जुर्माना लगाने के बावजूद पुरानी दिल्ली के सदर बाजार में लोग इसके बिना घूमते नजर आए

इससे थके और ऊबे लोग खुद से बार-बार पूछते हैं कि क्या महामारी आखिरकार खत्म हो गई और हम में से कई मास्क सहित एहतियातों में ढिलाई बरतने को खुशी-खुशी तैयार हो जाते हैं. ओमिक्रॉन की पहले से हल्की लहर से उन्हें यह मनचाही उम्मीद बंधी है. भारत में मामले दूसरे देशों के मुकाबले ज्यादा तेजी से कम हुए. दैनिक मामलों का हमारा औसत सात हफ्तों में 98.9 फीसद घट गया जबकि दूसरे देशों में यह इसी अवधि में आधा ही कम हुआ.

ओमिक्रॉन और उसके सब-वैरिएंट के लक्षण भी अभी तक हल्के ही रहे हैं, जिनमें लगातार तेज बुखार, खांसी और बदन दर्द सबसे आम हैं. जब प्रतिकृति या 'आर’ वैल्यू, यानी एक संक्रमित व्यक्ति से वायरस ग्रहण करने वाले लोगों की औसत संख्या, घटकर 1 से नीचे आ गई, तो कइयों ने इसे महामारी की विदाई का संकेत मान लिया. 

कोविड-19 का वायरस बार-बार दिखा चुका है कि वह ज्यादा धूर्त और मक्कार है. मामलों में कमी के करीब दो महीने बाद भारत में इसका ग्राफ फिर ऊपर चढ़ने लगा है. 1 मई को खत्म हफ्ते में देश में 22,000 नए मामले दर्ज हुए, जो उससे पहले के हफ्ते से 41 फीसद ज्यादा थे. चेन्नै के इंस्टीट्यूट ऑफ मैथमैटिकल साइंसेज की गणना के मुताबिक, 18 अप्रैल को खत्म हफ्ते में भारत की आर-वैल्यू 1.07 थी.

बीस राज्यों में मामलों में थोड़ी बढ़ोतरी दर्ज हुई, जिनमें केरल, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, बंगाल, पंजाब और उत्तराखंड शामिल हैं. तीन राज्य दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश खास तौर पर चिंता के रूप में उभरे, क्योंकि पिछले हफ्ते दर्ज मामलों में से 68 फीसद इन्हीं राज्यों में थे. दिल्ली में ही 9,684 नए मामले आए जो 24 अप्रैल को खत्म हफ्ते में दर्ज मामलों के मुकाबले 53 फीसद ज्यादा थे.

दिल्ली की आर-वैल्यू भी 18 अप्रैल को खत्म हफ्ते में 2 आंकी गई. सार्वजनिक जगहों पर अनिवार्य रूप से मास्क लगाने का नियम राष्ट्रीय राजधानी में 2 अप्रैल को हटा लिया गया था, पर मामलों में कई गुना बढ़ोतरी के बाद 20 दिन के भीतर इसे आनन-फानन फिर लागू करना पड़ा.

दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स अस्पताल के पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. विवेक नांगिया कहते हैं, ''यह वायरस अभी यहां रहेगा और अभी लौट-लौटकर आता रहेगा.’’ कोविड पर महाराष्ट्र की टास्क फोर्स के सदस्य डॉ. राहुल पंडित कहते हैं, ''हमें सतर्क रहने की जरूरत है और महामारी के खत्म होने तक सतर्कता में ढील नहीं आने देना है. नए रूपों के खतरे को अभी खारिज नहीं किया जा सकता.’’

तो क्या हम एक नई लहर के लिए तैयार हैं? सरकारी अफसर पलक झपकाए बगैर भरोसा दिलाते हैं कि मामलों की मौजूदा संख्या तो ऐसा कोई इशारा नहीं करती. आइसीएमआर (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) के एडिशनल डायरेक्टर जनरल समीरन पांडा इसे 'छोटा-सा बेमतलब का झटका’ या जिला स्तर पर स्थानीय उछाल करार देते हैं.

वे यह भी कहते हैं कि न तो अस्पताल में भर्ती होने की दर बढ़ी है और न नए रूप का कोई संकेत है. एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया कहते हैं, ''कोविड से सतर्क रहना चाहिए, पर घबराने की जरूरत नहीं. जिन इलाकों में उछाल देखी जा रही है, उन्हें संक्रमण को रोकने की अतिरिक्त कोशिश करनी चाहिए.’’ विशेषज्ञों का कहना है कि इसी कुशल फोकस से भारत में ओमिक्रॉन की पिछली लहर के असर को कम करने में मदद मिली. 

डॉ. राहुल पंडित कहते हैं, ''वायरस के लिए हम अब पहले से ज्यादा तैयार हैं. न केवल इलाज और बुनियादी ढांचे के लिहाज से बल्कि जागरूकता के लिहाज से भी उतने ही तैयार हैं.’’

तीन 'टी’ और टीके

 

भारत ने महामारी की रोकथाम के लिए टेस्ट-ट्रैक-ट्रीट-वैक्सिनेट और कोविड उपयुक्त व्यवहार के पालन की रणनीति जारी रखी है. अब एक साल पहले जैसा नहीं होता जब एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में कुछ मरीजों को टेस्ट रिपोर्ट के लिए औसतन पांच दिन इंतजार करना पड़ा था. अब घर पर ही ऐंटीजन किट से पांच मिनट में नतीजा मिल सकता है. ई-कॉमर्स साइटों पर ऐसी किट 140 रुपए में मिलती हैं और लोकप्रिय हो गई हैं. पुणे के जनरल फिजिशियन डॉ. रवींद्र नाइक कहते हैं, ''मेरे ज्यादातर मरीज होम टेस्ट कर रहे हैं.’’

देश के इलाज का शस्त्रागार भी काफी मजबूत हुआ है. तीसरी लहर के दौरान डॉक्टरों को मोनोक्लोनल ऐंटीबॉडी इलाज बंद करना पड़ा था, जो डेल्टा रूप के खिलाफ काफी असरदार रहा था पर इस लहर के प्रभावी रूप ओमिक्रॉन के खिलाफ बहुत कम असरदार रहे. डॉ. नांगिया कहते हैं, ''उभरते प्रमाणों से पता चलता है कि इलाज असरदार नहीं था और हमने इसका इस्तेमाल कम कर दिया.’’

इससे बीते कुछ महीनों में उन लोगों को काफी फिक्रमंद कर दिया जिन्हें ओमिक्रॉन का खतरा ज्यादा है, यानी बुजुर्ग और दूसरी बीमारियों से ग्रस्त लोग. मगर बस तभी तक जब बड़ी फार्मा कंपनी फाइजर की नई ऐंटीवाइरल दवाई पैक्सलोविड नहीं आई थी जिसने नई उम्मीदें जगा दीं. खासकर जब डॉक्टरों का कहना है कि ओमिक्रॉन और उसके सब-वैरिएंट—बीए.1, बीए.2 और एक्सई—पिछली रोग प्रतिरोधक क्षमताओं से बच निकलने की तरकीब ईजाद कर ली है.

पैक्सलोविड अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु को रोकने में 89 फीसद असरदार रही है, जो बाजार में मौजूद कुछ वैक्सीनों के असर से ज्यादा है. दिल्ली की संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. अंकिता वैद्य कहती हैं, ''यह ज्यादा जोखिम वाले और हल्के से मध्यम लक्षण वाले मरीजों के लिए है. ओमिक्रॉन के खिलाफ इसका असर काफी अच्छा है और अगर डॉक्टर लिखते हैं तो इसे देर किए बिना ले लेना चाहिए.’’

हैदराबाद स्थित हेटेरो फार्मा कंपनी को पैक्सलोविड लॉन्च करने के लिए डीसीजीआइ (भारतीय औषधि महानियंत्रक) की मंजूरी मिल गई है. सूत्रों को यकीन है कि मई के पहले हफ्ते से यह बाजार में मिलने लगेगी. डॉक्टर की सलाह पर खाई जाने वाली यह दवाई निर्माट्रेल्विर और रिटोनाविर से मिलकर बनी है. निर्माट्रेल्विर वायरस को अपनी नकल तैयार करने से रोकता है, और रिटोनाविर निर्माट्रेल्विर का विघटन रोकता है ताकि यह ज्यादा गाढ़े रूप में ज्यादा वक्त शरीर में बना रहे.

पैक्सलोविड तीन गोलियों (दो निर्माट्रेल्विर और एक रिटोनाविर की) के रूप में दिया जाता है जो लक्षण शुरू होने के बाद पांच दिन तक दिन में दो बार खानी होती हैं. इस दवाई को अमेरिका और ब्रिटेन में आपातकालीन इस्तेमाल की मंजूरी मिल चुकी है और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अस्पताल में भर्ती होने के अधिकतम जोखिम वाले कोविड के गैर-गंभीर मरीजों के लिए इसकी 'जोरदार सिफारिश’ की है. भारत में इस दवा की कीमत का खुलासा अभी नहीं किया गया है.

कुछ हफ्ते पहले देश में एक और उम्मीदों भरी दवाई—मर्क की मोल्नुपिराविर—लाई गई. मगर डर यह था कि इस गोली से बढ़ते भ्रूण, शुक्राणु कोशिका या बच्चों के डीएनए में गड़बड़ियां हो सकती हैं और इसलिए इसको देश के उपचार के दिशार्निदेशों में कभी शामिल नहीं किया गया. मुंबई के कल्याण स्थित फोर्टिस अस्पताल की संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. कीर्ति सबनीस कहती हैं, ''फाइजर की गोली के चिंताजनक दुष्प्रभाव नहीं हैं और जब यह मिलने लगेगी तो इससे ऊंचे जोखिम वाले लोगों को मदद मिलेगी और टीके लगाने के साथ मृत्यु को कम किया जा सकेगा.’’

भारत अब भी रोज टीकों की 25 लाख खुराकें लगा रहा है, जबकि 3 मई तक 60 साल से कम उम्र के वयस्क 71,300 बूस्टर डोज लगवा चुके थे. यह कार्यक्रम इतना सफल रहा कि बिल गेट्स ने इसे भारत जैसी आमदनी वाले देश में टीके लगाने के सबसे अच्छे रिकॉर्ड में से एक कहा. मगर अध्ययनों से पता चलता है कि खासकर रोग प्रतिरोधक क्षमता से बच निकलने वाले ओमिक्रॉन जैसे रूपों के मामले में टीकों का असर 6-9 महीनों के बाद मिटने लगता है.

विशेषज्ञ जोर देकर कहते हैं कि बूस्टर लगाने का वक्त आने पर सभी वयस्कों को जरूर लगवा लेना चाहिए, भले ही उन्हें ज्यादा जोखिम न हो. सबनीस कहती हैं, ''संक्रमण कम करना महामारी को खत्म करना है. इसलिए बीमारी भले हल्की हो और हम गंभीर बीमार न पड़ रहे हों, तब भी हमें बूस्टर जरूर लगवा लेना चाहिए ताकि हम खुद को वायरस का वाहक न बनने देना पक्का कर सकें. चौथी लहर अगर नहीं भी आती है, तो बूस्टर अस्पताल में भर्ती और मृत्य कम करने में मदद करेगा.’’

विशेषज्ञों को यह भी लगता है कि बच्चों को ज्यादा जोखिम न हो तब भी उन्हें टीके लगवाने चाहिए. वायरोलॉजिस्ट और मद्रास नेक्स्ट जेन के रोटरी क्लब की कोविड टास्क फोर्स की डायरेक्टर डॉ. पवित्रा वेंकटगोपालन कहती हैं, ''बच्चों में बीमारी की तीव्रता में अभी तक कोई खास इजाफा नहीं हुआ.

महामारी के दौरान बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बड़ों के मुकाबले ज्यादा मजबूत रही है. इसका ठीक-ठीक कारण अभी हमें पता नहीं है, पर बच्चों को या तो हल्के लक्षण रहे हैं या कोई लक्षण नहीं रहे. वैसे, वे वायरस के वाहक हो सकते हैं. हमें अभी यह भी पक्का पता करना है कि नया एक्सई वैरिएंट बच्चों के लिए ज्यादा खतरनाक है या नहीं.’’

चाहिए हर वक्त सतर्कता

ज्यादातर डॉक्टर लोगों में आत्मसंतोष के बढ़ते एहसास से फिक्रमंद हैं. एनसीआर में कोविड के फिर तेज उभार को देखते हुए विशेषज्ञ अब 6 मई से शुरू हो रही चार धाम यात्रा को लेकर चिंतित हैं. इसमें भाग लेने के लिए न कोविड की निगेटिव रिपोर्ट की जरूरत है और न टीका प्रमाणपत्र की. 2020 में इस यात्रा में 3,10,000 तीर्थयात्री शामिल हुए थे और उससे पिछले साल 32 लाख लोगों ने इन तीर्थस्थलों की यात्रा की थी.

एक दूसरे के नजदीक लोगों का इतना विशाल जमावड़ा बेहद जोखिम भरा है. न केवल सबसे कमजोर लोगों को संक्रमण हो सकता है बल्कि वायरस को खुलकर खेलने का मौका मिल जाएगा, जिससे वायरस का नया रूप उभर सकता है. ओमिक्रॉन ज्यादा संक्रामक है पर जानलेवा नहीं है. मगर कोविड प्रबंधन और इलाज में प्रगति के बावजूद डेल्टा से मिलता-जुलता एक वैरिएंट भारत और दुनिया को तबाह कर सकता है.

विशेषज्ञ जोर देकर कहते हैं कि खुद को खतरे से बाहर मान लेना महंगा पड़ सकता है. वेंकटगोपालन कहती हैं, ''हमें पूर्वानुमान और सतर्कता में चूक नहीं करनी चाहिए.’’ लोगों को संक्रमण की इत्तला भी जरूर देनी चाहिए. डॉ. नाइक बताते हैं कि पुणे में लोग अपनी जांच के नतीजे अपलोड नहीं करना चाहते क्योंकि उन्हें डर है कि सरकार उन्हें पब्लिक नर्सिंग सेंटर भेज सकती है. वे कहते हैं, ''सबसे बड़ी चुनौती उन्हें जिम्मेदारी लेने के लिए राजी करना है क्योंकि अगर वे अपनी जांच के नतीजों का खुलासा नहीं करते तो किसी और को संक्रमित कर सकते हैं.’’

लोगों को ओमिक्रॉन की लहर के हल्के होने से इस भुलावे में नहीं पडऩा चाहिए कि वे कोविड से बच निकलेंगे. नवी मुंबई में वाशी के फोर्टिस अस्पताल में आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. टी. चंद्रशेखर कहते हैं, ''हल्का कोविड भी मुश्किल बीमारी है. कई लोग ठीक होने के बाद भी हफ्तों कमजोरी महसूस करते हैं. अन्य वायरल बीमारियों की तरह इसमें भी आराम और सही इलाज जरूरी है.

शरीर को तंदुरुस्त होने और दूसरों को संक्रमण से बचाने का एक मौका देना ही चाहिए.’’ कभी-कभी बीमारी ऊपर से हल्की लगती है पर अगर संक्रमित व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता अच्छी नहीं है या उसे डायबिटीज या उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियां हैं तो यह रातोरात बदतर मोड़ ले लेती है.

डॉक्टर लांग कोविड को लेकर भी चिंतित हैं. दिल्ली के 14 वर्षीय अस्थमा के मरीज राज वर्मा (बदला हुआ नाम) के साथ यही हुआ. तीन माह पहले तीसरी लहर में उन्हें कोविड हुआ तो उनके लक्षण हल्के थे. मगर उसके बाद उनमें एलर्जन के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता विकसित हो गई जो बीमारी से पहले नहीं थी. गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में श्वसन चिकित्सा और नींद विशेषज्ञ डॉ. आशीष कुमार कहते हैं, ''हम एक पैटर्न देख रहे हैं जिसमें अस्थमा के मरीज ठीक होने के बाद काफी ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं और ऐसी कई चीजों से उन्हें अटैक आ जाता है जो पहले नहीं थीं.’’

इसी तरह दिल, दिमाग, लीवर और हॉर्मोन के संतुलन पर कोविड का असर देखकर डॉक्टर हैरान हैं. मुंबई की आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. फरह इंग्ले कहती हैं, ''कोविड से बहुत ज्यादा सूजन पैदा होती है जिसका असर किसी भी अंग पर पड़ सकता है.’’ दुश्चिंता और तनाव सरीखे खामोश लक्षण भी आम हैं. मुंबई के मनोचिकित्सक डॉ. केदार तिल्वे कहते हैं, ''यह तय करने का कोई तरीका नहीं है कि कौन कैसे प्रतिक्रिया करेगा. सबसे सुरक्षित यही है कि संक्रमित होने से बचने के लिए सावधानियां बरतें.’’

हम चाहे जितना पिंड छुड़ाना चाहें, कोविड कहीं नहीं जा रहा. डॉ. नांगिया कहते हैं, ''हमें चाहिए कि इसके हिसाब से ढलकर इस तरह रहें कि संक्रमित होने और संक्रमण फैलाने, दोनों से बचे रहें.’’ मास्क चढ़ा कर रखें.

—सोनाली आचार्जी.

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