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देश का नया चमड़ा केंद्र

सस्ती जमीन और सस्ता श्रम, खास इलाका, सरकारी रियायतें और परेशानियों से मुक्त माहौल के साथ कोलकाता अब कानपुर के चर्मशोधन कारखानों के मालिकों को लुभा रहा.

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धूप से बदला रंग: केएलसी में खुले में चमड़ा सुखाने का काम धूप से बदला रंग: केएलसी में खुले में चमड़ा सुखाने का काम

कुछ साल से देश की चमड़ा राजधानी गंगा किनारे कुछ और दूर कानपुर से कोलकाता की ओर बढ़ चली है. कभी देश के चमड़ा उद्योग का केंद्र कहा जाने वाला उत्तर प्रदेश का शहर अब वह ख्याति खोता जा रहा है क्योंकि कथित गोरक्षक दलों के चलते मवेशियों की ढुलाई वगैरह मुश्किल हो गई है. इससे चमड़ा उद्योग को जबरदस्त झटका लगा है.

इसलिए जब काउंसिल ऑफ लेदर एक्सपोर्ट के क्षेत्रीय चेयरमैन और कानपुर स्थित नाज एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड के मालिक जावेद इकबाल नाज सितंबर 2018 में मिलान हवाई अड्डे पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से थोड़ी देर के लिए मिले, तो उन्हें थोड़ा ही यकीन था कि अपने चमड़े की इकाई का विस्तार करने के लिए पश्चिम बंगाल में जमीन मिल पाएगी. ममता बनर्जी इटली और जर्मनी यात्रा के दौरान वहां कुछ देर के लिए रुकी थीं.

लेकिन कुछ महीनों बाद फरवरी 2019 में बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट के दौरान ममता ने शहर के पूर्वी किनारे पर बनतला में 1,100 एकड़ में फैले कोलकाता लेदर कॉम्प्लेक्स (केएलसी) में जमीन के आवेदन के लिए अधिसूचना जारी की और उसे 'दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा चमड़ा उद्योग परिसर’ बताया.

लगता है, बंगाल न सिर्फ जमीन की उपलब्धता, बल्कि कीमत और सरकारी सुविधाओं के मामले में भी आदर्श है. कानपुर के कारोबारियों के लिए हैरानी कि बंगाल में जमीन सस्ती थी. नाज बताते हैं, ''जाजमऊ में जमीन की कीमत 30,000-40,000 रुपए प्रति वर्ग मीटर थी और उन्नाव में 10,000-15,000 रुपए प्रति वर्ग मीटर.

वहीं केएलसी में केवल 2,800 रुपए प्रति वर्ग मीटर.’’ यही नहीं, कानपुर, जाजमऊ और उन्नाव के चमड़ा क्लस्टर की क्षमता पूरी तरह भर चुकी है. सीईटीपी (कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट)—चर्मशोधन कारखानों से निकलने वाले बेहद खतरनाक रासायनिक अपशिष्टों के उपचार के लिए बेहद जरूरी—अपनी अधिकतम क्षमता के स्तर पर कार्य कर रहे हैं. 

सबसे बढ़कर तो यह कि कथित गोरक्षकों के हमलों और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से 2017 में कई बूचड़खानों को बंद करने से चमड़ा उद्योग के लिए कारोबार का माहौल नहीं बचा रह गया था. गोहत्या के विवाद के बाद कानपुर के उपनगर जाजमऊ स्थित देश के सबसे बड़ा चमड़ा केंद्र की 400 में से 150 चर्मशोधन कारखानों को मजबूरन बंद करना पड़ा था.

फिर, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गंगा में अपशिष्ट पदार्थों के जाने से रोकने के लिए जनवरी 2019 में कुंभ मेला से पहले तीन महीने के लिए चर्मशोधन कारखानों को बंद करने का आदेश दिया था. सैकड़ों चर्मशोधन कारखाने बंद हो गए थे और विदेशी सौदे रद्द हो गए थे.

चर्मशोधन कारखानों के मालिकों को कच्चे माल के लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश का रुख करना पड़ा, इसलिए कारखाना मालिक कोलकाता की ओर बढऩे या नई इकाइयां शुरू करने की सोचने लगे. वजह?  एयरपोर्ट और बंदरगाह वाला महानगर होने के अलावा, केएलसी में जमीन की आकर्षक दरें और सरकारी रियायतों के साथ ही सस्ता श्रम.  

नाज बताते हैं, ''कई सौ चर्मशोधन कारखानों के मालिक जमीन मांग रहे थे. लेकिन दीदी ने उन्हीं को चुना जो चमड़ा उद्योग को लेकर गंभीर थे, न कि अन्य मकसदों के लिए जमीन का इस्तेमाल करना चाहते थे.’’

वाकई, राज्य सरकार बुनियादी ढांचे को बढ़ाकर, एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट को उन्नत करके और अनुकूल माहौल का वादा करके श्रम प्रधान चमड़ा उद्योग को बड़ा बढ़ावा देने को लेकर गंभीर थी. जल्द ही, कानपुर के कई चमड़ा कारोबारी केएलसी में नई इकाइयां बैठाने जा रहे हैं. 

हालांकि इस बीच सख्त लॉकडाउन और महामारी ने इस प्रक्रिया को भारी झटका दिया. अब तक 30 चमड़ा कारोबारियों को केएलसी में जगह आवंटित कर दी गई है और उनकी इकाइयों में निर्माण कार्य चल रहा है.

कानपुर के चमड़ा कारोबारी और चमड़ा उद्योग में अपनी चौथी इकाई स्थापित करने जा रहे मुख्तारुल अमीन कहते हैं, ''हमने कुछ महीने पहले ही जमीन हासिल की है...इसमें कोविड की और सीईटीपी प्लांट को उन्नत किए जाने के काम की वजह से देरी हुई. बिल्डिंग प्लान तैयार है. दो साल में उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है.’’

अमीन 15-20 करोड़ रुपए निवेश करने की योजना बना रहे हैं. अमीन की तरह ही, ऐसे करीब 20 चमड़ा कारखानों के मालिक, जिनकी इकाइयां यूपी में हैं, अब अपने कामकाज का विस्तार केएलसी में नई इकाई से करना चाहते हैं. कुल मिलाकर, उम्मीद है कि कानपुर के कारोबारी करीब 400 करोड़ रुपए का निवेश लाने जा रहे हैं.

अब केएलसी में चमड़ा निर्यात के कुछ बड़े दिग्गजों ने डेरा जमा लिया है और केएलसी का सालाना टर्नओवर 15,000 करोड़ रुपए और निर्यात 7,500 करोड़ रुपए का हो गया है. इस वजह से भी कानपुर और चेन्नै के निवेशकों के लिए यह आकर्षक जगह बन गया है. 

हालांकि केएलसी की कामयाबी आसान नहीं रही. इस सफर में करीब एक-चौथाई सदी लगी. इस पर एक नजर डालने से शायद यह बेहतर समझ में आएगा.  

कमजोर शुरुआत

सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में 538 पुराने चर्मशोधन कारखानों को कोलकाता से अपशिष्ट उपचार सुविधाओं के साथ स्थानांतरित करने का आदेश दिया. बनतला के पास कॉम्प्लेक्स की कल्पना की गई. दिवंगत जगमोहन डालमिया (बीसीसीआइ के पूर्व अध्यक्ष) के स्वामित्व वाली एम.एल. डालमिया ऐंड कंपनी लिमिटेड ने 1997 में उसकी बोली जीती थी.

डालमिया को 1,100 एकड़ जमीन लीज पर मिल गई. सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, उन्हें बीओटी (बिल्ड ऑपरेटर ट्रांसफर) के तौर पर 2002 तक स्थानांतरित इकाइयों के लिए जमीन को विकसित करना था. हालांकि डेवलपर निर्धारित समय सीमा से चूकता रहा. चर्मशोधन कारखानों के लिए अनिवार्य बुनियादी सीईटीपी की स्थापना का काम भी सरकार को करना था. सीईटीपी को 2004 में काम करने की अनुमति मिली और 2005 में पहले चर्मशोधन कारखाने का संचालन शुरू हुआ.

कलकत्ता लेदर कॉम्प्लेक्स टैनर्स एसोसिएशन के महासचिव इमरान अहमद खान ने वहां सन् 2000 में 7 करोड़ रुपए का निवेश किया था. वे 2013 में ऑस्ट्रेलिया से लौटे तो उन्हें झटका लगा. 200 एमएलडी (प्रति दिन दस लाख लीटर) का प्रबंध करने की क्षमता वाले सीईटीपी के चार मॉड्यूल के अलावा, वहां व्यावहारिक रूप से चमड़ा कारोबारियों के लिए कुछ नहीं था.  

एक चर्मशोधन कारखाने के मालिक कहते हैं, ''हम बस अपने निवेश की ईएमआइ भर रहे थे. उन दिनों कॉम्पलेक्स में स्ट्रीटलाइट और पीने के पानी की सुविधा नहीं थी. चर्मशोधन कारखानों से सीईटीपी तक हानिकारक अपशिष्टों को ले जाने वाली एचडीपीई पाइपलाइन भी नहीं थी.’’ ठोस कचरे के फेंके जाने की वजह से पास के गांवों के तालाबों में मछलियों के मारे जाने, खेतों में सब्जियों से सड़ने और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की शिकायतें सामने आईं.

बड़े स्तर पर खाली इस कॉम्प्लेक्स में जबरन वसूली की शिकायतें थीं—छह लाख लोग इन कारखानों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए थे और सरकार तथा डेवलपर्स से वाजिब शिकायतें थीं. 

लेकिन केएलसी की सबसे बड़ी दिक्कत कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट का पर्याप्त संख्या में नहीं होना था. ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले इस उद्योग के लिए वे बेहद अनिवार्य हैं. नतीजतन, सीईटीपी में अपशिष्ट जल के निस्तारण की क्षमता के बिना चर्मशोधक कारखानों को संचालित करने की तीखी आलोचना हुई. 30 एमएलडी अपशिष्ट के निस्तारण की क्षमता वाले प्रस्तावित छह सीईटीपी के बजाए कॉम्प्लेक्स में 20 एममएलडी निस्तारण की क्षमता वाले केवल चार सीईटीपी ही थे.
  
2010-2011 में अपने पहले पर्यावरण ऑडिट में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने सख्त शब्दों में सरकार की आलोचना की. केएलसी को लेकर नकारात्मकता बढ़ी, और रोजगार तथा निवेश आकर्षित करने की जरूरत से सरकार कदम उठाने पर मजबूर हुई. 2015 में इसमें बदलाव आना शुरू हुआ. 

धीरे-धीरे, बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ. चमड़े की धुलाई के लिए प्रति दिन 90,000 लीटर पानी की क्षमता वाले तीन पंपिंग स्टेशन स्थापित किए गए. वेस्ट बंगाल वेस्ट मैनेजमेंट लिमिटेड ने कोलकाता से 120 किलोमीटर दक्षिण में एक बंदरगाह शहर हल्दिया में हर महीने 100 टन कचरे के परिवहन के लिए सहमत होने के साथ-साथ खतरनाक ठोस कचरे के निपटान पर भी ध्यान दिया.

लेकिन सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब मार्च 2022 में 20 एमएलडी के अतिरिक्त अपशिष्ट उपचार करने की क्षमता वाले सीईटीपी के चार और मॉड्यूल का काम शुरू हुआ. उनके उद्घाटन पर ममता ने कहा, ''आठ सीईटीपी के साथ, यह  दुनिया का एकमात्र लेदर कॉम्प्लेक्स है. केएलसी 80,000 करोड़ रुपए के निवेश को आकर्षित करेगा और पांच लाख लोगों को रोजगार देगा.’’

अब, अपनी 40 एमएलडी क्षमता के साथ केएलसी 187 नए चर्मशोधन कारखानों के लिए अपने दरवाजे खोल सकता है, जिन्होंने पहले ही 2018 में जमीन खरीद ली है और अपशिष्ट उपचार की पर्याप्त क्षमता नहीं होने के कारण वहां स्थानांतरित होने में असमर्थ थे. इन चमड़ा कारोबारियों में से 30 कानपुर और चेनै से हैं और मुख्तारुल अमीन उनमें शामिल हैं.

अब केएलसी विकास की ओर बढ़ रहा है. बायो-गैस संयंत्र में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चमड़े की गाद, मांस और कचरे का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए किया जा रहा है. स्विच-एशिया के साथ-साथ, केएलसी 60 टन भार-धारण क्षमता वाली टाइलें बनाने के लिए चर्बी निकाल रहा है. चमड़े के बोर्ड, पेवर टाइल्स और सैंडल जैसे उप-उत्पादों के निर्माण की खातिर गाद और चमड़े के कचरे को एकत्र करने के लिए 51 एकड़ में फैला एक सुरक्षित भूमि भराव क्षेत्र तैयार किया जा रहा है.

चमड़ा उद्योग के बड़े नाम

कानपुर के चर्मशोधन कारखानों के मालिक एक बार अपनी उत्पादन इकाई स्थापित करने लेने के बाद कोलकाता लेदर कॉम्पलेक्स में स्थित अग्रणी निर्माण इकाइयों से आसानी से लाभन्वित हो सकते हैं. 100 करोड़ रुपए का सालाना टर्नओवर वाला विनीत ग्लोब्स एक शीर्ष निर्यातक है और वह अपनी दूसरी इकाई स्थापित करने की सोच रहा है. न्यू होराइजन, ट्रायो ट्रेंड्स, कोम्पानेरो और एएसजी लेदर, सभी लग्जरी ब्रान्ड हैं. 

बड़ी इकाइयां मजदूरों को मासिक 15,000-18,000 रुपए वेतन देती हैं. यह भी उत्तर प्रदेश के चर्मशोधन कारखाना मालिकों के लिए आकर्षक है. अनियत मजदूरों की मजदूरी भी यहां काफी कम है. 

पांच-छह लाख लोगों के लिए रोजगार का वादा भी साकार होता दिख रहा है. इमरान अहमद खान के मुताबिक, इस उद्योग में निवेश किए गए प्रत्येक एक करोड़ रुपए पर कम से कम 15 नौकरियां पैदा होती हैं. वे कहते हैं, ''यह केंद्र सरकार का आंकड़ा है, इसलिए, अगर 187 नई चर्मशोधन इकाइयां 4,000 करोड़ रुपए का निवेश कर रही हैं, तो अनुमान के मुताबिक, एक लाख प्रत्यक्ष रोजगार पैदा करना बहुत मुश्किल नहीं होगा.’’

आंकड़ा शानदार है. उत्तर प्रदेश के चमड़ा बेल्ट के बड़े खिलाड़ी—सुपर हाउस, पैसिफिक, नाज और कानपुर से अन्य 15—ने कोलकाता के चमड़ा केंद्र में भी चमक ला दी है. उन्होंने ममता बनर्जी से 5,000 करोड़ रुपए के निवेश का वादा किया है. 

गोरक्षकों के उत्पात, 2017 में बूचड़खानों और 2019 में टैनरियों की बंदी से उत्तर प्रदेश के चमड़ा कारोबारी नए ठिकाने तलाशने लगे. कोलकाता सुविधाओं के लिहाज से मुफीद लगा

चमड़े का उम्दा ठिकाना

कोलकाता लेदर कॉम्प्लेक्स का सालाना टर्नओवर 15,000 करोड़ रु.; निर्यात 7,500 करोड़ रु.

केएलसी में 8 सीईटीपी रोजाना 40 एमएलडी पानी का निस्तारण कर सकते हैं

वहां लाखों नौकरियां पैदा करनी की क्षमता है 

उत्तर प्रदेश के 20 चर्मशोधन कारखाना मालिक यहां 400 करोड़ रुपए का निवेश लाने वाले हैं

यूपी के चमड़ा उद्योग के शीर्ष नाम, जैसे सुपर हाउस, पैसिफिक, नाज की योजना कोलकाता में इकाइयां स्थापित करने की है

कोलकाता का एयरपोर्ट और बंदरगाह की सुविधाएं उनके लिए बड़ा आकर्षण हैं.

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