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प्रतिरक्षाः असलहों का जंजाल

मनमाने वैश्विक हथियार निर्माताओं पर निर्भरता से भारतीय सेना को परेशानी हो रही. त्रुटिपूर्ण हथियार उत्पादन और खरीद नीति इसकी वजह

मोर्चे पर  अखनूर में नियंत्रण रेखा के पास तैनात भारतीय सुरक्षा बल मोर्चे पर  अखनूर में नियंत्रण रेखा के पास तैनात भारतीय सुरक्षा बल

सन् 2020 में जब भारत का विशेष सैन्य बल लद्दाख में चीन के भारी फौजी जमावड़े के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की योजना बना रहा था, उसी की एक यूनिट को हथियारों की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा था. छोटे हथियार बनाने वाली बेल्जियम की कंपनी एफएन हसर्टेल (एफएनएच) ने कैबिनेट सचिवालय के तहत काम करने वाले एक विशेष अर्धसैनिक बल, स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) को लगभग 1,500 छोटे हथियारों की आपूर्ति का अनुबंध तोड़ दिया.

भारत और बेल्जियम की कंपनी के बीच तीन साल के मोल-तोल के बाद करीब 70 करोड़ रुपए मूल्य की पी90 कार्बाइन और एससीएआर असॉल्ट राइफल्स के लिए 2019 में एक करार हुआ और साल भर के भीतर आपूर्ति के लिए सहमति बनी थी. 

अगस्त के अंत में एसएफएफ को उन्हें मिलने वाले हथियारों के बगैर ही लद्दाख में पैंगोंग झील के दक्षिणी तट पर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के खिलाफ एक महत्वपूर्ण अभियान पर जाना पड़ा. एफएनएच के प्रवक्ता ने गोपनीयता का हवाला देकर इस विफल अनुबंध पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

असलहो का जंजाल
असलहो का जंजाल

इस घटना से चीन और पाकिस्तान दोनों देशों के साथ तनाव की स्थिति में आयातित छोटे हथियारों पर भारत की बुरी तरह निर्भरता और उसके कारण पैदा होने वाली परेशानियों की थाह लगाई जा सकती है. इस बात का पूरा अंदेशा बना रहता है कि विदेशी हथियार फर्म मनमाने तरीके से कोई आड़ी-टेढ़ी वजह निकालते हुए करार को ऐसे समय भी तोड़ सकते हैं, जब आयातक देश की राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई खतरा मंडरा रहा हो. यह तथ्य आयात को और पेचीदा बनाता है. करार रद्द करने का कारण आपूर्तिकर्ता देश की ओर से हथियार आपूर्ति की मंजूरी देने से इनकार से लेकर खरीदार देशों के मानवाधिकारों से जुड़े अपने मुद्दे तक कुछ भी हो सकता है.

एफएनएच के करार तोडऩे की वजह तो पता नहीं है लेकिन इसे पिछले अगस्त में ऐसे ही एक उदाहरण के आलोक में देखने की जरूरत है जब कंपनी ने अपने सबसे बड़े ग्राहक सऊदी अरब को छोटे हथियारों की आपूर्ति रोक दी थी. अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में इस उद्योग के 95 करोड़ यूरो (लगभग 8,396 करोड़ रुपए) के कारोबार में अकेले सऊदी अरब ने 22.5 करोड़ यूरो (लगभग 1,988 करोड़ रुपए) की खरीदारी की थी. यमन में सऊदी सैन्य हस्तक्षेप पर एक मानवाधिकार समूह की शिकायत के कारण इस सौदे को रोका गया.

एक हथियार निर्माता अपने मूल देश की विदेश नीति की अनदेखी करेगा, इसकी संभावना नहीं रहती. मसलन एफएनएच को ही लें. बेल्जियम की यह कंपनी कोई छोटी-मोटी फर्म नहीं है. दुनिया के शीर्ष पांच छोटे हथियार निर्माताओं में शुमार इस कंपनी के हथियारों का उपयोग यूएस स्पेशल ऑपरेशंस कमान भी करती है. भारत के सरकारी स्वामित्व वाले आयुध कारखानों में इसके तीन प्रसिद्ध उत्पादों—पिस्टल, मीडियम मशीन गन और सेल्फ-लोडिंग राइफल—का निर्माण पिछले चार दशकों से हो रहा है.

हालांकि, एफएनएच ने भारतीय सशस्त्र बलों के लिए छोटे हथियारों की आपूर्ति को हाल के किसी भी सौदे में भाग नहीं लिया है. (पाकिस्तान सेना को नई असॉल्ट राइफल की आपूर्ति करने के लिए 2016 की बोली में फर्म ने भाग लिया था) इन संभावित बाधाओं के बावजूद, भारतीय सेना के पैरा स्पेशल फोर्सेज ने एफएनएच हथियारों को हासिल करने के लिए घुमावदार रास्ता—अमेरिका के ‘विदेशी सैन्य बिक्री’ का चुना. 

एक अन्य प्रमुख जर्मन हथियार निर्माता हेकलर ऐंड कोच भारतीय बाजार से दूर रहता है. इसकी एमपी5 सबमशीन गन्स एनएसजी (नेशनल सिक्योरिटी गार्ड) और मार्कोस (मरीन कमांडो) ने मुंबई में 26/11 के आतंकवादी हमलों के दौरान इस्तेमाल की थीं. निर्माता का कहना है कि जर्मन निर्यात कानून ‘जम्मू-कश्मीर की स्थिति’ के मद्देनजर भारत को हथियारों की आपूर्ति की अनुमति नहीं देते.

एचऐंडके प्रवक्ता का कहना है कि ''जर्मनी में छोटे हथियारों के निर्यात के लिए संघीय सरकार की मंजूरी लेनी होती है. कश्मीर की स्थिति को ध्यान में रखते हुए, जर्मन सरकार ने हमारी कंपनी को बार-बार संकेत दिए हैं कि भारतीय रक्षा मंत्रालय को हथियार प्रदान करने की मंजूरी नहीं दी जाएगी.’’

भारत सरकार की ओर से स्वदेशी लघु हथियार उद्योग को पर्याप्त बढ़ावा न देने के कारण विडंबनापूर्ण स्थिति पैदा हुई है—एक ऐसा देश जो मंगल पर अंतरिक्ष यान भेजने में सक्षम है लेकिन हर साल लाखों असॉल्ट राइफल, पिस्टल और सबमशीन गन का आयात करता है और छोटे हथियारों के दुनिया के सबसे बड़े आयातकों में से एक है. अकेले भारतीय सेना को अपनी थल सेना और स्पेशल फोर्सेज के आधुनिकीकरण के लिए 3,500 करोड़ रुपए से अधिक की राइफलें, कार्बाइन और लाइट मशीन गन (एलएमजी) आयात करने की जरूरत है.

सेना समझती है कि विदेशी निर्भरता उसकी सीमाओं पर तैनात बलों की सैन्य ऑपरेशन की तैयारियों को किस हद तक प्रभावित कर सकती है. 2019 के बालाकोट हवाई हमले के बाद पाकिस्तान के साथ तनाव के दौरान सेना को तत्काल एंटी मटेरियल राइफल्स के लिए पुर्जों और खराब हथियारों की जगह नए हथियारों की जरूरत थी.

हल्के बख्तरबंद वाहनों और बंकरों को नष्ट करने में सक्षम ये हथियार 1999 के करगिल युद्ध के बाद दक्षिण अफ्रीकी हथियार निर्माता डेनेल से खरीदे गए थे. 2005 में रक्षा मंत्रालय के डेनेल को ब्लैकलिस्ट करने के बाद उसके पुर्जों की आपूर्ति रुक गई. सेना के लिए यह बड़ा सदमा था जब उसे पता चला कि कंपनी दिवालिया हो गई थी और अब हथियारों की आपूर्ति करने में असमर्थ थी.

स्वदेशी रूप से हथियारों के उत्पादन से क्या फायदा मिल सकता है, यह सर्वविदित है. 1971 के बांग्लादेश युद्ध के दौरान, भारत सरकार ने अपने आयुध कारखानों में बनी राइफल्स और कार्बाइन की आपूर्ति करके ‘मुक्ति वाहिनी’ को उसकी आजादी की लड़ाई के लिए सक्षम बनाया था.

विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के मनमाने रवैये से निबटने का एकमात्र समाधान वही हो सकता है जो एक खीझे हुए रक्षा सचिव ने एक बार साउथ ब्लॉक में सैन्य अधिकारियों के साथ बंद कमरे की बैठक में सुझाया था—भारत केवल चार रणनीतिक साझेदारों से हथियार आयात करे क्योंकि वे आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हमेशा 'कोई न कोई रास्ता खोज ही लेंगे’.

शायद यह हमें संकेत देता है कि पिछले चार वर्षों में छोटे हथियारों के आयात में इतनी तेजी कैसे आई है, जिनमें से दो सौदे तो आपातकालीन त्वरित आपूर्ति प्रावधानों के अनुबंध के तहत किए जा रहे हैं. पिछले साल सेना ने फास्ट ट्रैक प्रक्रिया के तहत अमेरिकी बंदूक निर्माता एसआइजी सॉयर से 700 करोड़ रुपए की 72,000 राइफलें खरीदी थीं.

सेना यूएई से 93,895 कार्बाइन आयात करना चाहती है. यूएई ऐसा देश है जिसका हथियार निर्माण का कोई इतिहास नहीं है. इसके साथ ही रूस के साथ साझेदारी में 7,50,000 एके-203 राइफल के उत्पादन का भी एक करार महत्वपूर्ण चरण में है. सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे ने 12 जनवरी को कहा कि अनुबंध पर जल्द ही हस्ताक्षर किए जाएंगे.

आयात, और अधिक आयात की जरूरतें पैदा करता है. सेना पहले ही अमेरिकी निर्माता को 72,000 राइफलों का ऑर्डर दोहरा चुकी है. इसलिए अन्य खरीद का कोई मतलब नहीं है क्योंकि सस्ता, स्वदेशी विकल्प मौजूद है. मसलन, एके-203 जनरल मिखाइल कलाश्निकोव की 1947 में विकसित प्रतिष्ठित रूसी राइफल का आधुनिक संस्करण है. इसमें लकड़ी की जगह पॉलिमर का प्रयोग और डस्ट कवर पर एक पिकैटेनी रेल (हथियार के निशाना लगाने वाली जगह को कसने के लिए) के अलावा और कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है.

रक्षा मंत्रालय के पास ऑर्डिनेंस फैक्ट्री तिरुचिरापल्ली में ‘त्रिची असॉल्ट राइफल’ और पश्चिम बंगाल की ईशापुर फैक्ट्री में ‘घातक’ राइफल के दो हथियार कारखाने पहले से ही हैं जो सस्ती एके-47 के क्लोन का निर्माण करते हैं (मूल एके-47 राइफल को कभी पेटेंट नहीं कराया गया था और इसलिए दुनिया भर में स्वतंत्र रूप से इसकी नकल तैयार की जाती है). त्रिची असॉल्ट राइफल और घातक दोनों की कीमत 50,000 रुपए से ज्यादा है. एके-203 की कीमत 75,000 रुपए आएगी क्योंकि रूस को लाइसेंस फीस भी चुकानी होगी.

इन्फैंट्री के पूर्व महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी के अनुसार, सबसे बड़ी समस्या यह है कि सभी हितधारक- उपयोगकर्ता, डिजाइनर और निर्माता—एक दूसरे के साथ बिना किसी तालमेल के काम करते हैं. जनरल कुलकर्णी 2016 के आयुध निर्माणी बोर्ड (ओएफबी) और सेना की उस साझेदारी का हिस्सा थे, जिसने इंसास 1सी विकसित की थी, जो 1980 के दशक की राइफल का सबसे बेहतर संस्करण था. सेना के अपनी जरूरतें बदल देने के बाद इस हथियार को हटा दिया गया था.

ऑर्डर देकर स्वदेशी हथियारों को जो मदद दी जा सकती है, उससे नवाचार को प्रोत्साहन मिलेगा. केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य पुलिस इकाइयों को लगभग 15,000 त्रिची असॉल्ट राइफल्स की आपूर्ति से प्राप्त अनुभव का इस्तेमाल करते हुए, आयुध निर्माणी तिरुचिरापल्ली पिछले साल एक कॉम्पैक्ट एके-47 कार्बाइन के विकास में सफल रही. हालांकि, इंसास राइफल की परछाई-सेवा अवधि में गुणवत्ता और विश्वसनीयता की कसौटी पर पूरी नहीं उतरने के कारण—ओएफबी की परियोजनाओं के लिए अब तक मुश्किलें खड़ी करती रहती है.

भारत की छोटी शस्त्र इकाइयों—और ये दुनिया की सबसे बड़ी इकाइयों में से एक हैं—के आधारभूत ढांचे का दशकों से भरपूर इस्तेमाल ही नहीं हुआ क्योंकि इन्हें नए ऑर्डर नहीं मिलते. इसकी सबसे बड़ी वजह इन इकाइयों में तैयार उत्पादों को लेकर भरोसे में कमी है. ईशापुर, त्रिची और कानपुर के तीन आयुध कारखानों—जो हर साल लगभग 1,00,000 राइफल्स और कार्बाइन के उत्पादन में सक्षम हैं—को दो साल पहले इंसास राइफल का उत्पादन बंद होने के बाद बड़े ऑर्डर मिलने बंद हो गए. ये कारखाने देश में एकमात्र ऐसे हैं जो 40 करोड़ रुपए प्रति मशीन की लागत वाली बैरल बनाने वाली आयातित मशीनों का उपयोग करके बंदूक के बैरल का निर्माण कर सकते हैं.

स्नाइपर राइफल्स, कार्बाइन और असॉल्ट राइफल्स की अपनी खुद की रेंज वाली निजी क्षेत्र की एकमात्र कंपनी, एसएसएस डिफेंस के सीईओ विवेक कृष्णन कहते हैं, ‘‘आत्मनिर्भर भारत का अर्थ केवल यह नहीं होना चाहिए कि हम भारतीय हथियार खरीदने लगें, बल्कि इसे सेना की भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए कमर कसने के रूप में लिया जाना चाहिए ताकि उन्हें अगले 50 साल तक हथियारों की खरीद के लिए किसी और का मुंह न ताकना पड़े. यह केवल भारतीय उद्योग में निवेश करने से हो सकता है. इसके लिए गंभीरता से प्रयास नहीं किए जाते तो हथियारों का आयात भविष्य में भी आकर्षक विकल्प बना रहेगा.


 

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