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भारत-रूसः जारी रहेगी दोस्ती

अमेरिका के साथ ताल मिलाने के बाद रूस के साथ कदमताल की तैयारी, 19वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए राष्ट्रपति पुतिन की अगवानी को नई दिल्ली तैयार

मिखाइल स्वेतलोव गेट्टी इमेजेज मिखाइल स्वेतलोव गेट्टी इमेजेज

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपने लिए खासतौर पर तैयार आइएल 96 जेट में उड़कर 4 अक्तूबर को भारत आ रहे हैं. यहां वे 19वें भारत-रूस शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे, जिसे इस बार बहुत उत्सुकता से देखा जाएगा. भूराजनैतिक बदलावों ने इस साल खासी अनिश्चितता को हवा दी है—माना जा रहा है कि भारत अमेरिका की तरफ झुक रहा है, खासकर हाल ही में नई दिल्ली में पिछले महीने हुए "टू प्लस टू्'' डायलॉग के बाद और इन संभावनाओं के बीच कि अगर रूस से भारत रक्षा उपकरण खरीदता है तो रूस के खिलाफ लगे अमेरिकी प्रतिबंध भारत पर भी लागू किए जा सकते हैं.

यही वजह है कि नई दिल्ली फिलहाल उस एक कार्यक्रम की तैयारियों में जी-जान से जुटी है जो राष्ट्रपति पुतिन की यात्रा के दौरान ज्यादा प्रतीकात्मक महत्व से भरपूर तस्वीर खिंचवाने का मौका होगा—वह है रूस को भारत में बने लड़ाई के योग्य मिग-21 विमान का तोहफा, जो 19वें भारत-रूस शिखर सम्मेलन के दौरान 5 अक्तूबर को दिया जाएगा.

यह तोहफा जाहिर तौर पर उस चीज को बयान करेगा जिसे रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में "रूस के साथ पुरानी और भरोसेमंद दोस्ती'' कहा था. 1964 की शुरुआत में ये प्रतिष्ठित विमान 1,200 से ज्यादा की तादाद में पूर्व सोवियत संघ से खरीदे और असेंबल किए गए थे.

यह तब की बात है जब इसी से मिलते-जुलते मिसाइल से लैस पश्चिमी सुपरसोनिक विमानों को खरीदने की भारत की कोशिशों को अमेरिका और ब्रिटेन ने झिड़क दिया था. यह भूराजनैतिक हालात का ही फेर है कि रूसी वायु सेना ने 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद एक भी मिग-21 विमान सोवियत वायु सेना से विरासत में हासिल नहीं किया—वे तब से सीआइएस (स्वतंत्र देशों का राष्ट्र मंडल) देशों में ही खड़े हैं. भारत के मिलिटरी हार्डवेयर के सबसे बड़े सप्लायर होने की सोवियत संघ की विरासत को रूस ने अलबत्ता जारी रखा है.

इस साल हिंदुस्तान ने अपने नए रणनीतिक साझीदार अमेरिका को यह बहुत समझाने की कोशिश की कि वह रूस के साथ हथियारों की खरीद के दरवाजे खुले रखने में उसकी मदद करे. ये दरवाजे एक अमेरिकी कानून सीएएटीएसए (पाबंदियों के जरिए अमेरिका के विरोधियों का मुकाबला कानून) ने बंद कर दिए हैं. इसी कानून के तहत रूसी हथियार कंपनियों के खिलाफ पाबंदियां आयद की गई हैं.

इसी के तहत भारत भी दूसरे दर्जे की पाबंदियों का निशाना बन सकता है, हालांकि इसी अगस्त में पारित यूएस नेशनल डिफेंस अथॉराइजेशन कानून (एनडीएए) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इससे छूट देने का अधिकार सौंप दिया है. इस बीच इस साल 2 से 5 जुलाई के बीच रूस के साथ गुपचुप बातचीत में भारत के रक्षा मंत्रालय के अफसरों ने रूस के साथ मौजूदा रक्षा अनुबंधों को अमेरिकी पाबंदियों से बचाने की गरज से एक नई वित्तीय व्यवस्था का रास्ता निकाला है और वह यह है कि इन रूसी हथियारों का भुगतान डॉलर की बजाए रुपए में किया जाए.

अमेरिकी अफसरों ने भारत को रूस की एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल की आसन्न बिक्री के खिलाफ आगाह किया है. इसी सौदे के बारे में सीतारमण ने 17 सितंबर को नई दिल्ली में मीडिया को बताया कि यह "अपने अंतिम चरण में'' है. हिंदुस्तान का मंसूबा 40,000 करोड़ रुपए में चार एस-400 मिसाइल प्रणालियां खरीदने का है.

एस-400 की बिक्री के बारे में चेतावनी देते हुए एशिया और प्रशांत सुरक्षा मामलों से जुड़े अमेरिकी असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर डिफेंस रैंडाल श्राइवर ने 29 अगस्त को भारत के खिलाफ पाबंदियों की संभावना को खारिज करने से इनकार कर दिया. वाशिंगटन में उन्होंने कहा कि अगर भारत ने रूस से नए बड़े प्लेटफॉर्म और प्रणालियां खरीदीं तो यह अमेरिका के लिए "खासी चिंता की बात'' होगी.

हथियारों की पाइपलाइन

इस साल मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति पुतिन के साथ एक अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के लिए सोचि गए थे. इस यात्रा से उन्होंने यह संकेत भी दिया था कि भारत रूस के साथ अपने रिश्तों को "विशेष और विशेषाधिकार युक्त रणनीतिक रिश्ता'' क्यों कहता है.

मिग-21 ने हथियार खरीद की आधी सदी के दरवाजे खोले थे, जो आज तक जारी है और जिसकी बदौलत रूसी मूल के लड़ाकू विमान, युद्धपोत, टैंक और पनडुब्बियां आज भी हिंदुस्तान के शस्त्रागार में 60 फीसदी की हिस्सेदारी रखती हैं. वाशिंगटन की झुंझलाहट समझ में आने वाली है. हालांकि वह पहले ही भारत का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य उपकरणों का सप्लायर बन चुका है और बीते एक दशक में भारत को 15 अरब डॉलर के रक्षा उपकरण बेच चुका है, फिर भी वह भारतीय बाजार से रूस को बेदखल नहीं कर सकेगा.

शिखर सम्मेलन में उत्तर-दक्षिण गलियारे में भारत की दिलचस्पी का विषय भी उभरकर आएगा. यह गलियारा मुंबई से शुरू होकर ईरान के रास्ते रूस तक जाएगा, जिससे भारतीय सामान की ढुलाई के लिए छोटा रास्ता हासिल होगा. इसके अलावा 2021 में छोड़े जाने वाले भारत के इनसानी अंतरिक्ष उड़ान मिशन "गगनयान'' के लिए रूस के स्टार सिटी में अंतरिक्ष यात्रियों के प्रशिक्षण पर भी बात होगी. मगर सबसे आगे और केंद्र में तो रक्षा संबंध ही होंगे.

आने वाले इस शिखर सम्मेलन में 10 अरब डॉलर से ज्यादा के सौदे पर बातचीत होगी या फैसले लिए जाएंगे. इनमें छिपी संभावना और क्षमता का बदौलत रूसी हथियारों के लिए कम से कम दो और दशकों तक भारतीय दरवाजे खुले रहेंगे.

एस-400 मिसाइलों के अलावा—जिनकी 36 राफेल विमानों की तरह ही भारतीय वायु सेना (आइएएफ) के मुताबिक, उसे लड़ाकू विमानों की कमी दूर करने की सख्त जरूरत है—और भी रक्षा सौदों पर बात होने की संभावना है.

इनमें शामिल हैं 2 अरब डॉलर में एक और अकुला क्लास की परमाणु शक्ति संपन्न हमलावर पनडुब्बी की लीज, कृवाक के चार युद्धपोतों के लिए 2 अरब डॉलर का सौदा, 200 से ज्यादा केए-226 लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर, जो हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ संयुक्त उद्यम में रशियन हेलिकॉप्टर्स द्वारा बनाए जाने हैं. इसके अलावा, भारतीय सेना के लिए 6,00,000 से ज्यादा एके-103 असॉल्ट राइफलों के निर्माण के लाइसेंस के लिए सरकार से सरकार के बीच एक सौदे पर भी बातचीत होगी. इनका निर्माण एक भारतीय आयुध कारखाने में किया जाना है. यह कम लागत का आकर्षक विकल्प है, पर मिग-21 की तरह इसकी प्रतीकात्मक अहमियत बहुत ज्यादा होगी.

इसके बाद नंबर आता है दो आइएल-78 विमानों के ऑर्डर का, जो इज्राएली "फाल्कन'' रडारों के साथ एयरबोर्न अर्ली वार्निंग और कंट्रोल विमान के तौर पर सुसज्जित होंगे. इसके अलावा भारत अपने छीजते विमान बेड़े की भरपाई के लिए रूस को कुछ और एसयू-30 विमानों का भी ऑर्डर दे सकता है.

इनसे एचएएल की कम चल रही उत्पादन इकाइयों को भी व्यस्त रखा जा सकेगा. भारत और रूस के सैन्य रिश्तों ने हाल ही में कुछ मायूसियों का भी सामना किया है. मसलन, इस साल अप्रैल में भारत ने पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान (एफजीएफए) बनाने की एक 11 साल पुरानी संयुक्त उद्यम परियोजना से अपने हाथ पीछे खींच लिए. अधिकारियों का कहना है कि एस-400 मिसाइल प्रणाली, युद्धपोत और हेलिकॉप्टर के समझौते होने ही वाले हैं और बस भारत के फैसले लेने वाले शीर्ष निकाय सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की मंजूरी का इंतजार है.

रूसी अफसर 5 अक्तूबर के शिखर सम्मेलन को "लिटमस टेस्ट'' कह रहे हैं. पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त जी. पार्थसारथी कहते हैं, "रूसी बेहद शंकालु हैं और उन्हें उस चीज को लेकर चिंता है जिसे वे अमेरिका के साथ हमारी बढ़ती नजदीकी के तौर पर देखते हैं.''

इनमें अमेरिका के साथ तितरफा सैन्य अभ्यासों का सिलसिला, हार्डवेयर की बिक्री और बहरीन में अमेरिकी नौसेना की सेंट्रल कमान में भारतीय नौसेना के अटेशे की तैनाती का फैसला भी शामिल है.

मॉस्को की चिंताएं उन दो समझौतों से भी बढ़ी हैं जिन पर भारत ने बीते दो साल से कुछ अधिक वक्त में अमेरिका के साथ दस्तखत किए हैं. 2016 में लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (एलईएमओए), जो भारत और अमेरिका को एक दूसरे के सैन्य अड्डों से जंगी जहाजों और विमानों में ईंधन भरवाने की इजाजत देता है. 6 सितंबर को "टू प्लस टू'' डायलॉग के दौरान भारत और अमेरिका ने सीओएमसीएएसए (कम्युनिकेशंस कंपैटिबिलिटी ऐंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) पर दस्तखत किए. यह भारतीय सैन्य प्लेटफॉर्म को अमेरिकी रणनीतिक संचार तक पहुंच और संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खरीद की इजाजत देता है.

एक रूसी अधिकारी ने कहा कि अगर बीईसीए या बेसिक इंटेलिजेंस ऐंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट पर दस्तखत होते हैं, तो रूस के साथ भारत के सैन्य रिश्ते गंभीर खतरे में पड़ जाएंगे. बीईसीए भारत और अमेरिका के बीच तीसरा बुनियादी समझौता होगा और जिस पर बातचीत चल रही है. बीईसीए भारत को ऐरोनॉटिकल, टोपोग्राफी और नॉटिकल डेटा के अमेरिकी डेटाबैंकों तक पहुंच मुहैया करेगा. यह अमेरिका के विशाल भूस्थानिक सूचना डेटा तक भी पहुंच देगी.

अमेरिका को भी भारत के बारे में ये सब डेटा मिलेंगे. रूस को ये डर है कि अग्रणी उपकरण भारत को सप्लाई करने से उनके अमेरिका को लीक होने का खतरा है. रूस अब जोर दे रहा है कि भारत उसके साथ भी ऐसे ही प्रोटोकॉल पर दस्तखत करे. इसलिए यह माना जा रहा है कि भारत-रूस शिखर सम्मेलन के एजेंडे में एक विषय लॉजिस्टिक्स सप्लाई एग्रीमेंट (एलईएमओए) हो सकता है.

इससे भारत के जंगी जहाजों और विमानों को सैन्य अभ्यासों के दौरान रूसी बंदरगाहों और एयरबेस से गुजरते समय ईंधन भरवाने की सुविधा मिलेगी. ईस्टर्न नेवल कमान के पूर्व कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल ए.के. सिंह कहते हैं कि चीन का उभार और भारत के स्वदेशी उद्योग की टेक्नोलॉजी से जुड़ी बाध्यताएं भारत को अमेरिका और रूस, दोनों पर भरोसा करने के लिए मजबूर कर रही हैं. वे कहते हैं, "हमारा मुकाबला बढ़ते अधिनायकवादी देश चीन से है जो हर महीने अपनी नौसेना में समुद्री युद्धपोत जोड़ रहा है, जबकि हमारे वैज्ञानिक अपनी फौजों के लिए एक अच्छी-भली राइफल तक नहीं बना सकते.''

पश्चिम के खिलाफ चीन के साथ रूस की बढ़ती नजदीकी को लेकर भी चिंता है, जिसे भारतीय सेना और कूटनीतिज्ञ सुविधा का रिश्ता मानते हैं. शीत युद्ध सरीखे इस फलक पर एक तीसरा भागीदार भी है—पाकिस्तान—जो हाल ही में ट्रंप प्रशासन का समर्थन गंवा चुका है और रूस उसका इस्तेमाल अफगानिस्तान में तालिबान तक पहुंचने के लिए करना चाहता है. एक अधिकारी कहते हैं, "ऐसा वह शायद अमेरिका के साथ वही करने के लिए करना चाहता है जो उसने सीरिया में रूस के साथ करने की कोशिश की थी और नाकाम रहा.''

नई दिल्ली ने अमेरिकी प्रतिबंधों से सामना होने पर सैन्य संबंधों को सुचारु बनाए रखने के अपने पक्के इरादे का संकेत भी उस वक्त दे दिया, जब भारतीय और रूसी अधिकारियों ने पिछले कुछ महीनों में एक नई वित्तीय व्यवस्था कायम की जिसमें भारत रूसी सैन्य खरीदों के लिए डॉलर में नहीं, रुपए में भुगतान करेगा.

इस व्यवस्था में लेनदेन के एसडब्ल्यूआइएफटी यानी स्विफ्ट रास्ते को बाइपास कर दिया जाएगा. अमेरिकी की कोशिश जहां यह है कि भारत को रूसी प्लेटफॉर्मों पर उसकी निर्भरता से छुड़ाया जाए, वहीं भारत-रूस के रिश्तों की मौजूदा स्थिति बताती है कि ऐसा नहीं होने जा रहा है.

जिगरी दोस्त

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