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बांग्लादेश में आतंक से आगे और लंबी जंग

फिर से उभर रहे आतंकवाद से बांग्लादेश के भविष्य पर स्याह बादल घिरने लगे हैं

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यह 1 जुलाई का शुक्रवार था जब बांग्लादेश की राजधानी ढाका के होली आर्टिसन कैफे में भयानक आतंकी हमला हुआ. कथित रूप से आइएस से जुड़े छह आतंकवादियों ने 18 विदेशी नागरिकों और 2 पुलिसकर्मियों सहित 20 लोगों को बंधक बनाकर उनकी नृशंस हत्या कर दी. मरने वालों में एक भारतीय लड़की भी शामिल है.

आतंकवादियों की प्रोफाइल चिंता का कारण
बांग्लादेशियों को आतंकवादियों की प्रोफाइल देखकर गहरा झटका लगा है. उनमें से ज्यादातर 20 से 25 साल के थे और उनका ताल्लुक उच्च मध्यम वर्ग के अमीर परिवारों से था (एक सत्तारूढ़ अवामी लीग पार्टी के एक वरिष्ठ सदस्य का बेटा था). यह हमला देसी आतंकियों की उभरती नई फसल का नमूना है, जो हाल में सिर उठाने लगी है. ये पढ़े-लिखे हैं और सामाजिक मीडिया के साधनों के इस्तेमाल में महारथी हैं. ये उस शहरी प्रोफाइल के अनुरूप हैं जिन्हें अल कायदा और आइएस जैसे संगठनों ने पेरिस से इस्तांबुल में हुए आतंकी हमलों में इस्तेमाल किया था. ढाका स्थित थिंक टैंक, बांग्लादेश एंटरप्राइज इंस्टिïट्यूट में सीनियर रिसर्च डायरेक्टर हुमायूं कबीर कहते हैं, ''वे दिन चले गए जब गरीब ग्रामीण इलाकों के मदरसों के जरिए आतंकी लिए जाते थे.'

2013 से तेज हुए हैं इस तरह के हमले
यह हमला बांग्लादेश के धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले अज्ञात हमलावरों के बढ़ते अत्याचारों की अगली खेप थी. इस्लामी उग्रवादियों के ऐसे हमलों में हिंदू, बौद्ध और ईसाई पुजारियों, ब्लॉगर्स, लेखकों, प्रकाशकों और उदारवादी मुसलमानों सहित 40 से अधिक लोग मारे जा चुके  हैं. करीब 16,000 लोगों को इस साल जून में की गई कड़ी कार्रवाई में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. हमले पर तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 2 जुलाई को कहा, ''जो धर्म में विश्वास रखता है वह इस तरह का काम नहीं कर सकता. उनका कोई धर्म नहीं है. आतंकवाद ही उनका धर्म है.'

दावे को लेकर संशय
हमले के एक दिन बाद आईएस ने हमले की जिम्मेदारी लेते हुए काले झंडे के सामने खड़े पांच युवकों की तस्वीर पोस्ट की है, जबकि बांग्लादेश के अधिकारी अब भी इसे स्थानीय आतंकवादियों का काम कह रहे हैं.

कट्टरपंथियों की मौजूदगी साबित हुई
ब्लैक फ्राइडे ने देश की सुरक्षा व्यवस्था में चूक की ओर इशारा किया है, साथ ही बांग्लादेशियों के बीच मुस्लिम कट्टरपंथियों की मौजूदगी को झुठलाती सरकार को बेनकाब किया है. गृह मंत्री असदुजमां खान कमाल ने पिछले साल भर में लगातार हुई हत्याओं को छिटपुट घटना करार दिया है. स्पष्ट तौर पर उन्हें इस बात का कोई अंदेशा नहीं था कि क्या होने वाला है. बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में भाग ले चुके सचिन कर्माकर कहते हैं, ''यह ऐसा टाइम बम था जो फटने के लिए तैयार था. '' बांग्लादेश में सरकार समर्थित कट्टरता का इतिहास 1970 के दशक के उत्तरार्ध से दिखता है और खास तौर पर इसकी झलक बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी के गहरे रिश्तों में मिलती है जिनके नेता 1971 के नरसंहार में लिप्त थे.

सोशल मीडिया पर आतंकियों की सक्रियता
विशेषज्ञों का मानना है कि इस नए आतंकवाद से निपटने की बांग्लादेश की तैयारी नहीं है. ऑनलाइन नियोक्ता अपने लक्षित लोगों की भर्ती के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं. शहरों और कस्बों में बहुत कम बजट पर स्लीपर सेल चल रहे हैं. फिर इनके लिए तस्करों से हथियार और बम खरीदे जाते हैं.

सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती
बड़ी संख्या में आतंकवादी पुलिस को चकमा देते हुए सीरिया और इराक जाकर आइएस में शामिल हो गए हैं. सीआईए से प्रशिक्षित बांग्लादेश काउंटर टेररिज्म एंड इंटेलिजेंस ब्यूरो को भी इनकी संख्या का अंदाजा नहीं है. उसे नहीं पता कि कितने लोग आईएस में शामिल होने निकले और प्रशिक्षण लेकर कितने युवक बांग्लादेश लौटे. और न यह पता है कि उस ब्लैक फ्राइडे को आतंकवादी वारदात करने वाले उन छह की तरह और कितने घात लगाए बैठे हैं.

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