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खास रपटः हथियारों और हीरे से आगे की राह

तेल अवीव में मोदी का जोरदार स्वागत हुआ था, दोनों ने बड़ी गर्मजोशी से एक-दूसरे को गले लगाया था, जिसमें दोनों के बीच निजी दोस्ती का भाव नजर आ रहा था. 

दोस्ती की फिजा 6 जुलाई, 2017 को ओलगा समुद्र तट पर मोदी और नेतन्याहू दोस्ती की फिजा 6 जुलाई, 2017 को ओलगा समुद्र तट पर मोदी और नेतन्याहू

इज्राएल का एयरफोर्स वन 14 जनवरी को जब नई दिल्ली में उतरेगा तो इज्राएल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दोनों के हावभाव पर गौर करने की वाकई कई वजहें होंगी. मोदी के इज्राएल दौरे के, जो किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला दौरा था, सिर्फ छह महीने बाद ही यह किसी इज्राएली प्रधानमंत्री का पहला भारत दौरा होगा. 

तेल अवीव में मोदी का जोरदार स्वागत हुआ था, दोनों ने बड़ी गर्मजोशी से एक-दूसरे को गले लगाया था, जिसमें दोनों के बीच निजी दोस्ती का भाव नजर आ रहा था. इसके बाद हैफा में ओलगा समुद्र तट पर बचपन के दोस्तों की तरह टहलते हुए दोनों प्रधानमंत्रियों की तस्वीरें खींची गईं.

वहां पानी में भीगने से बचने के लिए दोनों के पैंटों की मोडिय़ां ऊपर की तरफ मुड़ी हुई थीं. इस बार नेतन्याहू का दौरा, जो उतना ही ऐतिहासिक होगा, नई दिल्ली और तेल अवीव के बीच रिश्तों में कथित शीतलता के बीच हो रहा है. 22 दिसंबर को भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से येरुशलम को इज्राएल की राजधानी घोषित किए जाने के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव पर 127 अन्य देशों के साथ वोट किया था. नेतन्याहू ने भारत का नाम लिए बिना इस वोट को 'हास्यास्पद' और 'बेतुका नाटक' बताया था.

उसके एक सप्ताह बाद इज्राएल के सरकारी स्वामित्व वाले राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स लिमिटेड ने 2 जनवरी को कहा कि भारत के रक्षा मंत्रालय ने हल्के वजन वाली 1,600 टैंक-रोधी स्पाइक मिसाइलों की आपूर्ति का 50 करोड़ डॉलर का सौदा रद्द कर दिया है, जो हाल के वर्षों में सबसे बड़ा सौदा था. ये मिसाइलें तकनीक ट्रांसफर के जरिए एक निजी कंपनी भारत फोर्ज और सरकार के स्वामित्व वाली भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के आपसी सहयोग से भारत में ही बनाई जानी थीं. 

राफेल के प्रवक्ता ने इस सौदे के, जिसे लेकर कंपनी ने करीब पांच साल तक प्रयास किया था, रद्द होने पर 'दुख' जताया था. 3 जनवरी को भारत के रक्षा मंत्रालय की ओर से तुरत-फुरत राफेल को 131 बराक मिसाइलों का 460 करोड़ रु. के ऑर्डर की दिलासा देने वाली घोषणा भी उस सौदे के रद्द होने से तेल अवीव में पैदा हुए दुख की भरपाई नहीं कर सकी (इस सौदे को 2017 के शुरू में ही हरी झंडी दे दी गई थी). स्पाइक सौदे को त्वरित प्रस्ताव के तौर पर फिर से शुरू किया गया है, और राफेल एक बार फिर इसका प्रतियोगी होगा.

पांच वर्षों से एक और बड़ा विचाराधीन सौदा—15,000 करोड़ रु. का 155/52 एमएम के होवित्जर तोपों की आपूर्ति—खतरे में बताया जा रहा है. इसमें इज्राराएल की तोप निर्माता कंपनी एल्बिट फ्रांस के नेक्सटर से मुकाबला कर रही है. लेकिन संयुक्त राष्ट्र का वोट इज्राएल के लिए सचमुच एक बड़ा झटका था. ज्यादातर को लग रहा था कि भारत मतदान में हिस्सा नहीं लेगा. 3 जनवरी को संसद में भारत के विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया कि ''फलस्तीन पर भारत का रुख स्वतंत्र और स्थायी है. 

यह हमारे नजरिए और हितों के अनुरूप है और किसी अन्य देश के प्रभाव से संचालित नहीं है.'' इज्राएल के बड़े अखबार हारेत्ज में 4 जनवरी को एक लेख का शीर्षक था, ''भारत इज्राएल के साथ संबंध तो चाहता है लेकिन गंभीर नहीं.'' जाहिर है, इसमें नई भारतीय विदेश नीति नदारद थी.

सऊदी अरब में भारत के पूर्व राजदूत तलमीज अहमद संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत के वोट को सैद्धांतिक बताते हैं. वे कहते हैं, ''अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार सैन्य ताकत से हथियाए गए किसी इलाके को अपना घोषित नहीं किया जा सकता है और अंतिम स्थिति का फैसला दोनों पक्षों की सहमति से होना चाहिए. भारत की स्थिति भी इज्राएल और फलस्तीन जैसी है क्योंकि कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा 1948 से पाकिस्तान के कब्जे में है और हम इस पर किसी देश का आधिपत्य स्वीकार नहीं करेंगे.'' 

लगता नहीं है कि भारत दो-देशों की अपनी उस नीति के रुख से दूर हटेगा ''जिसमें इज्राएल और भविष्य का फलस्तीन देश आपस में शांतिपूर्वक रहें'' जैसा कि मोदी ने जुलाई में इज्राएल के दौरे से पहले इज्राएल हेयोम के साथ एक बातचीत में कहा था. नेतन्याहू के भारत दौरे के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी इज्राएल का दौरा किए बिना फलस्तीन की प्रशासनिक राजधानी रामल्ला का दौरा करने वाले हैं. मोदी का यह दौरा मई 2017 में फलस्तीन के राष्ट्रपति मोहम्मद अब्बास की नई दिल्ली यात्रा के जवाब में होगा, जो मोदी के तेल अवीव दौरे से दो महीने पहले हुई थी. 

महत्वपूर्ण बात है कि भारतीय प्रधानमंत्री ने इज्राएल दौरे के समय येरुशलम (जिस पर इज्राएल और फलस्तीन, दोनों अपनी राजधानी होने का दावा करते हैं) की यात्रा नहीं की थी. इस तरह फलस्तीन को भारत और इज्राएल के बीच रिश्तों से अलग रखा गया है क्योंकि भारत इज्राएल और खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के छह देशों—सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान, बहरीन और कुवैत—के साथ अपने रिश्तों को मजबूत करना चाहता है और उनके साथ मुक्त व्यापार संबंध रखना चाहता है.

भारत ने इज्राएल के साथ 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए थे, क्योंकि उसे जीसीसी देशों के साथ संबंध खराब होने का डर था. ये भारत को ऊर्जा की आपूर्ति करने वाले सबसे बड़े देश थे, इसके अलावा इसके करीब 70 प्रतिशत प्रवासी यहीं रहते हैं और भारत को सालाना करीब 35 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा भेजते हैं. 

जीसीसी के साथ भारत के नए संबंधों पर पश्चिम एशिया की उथल-पुथल और तेजी से बदलती भू-राजनीति का प्रभाव पड़ सकता है. सऊदी अरब, इज्राएल और अमेरिका के बीच गुप्त गठबंधन बन रहा है ताकि भूमध्य सागर से अरब सागर तक फैल रहे ईरान और शिया ब्लॉक के प्रभाव को रोका जा सके. भारत के संबंध इन सभी देशों के साथ अच्छे हैं, खासकर ईरान के साथ, जिसकी उसे पाकिस्तान के सहयोग बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया में पहुंचने के लिए जरूरत है. उसे बंदर अब्बास के रास्ते छोटा उत्तर-दक्षिण ट्रांसपोर्ट गलियारा भी मिल जाता है जो रूस तक परिवहन के रास्ते को छोटा कर देता है.

नेतन्याहू का दौरा बहुत व्यस्त होगा और प्रतीकात्मकता से भरा होगा—पत्नी सारा के साथ ताज महल में तस्वीरें खींची जाएंगी, गुजरात में साबरमती वाटरफ्रंट जाएंगे और फिर मुंबई में 11 वर्षीय मोशे होल्त्जबर्ग के साथ छाबड़ हाउस देखने जाएंगे. मोशे के माता-पिता 26/11 के आतंकी हमले में मारे गए थे. यह इस बात का संकेत होगा कि दोनों ही देश आतंकवाद को लेकर चिंतित हैं.

भारत और इज्राएल दोनों ही हीरा और रक्षा सौदों से आगे आर्थिक संबंध बनाने की दिशा में हैं. 2016-17 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 5.02 अरब डॉलर था जिसमें रक्षा सौदा (अनुमानित सालाना 60 करोड़ डॉलर) नहीं था. कच्चा, गैर-औद्योगिक हीरों का आयात-निर्यात एक अरब डॉलर से ज्यादा रहा था. नेतन्याहू के 100-सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल में सुरक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, रक्षा और प्रौद्योगिकी की कंपनियों के प्रतिनिधि होंगे. 

पिछले साल जून में उनकी कैबिनेट भारत में गैर-हीरा निर्यात को 25 प्रतिशत तक बढ़ाने और आरऐंडडी के लिए 4 करोड़ डॉलर खर्च करने पर राजी हो गई थी. प्रस्तावों में बॉलीवुड को इज्राएल में शूटिंग के लिए सुविधाएं देने और ढेरों भारतीय कंपनियों को व्यापार के लिए बढ़ावा देना शामिल था.

लेकिन यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही कठिन होगा. कृषि, जल और समुद्री जल से नमक अलग करने की प्रौद्योगिकी, जिसमें इज्राएल एक बड़ा खिलाड़ी बनना चाहता है, कई कारणों से बड़ी चुनौती साबित होगी जैसे कि लागत और किसानों की छोटी खेतिहर जमीनें. भारत के किसानों के लिए समुद्री पानी से नमक अलग करने और लघु सिंचाई की प्रौद्योगिकी महंगी हो सकती है लेकिन पानी और बिजली सस्ती है क्योंकि उन्हें भारी सब्सडी दी जाती है.

इसीलिए भारत-इज्राएली रक्षा संबंध वृद्धि का सबसे फायदेमंद क्षेत्र है, जिसमें सरकार ही ग्राहक है. इज्राएल भारत का तीसरा सबसे बड़ा रक्षा हार्डवेयर आपूर्तिकर्ता है जो 2012 और 2016 के बीच देश के हथियार आयात का 7.2 प्रतिशत था. इसमें रडार, मिसाइलें, युद्ध के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सिस्टम और बम शामिल थे. इज्राएल के रक्षा निर्यात में भारत का हिस्सा 40 प्रतिशत से भी ज्यादा है जिससे उसे सालाना करीब एक अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा की कमाई होती है.

इज्राएली कंपनियों ने 2017 में स्मार्ट बम, रेडियो, लेजर डेजिगनेशन पॉड और मिसाइलों के एक अरब डॉलर के सौदे हासिल किए जबकि साउथ ब्लॉक 'मेक इन इंडिया' को बढ़ावा देने के लिए हथियारों के आयात में कटौती करने की कोशिश कर रहा था. इज्राएल कई प्रमुख क्षेत्रों में एकाधिकार बनाने में सफल रहा है. 

इज्राएल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (आइएआइ) का भारत में निगरानी रखने वाले ड्रोनों के बाजार पर पूरा दबदबा है, क्योंकि सेना के तीनों अंग करीब 176 हेरोन और सर्चर-2 ड्रोनों का इस्तेमाल करते हैं. यह संख्या खुद इज्राएल में इस्तेमाल होने वाले कुल ड्रोनों की संख्या से भी ज्यादा है. आइएआइ और राफेल नौसेना और वायु सेना के लिए मध्यम दूरी—70 किमी की दूरी से विमान को निशाना बना सकते हैं—की मिसाइलों के बाजार पर दबदबा रखती हैं. 

पिछले साल अप्रैल में भारत एमआरएसएएम का इस्तेमाल करने वाला तब तीसरा देश बन गया जब रक्षा मंत्रालय ने एमआरएसएएम मिसाइलों के एक रेजीमेंट—16 लॉन्चर और 560 मिसाइलें—के लिए 2 अरब डॉलर के सौदे पर दस्तखत कर दिए थे. यह इज्राएल के इतिहास का सबसे बड़ा सौदा था. 

आइएआइ और राफेल भारतीय नौसेना की सतह से हवा में मार करने वाली (एसआरएसएएम) कम दूरी के 10 मिसाइल सिस्टमों और 600 मिसाइलों की जरूरत को पूरा करने के लिए 1.5 अरब डॉलर की एक अन्य परियोजना की प्रमुख प्रतियोगी हैं. इसके अलावा एक और बड़ा सौदा हो सकता है—आइएल-76 विमान पर फिट किया जाने वाला दो फाल्कन एयरबोर्न अर्ली वार्निंग ऐंड कंट्रोल (एईडब्लूऐंडसी) का 3 अरब डॉलर का सौदा. यह विमान 800 किमी की दूरी से दुश्मन के विमान, मिसाइल और ड्रोन का पता लगा सकता है. भारत-इज्राएल संबंध को मजबूत करने की अपार संभावनाएं हैं.

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