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खास रपटः भारत की एटमी शार्क

भारत की पनडुब्बी ताकत को पैना करने में काफी लंबा वक्त लग गया और एक बहुप्रतीक्षित परियोजना को अब जाकर कैबिनेट की सुरक्षा समिति की मंजूरी मिलने वाली है. एटमी क्षमता वाली हमलावर पनडुब्बी परियोजना में इतनी देरी क्यों हुई

पनडुब्बी पनडुब्बी

भारत के नौसेना प्रमुख एडमिरल करमबीर सिंह ने इस साल 4 मार्च को गुजरात के केवडिय़ा में हुए कमांडरों के संयुक्त सम्मेलन में एक पावरपॉइंट प्रजेटेंशन दिया, जिसे बनाने में कुछ महीने लगे थे. 96,000 करोड़ रुपए की लागत से एटमी शक्तिसंपन्न छह हमलावर पनडुब्बियां (एसएसएन) देश में ही बनाने का प्रस्ताव करीब 18 महीनों से मंत्रिमंडल की सुरक्षा समिति (सीसीएस) के पास अटका था, क्योंकि सरकारी अफसरों ने आर्थिक संकट के दौरान इन पनडुब्बियों की जरूरत पर सवाल उठा दिए थे. नौसेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री पर जोर डाला और बताया कि समुद्र के भीतर भारत की लड़ाकू शक्ति का संकट दूर करने के लिए एसएसएन का जल्द निर्माण कितना जरूरी है. करीब 6,000 टन की हरेक पनडुब्बी पर 16,000 करोड़ रुपए खर्च आएगा. 1980 के दशक में हासिल भारत की पारंपरिक पनडुब्बियों के बेड़े का बड़ा हिस्सा 30 साल का सेवा काल खत्म करने के करीब है. उनकी एवजी पनडुब्बियों को अफसरशाही लेट-लतीफी की मार झेलनी पड़ी है.

समुद्र में शक्ति घट रही है जब भारत के मुख्य शत्रु चीन ने शीत युद्ध के बाद सबसे बड़े नौसैन्य विस्तार का बीड़ा उठाया है. पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की नौसेना जंगी जहाजों के लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना है और अगले दशक में इसका बढ़ना जारी रहेगा. वह न सिर्फ नए विमानवाहक पोत, एटमी पनडुब्बियां और सतहपोत जोड़ेगी, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में सुदूर तैनातियों से अपनी पहुंच का भी विस्तार करेगी.

एडमिरल करमबीर सिंह की आवाज काम कर गई. दो दशकों से रुकी हुई परियोजना के मामले में सीसीएस का शुरुआती गोली दागना अब तय है. सीसीएस की मंजूरी से सरकारी धन मिल जाएगा जिससे भौगोलिक तौर पर बिखरी और टेक्नोलॉजी के लिहाज से चुनौतियों से भरी यह परियोजना शुरू हो सकेगी. परियोजना में गुरुग्राम में डिजाइन को अंतिम मंजूरी मिलना, कलपक्कम में एटमी रिएक्टर का निर्माण, हजीरा में ढांचा बनाना और पुर्जे जोड़ना तथा विशाखापत्तनम के पोत निर्माण केंद्र (एसबीसी) पर समुद्री परीक्षण शामिल हैं. पहली 6,000 टन की पनडुब्बी को पानी में उतारने में अभी एक दशक से ज्यादा लगेगा. माना जा रहा है कि एसएसएन परियोजना के लिए दूसरे स्वदेशी विमानवाहक पोत 65,000 टन वजनी आइएसी-2 के निर्माण की महत्वाकांक्षी नौसैन्य परियोजना को अब तिलाजंलि दे दी गई है.

एसएसएन परियोजना भारत की एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल (एटीवी) की छाया में दब गई. एटीवी एटमी शक्ति संपन्न चार लड़ाकू मिसाइल पनडुब्बियों (एसएसबीएन) के निर्माण की टॉप सीक्रेट परियोजना है. आइएनएस अरिहंत 2016 में कमीशन किया गया और दूसरी इकाई एस3 इस साल कमीशन की जाएगी. दो और इकाइयां एस4 और एस4* 2025 में नौसेना में शामिल होंगी.

एसएसबीएन और एसएसएन दोनों एटमी विखंडन रिएक्टरों का इस्तेमाल करते हैं ताकि संचालक दस्ते को चलाने के लिए जरूरी भाप उत्पन्न करने की खातिर भारी ताप पैदा कर सकें. एसएसबीएन सामरिक बमवर्षकों की तरह हैं, जो भयरोधक औजार के तौर पर अपनी नोक पर एटमी हथियार से लैस और दागी जाने को तैयार मिसाइलों के साथ समुद्र में चुपचाप मंडराते रहते हैं. एसएसएन समुद्र के भीतर वही हैं जो आसमान में लड़ाकू विमान हैं. डीजल-बिजली की पारंपरिक पनडुब्बियां असलियत में पानी में बस डूबी ही होती हैं. उन्हें अपने डीजल इंजनों को चलाने और अपनी बैटरियों को रिचार्ज करने की खातिर नली के सहारे हवा खींचने के लिए पानी की सतह पर गोता लगाना होता है और इसी वक्त वे पता लगाए जाने के लिहाज से सबसे ज्यादा असुरक्षित होती हैं. एसएसएन असल पनडुब्बियां हैं, इस लिहाज से कि वे लगभग अनिश्चित वक्त तक पानी के नीचे रहकर काम कर सकती हैं. उनकी यह क्षमता केवल क्रू के खाने की आपूर्ति से ही सीमित होती है. वे टारपीडो, ऐंटी-शिप क्रूज मिसाइलों और लैंड-अटैक क्रूज मिसाइलों जैसे विभिन्न सामरिक हथियारों से भी लैस होती हैं.

भारतीय नौसेना हिंद महासागर के अपने प्रभाव क्षेत्र में गश्त के लिए 1990 के दशक से ही कम से कम छह एसएसएन की जरूरत बताती आ रही है. फिलहाल उसके पास बस एक है—चक्र-2—जो 2012 में रूस से 10 साल की लीज पर ली गई है. चक्र-2 को समझौते की अवधि पूरी होने के साथ कुछ महीनों बाद लौटा दिया जाएगा. इसके कम से कम छह साल बाद इसकी उत्तराधिकारी, चक्र-3, नौसेना में शामिल होगी. इस पूर्व रूसी नौसैन्य एटमी शक्तिसंपन्न पनडुब्बी को मार्च 2019 में हुए 3 अरब डॉलर (21,000 करोड़ रुपए) के करार के तहत रूसी शिपयार्ड में भारतीय जरूरतों के मुताबिक ढाला जा रहा है.

चक्र-3 के आने से पहले नौसेना की समुद्रगत क्षमताओं में चार साल का अंतराल आ जाएगा. मगर यह बहुत बुरा खालीपन नहीं होगा. नौसेना उस 'गंवाए जा चुके दशक' को ताक रही है जिसमें 2020 के पूरे दशक में महज तीन पारंपरिक पनडुब्बियां हासिल करेगी, जबकि जरूरत उसे ऐसे कम से कम दर्जन भर जहाजों की है. नौसेना ने 1997 की पनडुब्बी निर्माण की अपनी 30 वर्षीय योजना में जो 24 पनडुब्बियों का अनुमान रखा था, उनमें से केवल छह हासिल की जा सकेंगी. स्वदेश निर्मित छह बड़ी पारंपरिक पनडुब्बियों के लिए 45,000 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट 75आइ 15 साल से अटका है. ये पनडुब्बियां इंडोनेशियाई द्वीपों की समुद्री चौकियों के नजदीक काम कर सकती हैं. नौसेना की 15 पारंपरिक पनडुब्बियों के बेड़े का बड़ा हिस्सा 30 साल से ज्यादा पुराना हो चुका है. इनमें से कुछ इनी-गिनी पनडुब्बियों का सेवा काल बढ़ाने के लिए उन्हें रूसी शिपयार्ड में अच्छा-खासा चुस्त-दुरुस्त किया गया है. अगले दशक में स्वदेशी एसएसएन का बेड़ा मिलना शुरू हो जाएगा, लेकिन वह मौजूदा संकट को हल करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाएगा.

 

कल-पुर्जों से बनी एकता
कल-पुर्जों से बनी एकता

भारत की रुक-रुककर चलती एसएसएन खोज

लड़ाकू विमानों की जगह पनडुब्बियों पर मोदी सरकार के विचार करने में लेफ्टिनेंट जनरल डी.बी. शेकतकर के नेतृत्व वाली समिति की बड़ी भूमिका है. दिसंबर, 2016 में जब समिति ने रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर को अपनी रिपोर्ट सौंपी तो उसने तीसरे लड़ाकू विमान के प्रस्ताव को किनारे करते हुए और पनडुब्बियों को खरीदने की सिफारिश की. पर्रीकर ने भी खुलकर कहा था कि चीनी बेड़े का जवाब भारत केवल पनडुब्बियों को तैनात करके ही दे सकता है.

पर्रीकर शायद अमेरिकी खुफिया आकलनों की बार-बार दी गई चेतावनियां जानते थे. पीएलए नौसेना तेजी से बढ़ रही थी, लेकिन साथ ही उसकी दुखती रग यानी पनडुब्बी-विरोधी युद्ध क्षमताओं का अभाव भी बढ़ रहा था. इस कमजोरी का सबसे अच्छा फायदा एटमी शक्तिसंपन्न हमलावर पनडुब्बियों ने उठाया, जिन्हें एटमी रणनीतिकार रियर एडमिरल राजा मेनन (सेवानिवृत्त) ने ''समुद्री ताकत का निर्णायक पंच'' कहा था. एसएसएन समुद्र के भीतर 30 समुद्री मील प्रति घंटा (55 किलोमीटर प्रति घंटा) से ज्यादा रफ्तार से चलती है, जो नौसेना के सबसे ताकतवर सतह लड़ाकू  पोत, दिल्ली-वर्ग के विध्वंसक पोत की शीर्ष रफ्तार है. समुद्र के नीचे बहुत तेजी से चलते हुए यह शत्रु युद्धपोतों का पीछा करके उन पर हमला बोल सकती है और भारी-भरकम मारक तारपीडो और लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों के अपने असलहे से निशानों को किनारे कर सकती है. उनकी मारकता और तकरीबन अभेद्यता से प्रेरित होकर यह लोकप्रिय मीम रचा गया है—'समुद्र में बस दो किस्म के पोत हैं, पनडुब्बियां और निशाने.' पनडुब्बी के ढांचे में बेहद क्षमतावान छोटा और सघन रिएक्टर फिट करने की प्रौद्योगिकीय जटिलता ने इस क्षमता को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों तक सीमित कर दिया है.

फिर आश्चर्य क्या कि खेल को बदल देने वाली इनकी उपयोगिता ने विशाल सत्ता स्वप्नों में डूबे सियासतदानों का ध्यान खींचा है. यहां तक कि उनका भी जिन्हें जमीन के पूर्वग्रहों से ग्रस्त माना जाता है. कभी गुरिल्ला बनकर पहाड़ी गुफाओं से काम कर चुके माओ जेदांग ने 1959 में कहा था कि भले ही '10,000 साल' लगें लेकिन चीन एटमी पनडुब्बियां बनाएगा. पहली चीनी एसएसएन 1974 में सेवा में शामिल हुई और इसका नाम चेयरमैन की जिंदगी की निश्चित घटना के आधार पर 'लॉन्ग मार्च-1' रखा गया. यह बहुत शोर और रेडियोधर्मिता पैदा करती थी, पर चीन ने कुलीन क्लब के आखिरी सदस्य के तौर पर इस पर जोर दिया.

यह घटना भारतीय योजनाकारों की नजरों से छिप नहीं पाई, जो अपने अप्रत्याशित उत्तरी पड़ोसी की तरफ से लहराए जा रहे एटमी हथियारों की आशंका से परेशान थे, खासकर जब उसके साथ वे 1962 में सरहद पर युद्ध लड़ चुके थे. 1974-79 में भारतीय प्रतिरक्षा योजना का मसौदा तैयार करने वाले कूटनीतिज्ञ डी.पी. धर की अध्यक्षता में सरकार की एपेक्स कमेटी-1 ने लिखा कि ''चीनी नौसेना की हमारे खिलाफ इस्तेमाल की जा सकने वाली एकमात्र ताकत उसकी पनडुब्बियों की ताकत है.'' मगर तब तक भारतीय सत्ता एसएसबीएन पर अपनी नजरें गड़ा चुकी थी. 1968 में तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रमुख सचिव पी.एन. हक्सर चीन के खिलाफ भयरोधक के तौर पर ''एटमी मिसाइलें ले जाने के लिए सुसज्जित एटमी शक्ति से संचालित पनडुब्बियों'' की जरूरत की रूपरेखा पेश कर चुके थे. एटीवी प्रोजेक्ट ने आधी सदी बाद 2018 में कहीं जाकर ठीक-ठाक समुद्रजन्य एटमी भयरोधक का निर्माण किया, जब आइएनएस अरिहंत पहली भयरोधक गश्त पर निकला.

सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि एसएसएन बेड़ा भारत की समुद्री ताकत में कई फायदे और बढ़त ले आएगा. वहीं, पूर्व परियोजना अफसरों का कहना है कि एसएसएन की योजना दो दशकों से ज्यादा वक्त से मुख्य रूप से इसकी बेहद ऊंची लागत की वजह से धीमे-धीमे आगे बढ़ी है. सामरिक एटीवी एसएसबीएन की लागत केंद्र सरकार ने अलग बजटीय मदों से चुकाई है, लेकिन इसके उलट एसएसएन का खर्च नौसेना उठाएगी. रक्षा बजट का सबसे छोटा हिस्सा—महज 14 फीसद—नौसेना के हिस्से में आता है, लिहाजा उसे नए युद्धपोत, विमान और पनडुब्बियां खरीदने के अपने खर्चों में तर्कसंगत तालमेल बिठाना होगा.

बजट की चिंताएं और विमानवाहक पोतों के प्रति नौसेना अफसरों का पूर्वग्रह बताता है कि प्रोजेक्ट 76 को शुरू होने में इतनी जद्दोजहद क्यों करनी पड़ी, जबकि सरकार की सैद्धांतिक मंजूरी उसे 1998 में ही मिल चुकी थी. 2006 में तब प्रधानमंत्री के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार आर. चिदंबरम की अध्यक्षता में एक समिति ने उस टेक्नोलॉजी की पहचान की थी जिसकी एटमी पनडुब्बियों की नई पीढ़ी के विकास के लिए जरूरत थी—करीब 13,500 टन वजन की पांच नई 'एस-5' एसएसबीएन. दोनों डिजाइन स्वदेश में ही बने नए एटमी रिएक्टर से ताकत हासिल करते, जिनका डिजाइन बीएआरसी या बार्क (भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र) ने तैयार किया था.

अव्वल कार्य प्रदर्शन करने वाला यह रिएक्टर, जिसकी क्षमता लगभग 190 मेगावाट मानी जाती है, अरिहंत वर्ग के 84 मेगावाट के रिएक्टर में बहुत सुधार करके बनाया गया है. नौसेना मुख्यालय के 2007 के एक पेपर ने 15 साल में (2022 तक) मैदान में उतारे जाने के लिए पहली इकाई की छह एसएसएन की औपचारिक जरूरत बताई थी. यह परियोजना अलबत्ता ठंडे बस्ते में पड़ी है, क्योंकि नौसेना की प्राथमिकता में पनडुब्बी के बजाए विमानवाहक पोत और सतह पोत रहे.

इस बीच पीएलए नौसेना से पनडुब्बी का खतरा असलियत बन चुका है. दिसंबर 2013 में चीनी शैंग वर्ग की एसएसएन की पहली सुदूर गश्त से नौसैन्य योजनाकारों को सुध आई कि पीएलए नौसेना उसके पिछवाड़े में कार्यरत है. यह एक कारक था जिसकी वजह से सरकार ने एसएसएन के डिजाइन अध्ययन के लिए फरवरी 2015 में ताबड़तोड़ सैद्धांतिक मंजूरी दी. दिसंबर 2016 में तब नौसैन्य प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा ने, जो इस परियोजना की बात स्वीकार करने वाले पहले सरकारी अफसर थे, नपे-तुले शब्दों में कहा, ''यह शुरू हो गई है. यह गोपनीय परियोजना है. प्रक्रिया चल पड़ी है.'' प्रोजेक्ट 75 पांच साल बाद भी डिजाइन के चरण में है. समझा जाता है कि नौसेना के पनडुब्बी डिजाइन ग्रुप (एसडीजी) को इसके डिजाइन को अभी अंतिम रूप देना है. इसमें अभी कम से कम दो साल और लगेंगे और तभी पनडुब्बी का ढांचा गढ़ने का काम शुरू हो सकेगा.

अमेरिकी नौसैन्य खुफिया दफ्तर का 2020 का एक आकलन अनुमान जाहिर करता है कि चीन की पनडुब्बी ताकत बढ़कर 2030 में 76 नावों (8 एसएसबीएन, 13 एसएसएन और 55 एसएस) की हो जाएगी. भारत की देरी बजट और नौकरशाही से संबंधित है.

दिसंबर 2020 में इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने कहा था, ''कुछ भी जो सतह पर, यहां तक कि जमीन पर भी, और समुद्र पर चलता हो, चुना जाएगा.'' उन्होंने कहा था, ''आज हमें जमीन पर या समुद्र में कुछ भी मार गिराने की काफी कुछ सटीक प्रणालियां मिल गई हैं. इसलिए विमानवाहक पोत असुरक्षित होने जा रहे हैं. कोई कह सकता है कि वे चलते रहते हैं, पर चलते तो वे (शत्रु) भी रहते हैं...इसमें ताड़ते रहने की क्षमता है और ये इस आधार पर निशाना लगाते हैं कि अगले पल आप कहां होंगे.'' स्वदेशी एसएसएन को अब टेक्नोलॉजी की चुनौतियों से उबरना होगा. इससे पहले कि पनडुब्बी का डिजाइन तय करके इसके निर्माण का काम शुरू किया जा सके, एटमी वैज्ञानिकों को एक नया ताकतवर प्रेशराइज्ड जल रिएक्टर तैयार करना होगा. यह लंबी और कष्टदायक प्रक्रिया है, लेकिन उम्मीद है कि पहला कदम उठा लिया गया है.

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