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नकली कन्हैया की फिल्मी कहानी

जमींदार का गायब हुआ बेटा चार साल बाद भिखारी के वेश में मिला, बहन ने उसके नकली बेटा बनने का मुकदमा जीता, इस दिलचस्प कथा में छुपे समाज के कई रंग

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दिलचस्प कथानक: कन्हैया उर्फ दयानंद गोस्वामी का परिवार दिलचस्प कथानक: कन्हैया उर्फ दयानंद गोस्वामी का परिवार

—पुष्यमित्र

कन्हैया असली है या नकली, यह हम नहीं कह सकते. जब लौटकर आया था तो उसके पिता कामेश्वर बाबू ने  मान लिया कि यही मेरा असली बेटा है, तो हम लोग भी मान लिए. हो सकता है, नकली ही हो. मगर 40-41 साल से यहां रह रहा है. घर-परिवार, समाज से जुड़ गया है. यहीं शादी-ब्याह हुआ, बच्चे हुए, नाती तक हो गया. अब उसको यहां से भगाना ठीक नहीं. जब आया था उसी वक्त भगा देते. अब ठीक नहीं. वैसे भी जिनको संतान नहीं होती, वे पोसपुत्र (दत्तक पुत्र) रख लेते हैं.’’

65 साल के उमेश सिंह जब यह कहते हैं तो उनकी बातों में कानून कम, सामाजिकता अधिक झलकती है. उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि अदालत ने उनके पड़ोसी पुराने जमाने के जमींदार कामेश्वर सिंह के बेटे कन्हैया को फर्जी बता दिया और कहा कि वह जमुई जिले के लखै गांव का रहने वाला दयानंद गोस्वामी है, जो संपत्ति हड़पने के इरादे से जमींदार के घर नकली बेटा बनकर आया था. उन्हें कन्हैया भाई जैसा ही लगता है. 

यह उस सनसनीखेज मुकदमे की जमीनी हकीकत है, जिसका फैसला इस साल अप्रैल माह के पहले हक्रते में आया. नालंदा जिले के सिविल कोर्ट में पांच अप्रैल को जज मानवेंद्र मिश्र ने यह फैसला सुनाया. उन्होंने इसी जिले के मुरगांवा गांव में पूर्व जमींदार और पूर्व मुखिया कामेश्वर सिंह के घर में उनका बेटा बनकर रहने वाले कन्हैया को धोखेबाज करार दिया.

1977 में कामेश्वर सिंह का बेटा घर से गायब हो गया था. चार साल बाद 1981 में भरथरी गायन करके भीख मांगने वाला दयानंद गोस्वामी गांव आकर खुद को जमींदार का इकलौता वारिस कन्हैया बताने लगा. तब से वह इस संपत्ति पर काबिज है. 

पहली नजर में यह कहानी पूरी तरह फिल्मी लगती है. संतान के गम में दुखी कामेश्वर सिंह ने उसे अपना बेटा मान लिया, मगर उसकी मां रामसखी देवी ने उसे बेटा नहीं माना. उन्होंने उस पर मुकदमा कर दिया. उस वक्त भी दयानंद गोस्वामी को जेल हुई थी. मगर बाद में मां रामसखी देवी ने एफिडेविट देकर कहा कि उसे गलतफहमी हुई थी, धोखे से उनसे पत्र लिखा लिया गया था.

उसके बाद कथित कन्हैया उर्फ दयानंद गोस्वामी को जमानत मिल गई. 1990 में जमींदार कामेश्वर सिंह का और 1992 में उनकी पत्नी रामसखी देवी का निधन हो गया तो अदालत ने मामले को बंद कर दिया. मगर बाद में कन्हैया की बहन विद्या देवी ने मुकदमा किया. वे हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गईं. बाद में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप पर जिला न्यायालय में फिर से सुनवाई शुरू हुई. उस मुकदमे का फैसला 41 साल बाद आया.

अभियोजन अधिकारी डॉ. राजेश कुमार पाठक ने बताया कि कोर्ट ने जब दयानंद गोवामी को डीएनए टेस्ट कराने की बात कही तो वह मुकर गया. इसके अलावा उसके द्वारा पेश दयानंद गोस्वामी का मृत्यु प्रमाण पत्र भी जांच में गलत पाया गया. गायब होने के बाद 1977 से 1981 के बीच वह कहां रहा, इसका कोई प्रमाण नहीं दे पाया.

किसी व्यक्ति ने कोर्ट में आकर गवाही नहीं दी कि कन्हैया हमारे साथ था. जमुई के तीन गवाहों ने इसकी पहचान लखै गांव के दयानंद गोस्वामी के रूप में की थी. अदालत ने उसे दयानंद गोस्वामी ही माना है और धोखाधड़ी के लिए सजा सुनाई.

इस मामले में शिकायतकर्ता विद्या देवी के वकील राजेश कुमार ने कहा, ''जमुई का दयानंद गोस्वामी 41 साल से कन्हैया बनकर उनकी मुवक्किल विद्या देवी के पिता के घर रहा है, उसने इस बीच 40-45 एकड़ पुश्तैनी जमीन भी बेच दी है. अब उसे संपत्ति के बेदखल करने और उसके नाम से जारी हथियार का लाइसेंस रद्द करने की अपील करेंगे.’’ 

मुरगांवा गांव में आज भी कई लोग उस घटना के चश्मदीद हैं. उन लोगों को वह दृश्य हू-ब-हू याद है जब अदालत द्वारा दयानंद गोस्वामी करार दिए गए कन्हैया को पड़ोस के केशोपुर गांव से लाया गया था. हजारों की भीड़ उसके स्वागत के लिए कामेश्वर सिंह की ड्योढ़ी पर उमड़ी थी.

एक ग्रामीण महिला सबुजा देवी बताती हैं कि कन्हैया बाबू घर आए तो सीधे अंदर गए और पिता के कमरे से पैसे निकालकर लाए, उन्होंने वे पैसे गरीबों में बांटे थे. वे कहती हैं, ''कामेसर बाबू का घर भूलभुलैया है, उसमें कोई अजनबी जा नहीं सकता. कन्हैया बाबू को एक-एक कोठली का रास्ता पता था.’’ सबुजा देवी को रत्ती भर संदेह नहीं है कि वे कन्हैया नहीं हैं. गांव के कहार टोली और रमानी टोले के सब पुराने लोग यही कहते हैं कि यही असली कन्हैया है. 
 
पूरे मुरगावां में सिर्फ एक आदमी महेश्वर प्रसाद सिंह ऐसे मिले जो दावे के साथ कहते हैं कि यह कन्हैया नहीं, दयानंद गोस्वामी है. 97 साल के महेश्वर प्रसाद, कामेश्वर सिंह के चचेरे भाई हैं. वे कहते हैं कि कामेश्वर सिंह ने तीन शादियां कीं. एक से कोई बच्चा नहीं हुआ. एक से दो बेटी हुई.

और तीसरी शादी रामसखी देवी से हुई, जिनसे पांच बेटियां और एक बेटा कन्हैया हुआ. 1977 में जब कन्हैया मैट्रिक परीक्षा देने चंडी गया था तो अचानक गायब हो गया. वह कामेश्वर बाबू का इकलौता बेटा था. उस समय 70-72 साल के कामेश्वर सिंह गम में डूब गए. 

चार साल बाद यहां से 10-12 किमी दूर केशोपुर में एक युवक आया जो भरथरी गाकर भीख मांगता था. उसने कहा कि वह मुरगावां के जमींदार कामेश्वर सिंह का बेटा है. खबर मिली तो कामेश्वर बाबू उसे देखने पहुंचे. वे उसे ले आए. लेकिन महेश्वर प्रसाद को तभी लग गया था कि यह कन्हैया नहीं है. उन्होंने कामेश्वर बाबू से कहा भी, मगर वे कहने लगे, अब जो है, यही हमारा बेटा है. 

हालांकि कन्हैया की मां रामसखी देवी को भरोसा नहीं हुआ. उनका कहना था कि उनके बेटे के सिर पर कटे का निशान था, इस लड़के के सिर पर नहीं है. इसलिए उन्होंने 1981 में ही मुकदमा किया था. 

महेश्वर प्रसाद कहते हैं, वे तब मुरगावां पोस्ट ऑफिस में पोस्ट मास्टर थे. उन्हें एक रोज दयानंद गोस्वामी की लिखी एक चिट्ठी मिली थी. वह चिट्ठी उसने जमुई जिले के लखै गांव में रह रही अपनी पत्नी को लिखी थी. चिट्ठी में उसने अपनी पत्नी को बताया था कि वह मुरगावां के जमींदार के घर बेटा बनकर रह रहा है.

उसने अपनी पत्नी को इस गांव तक आने का रास्ता भी बताया था. महेश्वर प्रसाद कहते हैं, तब फोटोकॉपी का जमाना नहीं था. इसलिए वे उसकी फोटोकॉपी कराकर रख नहीं पाये. हालांकि दयानंद गोस्वामी उर्फ कन्हैया के बड़े बेटे गौतम इसे गलत बताते हैं. वे कहते हैं कि ये महेश्वर प्रसाद ही थे, जिन्होंने उनकी दादी रामसखी देवी को भड़का कर उनके पिता के खिलाफ झूठा मुकदमा करवाया था. 

दयानंद गोस्वामी उर्फ कन्हैया आज भी अपने परिवार के साथ कामेश्वर सिंह की हवेली में ही रहते हैं. बंटवारे के बाद हवेली आधा हिस्सा उन्हें मिला, वह सफेद रंग में रंगा अलग से दिख जाता है. दूसरा आधा हिस्सा जर्जर और बदरंग है. उनकी हवेली के आगे तालाब और मंदिर है.

जब यह संवाददाता उनके दरवाजे पर पहुंचा तो वे घर पर नहीं थे. उनकी पत्नी ने बताया कि वे इसी मुकदमे की नकल निकलवाने बिहारशरीफ गए हैं. उस वक्त घर में उनकी पत्नी, दो बेटे और एक बेटी मौजूद थी. दोनों बेटे पढ़ाई पूरी कर चुके हैं और अब नौकरी की तलाश में हैं. बेटी पढ़ाई कर रही है. दो अन्य बेटियों की शादी हो चुकी है. उनकी पत्नी ने कहा, ''यह पूरा मामला संपत्ति के लालच में रचा गया है.

उनके घर लौटने के बाद बाबूजी (कामेश्वर सिंह) दस साल तक जिंदा रहे. बाबूजी ने ही मेरी उनसे शादी कराई. मेरी सास जरूर अपनी बेटी के प्रभाव में आकर मुकदमा कर बैठीं, मगर बाबूजी हमेशा हमारे साथ खड़े रहे. हम लोगों ने यहां रहकर बहनों की शादी कराई, माता-पिता का श्राद्ध कराया. इनके मन में छल होता, ये गलत आदमी होते तो ये संपत्ति बेचकर भाग नहीं जाते.’’ वे कहती हैं, ''सिर्फ एक बहन विद्या देवी गलत आरोप लगाकर हम लोगों को परेशान कर रही हैं, जबकि दूसरी छह बहनों ने कभी आपत्ति नहीं की.’’

थोड़ी देर बाद दयानंद गोस्वामी उर्फ कन्हैया भी घर आ गए. उन्होंने कहा कि जब वे मैट्रिक की परीक्षा देने चंडी गए थे तो जिस मकान में ठहरे थे, वहां की मालकिन ने उन्हें कहा था कि उनकी जान को खतरा है. इसलिए वे भाग गए थे. उन्हें फिर कुछ भरथरी गायक मिल गए. वे उनके साथ घूमते रहे. उन्हें गोरखपुर ले जाकर दीक्षा दी गई.

चार साल बाद अपनी मां के हाथों भिक्षा लेने की उम्मीद से वे अपने इलाके में लौटे थे. वे केशोपुर गांव में थे कि किसी ने उनसे कह दिया कि हाथ-पांव सही सलामत हैं, तो भीख मांगकर क्यों खाते हो. इसी बात के गुस्से में उनके मुंह से निकल गया कि वे भिखमंगे नहीं, उनके पिता के घर में दर्जनों नौकर काम करते हैं.  

वे अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को झूठा बताते हैं. वे कहते हैं कि बंटवारे के बाद उनके हिस्से में 80 एकड़ जमीन आई थी. उसमें से लगभग 40 एकड़ जमीन की बिक्री उनके पिता के जीते-जी हुई. घर में सात-सात बेटियां थीं, उनकी पढाई और शादी में पैसे खर्च हुए. पिता के गुजरने के बाद एक-दो एकड़ जमीन ही उनके हाथों बिकी है. वे इस आरोप को भी झूठा बताते हैं कि उन्होंने अपने पिता को मुखाग्नि नहीं दी. वे कहते हैं, जब पिता की मृत्यु हुई तो वे एक दूसरे मामले में जेल में थे. उनके पिता को मुखाग्नि उनकी पत्नी ने दी है. 

यह पूछने पर कि वे डीएनए टेस्ट करा लेने के लिए क्यों तैयार नहीं हैं. वे कहते हैं, ''माता-पिता जिंदा होते तो करा लेते. मगर बहन से डीएनए मिलने की संभावना कम होती है.’’ अदालत में दयानंद गोस्वामी का फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र पेश करने के आरोप पर वे कहते हैं कि अगर मृत्यु प्रमाण पत्र फर्जी है तो जारी करने वाले पर कार्रवाई होनी चाहिए. उन्हें तो यह दयानंद गोस्वामी के भाई राम खेलावन गोस्वामी ने उपलब्ध कराया था.

वे कहते हैं कि  जल्द ही पुनर्विचार की याचिका दायर करने वाल हैं. उनका आरोप है कि उनके चचेरे भाई गोपाल सिंह और उनकी बहन विद्या देवी के पति और दामाद तीनों वकालत के पेशे से जुड़े हैं और उनकी बड़ी पहुंच है. ये लोग  मुकदमे को प्रभावित कर रहे हैं.

इस कहानी की एक महत्वपूर्ण किरदार विद्या देवी हैं. उनके वकील और दयानंद गोस्वामी से सूचना मिली कि वे राजधानी पटना के नीलगिरि अपार्टमेंट में रहती हैं. मगर यह संवाददाता वहां गया तो उनके क्रलैट पर ताला लगा था. अपार्टमेंट के सुरक्षा प्रहरी ने कहा कि विद्या देवी यहां कम ही रहती हैं.

वे धनबाद या बोकारो में रहती हैं. उनके वकील से मिले नंबर पर कई बार कॉल भी किया गया, मगर उस कॉल को किसी ने रिसीव नहीं किया. इसलिए उनका पक्ष उपलब्ध नहीं है.  

इस कहानी की जड़ की तलाश करने जब इंडिया टुडे जमुई के लक्ष्मीपुर के पास स्थित लखै गांव पहुंचा तो वहां दयानंद गोस्वामी के नाम से कोई परिचित नहीं था. उनके पिता परभू गोस्वामी भी जीवित नहीं थे. दयानंद गोस्वामी के तीन भाइयों का परिवार वहां अलग-अलग रह रहा था. एक भाई की मौत हो गई थी.

नारायण गोस्वामी और खेलावन गोस्वामी जीवित हैं, मगर उनसे मुलाकात नहीं हो पाई. नारायण गोस्वामी के पुत्र प्रमोद गोस्वामी घर पर मिले. उन्होंने कहा कि यह कहानी उनके जन्म के पहले की है, हां, दादा और चाचा लोगों ने बताया कि छोटके चाचा को नशे की आदत थी. एक दिन वे कहीं गायब हो गए.

जब पहली बार मुकदमा हुआ था तो लखै गांव के तीन लोगों विष्णुदेव गोस्वामी, नंदन गोस्वामी और चौकीदार दशरथ पासवान ने अदालत में कथित कन्हैया की पहचान दयानंद गोस्वामी के रूप में की थी. उनमें दो नंदन गोस्वामी और दशरथ पासवान जिंदा नहीं हैं. विष्णुदेव गोस्वामी जीवित हैं, वे अपने बयान पर कायम हैं. दशरथ पासवान के बेटे रामानंद पासवान फिलहाल गांव के चौकीदार हैं.  

बरहट के थाना प्रभारी चितरंजन कुमार कहते हैं कि मृत्यु प्रमाण पत्र की जांच कराई तो वह फर्जी पाया गया. उसकी शादी माणिकपुर की एक महिला से हुई थी, लेकिन दयानंद गोस्वामी नहीं लौटा तो उस महिला ने दूसरी शादी कर ली. जिस गौरा पंचायत में उसके मरने की जगह बताई गई थी, वह भी गलत साबित हुई. इन्हीं सबूतों के आधार पर फैसला सुनाया गया है.

 

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