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भ्रष्टाचार से लड़ने पर चली जाती है जान

बिहार में आरटीआइ से भ्रष्टाचार और अनियमितताएं उजागर करने वाले कम से कम 20 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया और दर्जनों पर हमले हुए लेकिन हमलावरों को सजा अभी तक नहीं मिली

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आरटीआइ कार्यकर्ता विपिन अग्रवाल के पिता विजय अग्रवाल आरटीआइ कार्यकर्ता विपिन अग्रवाल के पिता विजय अग्रवाल

बाजार अपनी गति से ही चलता है. वह किसी के लिए रुकता नहीं है. चाहे वह महानगर का बाजार हो या किसी कस्बे का, कारोबार भावनाओं से परे होता है. बिहार के मोतिहारी जिले का हरसिद्धि बाजार भी वैसा ही सामान्य है. यहां कोई भी ऐसी चीज नहीं दिखती, जो यह महसूस करा सके कि कुछ दिनों पहले एक 14 साल के बच्चे ने यहीं की एक बिल्डिंग से कूदकर आत्महत्या कर ली थी. हरसिद्धि थाने से महज 100 मीटर दूर एक घर है, जहां बाहर से ही भीतर की वीरानी का एहसास तारी है. दस्तक देने पर एक अधेड़ व्यक्ति ने परिचय पूछकर अंदर आने के लिए कहा.

थोड़ी ही देर में भीतर वाले कमरे से एक दुबले-पतले बुजुर्ग व्यक्ति निकले, वे सफेद कुर्ता-पाजामा पहने हुए और माथे पर चंदन लगाए हुए थे, उनके हाथ कांप रहे थे, लेकिन उन्होंने फाइलों को मजबूती से पकड़ रखा था.

करीब 70 साल के विजय अग्रवाल कहते हैं, ''लोकल में तो यह मामला बहुत चला है. लेकिन क्या बात है कि सेंट्रल के लोग इसे उठा नहीं रहे हैं.'' सेंट्रल से उनका मतलब था दिल्ली का मीडिया.

मार्च महीने की 24 तारीख को उनके 14 वर्षीय पोते रोहित अग्रवाल ने घर के सामने वाली तिमंजिला इमारत से कूदकर आत्महत्या कर ली थी. उस दिन वह लड़का जिले के पुलिस अधीक्षक (एसपी) से बात करने उनके ऑफिस गया था. उसे अपने पिता विपिन अग्रवाल की हत्या के आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी के लिए गुहार लगानी थी. लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई. परिजनों का आरोप है कि एसपी ऑफिस में लड़के की आवाज नहीं सुनी गई, क्षुब्ध होकर उसने आत्महत्या कर ली. विपिन अग्रवाल सूचना का अधिकार (आरटीआइ) कानून, 2005 के तहत सरकारी दस्तावेज प्राप्त कर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार का खुलासा करते थे. उन्होंने कस्बे की कई सरकारी जमीन को अवैध कब्जे से मुक्त करवाया था. ये बातें कुछ लोगों को नागवार गुजरीं और 24 सितंबर, 2021 को गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई.

अग्रवाल देश के उन कम से कम 97 लोगों में से एक हैं, जिनकी आरटीआइ दायर करने के चलते हत्या की गई है. बिहार इस मामले में काफी आगे है, जहां ऐसे 20 कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई है. इतना ही नहीं, अब तक 179 आरटीआइ कार्यकर्ताओं पर हमला किया गया है, 186 को डराया-धमकाया या प्रताड़ित किया गया है और ऐसे सात लोग आत्महत्या कर चुके हैं.

बहरहाल, बेटे की हत्या के बाद से विजय अग्रवाल अपने पोते में सहारा ढूंढ रहे थे. लेकिन उसने भी अब साथ छोड़ दिया है. महज 35 साल की उम्र में विजय अग्रवाल की पत्नी गुजर गई थीं. उसके बाद बड़े बेटे की पत्नी की मौत हो गई. फिर बेटे विपिन और अब उनके पोते की मौत हो गई. हालांकि अभी भी उनमें न्याय की आस जिंदा है. वे दिन भर फाइलों में खोए रहते हैं, मुख्यमंत्री से लेकर एसपी और एसएचओ ऑफिस तक पत्र लिखते रहते हैं, विपिन के पुराने कागजों को निकालकर पढ़ते हैं, महत्वपूर्ण बातों को एक फाइल में इकट्ठा करते हैं और फिर संबंधित विभाग को पोस्ट कर देते हैं. बेटे के मर्डर केस में पुलिस कार्रवाई पर वे कहते हैं, ''जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, वे पैसे लेकर हत्या करते हैं. लेकिन जिन लोगों ने जमीन पर कब्जे किए थे, उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई. यदि उनमें से कोई एक भी पकड़ लिया गया तो पूरा केस खुल जाएगा. उसमें बड़े-बड़े लोग फंसेंगे.''

उन्होंने बताया, ''इसी मांग को लेकर मेरे पोते ने दो-दो बार धरना प्रदर्शन किया. लेकिन गिरफ्तारी नहीं हुई. 23 मार्च को उसका 8वीं क्लास का फाइनल एग्जाम था. जब वह शाम को परीक्षा देकर आया तो उसने कहा कि पापा के केस के संबंध में मुझे एसपी से मिलना है. लेकिन मैंने उससे कहा कि तुम पढ़ाई पर ध्यान दो. लेकिन वह अड़ा रहा और अंतत: एसपी से मिलने जिला मुख्यालय मोतिहारी चला गया. एसपी ने बोला था कि तीन बजे तक आ जाना. वह वहां 5.30 बजे तक था, लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई. और शायद किसी स्टाफ ने उसके साथ बदसलूकी की थी, जिसके कारण वह बुरी तरह आहत हुआ था.''

लड़का नाराज होकर करीब सात बजे घर लौटा और गुस्से में दादा के ऊपर पत्र फेंक दिया. उन्होंने कहा, ''इसके बाद वह मिट्टी का तेल लेकर सामने की बिल्डिंग के सबसे ऊपर चढ़ गया और वहां से मुझे फोन किया. उसने कहा कि आप प्रशासन को तत्काल यहां बुलाइए, नहीं तो कूद जाऊंगा. हम लोग उसे वापस बुलाने की कोशिश करते रहे, लेकिन तब तक वह मिट्टी का तेल डालकर कूद गया.''

विपिन अग्रवाल के मामले में क्या हुआ

विजय अग्रवाल याद करते हैं कि उस दिन सुबह विपिन मवेशी अस्पताल गए हुए थे. तारीख थी 24 सितंबर, 2021. वे अस्पताल से गाय के लिए दवा लेकर लौट रहे थे, तभी ब्लॉक गेट के पास मोटरसाइकिल से दो आदमी आए और गोली मारकर फरार हो गए. यह घटना सुबह करीब 10.30 बजे की है.

पुलिस जांच के मुताबिक, इस केस में 15 लोगों पर आरोप सत्य पाया गया है, जिसमें सात को गिरफ्तार किया गया है और आठ फरार हैं. इसके अलावा 11 लोगों को जांच में रखा गया है, जिसमें पहले नंबर पर स्थानीय ताकतवर नेता राजेंद्र प्रसाद गुप्ता का नाम है.

अग्रवाल ने कहा, ''जांच में रखने का मतलब है कि मामले में किसी तरह लीपापोती कर उन्हें क्लीनचिट दे दी जाए. राजेंद्र गुप्ता मुख्य साजिशकर्ता है, लेकिन उसे गिरफ्तार नहीं किया गया है.''

इस संवाददाता ने पुलिस से मामले का सिलसिलेवार ब्योरा हासिल किया. साथ ही पुलिस डायरी पर भी नजर दौड़ाई. दो आरोपियों मनीष कुमार और अजय सिंह का पुलिस को दिया बयान घटनक्रम पर थोड़ी रोशनी डालता है. मनीष ने पुलिस को बताया, ''हमने (आरोपियों) योजना बनाई थी. विपिन अग्रवाल ने आरटीआइ के तहत हम लोग की जमीन, घर आदि की सूचनाएं मांगकर और अतिक्रमण के खिलाफ अभियान चलाकर हमें नुक्सान पहुंचाया था.'' उन्हें रास्ते से हटाने के काम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए सचिन सिंह, पप्पू सिंह एवं राजेश कुमार (पत्रकार), किनदेव प्रसाद, अभिमन्यु सिंह के बीच 20 लाख रुपए में विपिन अग्रवाल की हत्या करना तय हुआ. घटना वाले दिन मनीष, सचिन सिंह, पप्पू सिंह, विवेक कुमार सिंह, नीरज कुमार तथा अजय सिंह एक साथ मोटरसाइकिल से वारदात के लिए गए थे. अजय सिंह ने भी पुलिस के सामने विपिन अग्रवाल पर हमले की बात कुबूली थी.

विपिन अग्रवाल के सैकड़ों दस्तावेज दर्शाते हैं कि उन्होंने विभिन्न स्तरों पर हरसिद्धि में सरकारी जमीन कब्जाने की शिकायत की थी. इस संबंध में उन्होंने बिहार लोक शिकायत निवारण कार्यालय, लोकायुक्त, सूचना आयोग, हाइकोर्ट, राज्यपाल आदि को पत्र भेजे थे.

हरसिद्धि के सर्किल ऑफिसर को 21 नवंबर, 2019 को सौंपी गई एक रिपोर्ट में खेसरा नं. 37 और खेसरा नं. 1058 पर सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने वालों की सूची पेश की गई थी, जिसमें उन लोगों के भी नाम शामिल हैं जो विपिन अग्रवाल की हत्या मामले में आरोपी हैं. रिपोर्ट में खेसरा नं. 37 में 75 लोगों और खेसरा नं. 1098 में 36 लोगों के अतिक्रमण का लेखा-जोखा दिया गया है, जिसकी प्रति इंडिया टुडे के पास है.

अग्रवाल ने कहा, ''बाजार में हर कोई जानता है कि हत्या किसने करवाई है, अगर कोई नहीं जानता है तो वह है पुलिस.'' हालांकि पूर्वी चंपारण के एसपी डॉ. आशीष कुमार का कहना है कि विपिन अग्रवाल की हत्या मामले में पुलिस ने सात लोगों को गिरफ्तार किया है और आठ फरार चल रहे हैं, जिनकी कुर्की की कार्रवाई होनी है. सात के खिलाफ चार्जशीट दायर हो गई है. उन्होंने कहा, ''जिस दिन की यह घटना बताई जा रही है, उस दिन उस लड़के ने मिलने का समय लिया था. तो हमने उसे तीन से पांच के बीच का समय दिया था. पांच बजे तक हम बैठे भी थे.

मुझे यह नहीं पता था कि यह वही लड़का है. बाद में मुझे डिस्ट्रिक्ट जज के यहां मीटिंग में जाना पड़ा. मेरे जाने के बाद डीएसपी ने बाकी लोगों से मुलाकात की थी.'' एसपी ने कहा, ''लेकिन वह लड़का किसी और से मिलना नहीं चाहता था. सिक्योरिटी ने कहा कि डीएसपी यहां बैठी हुई हैं, आप उनसे मिलकर शिकायत बता दीजिए. लेकिन वह बिना मिले चला गया. जिसकी सीसीटीवी फुटेज से पुष्टि होती है. वह शाम 5.27 बजे चाचा के साथ जाते हुए दिख रहा है. उसके साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ था.'' उन्होंने कहा, ''शूटरों ने जिन लोगों का नाम लिया है, उन्हें गिरफ्तार किया गया है और जिनका नाम नहीं लिया है, उन्हें अंडर इन्वेस्टिगेशन रखा गया है. किसी का नाम निकाला नहीं गया है.''

राम कुमार ठाकुर की जान क्यों ली

जनार्दन ठाकुर बरामदे से सट कर बने एक छोटे से स्टडी रूम के कोने से एक बोरी और प्लास्टिक की कई पन्नियां निकालते हैं. मकान कच्चा है, इसलिए यहां सीलन वाली महक भी है. वे बाहर लगे तख्त पर बोरी को खाली कर देते हैं. सैकड़ों कागज बिखर जाते हैं. उन पर मनरेगा, सूचना का अधिकार, प्रथम अपील, सूचना आयोग, शिक्षक भर्ती, राशन, मस्टर रोल जैसे कई शब्द अंकित हैं. इनमें से जो आवेदन पत्र हैं, उसके नीचे हस्ताक्षर में नाम लिखा है, ''राम कुमार ठाकुर.''

बिहार में मुजफ्फरपुर जिले के रतनौली गांव के रहने वाले राम कुमार ठाकुर, जनार्दन ठाकुर के छोटे भाई थे. वे जिले की दीवानी अदालत में वकालत करते थे. साथ ही आरटीआइ के माध्यम से गांव पंचायत में हुए विकास कार्यों की सूचना लेते थे. सूचना मांगने पर उठे विवाद के बीच 23 मार्च, 2013 को मुजफ्फरपुर से लौटते वक्त घात लगाकर उनकी हत्या कर दी गई. घटना को अब नौ साल हो गए हैं. पुलिस ने सिर्फ एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया था. बाकी तीन आरोपियों को फरार बताया गया है. केस से जुड़े एक अन्य आरोपी को शराब के मामले में हाल ही में गिरफ्तार किया गया है.

उनके पुत्र अभिजीत ठाकुर उस समय 16 साल के थे और 11वीं क्लास में पढ़ते थे. कई साल तक डिप्रेशन में रहने के बाद उन्होंने अपने आप को संभाल लिया है, लेकिन उनकी मां की स्थिति अभी भी बहुत खराब है. वे इंजीनियरिंग करना चाहते थे, उसका एंट्रेंस दिया, क्वालीफाइ भी कर गए थे, लेकिन पैसे की कमी के चलते दाखिला नहीं ले पाए. आगे की पढ़ाई बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर पूरी की.

उन दिनों को याद करते हुए वे कहते हैं, ''मनरेगा के तहत कई गड़बड़ियां की जा रही थीं. मरे हुए लोगों के नाम पर पैसे निकाले जा रहे थे. जितने दिन काम हुआ है, उसके मुकाबले और अधिक दिन का पैसा निकाल लिया जाता था. इसे लेकर मेरे पापा ने आरटीआइ के तहत कागज निकाला था. जिसमें पता चला कि भ्रष्टाचार हो रहा है. इस पर उन्होंने संबंधित विभाग में शिकायत की. जब यहां के मुखिया को यह पता चला कि मेरे पापा ने कार्रवाई की मांग की है तो वे घर आकर धमकी देने लगे.''

उन्होंने कहा, ''लेकिन पापा को अंदाजा नहीं था कि यह सब हो सकता है. वे कहते थे कि धमकी देता है तो देने दो, गांव का आदमी है, क्या कर लेगा. इसके बाद पापा की शिकायत पर गांव में सोशल ऑडिट कराया गया, ऑडिट के दौरान ही उन लोगों ने हमला किया. कई बार रास्ते में भी हमला किया गया. इस तरह की डराने-धमकाने की कवायद के बाद भी उन्होंने केस नहीं छोड़ा तो 23 मार्च, 2013 को घर से छह किलोमीटर दूर पुरुषोत्तमपुर में शाम को उनकी हत्या कर दी गई. उन पर गोली चलाई गई थी.''

अभिजीत कहते हैं कि पुलिस जिन्हें फरार बता रही है, वे गांव में कई बार घूमते दिख जाते हैं. आरोपियों के फरार होने पर कोर्ट ने कुर्की का आदेश दिया था. लेकिन जब पुलिस दरवाजे पर पहुंची तो आरोपियों ने शक्ति प्रदर्शन कर कुर्की करने से रोक दिया. फिर केस सीआइडी को दिया गया, जिसने जांच में आरोप सही पाए. सीआइडी ने एसटीएफ को भेजा, तब जाकर 2015 में एक आरोपी गिरफ्तार हुआ. उन्होंने कहा, ''मैं एसएसपी, डीएसपी समेत कई बड़े अफसरों के पास जा चुका हूं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. हर जगह से एक ही जवाब मिलता है: मैं देखता हूं. सवाल है कि कुर्की क्यों नहीं हो रही है. यदि पुलिस का मानना है कि आरोपी फरार हैं तो वे कुर्की करें, इसमें क्या दिक्कत है.''

अभिजीत ने बताया कि जब एक बार वे दारोगा के पास गए और कहा कि मैं आरोपियों की लोकेशन बताता हूं, चलकर उन्हें पकड़ लीजिए. इस पर पुलिस अधिकारी ने कहा, ''पकड़ने में पैसा लगता है, ऐसे नहीं पकड़ा जाता है.'' राम कुमार के भाई जनार्दन ठाकुर बताते हैं कि इस समय परिवार से समझौता कराने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा, ''आप मार देते हैं और फिर कहते हैं कि पैसे लेकर केस खत्म कर लीजिए, ऐसे थोड़े ही होता है. आप उतने पैसे खुद ले लीजिए और जिसको मारे हो, उसको वापस कर दो.''

शशिधर मिश्र का हत्यारा कोई नहीं!

कोरोना महामारी के दौरान जब बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का पूरा माध्यम डिजिटल कर दिया गया, तो 12वीं कक्षा में पढ़ रहे सूर्यकांत मिश्र के सामने बहुत बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई. वजह: मोबाइल फोन. उनके पूरे परिवार में आज तक किसी के पास स्मार्ट फोन नहीं है. स्कूल की ओर से दबाव रहता है, इसलिए सूर्यकांत को अपने दोस्तों के घर जाकर उनके स्मार्ट फोन से पढ़ाई करनी पड़ती है. यह सब उन्हें मजबूरी में करना पड़ता है. वे पिता को याद कर भावुक हो जाते हैं. वे कहते हैं, ''पापा होते तो यह सब न करना पड़ता.''

बेगूसराय जिले के फुलवरिया गांव के रहने वाले सूर्यकांत के पिता शशिधर मिश्र की 14 फरवरी, 2010 की रात गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. वे 2006 से आरटीआइ से भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर कर रहे थे. बिहार में किसी आरटीआइ कार्यकर्ता की हत्या का यह पहला मामला था. तब सूर्यकांत की उम्र महज छह साल और बड़ी बहन की आठ साल थी. उस दिन को याद करते हुए सूर्यकांत कहते हैं, ''उस समय मैं घर में पढ़ाई कर रहा था. मां खाना बना रही थीं. तभी बाहर से आवाज आई. हमें लगा कि आतिशबाजी हो रही है. उस बीच लाइट भी कट गई. इतना मुझे याद है. यह नौ बजे की घटना थी. तभी बाहर से फिर आवाज आई कि किसी को गोली मार दी गई है. चाचा, मम्मी दौड़कर बाहर गए तो देखा कि लाश पड़ी हुई थी. वे मेरे पापा थे. तब तक काफी देर हो चुकी थी.''

घटना को 12 साल से अधिक हो गए हैं, पर किसी को सजा नहीं हुई. परिवार के मुताबिक, हत्या में पड़ोस के ही लोग शामिल हैं. केस में पांच नामजद अभियुक्त हैं. सभी जमानत पर बाहर हैं. पत्नी अनीता देवी ने बताया कि उन्होंने केस नहीं किया था, पुलिस ने खुद ही केस दर्ज किया था. उन्होंने कहा, ''हमें जो सरकारी वकील मिला था, उसने मुझसे गलत बयान दिलवा दिया. मैं चाहती तो बहुत हूं कि केस लड़ा जाए, आरोपियों को सजा दिलवाई जाए, लेकिन मैं इतनी समर्थ नहीं हूं. मुझे कानून की समझ नहीं है.''

अनीता ने बड़ी बेटी उमा भारती की शादी कर दी है. उनके दो और बच्चे हैं, जो अभी स्कूल में पढ़ रहे हैं. अनीता ने कहा, ''मेरे पति की हत्या के बाद पुलिस सारे कागजात मेरे घर से उठाकर ले गई. पुलिसवालों ने कहा कि वे इसके जरिए आरोपियों को पकड़ने में मदद करेंगे. इन कागजों में उन्हीं लोगों के भ्रष्टाचार के कारनामों का विवरण था, जो इस मामले में आरोपी हैं. लेकिन आज तक पता नहीं चला कि उन कागजों का हुआ क्या. जब मेरे देवर वापस मांगने गए तो उन्हें एसपी ऑफिस से डांट कर भगा दिया गया. हमारे घर में जब कोई है ही नहीं तो हम केस किसके सहारे लड़ें.''

शशिधर मिश्र भाजपा से भी जुड़े हुए थे. अनीता बताती हैं कि उस समय जिला स्तर के कई भाजपा प्रतिनिधियों ने न्याय का आश्वासन दिया, कई साल बीत गए पर कुछ नहीं हुआ.

शशिधर स्थानीय समस्याओं से जुड़े मामले जैसे कि स्कूल, बाल विकास परियोजना, रेलवे टेंडर्स, रजिस्ट्री ऑफिस, सड़क निर्माण, नाला निर्माण जैसे कई मामलों में जानकारी प्राप्त कर इसमें हुए भ्रष्टाचार और गड़बड़ी को उजागर करते थे. वे आजीविका के लिए दुकानों में सामान पहुंचाने और साइकिल पर कपड़े बेचने का काम करते थे. पहले भी शशिधर पर कई बार हमले हुए थे, धमकियां मिल रही थीं. उन्होंने पुलिस को इसकी जानकारी दी थी, लेकिन उन्हें सुरक्षा नहीं दी गई.

वाल्मीकि यादव के हत्यारे आजाद हैं!

बिहार में जमुई जिले के बिछवे गांव का तालाब ज्यादातर समय पानी से लबालब भरा रहा है. इसके चलते अब सिंचाई काफी आसान हो गई है, नतीजतन उपज भी अच्छी हो रही है. गांववाले नहाने और कपड़े धोने के लिए भी इस पानी का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन तालाब हमेशा से ऐसा नहीं था.

लघु सिंचाई योजना के तहत जब पहली बार तालाब में काम शुरू किया गया था तो ठेकेदार इसे गहरा करने के नाम पर ऊपरी तौर पर खुदाई करके चले गए थे. इसमें ज्यादा पानी रुकता नहीं था, गांववालों की समस्या वैसी ही बनी रही. गांव के एक किसान वाल्मीकि यादव से यह सब देखा नहीं गया. उन्होंने तालाब के कार्यों की खोजबीन का बीड़ा उठाया. उन्होंने आरटीआइ का सहारा लिया और संबंधित विभाग में आवेदन दायर कर इसके खर्च का लेखा-जोखा मांगा.

जवाब में मिले दस्तावेजों के आधार पर उन्होंने संबंधित विभाग में शिकायत की, जिसके बाद ठेकेदारों को फिर से उसकी खुदाई करनी पड़ी. लेकिन यादव को अंजाम भुगतना पड़ा. वे अब इस दुनिया में नहीं हैं. उनकी आरटीआइ सक्रियता से नाराज होकर कुछ लोगों ने 1 जुलाई, 2018 को उस समय उन पर जानलेवा हमला किया जब वे पास के ही सिकंदरा बाजार से अपने घर की तरफ आ रहे थे. गोली लगने से उनकी मौत हो गई थी.

वाल्मीकि यादव साल 2006 से आरटीआइ का उपयोग कर रहे थे. आरटीआइ ऐक्ट के तहत ही 2016-17 के नरेगा कार्यों में उन्होंने 55 लाख रुपए के गबन का खुलासा किया था. इस मामले में पंचायत रोजगार सेवक पर आरोप लगा था और इसमें स्थानीय मुखिया की मिलीभगत बताई जा रही थी. केस की शिकायत करने पर यादव पर हमला भी किया गया था. उनके भाई दिनेश यादव ने बताया, ''इस केस के नौ में से सिर्फ एक आरोपी जेल में है. बाकी को करीब तीन महीने के भीतर जमानत मिल गई थी. हम लोगों ने इसका पुरजोर विरोध किया था.'' केस में नौ नामजद आरोपी हैं, छह के खिलाफ बयान पूरा हो चुका है. दिनेश यादव ने कहा कि मनरेगा मामले में प्रधान कृष्णदेव रविदास समेत कई लोगों के खिलाफ जांच चल रही थी, उसमें कार्रवाई होने वाली थी, उससे पहले हत्या कर दी गई. वे कहते हैं कि पुलिस ने ठीक जांच की है, पर आरोपियों को जमानत नहीं मिलनी चाहिए थी.

उन्होंने कहा, ''हम पर केस वापस लेने का काफी दबाव है, वे लोग कहते हैं कि मैनेज कर लो, नहीं तो तुम लोग के साथ भी वही करेंगे. हमारा पूरा परिवार तो अब किसी काम का रहा नहीं, हमें रास्ते पर ले जाने वाले वही थे'' 

भ्रष्टाचार की जड़ें बिहार में इतनी गहरी हो चुकी हैं कि सिस्टम साफ करने का अदना सा प्रयास भी आरटीआइ कार्यकर्ताओं की मौत का कारण बन रहा है. जाहिर है, बिहार को बदलने के लिए किसी भगीरथ की जरूरत है.

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