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कैंसर: मिथकों को छोड़िए हकीकत को जानिए

कैंसर को लेकर इतने सारे मिथक हैं जो दूर होने को तैयार नहीं, जरूरी नहीं कि ये हानिकारक ही हों लेकिन कैंसर से जुडे भ्रम जानलेवा हो सकते हैं. सचाई से रू-ब-रू करा रहे हैं नए शोध.

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दरअसल कैंसर एक तरह का फंगस (फफूंद) होता है और इससे निबटने के लिए जरूरत है सिर्फ बेकिंग सोडा की जिसे ट्यूमर में इंजेक्ट करना होता है. चीनी तो 'कैंसर कोशिकाओं' का भोजन होती है इसलिए अगर इस रोग से बचना है तो बेहतर होगा कि भोजन में चीनी की मात्रा कम-से-कम कर दी जाए. अगर आप अपने खान-पान में नींबू जैसे खाद्य पदार्थों को शामिल नहीं करते तो इससे रक्त में अम्ल की मात्रा बढ़ जाती है और कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है. चुकंदर और ब्रॉकली जैसे सुपरफूड का सेवन करना फायदेमंद होगा. कैंसर से आश्चर्यजनक रूप से बचाव करते हैं कॉफी के दाने और भांग. बड़ी-बड़ी दवा कंपनियां अपने फायदे के लिए यह सारी महत्वपूर्ण जानकारी हमसे छिपा रही हैं.

एकदम बकवास
इस तरह की सारी बातें बिलकुल गलत हैं, एकदम बकवास. ये जानकारियां हमें खतरनाक रूप से भ्रमित भी कर रही हैं. फिर भी गूगल के 'कैंसर से बचाव' समेत लाखों वेब पेज, यूट्यूब के वीडियो, लोगों के निजी अनुभव, कम्युनिटी चैट और ढेरों सुझाव ठीक आपके सामने मौजूद हैं. जब इंटरनेट ही हमारा डॉक्टर बन जाता है तो असलियत और भ्रम में अंतर करना मुश्किल हो जाता है. लेकिन कैंसर से जुड़े मिथकों को यह रोग खुद ही हवा देता है: कुछ रोगों के नाम के साथ ही डर या भ्रम जुड़े होते हैं और जिनसे छुटकारा पाना आसान नहीं होता.
भारत का ही उदाहरण लेते हैं: भारत में हर साल कैंसर के 11 लाख नए मामले सामने आ रहे हैं. और इसी समय 30 लाख भारतीयों को यह रोग अपनी चपेट में लेता जा रहा है. कैंसर से हर साल 7,00,000 भारतीयों की मौत होती है, जिनमें से 80 प्रतिशत डर, घबराहट या लापरवाही की वजह से डॉक्टरों के पास तब पहुंचते हैं जब बहुत देर हो चुकी होती है.
इस दुखद कहानी का अच्छा पहलू भी है: वह यह कि ढेरों नए शोध कैंसर को देखने, समझने और इसके इलाज के तरीकों को बदलने की राह आसान कर रहे हैं. अब ऑन्कोलॉजी (कैंसर रोग विज्ञान) ही इसका एकमात्र समाधान नहीं है. बीते एक साल में हुए कई नए शोधों ने वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर कैंसर से जुड़े कई भ्रमों को दूर कर दिया है.

मिथक: चेतावनी बिना आता है कैंसर
हकीकत: इस बात में कोई सचाई नहीं है. ज्यादातर कैंसर के लक्षण नजर आने लगते हैं, यह दावा ब्रिटिश जर्नल ऑफ जनरल प्रैक्टिस के जनवरी 2015 के अंक में छपे शोध में किया गया है. इसमें पता लगाया गया है कि लोगों में कैंसर के लक्षण नजर आने पर वे चिकित्सीय सहायता लेने का फैसला लेते हैं या नहीं.

शोध में शामिल 1,700 मरीजों में से करीब 52 फीसदी ने पिछले तीन माह में कैंसर से जुड़ा कम-से-कम एक चेतावनी भरा लक्षण दिखने के बावजूद डॉक्टर से सलाह नहीं ली (देखें ग्राफिक). कुछ ने लक्षण को स्वीकारने से ही इनकार कर दिया तो कुछ ने डॉक्टर का समय बर्बाद नहीं करना चाहा, कुछ रोग के खराब निदान के डर से डॉक्टर के पास नहीं पहुंचे तो कुछ ने अपनी समस्या की वजह बढ़ती उम्र को मान लिया. इंडियन एसोसिएशन ऑफ सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के उपाध्यक्ष और मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ ऑन्कोलॉजी के प्रमुख डॉ. हरित चतुर्वेदी कहते हैं, ''भारतीय संदेह के मामले में कच्चे हैं इसीलिए रोग की पहचान और उपचार देर से शुरू हो पाता है.'' ऐसा कोई भी लक्षण जो लगातार तीन हफ्ते तक बना रहता है मसलन कोई गांठ, मस्सा, गला खराब रहना या बलगम बनना सब  की जांच जरूरी है. और डॉक्टर की सलाह? ''संदेह कैंसर को मात दे सकता है.''

मिथक : बदकिस्मती से होता है कैंसर
हकीकत : जी नहीं. 10 में से 4 से ज्यादा तरह के कैंसर से जीवनशैली में बदलाव करके बचा जा सकता है जैसे तंबाकू नहीं खाना, संतुलित वजन बनाए रखना, सेहतमंद खान-पान, शराब का सेवन नहीं करना, यह कहना है एक्वस, दिल्ली में प्रोफेसर यूरो-ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अमलेश सेठ का. वे कहते हैं, ''यह आपके पक्ष में होगा.''

आशंका, जीवनशैली, माहौल, जीन्स, इनमें से कैंसर की वजह क्या है, यह सवाल बरसों से डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को परेशान किए हुए है. जर्नल साइंस के जनवरी 2015 के अंक में छपे शोध में एक सांख्यिकीय मॉडल के जरिए कैंसर के जोखिम का आकलन करने के तरीके ने नई बहस को जन्म दे दिया है. अमेरिका स्थित जॉन हॉपकिंस किमेल कैंसर सेंटर के वैज्ञानिकों, गणितज्ञ क्रिश्चन टोमासेटी और कैंसर जेनेटिस्ट बर्ट वोगेल्स्टेन की टीम का दावा है कि दो-तिहाई मामलों में कैंसर की उत्पत्ति किसी कार दुर्घटना की तरह ही आकस्मिक या 'जैविक बदकिस्मती' की वजह से होती है. सीधे कहें, आखिर किसी भी तरह की गलत आदत नहीं पालने वाले लोगों को कैंसर क्यों होता है जबकि खराब जीवनशैली वाले कई इससे बचे रहते हैं.

सबसे बड़ी है जैव संरचना: कैंसर का मतलब है कोशिकाओं में कई गुना वृद्धि होना. स्वस्थ मानव शरीर में हर दिन दस खरब कोशिकाएं विखंडित होती हैं. डॉ. सेठ कहते हैं, ''कई कोशिकाएं मरती हैं और उतनी ही नई कोशिकाएं बन जाती हैं.'' शरीर के अपने नियम-कायदे होते हैं: त्वचा की कोशिकाएं बनने में चार हक्रते लगते हैं, लीवर की कोशिकाएं 150 दिन में बनती हैं, लाल रक्त कोशिकाएं 120 दिन में बनती हैं. आनुवंशिकता या जीवित कोशिकाओं में मौजूद डीएनए भी हर दिन लाखों तरह के बदलावों से गुजरता है. इनमें से ज्यादातर नुक्सानदायक साबित नहीं होते या फिर हमारी कोशिकाओं में नुक्सान को सुधारने की ताकत होती है. डॉ. सेठ कहते हैं, ''समय के साथ और अकस्मात ही शरीर डीएनए की प्रतिलिपि बनाते समय कुछ गलतियां कर देता है.'' जब ऐसी गलतियां (परिवर्तन) होती हैं तो अनियंत्रित कोशिकाएं बनने की आशंका प्रबल हो जाती है, जो शरीर के नियमों को नहीं मानते हुए अनियंत्रित ढंग से बढऩे लगती है और इर्द-गिर्द की कोशिकाओं और उत्तकों को खत्म करने लगती है. डॉ. सेठ कहते हैं, ''लेकिन यह बात अब भी कायम है कि ज्यादातर कैंसर में बचाव की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है.'' वे आगे कहते हैं, ''इसका मतलब यह है कि अगर ज्यादातर प्रकार के कैंसर से बचाव नहीं हो सकता है तो उनकी समय रहते पहचान करने पर जोर दिया जाना चाहिए ताकि रोग का इलाज समय रहते शुरू किया जा सके.''

कैंसर के मिथक
मिथक: जल्द-से-जल्द सर्जरी हो
हकीकत: जरूरी नहीं हर तरह के कैंसर में सर्जरी की जरूरत पड़े. दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट ऐंड रिसर्च सेंटर के मेडिकल डायरेक्टर ए.के. धवन कहते हैं, ''कैंसर की रोकथाम का उपाय शुरुआत में ही इसकी पहचान करना और सही इलाज शुरू करना है. भारतीयों को लगता है कि कैंसर को जल्द-से-जल्द शरीर से बाहर कर दिया जाए. रोग के शुरुआती चरणों में खासकर गांठ, स्तन, फेफड़ों के प्रोस्टेट में सर्जरी की भूमिका बहुत कम होती है. जरूरत यह समझने की है कि ट्यूमर किस तरह का है, कौन से अंग में और किस जगह पनप रहा है और सबसे जरूरी रोग किस स्टेज पर पहुंच चुका है.''

ग्रेडिंग में माइक्रोस्कोप में देखकर यह पता लगाया जाता है कि कोशिका किसी भी सामान्य कोशिका से कैसे अलग दिखती है. लो ग्रेड कैंसर धीरे-धीरे विकसित होता है जबकि हाइ ग्रेड वाला तेजी से बढ़ता है. चरण का मतलब है कि इलाज नहीं मिलने की स्थिति में कैंसर किस तरह पनप और बढ़ रहा है: यानी किसी एक जगह गांठ के इर्द-गिर्द शिराओं के बनने से लेकर लसिकाओं और रक्त के जरिए शरीर के दूसरे हिस्सों में पहुंचना. डॉ.चतुर्वेदी कहते हैं, ''मरीज को किस इलाज की जरूरत है इसकी खातिर डॉक्टर के लिए कैंसर की स्टेज और ग्रेड जानना जरूरी है. इससे अनुभवी ऑन्कोलॉजिस्ट समझ जाते हैं कि मरीज को कब इलाज की जरूरत है और कब नहीं. ऐसे मरीज भी आते हैं जिनके रोग की स्टेज गलत समझ ली गई होती है और अधूरी सर्जरी के कारण रोग फिर पनपने लगता है.''

इसके भी सबूत हैं कि शुरुआती कीमोथेरेपी और रेडिएशन के बाद कई बार फॉलोअप परीक्षण से कुछ मरीजों को बेहतरीन नतीजे मिलते हैं और वे सर्जरी के जोखिम और जटिलता से बच जाते हैं. अमेरिकन सोसाइटी ऑफ क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी इस नतीजे पर जनवरी में पहुंची है. सोसाइटी ने 2006 से 2014 के बीच मेमोरियल स्लोअन कैटेरिंग कैंसर सेंटर में स्टेज 1 से 3 के गुदा कैंसर के मरीजों के क्लिनिकल डाटा का परीक्षण किया था. कीमोरेडिएशन और सिस्टेमैटिक कीमोथैरेपी के उपचार के बाद जिन मरीजों का ट्यूमर पूरी तरह से खत्म हो गया, उनकी बचने की दर एक जैसी थी, उनमें से कुछ ने तुरंत सर्जरी करवाई थी तो कुछ ने 'रुको और देखो' वाली निरीक्षण की पद्धति अपनाई थी. जो लोग सर्जरी से बच गए, वे अंतडिय़ों की गड़बड़ी और यौन क्रियाओं में परेशानी जैसे इसके जोखिम से भी बच गए. सोसाइटी के मुताबिक गुदा के कैंसर के लिए गैर-सर्जरी वाले इलाज की स्वीकार्यता दुनियाभर में बढ़ रही है.

मिथक: कैंसर यानी मौत
हकीकत: ऐसा तो बिलकुल भी नहीं है. मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल ऐंड कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ. राजन बरवे कहते हैं, ''कैंसर का इलाज मुश्किल इसलिए है न्न्योंकि यह सिर्फ रोग नहीं है. यह सैकड़ों रोगों का जटिल समूह है, कुछ रोग ज्यादा खतरनाक होते हैं तो कुछ.

कम.'' अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के मुताबिक आज सभी तरह के कैंसर से बच निकलने की दर बढ़ गई है, जो 1975 में 50 प्रतिशत थी और आज 66 प्रतिशत है. बचाव की दर बढ़ी है प्रोस्टेट कैंसर में (69 से 100 प्रतिशत), ब्रेस्ट कैंसर (75 से 89), द ब्लैडर (73 से 82), किडनी (49 से 69) और गले के कैंसर की बचाव दर 51 से प्रतिशत हो गई है. बच्चों में होने वाले ल्यूकेमिया ने 1970 में हमला बोला था और इससे पीड़ित 75 प्रतिशत बच्चों की मौत हो गई थी पर आज इसके 73 प्रतिशत मरीजों की जान बच जाती है. रेडिएशन थेरेपी से यूटेराइन सवाईकल कैंसर के 85-90 प्रतिशत मामलों में लंबे समय तक रोग से बचाव हो जाता है.

एक गैर सरकारी संगठन कैंसर रिसर्च ने 1970 से 70 लाख कैंसर मरीजों के रोग से बचाव के रिकॉर्ड का विस्तृत विश्लेषण किया. यह संगठन कैंसर से बचने वाले लोगों का रिकॉर्ड रखता है और रिसर्च को बढ़ावा देता है. संगठन ने पता लगाया कि 1970 की शुरुआत में अगर 25 फीसदी कैंसर से पीडि़त लोग 10 साल तक जीवित रहते थे तो आज यह दर 50 फीसदी हो गई है. 2015 में यह दर 75 प्रतिशत तक हो सकती है. डॉ. बरवे कहते हैं, ''इससे पता चलता है कि कैंसर से बचाव के मामले में हम कितने आगे बढ़ गए हैं.''

शार्क को कैंसर नहीं होता
मिथक खत्म नहीं हो रहे: शार्क को कैंसर नहीं होता बल्कि वे तो इससे बचाव करती हैं; डियोड्रेंट से स्तन कैंसर होता है; डिजाइनर लिपस्टिक और हेयर डाई से कैंसर होता है, कैंसर संक्रामक रोग है, यह सब गलत है. मिथक मूखर्तापूर्ण और बेतुके होते हैं. हो सकता है कि उनसे कोई नुक्सान नहीं हो पर कैंसर से जुड़े मिथक जानलेवा हो सकते हैं. कैंसर दुनियाभर में होने वाली मौत की बड़ी वजह है. दुनियाभर में इस साल कैंसर से जुड़े जो भी अभियान हुए, उनकी टैगलाइन थी, 'नॉट बियांड अस' और इनका सारा ध्यान उन उपायों को एकजुट करने पर है, जो हमारे दायरे में हैं. चलिए, एक नई शुरुआत करते हैं.

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