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मंदिरों की शरण में नवीन

मुख्यमंत्री नवीन पटनायक द्वारा ओडिशा में शुरू की गईं धार्मिक-ऐतिहासिक धरोहरों से जुड़ीं महत्वाकांक्षी परियोजनाएं यहां भाजपा के उभार की काट बन रहीं.

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मुख्यमंत्री का दौरा: पुरी के जगन्नाथ मंदिर में जनवरी 2020 में जीर्णोद्धार का जायजा लेते नवीन पटनायक मुख्यमंत्री का दौरा: पुरी के जगन्नाथ मंदिर में जनवरी 2020 में जीर्णोद्धार का जायजा लेते नवीन पटनायक

सुप्रीम कोर्ट ने 3 जून को ओडिशा सरकार के श्री मंदिर परिक्रमा प्रोजेक्ट (एसएमपीपी) के खिलाफ एक जनहित याचिका खारिज की, तो मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का ट्वीट था, ''तुमा इच्छा बिना पत्रा ते हिलेनी अहे जगन्नाथ. जय जगन्नाथ (आपकी इच्छा के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिलता, जगन्नाथ. जय जगन्नाथ!)’’ इससे पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) ने ओडिशा उच्च न्यायालय को यह सूचित किया था कि समुद्र के किनारे बसे पुरी शहर में राज्य सरकार के हेरिटेज कॉरिडोर निर्माण प्रोजेक्ट के लिए जगन्नाथ मंदिर के आसपास कराए जा रहे पुनर्विकास कार्यों से 12वीं सदी के प्राचीन मंदिर परिसर को नुक्सान हो सकता है.

लेकिन उसके कुछ सप्ताह बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की हेरिटेज परियोजना का समर्थन कर दिया. इसे नवीन पटनायक की सरकार, जो लोकसभा और विधानसभा चुनावों से एक साल पहले 2023 में ही इस परियोजना को पूरा करने की इच्छुक है, के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है.

ओडिशा में मंदिर की राजनीति देर से शुरू हुई. नवीन ने इसे 2019 के बाद तब अपनाया जब भाजपा ने राज्य की 21 लोकसभा सीटों में से आठ पर जीत हासिल करके शानदार प्रदर्शन किया. 2014 में भाजपा सिर्फ एक सीट जीतने में कामयाब रही थी. पटनायक ने महसूस किया कि भाजपा ओडिशा में एक आक्रामक हिंदुत्व की लहर पैदा करने और इससे क्षेत्रीय अस्मिता को खत्म करने की योजना के साथ आगे बढ़ रही है.

इसको ध्यान में रखते हुए उन्होंने ओडिशा में पुरी, भुवनेश्वर और कोणार्क में 11वीं और 12वीं शताब्दी के मंदिरों पर केंद्रित एक सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण अभियान की योजना बनाई. मुख्यमंत्री के रूप में पांचवीं बार कार्यभार संभालने के तुरंत बाद, उन्होंने भारतीय वास्तुशिल्प के इन आश्चर्यों को और अधिक पर्यटक-अनुकूल बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम शुरू किया. हालांकि, एएसआइ काम की गति धीमा करके भाजपा को विवादस्पद रूप से फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रहा है, जो मंदिर राजनीति को नवीन से हथियाने को बेकरार है. 

2019 के विधानसभा और लोकसभा चुनाव नवीन की पार्टी बीजद के लिए काफी संघर्षपूर्ण रहे थे. ओडिशा में पहली बार बहुत से मतदाताओं ने विधानसभा के लिए तो बीजद को वोट दिया लेकिन लोकसभा में भाजपा के लिए वोट डाले. बीजद विधानसभा की 146 सीटों में से 112 के साथ राज्य में सत्ता बरकरार रखने में सफल रहा और भाजपा ने केवल 23 पर ही जीत हासिल की लेकिन राज्य में भाजपा के पांव पसारने से नवीन के कान खड़े हो गए हैं. उन्होंने इस नई राजनैतिक चुनौती की काट खोजने पर ध्यान दिया.

21 अक्तूबर, 2019 को, उनके मंत्रिमंडल ने ''पुरी के विरासत शहर को संरक्षित और पुनर्जीवित करने’’ की एक परियोजना को मंजूरी दी जिसके केंद्र में जगन्नाथ मंदिर था. नवीन ने ''सौंदर्य की दृष्टि से आकर्षक, सुलभ और सुरक्षित वातावरण’’ निर्माण के लिए 2019-20 में अबाधा परियोजना (एबीएडीएचए यानी बुनियादी सुविधाओं के संवर्धन और विरासत तथा वास्तुकला के विकास की योजना) शुरू की.

अबाधा के लिए तीन वित्तीय वर्षों में 3,208 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया. इसमें से 800 करोड़ रुपए जगन्नाथ मंदिर के चारों ओर 75 मीटर चौड़ा गलियारा (एसएमपीपी) बनाने के लिए दिए गए थे. इसमें मनमोहक बागवानी, विश्राम स्थल, पेयजल की सुविधा, शौचालय और तीर्थयात्रियों के लिए अन्य सुविधाएं होंगी.

इसके अलावा, ध्यान के लिए स्थल जैसी सुविधाओं से लैस पांच एकड़ भूमि पर जगन्नाथ बल्लभ तीर्थ केंद्र के निर्माण के लिए 190 करोड़ रुपए और मठों के विकास, धार्मिक और विरासत झीलों के जीर्णोद्धार, एक उद्यान और एक बहु-स्तरीय पार्किंग के अलावा, जगन्नाथ मंदिर को गुंडिचा मंदिर और गुरुकुल परियोजना से जोड़ने वाली सड़कों के निर्माण के लिए 685 करोड़ रुपए निर्धारित किए गए थे.

जगन्नाथ मंदिर के एक सेवक बिनायक दशमहापात्रा के अनुसार, यह गलियारा वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर गलियारे से प्रेरित है. हालांकि वाराणसी में जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट को लागू करने के लिए केंद्र और राज्य के सभी संस्थान एकजुट हैं, के उलट यहां एसएमपीपी केंद्र-राज्य सरकार के बीच एक अलग तरह के गतिरोध में फंस गया है. दशमहापात्र कहते हैं, ''यहां लोग इस परियोजना के पक्ष में हैं, लेकिन भाजपा नेताओं को समस्या है.’’ 

ज्यादातर भाजपा नेता इस मसले पर कुछ बोलने से बचते हैं. लेकिन राज्य में पार्टी के प्रवक्ता बिरंची त्रिपाठी कहते हैं, ''हमारी चिंता है मंदिर की सुरक्षा.’’ वे यह भी शिकायत करते हैं कि पिलर के लिए 20-30 फुट गड्ढे खोदने की अनुमति दी गई जो प्राचीन स्मारकों से जुड़े कानून का सीधा उल्लंघन है.

हालांकि मंदिर प्रशासन और बंदोबस्ती के विषय पर 2016 में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति बी.पी. दास की अगुआई में गठित एक समिति का एक अवलोकन भी परियोजना को सही ठहराने में नवीन सरकार के काम आया है. इस मंदिर में प्रति दिन औसतन 50,000 तीर्थयात्री आते हैं और रथयात्रा में तो यह आंकड़ा बढ़कर 10 लाख तक पहुंच जाता है. इसके मद्देनजर समिति ने मंदिर की सुरक्षा बढ़ाने के लिए तत्काल उपाय करने को कहा था.

इसके अलावा, दुकानों, होटलों और अन्य व्यावसायिक भवनों की अंधाधुंध वृद्धि से मंदिर की 16 फुट ऊंची विरासत चारदीवारी—मेघनाद पचेरी—छिप गई है. मंदिर के चारों ओर का 100 मीटर चौड़ा रास्ता कई जगहों पर सिमटकर बमुश्किल 5-10 मीटर का रह गया था. मंदिर के भीतर कोई शौचालय नहीं था. जीर्णोद्धार कार्य से जुड़े एक अधिकारी का कहना है, ''मंदिर के बुजुर्ग सेवक पेशाब के लिए मंदिर के किसी अंधेरे कोने का इस्तेमाल किया करते थे.’’ 

पुरी निवासी बिभू मिश्रा कहते हैं, ''प्रवेश द्वार तो किसी भी दृष्टि से एक तीर्थस्थल का प्रवेश द्वार नहीं लगता था. तीर्थयात्रियों को कचरे से भरे रास्ते पर नंगे पांव चलना पड़ता था. खुली नालियां, मक्खियां और मल की बदबू ने इसे और खराब कर दिया.’’ ये समस्याएं तो लंबे समय से थीं, लेकिन लगता है कि राज्य में भाजपा के उभार के बाद सरकार चेती है और मंदिर पर उसका ध्यान गया है.

नवीन सरकार ने संबलपुर में समलेश्वरी मंदिर, जगतसिंहपुर में मां सरला मंदिर, जाजपुर में बिरजा मंदिर, गंजाम में तारा तारिणी मंदिर, कटक में मां चंडी मंदिर और नयागढ़ में नील माधब मंदिर सहित कम से कम एक दर्जन अन्य मंदिरों के लिए अपना खजाना खोल दिया है. इसके अलावा भुवनेश्वर स्थित लिंगराज मंदिर और कोणार्क के सूर्य मंदिर, दोनों के आसपास अनधिकृत निर्माणों को हटाकर पहुंच मार्ग के चौड़ीकरण की योजनाओं पर भी काम चल रहा है.

व्यापक राहत और पुनर्वास (आरऐंडआर) पैकेज के कारण एसएमपीपी और लिंगराज में बिजली की गति से काम शुरू हो सकता है. इस परियोजना में जिनके 50 वर्ग मीटर (538 वर्ग फुट) क्षेत्र के घर चले गए, उन्हें तीन विकल्प दिए गए थे—30 लाख रुपए की एकमुश्त सहायता या 520 वर्ग फुट क्षेत्र की आवासीय इकाई या मंदिर परिसर से 1.5-2 किमी के भीतर प्रस्तावित आरऐंडआर कॉलोनी में 1,000 वर्ग फुट का भूखंड.

भूमि अधिग्रहण नवंबर 2019 में शुरू हुआ और फरवरी 2021 यानी अंतिम मास्टरप्लान में श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंधन प्राधिकरण से हरी झंडी मिलने तक, इलाके को खाली कराने की कवायद पूरी कर ली गई. अब लोग दूर से भी मंदिर की चारदीवारी देख सकते थे और मंदिर के आसपास के क्षेत्र का कायाकल्प हो गया. 600 लोगों ने अपनी जमीन, घर, दुकानें और आजीविका खो दी लेकिन पूरी प्रक्रिया के दौरान कोई हंगामा नहीं हुआ.

इससे सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए, खासकर भाजपा. पीडब्ल्यूडी विभाग के एक अधिकारी का कहना है, ''हमने 99 प्रतिशत भूमि तो प्रत्यक्ष खरीद योजना के माध्यम से हासिल की है और केवल एक प्रतिशत के लिए हमें भूमि अधिग्रहण में जाना पड़ा. केवल पांच या छह मामले अदालत में लंबित हैं.’’ 

 

रास्ते की बाधाएं

कुछ मामूली और दिखावटी बदलावों जैसे स्वागत केंद्र और कार्यालय कक्ष को 75 मीटर के निषिद्ध क्षेत्र से स्थानांतरित करने का सुझाव देने के अलावा एएसआइ यह नहीं बता पा रहा कि वास्तव में ऐसी कौन सी चीज है जो उसे परेशान कर रही है. राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (एनएमए) द्वारा सितंबर 2021 को निषिद्ध क्षेत्र के भीतर एक आश्रय मंडप, अमानती घर और शौचालय निर्माण के लिए अपनी ''अनापत्ति’’ देने के बाद एएसआइ की ओर से हर चीज में अड़ंगा लगाने का काम शुरू हो गया.

ओडिशा सरकार के अधिकारियों का तर्क है कि जगन्नाथ मंदिर के लिए एनएमए ही अंतिम प्राधिकरण है क्योंकि कोई विरासत उप-नियम नहीं हैं, जिसके तहत एएसआइ हस्तक्षेप कर सकता है. मई 2021 में, राज्य के संस्कृति निदेशक के संपर्क किए जाने पर, पुरातत्व अधीक्षक ने पांच सदस्यीय टीम को साइट पर भेजा. इस टीम द्वारा समीक्षा के आधार पर एनएमए ने हरी झंडी दी थी.

एएसआइ की ओर से ओडिशा उच्च न्यायालय को सौंपे गए एक हलफनामे से यह भी पता चला कि उसे योजना को लेकर कोई बड़ी समस्या नहीं थी. इसमें कहा गया है, ''शौचालय, नालियां, बिजली के तार जैसे कार्य निर्माण की परिभाषा में नहीं आते...[और] निषिद्ध क्षेत्र में भी किए जा सकते हैं.’’ एएसआइ को 75 मीटर चौड़े कॉरिडोर के भीतर एक स्वागत काउंटर की योजना पर आपत्ति थी. यहां तक कि एएसआइ के महानिदेशक, जो 21 फरवरी 2022 को पुरी और भुवनेश्वर में निरीक्षण कर रहे थे, ने उल्लेख किया कि ''भक्तों के लिए प्रस्तावित सुविधाएं आवश्यक हैं और इसकी अनुमति दी जा सकती है.’’

बीजद सांसद अमर पटनायक के अनुसार, इस परियोजना का एकमात्र उद्देश्य था ''तीर्थयात्रियों, विशेष रूप से वृद्धों, विकलांगों, महिलाओं और बच्चों के लिए अधिक सुविधाएं प्रदान करना.’’ फिर भी, भुवनेश्वर से भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी के किसी करीबी ने इसके खिलाफ एक जनहित याचिका दायर कर दी. वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों का आरोप है कि सारंगी इसे बीजद से हथियाने के लिए राजनीति कर रही हैं.

एक अधिकारी कहते हैं, ''अगर मंदिरों के सौंदर्यीकरण का सारा श्रेय नवीन लेते हैं, तो ओडिशा में हिंदू भावनाओं को भड़काने का भाजपा का एजेंडा बेमानी हो जाएगा. एएसआइ की अड़ंगा डालकर देरी कराने की रणनीति एक राजनैतिक प्रपंच का हिस्सा प्रतीत होती है.’’ एएसआइ के डीजी, जो एनएमए के एक पदेन सदस्य भी हैं, ने साइटों का दौरा किया, सकारात्मक टिप्पणियां कीं और यहां तक कि सीएम से मुलाकात में पूर्ण सहयोग का आश्वासन भी दिया था.

लेकिन एएसआइ के रुख में अचानक परिवर्तन हैरान करता है. 27 फरवरी, 2021 को जब विधानसभा में इसके संदर्भ में एक प्रस्तुति दी गई थी, तब सभी दलों ने इसका समर्थन किया था और उद्घा टन समारोह में एएसआइ और एनएमए के प्रतिनिधियों के साथ सभी दलों के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे. 

जहां जगन्नाथ मंदिर में काम की गति धीमी है, वहीं लिंगराज मंदिर के आसपास के जीर्णोद्धार पर एएसआइ का दावा है कि यहां खुदाई के दौरान प्राचीन संरचनाओं के अवशेष मिले थे. लिंगराज के एक सेवक रामचंद्र रथ कहते हैं, ''लिंगराज मंदिर के आसपास लगभग हर जगह एक मंदिर है.

9वीं सदी का गौरीशंकर मंदिर एक व्यस्त रास्ते के बीच में है. 14वीं सदी का तीर्थेश्वर मंदिर एक निजी प्रांगण में है. उसी काल का भबानी शंकर मंदिर अनधिकृत दुकानों और अन्य भवनों के पीछे छिप गया था. सरकार ने अतिक्रमण हटाकर मंदिरों की सुंदरता और गरिमा को बहाल किया है.’’  

काम के अचानक ठप हो जाने से एक नई समस्या खड़ी हो गई है. सभी दुकानों और वेंडरों को हटा दिए जाने से तीर्थयात्रियों के पास बैठने के लिए कोई जगह नहीं है और न ही पीने के पानी की कोई व्यवस्था है. भबानी शंकर मंदिर के एक सेवक काबू मिश्रा कहते हैं, ''नवीनीकरण पर रोक ने उनकी परेशानियां कई गुना बढ़ा दी हैं.’’

अमर पटनायक के अनुसार, एएसआइ ''मंदिर की राजनीति’’ कर रहा है. सांसद कहते हैं, ''एनएमए स्मारकों और उनके आस-पास की हर चीज के लिए उत्तरदायी निकाय है, जबकि एएसआइ को पुरातात्विक अवशेषों की रक्षा करनी है. दुख की बात है कि एएसआइ अपने दायरे से बाहर जा रहा है और तीर्थयात्रियों से जुड़े विकास कार्यों को खतरे में डाल रहा है.’’ 

पुरी का जगन्नाथ मंदिर

3,208करोड़ रुपए का बीते तीन वित्त वर्षों के दौरान 'बुनियादी सुविधाओं के विस्तार और पुरी में विरासत और वास्तुकला के विकास’ के लिए प्रावधान किया गया

800 करोड़ रुपए

से श्री मंदिर परिक्रमा परियोजना पूरी होगी, जिसके तहत मंदिर के चारों ओर 75 मीटर का एक गलियारा बनाया जाएगा, मंदिर का खुला क्षेत्र पांच एकड़ से बढ़ाकर 26 एकड़ किया जाएगा.

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