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आसाराम के रेप मामलों में प्रमुख गवाह की हत्या कर घोंट दिया सच का गला

आसाराम और उसके बेटे नारायण साईं के बलात्कार मामलों में प्रमुख गवाह अमृत प्रजातपति की हत्या से गुजरात पुलिस पर सवालिया निशान.

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यह गुजरात पुलिस की छवि पर हाल के दौर का शायद सबसे बड़ा धब्बा है. अगर वारदात दुर्भाग्य से मोदी की गुजरात से केंद्र में ताजपोशी के वक्त नहीं हुई होती तो बलात्कार के आरोपी धर्मगुरु आसाराम और उसके बेटे नारायण साईं के खिलाफ मुख्य गवाह 57 वर्षीय अमृत प्रजापति को गोली मारने की घटना देशभर के मीडिया की सुर्खियों में छा गई होती. प्रजापति 2008 से ही दोनों बाप-बेटे के कथित कुकर्मों को उजागर कर रहे थे. उन्होंने धर्मगुरु के पाखंड और महिला अनुयायियों के यौन शोषण के विस्तृत ब्यौरे सबके सामने पेश किए थे. अब दोनों बाप-बेटे अलग-अलग मामलों में करीब सालभर से जेल में हैं. हमलावर कथित तौर पर आसाराम के समर्थक बताए जा रहे हैं. प्रजापति को 22 मई को राजकोट के उनके क्लिनिक में गोली मार दी गई थी. दो दिन बाद प्रजापति बेहोशी में चले गए थे और 10 जून को उनकी मौत हो गई.
 
इस मामले में गुजरात पुलिस की भूमिका पर कई गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं. प्रजापति की पत्नी 37 वर्षीया सरोज और उनके रिश्तेदार मोदीभाई प्रजापति ने बताया कि वारदात के दो दिन बाद बेहोशी में जाने से पहले प्रजापति ने खुद पांच संदिग्धों के नाम बताए थे लेकिन पुलिस एक भी संदिग्ध को गिरफ्तार नहीं कर पाई है जबकि 18 दिन बाद उनकी मौत हुई. इससे सवाल खड़े हुए कि क्या यह पुलिस का निकम्मापन है या वह हजारों करोड़ रु. के आसाराम आश्रम की ओर से भारी दबाव में है.

नरेंद्र मोदी और गुजरात में उनकी उत्तराधिकारी आनंदीबेन पटेल, दोनों ही आसाराम के गलत कार्यों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के पक्ष में बताए जाते हैं लेकिन गुजरात पुलिस के आला महकमे में आसाराम से मिलीभगत की खबरें भी आम हैं. पिछले साल इसके सबूत उस समय भी मिले जब पुलिस के बड़े अधिकारियों ने आसाराम के आदमियों को छह करोड़ रु. के साथ पकड़ा था. वे यह रकम सूरत में नारायण साईं के मामले की जांच कर रहे एक जूनियर पुलिस अफसर को देने जा रहे थे. रकम 15 करोड़ रु. के सौदे का हिस्सा थी. उस पुलिस इंस्पेक्टर को भी गिरफ्तार कर लिया गया था.

सरोज भी आसाराम की अनुयायी रह चुकी हैं. वह पूछती हैं, ‘‘क्या कोई संदेह है कि किसने उन्हें मारा? आसाराम मेरे पति को निगल गया. सिर्फ सीबीआइ जांच से ही सचाई सामने आ सकती है.’’ जाहिर है, गुजरात पुलिस अब बचाव की मुद्रा में है. एक वरिष्ठ अधिकारी आश्वस्त करते हुए कहते हैं, ‘‘चाहे जो हो, हम अपराधियों को पकड़ लेंगे.’’ यह बयान भी बहुत देर से आया है. आदर्श स्थिति तो यह होती कि प्रजापति को पुलिस सुरक्षा मुहैया कराती, चाहे उन्होंने खुद इसकी मांग भले न की हो.

प्रजापति आसाराम आश्रम से 1989 में आयुर्वेद विभाग के प्रभारी के नाते जुड़े थे. 2008 और उसके बाद प्रजापति के मीडिया में दिए बयानों के मुताबिक कुछ साल बाद ही उन्हें यह खटका कि आसाराम उनसे किसी न किसी बहाने सेक्स उत्तेजना पैदा करने वाली दवाइयां बनवा रहे हैं. उनका आरोप था कि 1992 में उन्होंने अहमदाबाद आश्रम में आसाराम को एक महिला अनुयायी के साथ सेक्स करते देखा और उसके बाद ऐसी कई हरकतें जानीं. लेकिन प्रजापति ने कहा कि वे आसाराम के चेलों के डर के मारे मुंह खोलने से बचते रहे. आखिर 1996 में उन्होंने आश्रम छोडऩे का साहस बटोर लिया.
अमृत प्रजापति
(अमृत प्रजापति)
जाहिर है, आसाराम के चेलों का आरोप है कि प्रजापति धोखेबाज था और उसके विद्रोह करने की वजह पैसा उगाहना था.
दिलचस्प यह भी है कि आसाराम के शिष्यों को यह सीख दी जाती थी कि गुरु पर सवाल खड़ा करना संसार में सबसे बड़ा पाप है. सो, उनके चेलों का गुरु पर सवाल उठाने वालों के खिलाफ हमला करने का पुराना इतिहास है. आसाराम के खिलाफ आवाज उठाने वाले राजू चांडक पर भी पहले हमले हुए. इसके अलावा, आसाराम के कई अनुयायियों ने ऐसी दास्ताने सुनाई हैं कि कैसे उन्हें अवैध संपत्ति हासिल करने और विरोधियों को चुप कराने के लिए हिंसक औजार की तरह इस्तेमाल किया गया.

प्रजापति 1996 में आश्रम छोडऩे के बाद 2008 में खुलकर सामने आए जब आसाराम के कई अनुयायी उनकी काली करतूतों के खिलाफ खुलकर बोलने लगे. उन लोगों ने महिलाओं के यौन शोषण, अवैध संपत्ति हथियाने और काला जादू करने संबंधी कई आरोप लगाए. साबरमती नदी के किनारे आसाराम के एक स्कूल में कथित रूप से काला जादू के प्रयोग से दो बच्चों की मौत के बाद उनके विरोध में आवाजें मुखर हुई थीं. उस मामले में गुजरात सरकार नेन्यायिक जांच बिठाई थी, लेकिन आरोप सिद्ध नहीं हो सके.

प्रजापति का यह आरोप भी था कि अहमदाबाद में आसाराम का महिला आश्रम ‘‘उसकी रखैलों का डेरा’’ है. उन्होंने यह भी कहा था कि आसाराम सेक्स उत्तेजक दवाइयां सिर्फ खुद ही नहीं खाता था, बल्कि सहवास से पहले दूध में मिलाकर महिला को भी पिलाता था. संयोग से, पिछले साल जोधपुर में जिस लड़की के साथ दुराचार के आरोप में आसाराम 10 महीने से जेल में है, उसने भी अपने बयान में कहा कि पहले उसे दूध पिलाया गया था.

प्रजापति निडर थे. अकसर वे आत्मरक्षा के लिए बगल में पिस्तौल टांगकर इधर-उधर आते-जाते थे, ताकि आसाराम के गुंडों के हमलों से बचे रहें. प्रजापति का साहस यह बताने के लिए काफी था कि वे अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं. वे आसाराम और उसके बेटे नारायण साईं की करतूतों को विस्तार से बताते थे, इसलिए मीडिया में भी काफी लोकप्रिय थे. उनके दोस्त अकसर आसाराम की ताकत से उन्हें सावधान किया करते थे लेकिन आसाराम के खिलाफ प्रजापति में मानो कोई जुनूनी तेवर था. उनकी जिंदगी का मिशन थाः आसाराम की करतूतों को तार्किक परिणति तक पहुंचाना. हालांकि वे रहते अहमदाबाद में थे और हफ्ते में एक बार वडोदरा और राजकोट की क्लिनिक में जाते थे, लेकिन अपने मिशन के लिए भी समय निकाल लेते थे. बेशक, उनकी हत्या धर्म के पाखंडियों के खिलाफ लड़ाई में एक विराम की तरह है.

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