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मंडल 2.0 का आगाज?

बिहार में शुरू की गई मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जातिगत गणना की कवायद भविष्य की राजनीति और समाज पर बड़े असर डाल सकती है.

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सर्वदलीय बैठक के बाद बिहार में जातिगत गणना करवाने की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सर्वदलीय बैठक के बाद बिहार में जातिगत गणना करवाने की घोषणा करते हुए

पुष्यमित्र

जाति बिहार की राजनीति का ऐसा सच, जो थोड़ा कड़वा-कसैला जरूर है, मगर इससे गुजरे बगैर राज्य की राजनीति में बने रहना आसान नहीं. इसलिए कई दशक पहले जो वामपंथी दल यह कहा करते थे कि दुनिया में दो ही जातियां होती हैं, अमीर और गरीब, समय के साथ उन्हें बिहार की राजनीतिक जमीन पर अपनी राय बदलने और जातियों के सवाल पर फैसले लेने को मजबूर होना पड़ा.

हाल के दिनों में वही स्थिति भाजपा की भी हुई. पिछले महीने ही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष संजय जायसवाल का यह बयान सुर्खियों में था कि जातियां दो ही होती हैं, अमीर और गरीब. मगर एक जून को जब मुख्यमंत्री सचिवालय में जातिगत गणना के मसले पर सर्वदलीय बैठक हुई तो वे उसमें मौजूद थे और बैठक के बाद मुस्कुराते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इस घोषणा के साथ सहमति जता रहे थे कि वे भी राज्य में जाति आधारित गणना के फैसले के साथ हैं.

बिहार सरकार ने जब से राज्य में अपने स्तर पर जाति आधारित गणना कराने का फैसला किया है, सोशल मीडिया पर एक खास तबके के लोग इसका मुखर विरोध कर रहे हैं. इनका तर्क है कि 21वीं सदी में जाति के मसले पर बात करना पहले से ही पिछड़े राज्य बिहार को और पीछे ढकेलना है.

ऐसी भावनाओं को भाजपा के राज्यसभा सांसद राकेश कुमार सिन्हा यह कहते हुए स्वर देते हैं कि इससे राज्य में जातीय ध्रुवीकरण तेज होगा. उनके मुताबिक, ''जेपी, लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय और विनोबा भावे ने जाति विहीन समाज का सपना देखा था. युवाओं को आगे आकर उनके सपनों को पूरा करना चाहिए.’’ 

लेकिन जब यह सवाल जातिगत जनगणना के पैरोकार, स्वराज अभियान के संस्थापक योगेंद्र यादव से पूछा जाता है तो वे कहते हैं, ''समाज जातिविहीन हो जाए यह निश्चित तौर पर एक आदर्शवादी परिकल्पना है, मगर दुर्भाग्यवश आज जितने भी लोग जातिविहीन समाज की बात कर रहे हैं, उनमें से 99 फीसदी वे हैं जिन्होंने अपनी जाति के विशेषाधिकार से भरपूर लाभ उठा लिया है. अब वे चाहते हैं कि दूसरे लोग इसका फायदा उठाकर उनकी बराबरी तक न पहुंच सकें. गैर-बराबरी की यह यथास्थिति यूं ही बरकरार रहे.’’

जाति के सवाल का यही राजनीतिक द्वंद्व है, जो बिहार सरकार द्वारा राज्य में जाति आधारित गणना कराने का फैसला लेने के बाद से धीरे-धीरे सुलग रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धीमी आंच पर सुलगता यह द्वंद्व धीरे-धीरे तेज हो सकता है और 2024 के लोकसभा चुनाव तक बड़े मुद्दे का रूप ले सकता है. ऐसा मानने वालों में उनकी संख्या अधिक है, जिन्हें लगता है कि भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति की काट जाति के सवालों में छिपी है. 

अब इस फैसले का अंजाम जो भी हो, मगर अपने स्तर से जाति आधारित गणना कराने का फैसला करके बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक राजनीतिक दांव तो खेल ही दिया है. उन्होंने इसके लिए पहले अपने सहयोगी दल भाजपा को साथ आने पर मजबूर किया, फिर फैसले लेने के बाद वे इस महत्वाकांक्षी परियोजना को पूरा करने में कमर कसकर जुट गए हैं. 

इस फैसले के अगले ही दिन राज्य की कैबिनेट ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी, आकस्मिक फंड से जाति आधारित गणना के लिए 500 करोड़ रुपए का आवंटन कर दिया. बिहार सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग को इसे पूरा करने की जिम्मेदारी दी गई है. इसके लिए फरवरी, 2023 की समय सीमा तय की गई है और जून के पहले हफ्ते में ही राज्य के अधिकारी इस मसले पर दो बार बैठक कर चुके हैं.

नीतीश कुमार ने घोषणा की है कि इस गणना में राज्य से बाहर रहने वाले बिहार वासियों को भी गिना जाएगा. साथ ही इस गणना के बाद सभी नतीजों को जगह-जगह सार्वजनिक किया जाएगा और मीडिया के जरिये भी इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा ताकि हर कोई इन नतीजों से अवगत हो सके.

नीतीश कुमार इस घोषणा से शायद यह याद दिलाने की कोशिश कर रहे थे कि भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार 2011 के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े सार्वजनिक नहीं कर रही है. इस मायने में बिहार सरकार का यह काम नजीर बन सकता है, दूसरी तरफ अगर इस बहाने कभी कोई राजनीतिक गठजोड़ की संभावना तैयार होगी तो उसमें नीतीश कुमार अगुआ की भूमिका भी निभा सकते हैं. 

हालांकि सार्वजनिक तौर पर नीतीश कुमार इस फैसले को प्रशासनिक ही बताते हैं, मगर इसके कुछ बड़े तात्कालिक राजनीतिक नतीजे दिखते हैं. ऐसा करके नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) दोनों को साधा. उन्होंने इस मुद्दे पर राजद के नेता तेजस्वी यादव को जल्द से जल्द फैसला लेने का आश्वासन दिया और भाजपा को अहसास दिलाया कि अगर वह इस फैसले पर साथ न आई तो उसकी छवि पिछड़ा विरोधी बन जाएगी.

इस तरह नीतीश ने 1931 के बाद राज्य में पहली बार जाति गणना कराने का सारा श्रेय खुद ले लिया. साथ ही एक होशियारी भरा राजनीतिक दांव खेलकर उन्होंने अपने ऊपर हावी उस राजनीतिक दबाव से भी मुक्ति पा ली, जो हाल के दिनों में उन पर छाया था. इससे पहले तक ऐसा लग रहा था कि भाजपा की तरफ से उनपर बिहार की सत्ता छोड़कर दिल्ली जाने का दबाव बनाया जा रहा है. 

इस फैसले के बाद राजद और भाजपा, दोनों खेमों में एक तरह की बेचैनी दिख रही है. तेजस्वी यादव सोशल मीडिया पर लगातार यह संदेश देने में जुटे हैं कि यह फैसला उनके दबाव में लिया गया है. वे कहते हैं, ''आखिरकार भाजपा को बिहार में हमारे विचार का समर्थन करना पड़ा. झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए.’’ वहीं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने इंडिया टुडे को बताया कि भाजपा ने ही राजद को झुकाया है क्योंकि जातिगत जनगणना की मांग करने वाले अब जातिगत सर्वे पर सहमत हैं.

जायसवाल यह भी कहते हैं, ''भाजपा हमेशा से कास्ट सर्वे के लिए तैयार रही है. राज्य की तरफ से जब एक प्रतिनिधिमंडल जातिगत जनगणना की मांग को लेकर प्रधानमंत्री मोदी से मिला तब पीएम ने कहा था कि वे तकनीकी मुश्किलों के चलते देशभर में जाति जनगणना तो नहीं करा सकते, मगर राज्य चाहें तो ऐसे सर्वे करा सकते हैं.’’ 

तकनीकी तौर पर यह बात सच है, क्योंकि 1948 के जनगणना अधिनियम के मुताबिक जनगणना कराने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार के पास है. राज्य में जातिगत गणना के मसले पर हुई सर्वदलीय बैठक के संयोजक बिहार के शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी इस बात को और स्पष्ट करते हुए कहते हैं, ''चूंकि जनगणना संविधान के मुताबिक संघ सूची का विषय है, इसलिए हम इसे जनगणना कहने से परहेज कर रहे हैं. मगर यह सिर्फ जातियों की आबादी की गणना नहीं होगी. इसका स्वरूप काफी हद तक सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण जैसा होगा. ताकि राज्य की विभिन्न जातियों की आर्थिक हैसियत और सामाजिक स्थिति का भी आकलन हो सके.’’

विजय कुमार चौधरी के मुताबिक भले इस गणना या सर्वे की संवैधानिक स्थिति जनगणना जैसी नहीं होगी, मगर इसके जरिये वे तमाम आंकड़े बाहर आएंगे, जिसकी अपेक्षा जाति जनगणना की मांग करने वालों को रहती है. मगर इसके बावजूद सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं में थोड़ी मायूसी दिख रही है. राज्य में पिछड़े मुसलमानों के मुद्दे उठाने वाले पूर्व सांसद अली अनवर कहते हैं, ''अगर पूरे देश में जातिगत जनगणना होती तो उसका संवैधानिक महत्व होता, इसलिए उसके आंकड़ों पर कोई सवाल नहीं उठता.

दूसरी बात, 1948 के जनगणना अधिनियम के मुताबिक सवाल पूछने और जवाब देने वाले कानूनी बाध्यता से बंधे होते हैं. गलत जवाब देने वाले नागरिक और गलत उत्तर दर्ज करने वाले कर्मचारी को कानूनन दंडित किया जा सकता है.’’ इसी बात को आगे बढ़ाते हुए पत्रकार एवं जातिगत मामलों के टिप्पणीकार दिलीप मंडल कहते हैं कि इसी वजह से जनगणना में सरकारी शिक्षकों को लगाया जाता है, ताकि उनकी कानूनी जिम्मेदारी तय हो सके. दिलीप के मुताबिक, ''हम 2011 के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण का उदाहरण देख सकते हैं, जिसमें शिक्षकों को नहीं लगाया गया और उसके अराजक नतीजे सामने आए.’’ 

योगेंद्र यादव जो लंबे अरसे से देश में जातिगत जनगणना कराने की मांग करते रहे हैं, कहते हैं, ''बिहार सरकार का यह फैसला बड़े सवालों से मुंह चुराकर पतली गली से निकलने जैसा है. फिर भी एक सकारात्मक बात यह जरूर है कि इस फैसले के बाद जाति जनगणना की मांग करने वाले दूसरे राज्यों में ऐसे फैसले लिए जा सकते हैं और एक दफा तीन-चार राज्यों ने ऐसे फैसले कर लिए तो केंद्र सरकार पर खुद-ब-खुद जातिगत जनगणना कराने का दबाव बन जाएगा.’’

हालांकि 2018 में तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने वादा किया था कि आने वाली जनगणना में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की गणना की जाएगी. इस बात का हवाला देते हुए योगेंद्र भाजपा पर जातिगत जनगणना को लेकर अस्पष्ट रवैया रखने का आरोप लगाते हैं और कहते हैं, ''पीएम मोदी खुद को ओबीसी कहते हैं. भाजपा पिछड़ों का वोट लेने के लिए राजनीतिक प्रयास करती रहती है. मगर अभी भी पार्टी की सोच पिछड़ा विरोधी है और उसका मूल स्वभाव ब्राह्मणवादी है, इसलिए वह जातिगत जनगणना के सवाल को टालती है.’’

हालांकि देखा जाए तो 1999 से लेकर अब तक की लगभग सभी सरकारों ने इस सवाल के साथ टालमटोल की है. 1999 में जनगणना के रजिस्ट्रार ने जातिगत जनगणना कराने की सिफारिश की थी. 2010 में संसद के दोनों सदनों ने इस प्रस्ताव को पास किया. मगर 22-23 साल बाद भी जातिगत जनगणना नहीं हुई. इस बीच कम से कम छह राज्य सरकारें केंद्र सरकार से इसकी मांग कर चुकी हैं.

इस वक्त बिहार सरकार के अलावा महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड, केरल और तमिलनाडु आदि राज्यों में जाति जनगणना की मांग की जा रही है. महाराष्ट्र की तरफ से पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में जातिगत जनगणना को लेकर याचिका भी दायर की गई थी.

इसके जवाब में हलफनामा दायर करते हुए केंद्र ने कहा था कि पिछड़ों की जातिगत जनगणना कराना प्रशासनिक रूप से काफी जटिल काम है और पहले भी जब जातियों की गिनती हुई तो उसकी सत्यता को लेकर कई सवाल उठते रहे. इस हलफनामे के मुताबिक, 2011 के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों में तमाम तरह की खामियां हैं, जिस वजह से उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता.

केंद्र सरकार की तरफ से यह तर्क भी दिया जाता है कि 2011 के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण में देश में जातियों-उपजातियों, कुलनामों आदि की संख्या 46 लाख के पार चली गई थी, ऐसे में जनगणना में इतनी जातियों को शामिल करना तकनीकी तौर पर मुश्किल होगा.  

मगर क्या जातियों की संख्या की उलझनें सचमुच इतनी विकट हैं? योगेंद्र कहते हैं, ''यह वैसी ही बात है, जैसे कहा जाता है कि इस देश में 33 करोड़ देवी-देवता हैं. सच तो यह है कि अनुसूचित जाति और जनजाति से जुड़े जातियों के विवरण जनगणना में पहले से ही दर्ज होते रहे हैं. इसके अलावा केंद्र में और अलग-अलग राज्यों में ओबीसी की सूची पहले से तैयार और उपलब्ध है, ताकि उन्हें आरक्षण का लाभ दिया जा सके.

सिर्फ अगड़ी जातियों की सूची हमारे पास नहीं है. मगर वह उतनी बड़ी समस्या नहीं है. क्योंकि इस मसले पर भी मानव विज्ञानी सुरेश कुमार सिंह ने बड़ा काम किया है. उनकी किताब एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में देशभर की सभी जातियों का विवरण दर्ज है. इसलिए जातियों की संख्या के नाम पर जाति जनगणना को टालना ठीक नहीं है.’’

विजय कुमार चौधरी इसे कोई मुश्किल नहीं मानते. वे कहते हैं,  ''इस जातिगत गणना में उपजातियों को दर्ज नहीं किया जाएगा, सिर्फ जाति के विवरण दर्ज होंगे. इसके लिए सभी सर्वे करने वालों को प्रशिक्षित और तैयार किया जाएगा कि वे कैसे उपजातियों के आधार पर जातियों की पहचान कर सकें.’’

दिलचस्प बात है कि इस जाति आधारित गणना में बिहार में सभी संप्रदाय के लोगों को शामिल किया जा रहा है. चाहे वे मुसलमान हों, ईसाई हों, सिख हों, बौद्ध या जैन हों. यानी इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि भारतीय परिस्थिति में हर धर्म में जाति की मौजूदगी किसी न किसी रूप में है. पहले भाजपा को लगता रहा कि शायद इस कवायद में सिर्फ हिंदू धर्म के लोगों की जातियां पूछी जाएंगी. इसलिए गिरिराज सिंह लगातार मांग करते रहे कि मुसलमानों को भी इसमें शामिल किया जाए.

मगर नीतीश कुमार इस मसले को लेकर पहले से ही सजग थे. इसलिए जब सर्वदलीय बैठक हुई तो उसमें असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहाद मुस्लिमीन (एआइएमआइएम) के प्रतिनिधि अख्तरुल ईमान को भी आमंत्रित किया गया जो अमौर विधानसभा से पार्टी के विधायक हैं. बैठक के बाद अख्तरुल ईमान ने कहा, ''इस देश में चाहे कोई भी मजहब हो, सबमें जातियों की मौजूदगी है. मुसलमानों में भी जातियां हैं, इसलिए हम मुसलमानों की जाति जनगणना कराने के भी पक्षधर हैं.’’

पूर्व सांसद और पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य अली अनवर तो लंबे समय से मुसलमानों में जाति के सवाल को लेकर सक्रिय रहे हैं. उन्होंने जनगणना में अपनी जाति का विवरण दर्ज कराने के लिए एक बुकलेट भी तैयार की है. इस बुकलेट में केंद्रीय सूची में दर्ज बिहार के मुसलमानों की 24 जातियां और बिहार की सूची में दर्ज 31 जातियों के नाम दिए गए हैं ताकि न बताने वालों को भ्रम हो, न पूछने वालों को. उनकी संस्था ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज का नारा है, दलित-पिछड़ा एक समान, हिंदू हो या मुसलमान. 

सबसे दिलचस्प बात है कि अली अनवर इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि जाति जनगणना ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का इलाज है. उनकी बुकलेट पर सबसे ऊपर यही पंक्तियां दर्ज हैं, 'सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का यही इलाज, जाति जनगणना के लिए हो जाएं तैयार.’ वे कहते हैं, ''इस देश में हमेशा से सांप्रदायिक ताकतें इस बात की कोशिश करती रहीं कि जाति के सवाल सामने न आएं.

इससे उन्हें ध्रुवीकरण करने में दिक्कत होती हैं. 1941 में जब देश में जनगणना हो रही थी, तब भी हिंदू महासभा ने लोगों से अपील की थी कि वे जाति न बताकर खुद को हिंदू बताएं, दूसरी तरफ मुस्लिम लीग भी लोगों को अपनी जाति बताने के बदलने मुसलमान बताने की अपील कर रही थी.’’ 

वहीं आज की बात करें तो सोशल मीडिया का एक तबका अक्सर यह अपील करता नजर आता है कि लोगों को जाति के बदले धर्म या देश की पहचान देनी चाहिए. खुद को हिंदू या भारतीय/इंडियन बताना चाहिए. मगर क्या ऐसी कोशिशों से बिहार की जाति आधारित गणना प्रभावित होगी. इस सवाल पर योगेंद्र यादव कहते हैं, ''अगर कुछ लोग ऐसा अभियान चला रहे हैं तो उसका स्वागत होना चाहिए. मगर मेरा अनुमान है कि ऐसे लोग एक फीसदी से भी कम होंगे जो अपनी जाति के बदले देश या धर्म की पहचान लिखाएंगे. इससे जाति आधारित गणना के आंकड़ों पर बड़ा असर पड़ेगा यह कहना मुश्किल होगा.’’     
मगर जाति आधारित गणना के खिलाफ चला अभियान क्या सिर्फ जाति न लिखने के अभियान तक सीमित रहेगा? क्या सचमुच जाति के सवाल भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति की काट हैं? बिहार की जाति आधारित गणना के बाद क्या फिर से आरक्षण बढ़ाने की मांग उठेगी और जैसी आशंका जताई जा रही है कि मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद वाली स्थिति एक बार फिर उत्पन्न होगी और क्या इन सबका असर 2024 के लोकसभा चुनावों पर पड़ेगा?

बीबीसी से लंबे अरसे तक जुड़े रहे पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि जाति गणना के नाम पर जो कुछ बिहार में चल रहा है, उसका मकसद लोगों को लाभ पहुंचाना कम, वोट जुटाने की राजनीति अधिक लग रहा है. वे कहते हैं, ''लोगों को आशंका है, आने वाले दिनों में इसकी वजह से नफरत और संघर्ष का वह पुराना दौर शुरू हो सकता है, जिसकी वजह से बिहार पिछली सदी में परेशान रहा था.

यह ठीक है कि इस राजनीति की वजह से नीतीश कुमार ने फिलहाल भाजपा और राजद दोनों पर बढ़त हासिल कर ली है, मगर उनके इरादे इसके जरिये देश की राजनीति में बड़ा कदम रखने के लग रहे हैं.’’ इस सवाल के जवाब में बिहार के वरिष्ठ पत्रकार रमाकांत चंदन भी ठाकुर से सहमति जताते हैं. वे कहते हैं, ''इस सर्वेक्षण के बाद जो आंकड़े सामने आएंगे, उनके आधार पर बड़ी आबादी वाली जातियां सत्ता में अधिक हिस्सेदारी की मांग करेंगी और इसकी वजह से तनाव होगा. स्वाभाविक रूप से इसका असर 2024 के लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा.’’

हालांकि योगेंद्र यादव जातिगत गणना को राजनीतिक चश्मे से देखने का विरोध करते हैं. वे कहते हैं, ''मुझे कहीं से भी जाति जनगणना के सवाल के पीछे कोई राजनीति नजर नहीं आती. इस कवायद से जरूरी आंकड़े सामने आएंगे, जिससे जाति आधारित इस देश में सरकारों को अपनी नीति तैयार करने में मदद मिलेगी. इसके बावजूद अगर कुछ लोगों को लग रहा है कि इससे जातियों के बीच तनाव बढ़ेगा और माहौल खराब होगा, तो उन्हें क्या अभी देश का माहौल खराब नहीं लग रहा, जब धार्मिक मसलों को लेकर लगातार राजनीति हो रही है और वोट के लिए तनाव पैदा किया जा रहा है.’’

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