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अयोध्याः राम के नाम पर कोहराम

बाबरी मस्जिद विध्वंस की 25वीं बरसी पर सुप्रीम कोर्ट इस मामले की जब फिर सुनवाई करने जा रहा है तो समूचे अयोध्या विवाद पर इंडिया टुडे की एक पेशकश.

विवाद स्थल बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के दो दिन बाद 8 दिसंबर 1992 को अयोध्या के विवादित स्थल पर सुरक्षाकर विवाद स्थल बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के दो दिन बाद 8 दिसंबर 1992 को अयोध्या के विवादित स्थल पर सुरक्षाकर

यकीनन, आप इसे गजब का दैवीय संयोग कह सकते हैं. मिल्कियत के मुकदमे पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई बाबरी मस्जिद विध्वंस की 25वीं बरसी के एक दिन पहले ही शुरू हुई. इस विध्वंस ने समूचे देश में नफरत के शोलों को हवा दी और देश भर में हुए दंगों में 2,000 से अधिक लोगों की जान चली गई थी. बेशक, उस राष्ट्रीय शर्म की याद और उसके दोषियों तथा पीड़ितों के साथ न्याय पर ही अदालत का फोकस होगा.

अयोध्या विवाद तो लगभग तभी से है जब देश आजाद हुआ. अयोध्या में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच मालिकाना हक को लेकर कानूनी लड़ाई 1949 में शुरू हुई. 1980 के दशक में यह मामला पहचान की राजनीति की सवारी करके केंद्रीय मंच पर आ धमका. 1990 के दशक की शुरुआत में इस विवाद के इर्दगिर्द जन समर्थन जुटने लगा और उसने एक आंदोलन की शक्ल ले ली, जिसकी परिणति 6 दिसंबर 1992 को बाबारी मस्जिद विध्वंस के रूप हुई.

राजनैतिक नेतृत्व ने मामला अदालतों के हवाले कर दिया. लेकिन ये मुकदमे 25 साल से ऐसी चिनगारी की तरह बने हुए हैं, जिनकी चर्चा होते ही आतंक बरपा हो जाता है. 2010 में इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ पीठ ने फैसला सुनाया लेकिन दोनों पक्षों ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. मस्जिद ढहाए जाने के बाद आपराधिक मामले तो लखनऊ की सीबीआइ अदालत में चल रहे हैं जबकि मालिकाना हक का दीवानी मामला सुप्रीम कोर्ट में है. उसकी अगली सुनवाई अब 8 फरवरी 2018 को होनी है.

अदालतों के सामने 90,000 पन्नों की गवाही और पुरातत्व संबंधी साक्ष्यों को करोड़ों लोगों की आस्था से तालमेल बैठाने का महती कार्य है. समूचा देश सांस रोके इस मामले के खत्म होने का इंतजार कर रहा है. इंडिया टुडे देश को आतंकित करने वाले इस विवाद के राजनैतिक, कानूनी और नैतिक पहलुओं पर नए सिरे से नजर डाल रहा है.

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