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जम्मू-कश्मीरः अब काम भी तो दिखाएं महबूबा

पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की तेजतर्रार मुखिया महबूबा मुफ्ती जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री के बतौर कमान अपने हाथ में लेने जा रही हैं. राज्य के लंबे संकटग्रस्त इतिहास में ऐसा पहली बार होगा कि कोई महिला मुख्यमंत्री बनेगी.

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तकरीबन सालभर के अप्रत्याशित घटनाक्रम के बाद जम्मू-कश्मीर में चीजें दूसरी बार पटरी पर लौटती नजर आ रही हैं. मजहबी, सियासी और वैचारिक विभाजक रेखाओं में बंटे इस संकटग्रस्त सरहदी प्रांत की जनता एक बार फिर अपनी किस्मत पर सामूहिक दांव आजमाने के लिए खुद को तैयार कर रही है.

मुफ्ती मोहम्मद सईद ने 12 महीने पहले भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ असंभव-सा गठजोड़ करने में कामयाबी हासिल की थी, जिसे कुछ लोगों ने 'अस्वाभाविक' बताया था, कुछ ने 'दो परस्पर विरोधी ध्रुवों का एक अस्थिर गठबंधन' कहा था और कुछ ने इसे 'उत्तर और दक्षिण के मेल' का नाम दिया था. आज 56 साल की उनकी बेटी और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की तेजतर्रार मुखिया महबूबा मुफ्ती जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री के बतौर कमान अपने हाथ में लेने जा रही हैं. राज्य के लंबे संकटग्रस्त इतिहास में ऐसा पहली बार होगा कि कोई महिला मुख्यमंत्री बनेगी. जाहिर है, यह उपलब्धि उनके लिए एक बड़ी व्यक्तिगत त्रासदी के बाद आई है. पिछली 7 जनवरी को उनके पिता का देहांत हो गया था. अब उनके सामने चुनौतियों की लंबी फेहरिस्त है.

गर्मियों में श्रीनगर के फेयरव्यू कॉटेज और सर्दियों में जम्मू की वजारत रोड पर स्थित भव्य मुख्यमंत्री आवास में बैठकर महबूबा को एक खतरनाक संतुलन साधने का काम करना होगा. यह संतुलन श्रीनगर और दिल्ली के बीच, खूबसूरत कश्मीर घाटी और जम्मू के बीच, और 'नरम अलगाववाद' की खुराक पर लंबे समय से पलती रही अपनी मुस्लिम बहुल पार्टी पीडीपी और हिंदू राष्ट्रवादी बीजेपी के बीच कायम करना है जो घाटी में धीरे-धीरे रास्ता बना रही है.

क्या महबूबा इसके लिए तैयार हैं? मुफ्ती मोहम्मद सईद के इंतिकाल के बाद उन्होंने लंबे वक्त तक शोक में सियासी घटनाक्रम से दूरी बनाए रखी और (कई लोगों के मुताबिक) जान-बूझकर देरी की और 11 हफ्तों तक मुख्यमंत्री बनने की कोई जल्दी नहीं दिखाई. उन्होंने बीजेपी नेतृत्व की ओर से गठजोड़ के एक समयबद्ध एजेंडे पर आश्वस्त होने की कोशिश की. यह एजेंडा 16 पन्ने का एक दस्तावेज है जिसे 1 मार्च, 2015 को दोनों पार्टियों ने अपनाया था, जब उनके बीच पहली बार मिलीजुली सरकार बनाने का फैसला हुआ था.

महबूबा को बखूबी पता है कि उनके पिता की अगुआई में शुरुआती आठ महीनों के दौरान जमीनी स्तर पर एजेंडे को उतारने की दिशा में तकरीबन कोई काम नहीं हो सका है. इसकी बड़ी वजह यह थी कि नरेंद्र मोदी की सरकार निर्णायक क्षेत्रों में मुफ्ती को समर्थन देने में हिचकिचा रही थी, जिसमें 2014 के हजारों बाढ़ पीड़ित लोगों को राहत मुहैया कराने का काम भी शामिल था. फिर, लगातार कुछ ऐसे विवाद भी खड़े होते रहे जिनसे बचा जा सकता था. मसलन, जेल से एक अलगाववादी की रिहाई, बीफ पर प्रतिबंध और जम्मू-कश्मीर के संविधान में प्रस्तावित राज्य के झंडे के प्रयोग पर मतभेद.

पीडीपी के अंदरूनी लोग बताते हैं कि लगातार 11 हफ्ते तक जब महबूबा ने अपनी चुप्पी के कारण अपनी पार्टी के नेताओं को भी गहरे भ्रम में डाला हुआ था, वे दरअसल ''बीजेपी के साथ गठबंधन को जारी रखने के विवेक पर भी विचार कर रही थीं.'' भविष्य की दिशा का पता तब लगा जब 19 मार्च को तमाम मतभेदों को सुलझाने के लिए बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह और महासचिव राम माधव से दिल्ली में की गई मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री से मुलाकात का इंतजार करने की बजाए वे श्रीनगर लौट गईं.

इसके दो दिन बाद ऐसा लगा कि किसी जादू से सब कुछ ठीक हो गया. दिल्ली में 21 मार्च को प्रधानमंत्री के साथ हुई मुलाकात के बाद उनके चेहरे पर अरसे बाद मुस्कान देखी गई. उन्होंने इस मुलाकात को 'बहुत सकारात्मक' बताया और कहा कि वे 'संतुष्ट' हैं. घाटी के कई टिप्पणीकारों ने इसे 'आत्मसमर्पण' के रूप में देखा, पर उनके करीबी नेताओं का मानना है कि ''अब सरकार को हर तरीके के समर्थन के मामले में महबूबा को प्रधानमंत्री की ओर से निजी आश्वासन मिल गया है.''

वैसे बीजेपी पर भरोसे की बहाली को लेकर महबूबा ने जिन मांगों को पहले रखा था, उन पर प्रधानमंत्री की ओर से कोई बयान नहीं आया है. इनमें स्टेट पावर प्रोजेक्टस वापस देना, आक्वर्ड फोर्सेज स्पेशल पावर ऐक्ट (एएफएसपीए) हटाना और बाढ़ राहत मुहैया करना शामिल थीं. वहीं सरकार बनने से पहले पीडीपी और बीजेपी में मतभेद सामने आने लगे हैं. बिना शर्त समर्थन के पीडीपी के दावे को बीजेपी अब गलत ठहरा रही है और पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सुनील सेठी कहते हैं, ''जितने कैबिनेट मंत्री पीडीपी के हों, उतने हमारे भी होने चाहिए.''

लेकिन दोबारा अपने पद पर बहाल होने की उम्मीद कर रहे मुफ्ती की कैबिनेट में वित्त मंत्री हसीब द्राबू कहते हैं, ''महबूबा मुफ्ती ने हमेशा यही कहा था कि वे तभी कोई फैसला करेंगी जब वे निजी तौर पर संतुष्ट हो जाएंगी (कि यह गठबंधन उन उद्देश्यों की पूर्ति कर सकता है जिन्हें लेकर चला गया था). उन्होंने इसी मकसद से इस दिशा में काम किया.'' तो, क्या 'अंत भला तो सब भला' वाला मुहावरा यहां उपयुक्त होगा?

एक बात तो पहले से ज्यादा साफ  है कि अपने दूसरे अवतार में भी पीडीपी-बीजेपी गठबंधन बुनियादी तौर पर वही है जो पहले था. यानी यह दो प्रतिकूल विचार वालों का गठजोड़ है. राज्य बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''महबूबा यह भी जानती हैं कि पीडीपी के पास और कोई रास्ता नहीं बचा है.'' उनके मुताबिक, महबूबा के इस कदम के पीछे यह डर था कि कहीं उनकी पार्टी टूट न जाए. उनका दावा है, ''हमने अच्छी-खासी संख्या का प्रबंध कर लिया था. पीडीपी के 27 में से 22 विधायक, जिसमें कई पूर्व मंत्री भी शामिल हैं, महबूबा से अलग होना चाहते थे.''

जम्मू की कैनाल रोड पर एक आलीशान मकान में रह रहे बीजेपी के उप-मुख्यमंत्री निर्मल सिंह भी काफी उत्सुक दिखते हैं. वे खुशी-खुशी आगे के काम गिनवाते हैं, ''हमें प्रधानमंत्री के 80,000 करोड़ रु. के पैकेज को जमीन पर उतारना है.'' जम्मू के लोगों की समस्या का जिक्र करने पर हालांकि वे कुछ नरम पड़ जाते हैं. वे उन सभी परियोजनाओं के बारे में बताते हैं जो पिछले साल जम्मू में उनकी निगरानी में शुरू हुई हैं. घाटी अब भी उनकी पहल से दूर है.

अब, जबकि महबूबा ने पहल करते हुए बीजेपी के साथ ही रहना चुना है, तो क्या वे इसका कुछ लाभ उठा सकती हैं? सियासी स्तर पर कई संतुलन बैठाने के अलावा महबूबा को राजकाज के मामले में भी प्रदर्शन करना होगा और उन लोगों तक उसके लाभ पहुंचाने होंगे, जो मौजूदा उथल-पुथल से प्रभावित हैं और एक के बाद एक आई सरकारों के भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं. 2014 के बाढ़ पीड़ितों को राष्ट्रपति शासन के तहत पिछली 9 जनवरी से मुआवजा मिलना शुरू हुआ था. इसे छोड़ दें, तो स्वास्थ्य व शिक्षा सेवाएं मुहैया कराने में राज्य बिल्कुल नाकाम रहा है. बाढ़ के कारण प्रदेश के उद्योगों को जो नुक्सान हुआ है, उसकी भरपाई अब तक नहीं की जा सकी है. इसके अलावा सर्दियों में कारोबारियों को बिजली का संकट भी झेलना पड़ा है. कश्मीर के युवाओं में लगातार असंतोष गहराता जा रहा है और उनमें कट्टरता घर करती जा रही है. व्यापक बेरोजगारी इसे और खतरनाक बना रही है.

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता मीरवाइज उमर फारूक पीडीपी-बीजेपी की सरकार को कश्मीर के मसले का कोई हल कर पाने में असमर्थ पाते हैं. वे पीडीपी को इस बात का दोषी ठहराते हैं कि उसने बीजेपी के साथ आने के लिए स्वराज के अपने पुराने नारे को छोड़ दिया. वे इस गठबंधन को महज एक 'प्रशासनिक ढांचा' करार देते हैं जिसकी जरूरत 'सड़क, पानी और बिजली की समस्याओं को संबोधित करने' के लिए है. वहीं पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला कहते हैं, ''अगर महबूबा सरकार बनाने में ढाई माह लगा सकती हैं तो मुख्यमंत्री बनने पर सख्त फैसले लेने में कितना वक्त लेंगी?''

पीडीपी में महबूबा के सबसे युवा सहयोगियों में एक और उनके करीबी वाहिद पर्रा मानते हैं कि उनमें कामकाज दिखाने की क्षमता है. पर्रा कहते हैं, ''कश्मीर के युवाओं से महबूबा गहरे जुड़ी हैं और यहां युवाओं की आबादी करीब 65 फीसदी है.'' वे जोर देकर बताते हैं कि जनता के बीच 20 साल तक काम करने से महबूबा का नजरिया व्यावहारिक है और यही बात ''उन्हें मुफ्ती सईद से आगे रखती है जो एक द्रष्टा, चिंतक और रणनीतिकार थे.'' उनके मुताबिक यही चीज महबूबा को सरकार चलाने में लाभ देगी. वे कहते हैं, ''देखते रहिए, वक्त के साथ आप पाएंगे कि बीजेपी के विधायक मुख्यमंत्री के पास जाने में उतनी सहजता का एहसास करेंगे जितनी खुद उनके मंत्रियों को नहीं होती.''

हसीब द्राबू इससे सहमत हैं, ''महबूबा में दोनों बातें मौजूद हैं—पिता की तरह चीजों का करीबी आकलन और दूर से खड़े होकर देखने की क्षमता.'' मुफ्ती की कैबिनेट में वित्त मंत्री बने द्राबू कहते हैं, ''अपने पिता की दृष्टि का लाभ और साथ ही जमीनी स्तर से लगातार मिलने वाली प्रतिक्रियाओं से महबूबा ऐसी नीतियां बनाने में सक्षम होंगी जो राज्य के लिए लंबे अरसे तक कारगर साबित होंगी. ''—साथ में अश्विनी कुमार

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