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आसान नहीं है बोम्मई की राह

इसी सप्ताह कुर्सी पर एक साल पूरा करने वाले कर्नाटक के मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई के लिए आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को जीत दिलाना कड़ी चुनौती.

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बासवराज बोम्मई
बासवराज बोम्मई

अजय सुकुमारन

बासवराज बोम्मई आम तौर पर सार्वजनिक कार्यक्रमों में बिना किसी पूर्व तैयारी के धुआंधार बोलते हैं. उनके भीतर के इंजीनियर की तकनीकी विवरणों पर विशेष नजर होती है. मसलन, पिछले हफ्ते बेंगलूरू में कर्नाटक पावर कॉर्पोरेशन की वर्षगांठ पर आयोजित समारोह में, उन्होंने कुछ हद तक विस्तार से याद किया कि चार दशक पहले काली नदी पर राज्य के सबसे ऊंचे बांध की नींव रखने का काम कितनी मुश्किलों से भरा था.

तब इंजीनियरिंग के छात्र के नाते बोम्मई ने बांध का निर्माण कार्य करीब से देखा था. फिर तुरंत ही उन्होंने चार दशक पुरानी बात को बड़ी कुशलता से वर्तमान संदर्भों से जोड़ दिया, जिस पर दर्शकों ने खूब ठहाके लगाए. उन्होंने पावर (बिजली), पावर ग्रिड और पावर डिस्ट्रिब्यूशन (बिजली वितरण) जैसे विषयों पर चुटकी लेने में विशेष दिलचस्पी दिखाई क्योंकि कुछ हद तक इनका सरोकार पॉलिटिकल पावर से भी था.

कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने कहा, ''पॉलिटिकल पावर भी पैदा होती है...यह केवल कुछ जगहों पर पैदा होती है, फिर इसे वितरित किया जाता है, इसे जमा करके नहीं रखा जा सकता...पॉलिटिकल गुडविल (राजनैतिक सद्भावना) को इकठ्ठा करके नहीं रखा जा सकता, इसे बार-बार अर्जित करने की जरूरत पड़ती है.’’ 

चुनावी साल में, 'पावर मैनेजमेंट’ या सत्ता का प्रबंधन निश्चित रूप से बोम्मई के लिए भी एक कड़ी चुनौती है. 62 वर्षीय मुख्यमंत्री ने 28 जुलाई को कुर्सी पर एक वर्ष पूरा किया और उनके सामने यह तय करने की बड़ी चुनौती है कि तमाम राजनैतिक उठापटक के बावजूद, कर्नाटक में भाजपा के लिए सद्भावना (गुडविल) की आपूर्ति में कोई कमी न आने पाए. उनकी इस चिंता के पीछे कारण, प्रदेश का राजनैतिक इतिहास है.

1980 के दशक के मध्य से, कर्नाटक में किसी सत्तारूढ़ दल की केवल तीन बार वापसी हुई है, जिसमें केवल एक बार उसने अकेले अपने दम पर वापसी की है जबकि दो बार गठबंधन करके सत्ता में वापसी हो पाई है. बोम्मई जिस सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं उसे भाजपा ने विधानसभा चुनाव के एक साल बाद, 2019 में दलबदल कराकर कांग्रेस-जनता दल (सेक्युलर) की गठबंधन सरकार को गिराकर हासिल किया था.

पिछली जुलाई में जब कोविड की दूसरी लहर थम रही थी, भाजपा के दिग्गज नेता बी.एस. येदियुरप्पा के हाथों से निकलकर कर्नाटक की गद्दी बोम्मई को मिल गई. उन्होंने कुर्सी पर बैठने के पहले ही दिन किसानों के बच्चों के लिए छात्रवृत्ति की घोषणा, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत मासिक पेंशन बढ़ाने और प्रशासन को सुदृढ़ करने के उपायों की घोषणा करके धमाकेदार शुरुआत की थी.

उन्होंने किसानों, महिलाओं और युवाओं के लिए उन कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने पर भी ध्यान केंद्रित किया है, जिसकी शुरुआत खुद उन्होंने की थी. आर्थिक मोर्चे पर, कर्नाटक के मजबूत आइटी सेवा क्षेत्र ने कोविड के बाद स्थितियों में तेजी से सुधार में मदद की. उसने मार्च 2022 तक राज्य को 9.5 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि प्राप्त करना संभव किया. राज्य में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) प्रवाह उच्च स्तर पर था.

पिछले वित्त वर्ष में 1.63 लाख करोड़ रुपए के इक्विटी प्रवाह के साथ कर्नाटक एफडीआइ प्राप्त करने वाले राज्यों की सूची में अव्वल था. इंडिया टुडे  से खास बातचीत में बोम्मई कहते हैं, ''मैं अपनी सारी ताकत, अपना समय और ऊर्जा उन लोगों के उत्थान में लगा रहा हूं, जो समाज के आर्थिक पायदान पर सबसे नीचे रह गए हैं. मुझे विश्वास है कि इन प्रयासों से फर्क पड़ेगा.’’ 

लेकिन बोम्मई के कार्यकाल के अधिकांश समय में सांप्रदायिक मुद्दे छाए रहे हैं. जब उन्हें मुख्यमंत्री चुना गया, ज्यादातर लोग बोम्मई को संतुलित, गैर-विवादास्पद नेता के रूप में देख रहे थे. उन पर जनता पार्टी के उनके शुरुआती दौर की कुछ छाप दिखती थी. उनकी यह छवि कुछ हद तक नाटकीय रूप से बदल गई क्योंकि दक्षिणपंथी समूहों ने राज्य में सांप्रदायिक माहौल पैदा किया, जो अब तक राज्य के कुछ हिस्सों तक ही सीमित था.

पिछले दिसंबर में, सरकार धर्मांतरण विरोधी विधेयक लेकर आई, जिसे इस साल एक अध्यादेश लाकर पारित किया गया था. उसके तुरंत बाद उडुपी के एक महिला कॉलेज में हिजाब पहनने को लेकर विवाद हुआ जो उग्र प्रदर्शनों में बदल गया. उसके बाद मंदिर के मेलों में मुस्लिम फेरीवालों के बहिष्कार और फिर हलाल मांस को बंद करने का आह्वान किया गया.

बोम्मई का कहना है कि उन्होंने बस कानून का पालन किया और यह आरोप बेबुनियाद है कि हिंदुत्व की अपनी साख को साबित करने के लिए ऐसा किया, क्योंकि वे भाजपा में नए नहीं हैं बल्कि 2008 में जद (यू) से अलग होने के बाद आ गए थे. वे कहते हैं, ''कानूनी तरीके से शासन करने को कोई हिंदुत्व समझता है तो फिर उसकी सोच से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता.’’ 

मई में, जैसे ही इन आक्रामक हिंदुत्ववादी अभियानों का मिला-जुला असर चरम पर पहुंच गया, बोम्मई ने छवि सुधार के लिए उन कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन और उनकी समीक्षा बैठकों पर बल दोगुना कर दिया. राज्य के बजट में यह नजर आ रहा था. इलेक्ट्रॉनिक चिप निर्माण में निवेश के लिए मैसूरू के पास एक चिप निर्माण इकाई में प्रस्तावित 3 अरब डॉलर के निवेश के लिए सेमीकंडक्टर कंसोर्शियम, आइएसएमसी के साथ करार पर हस्ताक्षर किए.

बोम्मई उसके बाद दावोस गए और अक्षय ऊर्जा और डेटा केंद्रों जैसे नए क्षेत्रों में 25 कंपनियों से लगभग 65,000 करोड़ रुपए के निवेश वादों के साथ लौटे. बेंगलूरू चैंबर ऑफ इंडस्ट्री ऐंड कॉमर्स (बीसीआइसी) के अध्यक्ष के.आर. सेकर का मानना है कि उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहण में हालिया उदार नीतियों ने राज्य में निवेश के माहौल में सुधार किया है. वे कहते हैं, ''कर्नाटक उद्योग के नजरिए से प्रगतिशील है और सरकार उद्योगों के लिए सुलभ है.’’ फिर भी उनका कहना है कि बुनियादी ढांचा क्षेत्र, विशेषकर लॉजिस्टिक्स के मामले में, कई चुनौतियां सामने दिखती हैं. 

इस बीच, भ्रष्टाचार के आरोपों ने बोम्मई सरकार पर हमला करने के लिए विपक्षी दलों को पर्याप्त गोला-बारूद दिया है. इसे पिछले साल के अंत में कर्नाटक स्टेट कॉन्ट्रैक्टर ऑर्गेनाइजेशन की उस शिकायत के साथ तेज हवा मिली कि हर ठेके पर 40 प्रतिशत कमिशन मांगा जा रहा है. कांग्रेस विधायक और पार्टी के प्रवक्ता प्रियांक खड़गे कहते हैं, ''भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी में वृद्धि और विकास कार्यों का ठप पड़ जाना ये प्रमुख समस्याएं हैं जिससे कर्नाटक फिलहाल बहुत पीड़ित है.’’

खड़गे बिटकॉइन घोटाला, बोरवेल की खुदाई में अनियमितताओं के अलावा 545 पुलिस उप-निरीक्षकों की भर्ती में घोटाले को जोर-शोर से उठा रहे हैं, जिसमें एक स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता और एक उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारी सहित कई गिरफ्तारियां हुईं. बोम्मई ने ठेकेदारों के आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया और पुलिस भर्ती घोटाले के बारे में कहा कि पुलिस सब-इंस्पेक्टर भर्तियों पर जांच तो खुद गृह मंत्रालय ने बैठाई है. 

मिलनसार बोम्मई को लोगों से मिलते-जुलते देखा जाता है और जैसा कि एक पार्टी पदाधिकारी कहते हैं, ''वे किसी के साथ विवाद पालने या फिर प्रतिशोध की भावना रखने वाले व्यक्ति नहीं हैं.’’ पार्टी के नेता उनकी ''आम आदमी’’ की छवि की ओर इशारा करते हैं. मुख्यमंत्री बेंगलूरू में अपने आरटी नगर घर, जिसे उनके पिता ने बनाया था, के बाहर आम लोगों से मिलते हैं और उनकी शिकायतें सुनते हैं.

विधानसभा में, बोम्मई ने कई मुश्किल मौकों पर स्थितियों को चतुराई से संभाला है. लेकिन वे येदियुरप्पा की तरह जननेता नहीं हैं, हालांकि दोनों लिंगायत समुदाय से आते हैं. आलोचक कहते हैं कि सांप्रदायिक मुद्दों को संभालने में उनमें वह चतुराई नहीं है, जो येदियुरप्पा में रही है. पार्टी के एक नेता कहते हैं, ''उन्हें कुर्सी बचाकर रखनी है, इसलिए हिंदुत्व से जुड़े किसी भी मुद्दे के विरोध का साहस वे कर ही नहीं सकते.’’

फिर भी, मुख्यमंत्री की कुर्सी के कई अन्य धुरंधर दावेदारों को पछाड़कर सत्ता में आए बोम्मई के लिए सफर इतना आसान नहीं रहा है. हाल तक, चर्चा थी कि मुख्यमंत्री की उनकी कुर्सी डोल रही है. हालांकि चुनाव में 10 महीने से कम समय शेष हो, तो पार्टी शायद नाटकीय परिवर्तन का जोखिम नहीं उठाना चाहेगी.

इसके अलावा, बोम्मई के कुर्सी पर होने से दिल्ली का कर्नाटक सरकार के कामकाज पर नियंत्रण पहले से अधिक है. मई 2023 में होने वाले चुनाव में भाजपा के साथ-साथ अपनी वापसी तय करने के लिए बोम्मई को ''असाधारण प्रदर्शन’’ की जरूरत होगी. बोम्मई को मुख्यमंत्री की गद्दी चाहिए और भाजपा को इस दक्षिणी राज्य में सत्ता बरकरार रखनी है. दोनों का बहुत कुछ दांव पर है, ऐसे में किसी भी असावधानी की गुंजाइश बहुत कम है.

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