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अब केरल में बीजेपी की आक्रामक हिंदुत्व की चाल

जहां करीब आधी आबादी मुसलमानों और ईसाइयों की है, बीजेपी वहां आक्रामक हिंदुत्व की चाल चल रही है. उसका एजेंडा 55 फीसदी हिंदू वोटों को एकजुट कर अपने साये तले लाना है.

श्री पद्मनाभस्वामी तिरुअनंतपुरम मंदिर में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह श्री पद्मनाभस्वामी तिरुअनंतपुरम मंदिर में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) केरल में अब राजनैतिक दुस्साहस पर उतर आई है. पार्टी खुलेआम हिंदुत्व के मद में झूम रही है. जिस राज्य में 27 फीसदी मुसलमान और 18 फीसदी ईसाई बसते हों, वहां यह राजनीति अविवेकपूर्ण और अव्यावहारिक जान पड़ सकती है, फिर इससे क्या हासिल होगा? अमित शाह के सक्षम चुनावी दांवपेच के सहारे पार्टी दरअसल बाकी आबादी पर अपना निशाना साधे है—यह 55 फीसदी हिंदुओं की आबादी है. बीजेपी अपना कायांतरण एक ऐसे विशाल हिंदू रथ के रूप में कर लेना चाहती है जिस पर पिछड़ी जाति के एझावा, सवर्ण नंबूदरी और अनुसूचित जाति के पुलाया, तीनों को बैठाया जा सके.

यहां हिंदुओं की एकता सामाजिक स्तर पर भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं है लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह राजनैतिक हकीकत में तब्दील हो सकती है. यहां ऐसे कई मलयाली हिंदू हैं जिन्होंने आधुनिकता की झोंक में साम्यवाद से प्रेरणा लेकर अपने जातिनामों को तिलांजलि दे दी है, बावजूद इसके इस समाज में अब भी जातिगत चेतना बदस्तूर कायम है. लोगों को तब तक चैन नहीं मिलता जब तक वे आपकी जाति को नहीं जान लेते. एक-दूसरे के प्रति निजी और सार्वजनिक दायरे में गिले-शिकवे निकालने वाले इन तमाम तबकों को क्या आक्रामक हिंदुत्व का औजार बीजेपी के दायरे में समेट सकता है? ध्यान रहे कि अगले कुछ माह में यहां स्थानीय निकायों के चुनाव हैं और 2016 में केरल विधानसभा का चुनाव भी प्रस्तावित है.
बीजेपी की राज्य इकाई के अध्यक्ष वी. मुरलीधरन कहते हैं कि 2016 के चुनाव में पार्टी खुद को उन दो गठबंधनों के विकल्प के तौर पर पेश करेगी जो एक-एक करके राज्य पर शासन करते रहे हैं—सत्तारूढ़ कांग्रेसनीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) और सीपीएम के नेतृत्व वाला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ). यह दावा एक ऐसी पार्टी के लिए महत्वाकांक्षी जान पड़ सकता है जिसने 2011 के चुनाव में सिर्फ 6 फीसदी मत हासिल किए थे और जिसे एक भी सीट नहीं मिली थी. बीजेपी की निगाह आम चुनाव में हासिल 10.3 फीसदी वोटों और जून में हुए अरुविक्कार के उपचुनाव में अभूतपूर्व रूप से हासिल उन 17 फीसदी वोटों पर टिकी है जो उसने सीपीएम से झटक लिए थे. इसी के आधार पर वह आगे का सपना देख रही है.
बीजेपी ने मतदाताओं को लेकर विस्तृत योजना बनाई है जिसके तहत प्रत्येक वार्ड में मतदाता की जाति और धर्म की सूची तैयार हो गई है. इस सूची में तीन खाने हैः पहले में उस पार्टी का नाम है जिसे अमुक पक्के तौर पर वोट देगा; दूसरे खाने में उस पार्टी का नाम है जिसे वह संभावित तौर पर वोट दे सकता है; और तीसरे में वह पार्टी है जिसे वह वोट नहीं देगा. बीजेपी के निशाने पर वे मतदाता हैं जो संभवतः उसे वोट दे सकते हैं और उसके बाद पार्टी इन संभावितों को पुष्ट करने के लिए अभियान चलाएगी.

पिछले आम चुनाव में उन ईसाइयों ने भी नरेंद्र मोदी से परहेज नहीं किया था जो सामान्यतः कांग्रेस या केरल कांग्रेस के मतदाता रहे हैं. इस तबके का नौ फीसदी वोट बीजेपी को आया था. सेंटर फॉर द स्डटी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के कार्यक्रम लोकनीति के अध्ययन के मुताबिक, करीब 16 फीसदी मुसलमानों ने भी बीजेपी को वोट दिया था. मुरलीधरन कहते हैं कि शाह के दिमाग में तस्वीर साफ  हैरू ''हम खुद को सीपीएम और कांग्रेस के खिलाफ आक्रामक ढंग से पेश करेंगे. स्थानीय निकाय चुनाव में हर सीट पर लड़ेंगे. अपने चुनाव चिन्ह पर हम उम्मीदवारों को उतारेंगे. हम सभी हिंदू समुदायों की नुमाइंदगी करेंगे और हमारे अधिकतर उम्मीदवार हिंदू ही होंगे. हम असेंबली की 140 में से 125 सीटों पर फोकस करेंगे.''
बिहार में महादलित जीतनराम मांझी की तर्ज पर बीजेपी केरल में एझावा समुदाय के नेता वेल्लापल्ली नतेसन पर दांव खेल रही है. वे श्री नारायण धर्म परिपालन योगम के महासचिव हैं जिसे सौ साल पहले समाज सुधारक नारायण गुरु ने राज्य के सबसे बड़े पिछड़े समुदाय एझावा के सशक्तीकरण के लिए स्थापित किया था. यह समुदाय वाम के साथ रहा है. अगर इसकी चुनावी आस्था में बदलाव आया तो केरल के चुनावी इतिहास में यह निर्णायक मोड़ होगा.

विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के नेता प्रवीण तोगडिय़ा और एसएनडीपी योगम इडुक्की जिले में अस्पताल खोलने की योजना बना रहे हैं जिसमें गरीब हिंदुओं का इलाज किया जाएगा. तमाम धर्मों से मिलकर बने एक राज्य में अस्पताल जैसे सेकुलर संस्थान का लक्ष्य वाक्य होगा ''स्वस्थ हिंदू, सुखी हिंदू्', जो अपने आप में विडंबना है. बीते 30 अगस्त को यहां आक्रामक हिंदुत्व का एक उदाहरण देखने को मिला जब श्री नारायण गुरु के जन्म महोत्सव पर नतेसन ने बीजेपी की साध्वी निरंजना ज्योति को अतिथि के रूप में आमंत्रित किया. पिछड़ी जाति से आने वाली केंद्र सरकार की मंत्री और भगवाधारी साध्वी ने यहां बयान दियारू ''हदुओं को नास्तिकों से अपनी बेटियों की रक्षा करनी होगी.''

केरल में बीजेपीहाल ही में अमित शाह ने जब दिल्ली में नतेसन और उनके बेटे तुषार से मुलाकात की, तो कयास लगाया गया कि नतेसन बीजेपी के साथ गठजोड़ कर लेंगे और उसके बदले पार्टी उनके बेटे को राज्यसभा में भेज देगी. नतेसन कहते हैं, ''बीजेपी कोई अछूत पार्टी नहीं है. हम राजनैतिक दबाव समूह के तौर पर काम करेंगे. हम नंबूदरी से लेकर नयाडि तक सभी जातियों के बीच हिंदुओं की एकता चाहते हैं.'' बीजेपी भी केरल में यही सियासी भाषा बोल रही है.

पिछले आम चुनाव में बीजेपी को मिले 23 फीसदी वोट एझावा के थे जबकि 2009 में यह आंकड़ा 12 फीसदी था. क्या पार्टी नतेसन का इस्तेमाल कर के इस समुदाय को अपनी झोली में खींच पाएगी? यदि ऐसा हुआ, तो राज्य में यह वाम दलों के अंत की मुनादी होगी.

बीजेपी को अब तक केरल पुलयार महासभा का समर्थन मिल चुका है जो पुलयारों के सशक्तीकरण के लिए काम करती है. इसके अध्यक्ष एन.के. नीलकंठन कहते हैं, ''अक्सर ऐसा कहा जाता है कि हमारा पिछड़ापन संघ की वजह से है. अगर वे इसे दुरुस्त करने को तैयार हैं, तो हम भी इतिहास को भुलाने के लिए तैयार हैं.''

इन घटनाक्रमों से सेकुलर तबकों के बीच खलबली मच गई है. सीपीआइ ने उत्तेजना में कह डाला कि धर्मनिरपेक्षता का मतलब अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण नहीं होना चाहिए और हिंदुओं को दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए. सीपीएम को बीजेपी और एसएनडीपी के करीब आने का डर सता रहा है, लेकिन वह अब तक नहीं समझ पाई है कि इसे चुनौती कैसे दी जाए. विपक्ष के नेता वी.एस. अच्युतानंदन कहते हैं, ''सीपीएम नतेसन का पर्दाफाश करेगी जो अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के चलते बीजेपी के साथ जा रहे हैं ताकि उनके बेटा राजनीति में स्थापित हो सके. उन्हें श्री नारायण गुरु के महान सेकुलर आदर्शों को तोडऩे से कोई परहेज नहीं है जिन्होंने कहा था कि ''धर्म चाहे कोई भी हो, अगर वह बेहतर इंसान बना सकता है तो इतना ही पर्याप्त होना चाहिए.''

केरल में धीरे-धीरे ध्रुवीकरण पनप रहा है. मुस्लिम लीग के शिक्षा मंत्री पी.के. अब्दुरब ने जब एक उद्घाटन समारोह में दीप प्रज्जवलन करने से यह कहते हुए मना कर दिया कि यह हिंदू परंपरा है, तो कई हिंदुओं की त्योरियां चढ़ गईं. उन्होंने जब अपने सरकारी आवास का नाम गंगा से बदलकर ग्रेस कर दिया था तब भी हिंदू नाराज हुए थे. मुरलीधरन कहते हैं, ''हम इन बातों को चुनावी मुद्दा बनाएंगे. मुस्लिम लीग बचकर नहीं निकल सकती. हो सकता है, वे ओणम को हिंदू त्योहार करार देते हुए प्रतिबंधित करना चाहें.''

बीजेपी को मलयालियों की आकांक्षाओं का पूरा ख्याल है, इसीलिए ओबीसी का इस्तेमाल उसकी कई रणनीतियों में छोटा-सा हिस्सा है. संभव है, हिंदुओं को साथ लाने के बाद मोदी सरकार केरल के विकास के लिए पैकेज की घोषणा कर डालें. बीजेपी को तिरुअनंतपुरम जैसे कुछेक इलाकों के पार जाकर अपनी ताकत दिखानी है. खेल शुरू हो चुका है.

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