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उत्तराखंडः ऐसे खिलाएंगे कमल?

एकजुट होकर विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाने की बजाए नेता प्रतिपक्ष के मुद्दे पर बीजेपी में तेज हुआ आंतरिक घमासान. विपक्ष के नेता को चुनने को लेकर दो फाड़ हुई पार्टी.

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उत्तराखंड में 2017 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं. इस बार राज्य में कमल खिलाने का ख्वाब संजोए बीजेपी का नारा हैः 'हम सबके, सब हमारे'. इस नारे के सहारे पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करने का मंसूबा बना रही है. पिछले दिनों रामनगर में हुई पार्टी की कोर ग्रुप की मंथन बैठक में यह तय हुआ, जिसे पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी हरी झंडी दिखा दी. इस बैठक में पार्टी के सभी महत्वपूर्ण प्रदेश पदाधिकारियों समेत 29 विधायक शामिल थे.

हालांकि बैठक के बाद भी पार्टी नेता प्रतिपक्ष का नाम तय नहीं कर सकी. इस पद को फिलहाल नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट के पास ही रखना पड़ा है. बात सिर्फ नेता प्रतिपक्ष का पद खाली होने की नहीं है, जिसे लेकर पार्टी के अंदर अंदरूनी राजनीति और उथल-पुथल का माहौल है. अगले चुनावों में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त दिखने की कोशिश कर रही पार्टी के पास बुनियादी रणनीति की कोई रूपरेखा तैयार नहीं है. फिलहाल सारी कोशिश सिर्फ अंदरूनी विवाद पर परदा डालने की है.

हुआ यह कि रामनगर बैठक के बाद नेता प्रतिपक्ष का मुद्दा पार्टी के भीतर और बाहर गरमा गया. अंदरूनी सूत्रों की मानें तो पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने हरिद्वार के विधायक मदन कौशिक को नेता प्रतिपक्ष बनाने का निर्देश दिया था, लेकिन पार्टी विधायक इस पर एकमत नहीं हो पाए. आपसी घमासान उस वक्त खुलकर सामने आ गया, जब हरिद्वार जिले के दो विधायक आदेश चौहान और यतीश्वरानंद इसके विरोध में खड़े हो गए. चौहान का कहना था कि विधायकों की रायशुमारी से ही चयन होना चाहिए.

हालांकि इस विवाद के चलते प्रदेश नेतृत्व को केंद्र की नाराजगी झेलनी पड़ रही है. अब राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने स्वयं देहरादून में पार्टी की प्रांतीय कार्य परिषद में आने की सहमति दी है. ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही है कि नए नेता प्रतिपक्ष के नाम की घोषणा केंद्र से ही हो सकती है.

दरअसल, नेता प्रतिपक्ष के नाम पर विधायक ही नहीं, बल्कि सांसदों में आपसी टकराव है. हरिद्वार के सांसद रमेश पोखरियाल निशंक भी इसमें शामिल हैं. मदन कौशिक का नाम आते ही निवर्तमान अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत और पूर्व अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल का नाम भी आगे कर दिया गया. यहां तक कि देहरादून जिले के विधायक और विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हरबंश कपूर का नाम भी आने लगा और मामला पूरी तरह विवादों में घिर गया.

इस विवाद से पार्टी को किसी तरह के राजनैतिक नुक्सान से बचाने के लिए प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट कहते हैं, ''दरअसल, नेता प्रतिपक्ष का चुनाव इस बैठक के एजेंडे में ही नहीं था. इसलिए इस मुद्दे पर चर्चा करने का सवाल ही नहीं उठता.'' लेकिन असल बात तो कुछ और ही है. उनकी दुविधा यह थी कि मदन कौशिक के नाम पर हरिद्वार के बीजेपी विधायक एकमत ही नहीं हो पाए. मजे की बात तो यह है कि इस मुद्दे को प्रदेश नेतृत्व ने केंद्रीय नेतृत्व के सिर पर डाल इस विवाद की आग में पानी डालने की कोशिश की है.

इस विवाद को शांत करने की मंशा से भट्ट सफाई देते हुए कहते हैं, ''यह बैठक आगामी विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी की रणनीति बनाने को लेकर रखी गई थी. रणनीति तैयार कर केंद्र से उसकी स्वीकृति भी ले ली गई है.'' वे बताते हैं कि हमने राज्य की वर्तमान सरकार को उसके ही कारनामों पर घेरने की रणनीति बनाई है. सरकार को नैनीसार जमीन आवंटन, नारी निकेतन, शराब नीति, खनन और भ्रष्टाचार के मामले में घेरने के लिए 14 मार्च से प्रदेश में आंदोलन शुरू किया जाएगा.

प्रदेश बीजेपी के केंद्रीय प्रभारी श्याम जाजू भी अगले चुनावों में कमल खिलाने को लेकर बिल्कुल मुतमुइन हैं. वे कहते हैं, ''पिछले दिनों पार्टी आयोजित जनचेतना रैलियों में जिस उत्साह के साथ लोगों का समर्थन मिला है, उससे साफ है कि लोग बदलाव चाहते हैं और बीजेपी को लाने का मन बना चुके हैं.'' लेकिन अपनी जीत को लेकर इस कदर आश्वस्त पार्टी को अभी तक यह भी पता नहीं है कि प्रदेश में मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी कौन होगा. कांग्रेस के नेता और मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार सुरेंद्र कुमार कहते हैं, ''बीजेपी के भीतर गुटबाजी इतनी बढ़ चुकी है कि वह अपनी खामियों से ध्यान भटकाने के लिए कांग्रेस पर कुछ भी आरोप लगाती फिरती है. लेकिन उस पर कोई कान देने वाला नहीं है.''

नेता आपस में चाहे जितना सिर फोड़ लें, लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि चुनाव इस तरह नहीं जीते जाते. सचमुच कमल खिलाने के लिए पार्टी को झगड़े भुलाकर जमीनी स्तर पर काम करना होगा.

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