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एनसीआरबी आंकड़े: मध्य प्रदेश फिर बलात्कार में आगे तो दिल्ली में हर क्राइम में आगे

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश बलात्कार के मामले में फिर अव्वल, दिल्ली सभी तरह के अपराधों में सबसे आगे.

अगर आप ऐसे शहर में रहते हों, जहां रोजाना महिलाओं के खिलाफ अपराध के करीब 30 मामले और बलात्कार की छह वारदात दर्ज हो रही हों, वहां आप खुद को कितना सुरक्षित महसूस करेंगे? '' पिछले माह ही डीटीसी की बस में छेडख़ानी की शिकार हुईं 26 वर्षीया अंकिता सख्त लहजे में यह सवाल करती हैं. दिल्ली के आनंद पर्वत इलाके में छेडख़ानी का विरोध करने पर 16 जुलाई को ग्यारहवीं की छात्रा की हत्या की वारदात हो, या फिर दिसंबर, 2012 की गैंग रेप की वारदात, उनके जेहन में अब भी ताजा हैं. अंकिता वसंत विहार के उसी इलाके में रहती हैं, जहां से दिसंबर, 2012 की पीड़िता दरिंदों की बस में बैठी थी. जाहिर है, उनका इशारा हाल ही में जारी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2014 के आंकड़ों की ओर है. इनके मुताबिक, पिछले साल सिर्फ दिल्ली में ही रोजाना संज्ञेय अपराध के 383 मामले दर्ज हुए, जो दूसरे नंबर पर मौजूद मुंबई से करीब साढ़े तीन गुना ज्यादा हैं. पूरी दिल्ली में यह संख्या 426 है. 2013 की तुलना में इसमें 94 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. बलात्कार के मामलों में 28 फीसदी की वृद्धि हुई है. स्वाभाविक है कि ऐसे माहौल में अंकिता का गुस्सा और डर बेमानी नहीं जान पड़ता.

नहीं सुधरा मध्य प्रदेश
बलात्कार प्रदेश के नाम से बदनाम मध्य प्रदेश में भी कोई सुधार होता नजर नहीं आ रहा है. एनसीआरबी के मुताबिक, 2014 में भी देश में बलात्कार के सबसे अधिक 5,076 मामले इसी राज्य में दर्ज हुए हैं. यही नहीं, पिछले साल की तुलना में इसमें 17 फीसदी की वृद्धि हुई है. व्यापम के दागों को धोने में जुटी शिवराज सिंह चौहान सरकार में इस पर लगाम कसने की इच्छाशक्ति नजर नहीं आ रही. राज्य में महिलाओं के लिए काम कर रहे एनजीओ संगिनी की प्रार्थना मिश्र कहती हैं, ''महिलाओं के खिलाफ हिंसा को किस तरह रोका जाए, यह राज्य सरकार की प्राथमिकता में है ही नहीं. मुख्यमंत्री का विजन 2018 घरेलू हिंसा की तो बात करता है लेकिन उसमें भी वह सिर्फ उनके लिए चलाई जा रही योजनाओं को बताता है. कहीं भी यह जिक्र नहीं है कि सरकार महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकने के लिए क्या कदम उठा रही है.'' सिर्फ यही नहीं, राज्य कुल संज्ञेय अपराधों के मामलों में भी सबसे आगे हो गया है, जबकि 2013 में यह महाराष्ट्र के बाद दूसरे नंबर पर था. लूट के मामलों में महाराष्ट्र अब भी आगे है, पर इसमें करीब तीन फीसदी की कमी आई है.

उत्तर प्रदेश भी कहीं कम नहीं है. बलात्कार के मामले में यह जहां मध्य प्रदेश और राजस्थान के बाद तीसरे नंबर पर है तो हत्या तथा अपहरण और भगा ले जाने के मामलों में अव्वल. वहीं इस साल विधानसभा चुनाव देखने जा रहा और 15 फीसदी दलित वोटों को लेकर मची रस्साकशी के बीच बिहार 7,893 मामलों के साथ दलितों और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अपराध में मामूली अंतर के साथ उत्तर प्रदेश और राजस्थान के बाद तीसरे नंबर पर है. यहां दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अपराध में 2013 की तुलना में 17 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

सबसे आगे दिल्ली

इन सबके बीच अगर अपराध दर यानी अपराध प्रति लाख आबादी के हिसाब से देखें तो दिल्ली सबसे आगे है. मसलन, जहां कुल संज्ञेय अपराध दर राष्ट्रीय स्तर पर 358 है तो दिल्ली में 767. बलात्कार के मामले में दिल्ली की अपराध दर मध्य प्रदेश से करीब दोगुनी है. उन दिनों जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार और दिल्ली पुलिस की आपसी जंग चरम पर थी, प्रदेश में पिछले साल की तुलना में पहली छमाही  में ही संज्ञेय अपराध में करीब 25 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इस साल 15 अगस्त तक राज्य में कुल 1,13,969 संज्ञेय अपराध दर्ज हो चुके हैं, जो 2013 के कुल संज्ञेय अपराधों से 42 फीसदी अधिक है. 2014 में इसमें 94 फीसदी  की वृद्धि हुई थी. देश की राजधानी में लूटपाट का आलम यह है कि 2014 में यहां लूट के दर्ज मामलों में जहां 419 फीसदी वृद्धि तो स्नैचिंग में 102 फीसदी और घरों में चोरी में 295 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई. जाहिर है, ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं. विडंबना यह कि दिल्ली पुलिस दर्ज आंकड़ों में इस भयानक इजाफे को अपनी उपलब्धि ही बता रही है. डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस और दिल्ली पुलिस के पीआरओ राजन भगत कहते हैं, ''यह पुलिस की कोशिशों का नतीजा है. हमने ट्रुथफुल रजिस्ट्रेशन को बढ़ावा दिया, जिससे ईमानदारी से एफआइआर दर्ज हुई हैं. इस वजह से 2014 के दर्ज मामलों में इतना इजाफा दिखाई दे रहा है.''

अगर उनकी बात मान भी लें तो दिल्ली में इतनी बड़ी संख्या में अपराध होना चिंता का सबब तो है ही. तिस पर तब जब दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, 2015 में भी 25 फीसदी अपराध वृद्धि मौजूद है. इस वृद्धि पर भगत की दलील है, ''यह कोई असामान्य वृद्धि नहीं है और ऐसा बढ़ती आबादी या अन्य सामाजिक वजहों से भी होता है.'' लेकिन दिल्ली पुलिस अपने ही इस आंकड़े को कैसे झुठला सकती है कि कुल संज्ञेय मामलों के अपराधियों की गिरफ्तारी में इस साल जहां 0.21 फीसदी की कमी आई है, जबकि पिछले साल इसमें करीब 17 फीसदी की वृद्धि हुई थी, वहीं इस साल स्नैचर्स और ऑटो लिफ्टर्स की गिरफ्तारी में 15 फीसदी की कमी आई है.

आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष पुलिस के मंसूबे पर ही सवाल खड़ा करते हैं, ''दिल्ली पुलिस अपने सियासी आकाओं के इशारे पर काम कर रही है. अपराधियों पर अंकुश लगाने की बजाए वह आप नेताओं के पीछे पड़ी है. ऐसे में दिल्ली में अपराध पर भला कैसे लगाम लगेगी?'' पुलिस की ट्रुथफूल रजिस्ट्रेशन की दलील को लेकर 21 वर्षीय छात्र कार्तिक का अनुभव जुदा है, ''मैं अपने मोबाइल चोरी की एफआइआर दर्ज कराने पहुंचा, तो हमें कहा गया कि महज गुम होने का सनहा दे दो, एफआइआर करने का कोई फायदा नहीं है. हमारे अडऩे पर ही एफआइआर दर्ज की गई. एफआइआर दर्ज कराने आए तीन अन्य लोगों को भी ऐसे ही कहा जा रहा था.'' करीब पांच माह पहले कार्तिक एम्स के पास डीटीसी की बस में स्नैचिंग के शिकार हो गए थे. अब उन्होंने स्नैचिंग के डर से डीटीसी बस में सफर करना तकरीबन बंद कर दिया है तो अंकिता अब भी डरी-सहमी रहती हैं. ऐसे में उनके मन में एक ही सवाल है—क्या शांति, सेवा और न्याय का नारा लगाने वाली दिल्ली पुलिस पर कोई फर्क पड़ेगा?

—साथ में शुरैह नियाजी

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