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खास रपटः तूफान में फंसी कश्ती

महामारी पर काबू पाने और औद्योगिक उत्पादन में जान फूंकने की कोशिश में बुरी तरह उलझे महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे सबके निशाने पर, सुशांत सिंह राजपूत मामले से निपटने में कोताहियों ने संकट और बढ़ाया

लंबी पेशकदमी विधानसभा के मॉनसून सत्र के पहले दिन 7 सितंबर, 2020 को विधान भवन में बेटे तथा मंत्री आदित्य ठाकरे के साथ मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे लंबी पेशकदमी विधानसभा के मॉनसून सत्र के पहले दिन 7 सितंबर, 2020 को विधान भवन में बेटे तथा मंत्री आदित्य ठाकरे के साथ मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे

उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र के 19वें मुख्यमंत्री का पदभार संभाला, तो ऐसा लगा था कि वे कुछ नया करेंगे. वन्यजीव फोटोग्राफी का शौक छोड़कर राजनीति में उतरे शिवसेना प्रमुख ने दो अस्वाभाविक सहयोगियों—राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और कांग्रेस—के साथ महाराष्ट्र विकास अघाड़ी गठबंधन की सरकार बनाई थी. उन्होंने किसानों को चिंतामुक्त करने का वादा किया और अपना नेक इरादा जाहिर करने के लिए 2 लाख रुपए तक की कृषि कर्ज माफी योजना का भी ऐलान किया. वह हाजिरजवाब और मिलनसार रहे हैं और उन्हें यकीन था कि वे कांग्रेस के साथ अपनी निभा लेंगे, जो राजनीति के लिहाज से एकदम विपरीत ध्रुव पर खड़ी है. विपक्षी भाजपा ने अटकलें लगाईं कि तीन-पार्टी की 'ऑटोरिक्शा सरकार' (पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस के मुताबिक) की सरकार अपने विरोधाभासों क बोझ से गिर जाएगी. ठाकरे ने उन्हें गलत साबित किया.

हालांकि, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर 10 महीने से आसीन ठाकरे फिलहाल घिरे दिखते हैं. महामारी का प्रकोप बढ़ रहा है और महाराष्ट्र 14 सितंबर को 10 लाख संक्रमण के मामलों के साथ देश पहले नंबर पर था. राज्य में नया औद्योगिक निवेश नहीं हो पा रहा है और केंद्र जीएसटी मुआवजा देने के अपने वादे से मुकर गया है और उसे बदले वह कर्ज की पेशकश कर रहा है, जिसका सभी गैर-भाजपा राज्य सरकारें विरोध कर रही हैं. ऐसे में महाराष्ट्र अभी तक इस वित्त वर्ष में 60 फीसद राजस्व कमी से जूझ रहा है. इसी के साथ यह धारणा भी मजबूत हुई है कि 60 वर्षीय मुख्यमंत्री ऐसे समय में नौकरशाही के आगे झुक रहे हैं जब राज्य को राजनैतिक नेतृत्व की दरकार है. ठाकरे और उनकी पार्टी शिवसेना को अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत और कंगना रनौत के साथ उलझने से भी नाराजगी झेलनी पड़ रही है.

शुरुआत में ठाकरे की लोकप्रियता बहुत अधिक थी. लोग उनसे मिलने मंत्रालय के उनके दफ्तर में लोगों को तांता लगा रहता था. फरवरी के बाद स्थिति बदलने लगी. शरद पवार के साथ ठाकरे की लगातार बैठकों से संकेत गया कि वे राकांपा प्रमुख के प्रभाव में हैं. दिन में सिर्फ चार घंटे दफ्तर में रहने की उनकी आदत भी अटकलों का विषय बन गई. मार्च में, राज्य में पहला कोविड-19 मामला सामने आया और ठाकरे ने खुद को अपने घर तक सीमित कर लिया. वे हृदयरोगी हैं और उनके दिल की धमनियों में नौ स्टेंट डले हैं इसलिए उन्होंने घर से काम करने और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बात करने को तरजीह देने लगे. हालांकि 13 सितंबर को मीडिया से वीडियो बातचीत में उन्होंने इसका खंडन किया वे 'उपलब्ध' नहीं रहते हैं. उन्होंने कहा कि वे राज्य के सभी 36 जिलों की स्थिति का जायजा हर रोज लेते हैं. उन्होंने 13 सितंबर को लोगों के साथ एक फेसबुक लाइव कार्यक्रम में कहा, ''मैं वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग केजरिए महाराष्ट्र के हर जिले केसंपर्क में हूं और काम हो रहा है.''
 
पवार का जलवा
पहले दो महीनों में ठाकरे के कई फैसलों पर पवार की छाप है. उन्होंने शहरों में विकास कार्यों के लिए फड़णवीस की दी गई अनुमतियों को रोक लिया, पांच सिंचाई परियोजनाओं में 6,144 करोड़ रुपए की लागत वृद्धि की जांच का आदेश दिया और भाजपा नेताओं के नियंत्रण वाले चार सहकारी चीनी मिलों को 135 करोड़ रुपए के पूंजीगत ऋण की गारंटी को रद्द कर दिया. उन्होंने कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) में स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति की फड़णवीस की नीति को भी बदल दिया.

हालांकि ठाकरे ने सहयोगियों को अपनी मर्जी से प्रशासनिक फैसले लेने की छूट तो दी पर गाहे-बगाहे उन पर लगाम भी लगई. मसलन, उन्होंने 6 जुलाई को मुंबई में नौ पुलिस उपायुक्तों (डीसीपी) के तबादले रोक दिए. वे इससे चिढ़े थे कि न तो गृह मंत्री अनिल देशमुख (राकांपा) और न ही मुंबई के पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह ने उनसे इन तबादलों के बारे में बात की. पांच दिन बाद तबादलों को हरी झंडी मिली, जब पवार खुद ठाकरे के निवास पर इस संबंध में पहुंचे. राजनैतिक टिप्पणीकार हेमंत देसाई कहते हैं, ''वे घर से काम करते हैं, यह कोई मुद्दा नहीं. जरूरी यह है कि सरकार वही चला रहे हैं.''
कहते हैं, तबादला प्रकरण ने उनके और पवार के बीच थोड़ी खटास पैदा कर दी.

राकांपा प्रमुख ने ठाकरे के साथ दो महीने तक कोई मुलाकात नहीं की. 7 सितंबर को वे मराठा आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए फिर मिले. इस बीच, एक टीवी साक्षात्कार में पवार ने ठाकरे को घर से बाहर निकलने और राज्य में महामारी की स्थिति का जायजा लेने की सलाह दी. उन्होंने कंगना रनौत के घर में कथित अनधिकृत गैर-कानूनी निर्माण को ढहाने की बीएमसी (बृहन्मुंबई नगर निगम) की कार्रवाई पर भी नाराजगी जताई. शिवसेना सांसद संजय राउत ने सुलह-सफाई के लिए पवार से कम से कम तीन बार बात की.

ठाकरे के एक करीबी का कहना है कि जब भी ठाकरे बात मानने से इनकार कर देते हैं, पवार नाराज हो जाते हैं. वे कहते हैं, ''उद्धवजी ने कुछ अवसरों पर पवार को 'ना' कहने की हिम्मत दिखाई है. उनका (पवार का) गुस्सा, उसी हताशा का परिणाम है.'' हालांकि राकांपा नेता अविनाश आदिक इन आरोपों का खंडन करते हैं. वे कहते हैं, ''मुख्यमंत्री से मिलने के लिए पवार साहब ने कभी प्रोटोकॉल का उल्लंघन नहीं किया. जब भी जरूरी लगता है, वे मुख्यमंत्री को फोन करते हैं.''

हालांकि दोनों नेता दूसरे मुद्दों पर भी दो राय रखते रहे हैं. उन्होंने पवार की इच्छा के विपरीत राज्य से लॉकडाउन को पूरी तरह नहीं हटाया. उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि स्वास्थ्य सचिव डॉ. प्रदीप व्यास, स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे (राकांपा) की बजाए सीधे उनसे निर्देश लें. मुख्यमंत्री ने अपने पसंदीदा नौकरशाहों को मुख्य पदों पर नियुक्त किया.

हालांकि, पवार के साथ सुलह के तुरंत बाद, ठाकरे ने पवार के दबाव में नागपुर के नगर निगम आयुक्त तुकाराम मुंडे (मुख्यमंत्री ने इससे पहले भाजपा की शिकायतों के बावजूद अधिकारी को पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की थी) का तबादला कर दिया.

कांग्रेस की मजबूरी
सत्तारूढ़ महाराष्ट्र विकास अघाडी में कांग्रेस विशुद्ध रूप से व्यावहारिकता को ध्यान में रखकर शामिल हुई. पार्टी ने 2019 में सबसे कम सिर्फ 16 फीसद वोट हासिल किया और सत्ता के जरिए उसे अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की उम्मीद है. नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता का कहना है, ''अगर हम 20 फीसद वोट तक पहुंचने में भी सफल हो जाते हैं, तो राज्य में हमारी उम्मीदें जिंदा रहेंगी.''


हालांकि गठबंधन में राकांपा के हावी रहने से यह संभव नहीं दिख रहा है. कांग्रेस ठाकरे की क्षमताओं को लेकर भी संशय में है. एक कांग्रेसी नेता के अनुसार, ठाकरे में एक साथ कई समस्याओं को हल करने की क्षमता नहीं दिखती. वे कहते हैं, ''उनके सामने पूरी थाली परोसें तो वे या तो चावल खाएंगे या फिर चपाती. बाकी कुछ छूएंगे ही नहीं.'' हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने राजनैतिक सचिव अहमद पटेल के जरिए ठाकरे के साथ नियमित संपर्क में हैं. उन्होंने 9 सितंबर को ठाकरे को फोन किया था जिसमें रनौत के साथ धैर्यपूर्वक बर्ताव की सलाह दी.
 
मराठा तूफान
राज्य में मराठा समुदाय के लिए आरक्षण पर 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट का आदेश गठबंधन सरकार के लिए बड़ा झटका है. 2018 में राज्य की भाजपा सरकार ने 35 प्रतिशत मराठों को शैक्षणिक संस्थानों में 12 फीसद और सरकारी नौकरियों में 13 फीसद आरक्षण का हकदार बनाया था लेकिन इससे राज्य में आरक्षण 66 फीसद हो गया, जो 1993 के सुप्रीम कोर्ट की तय सीमा से 16 फीसद अधिक था.


ठाकरे के लिए स्थिति ज्यादा जटिल इसलिए हो गई है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के मामले के विपरीत महाराष्ट्र में कोटा पर रोक लगा दी. आंध्र और तमिलनाडु में ऐसा ही मुद्दा है. मराठा संगठनों ने अब सरकार पर विश्वासघात का आरोप लगाकर आंदोलन शुरू कर दिया है. मराठा महासंघ के अध्यक्ष राजेंद्र कोंधारे का कहना है कि जब तक सरकार 'अपना वादा' पूरा नहीं करती, तब तक आंदोलन चलेगा. मराठा आरक्षण पर एक उप-समिति का नेतृत्व करने वाले भाजपा नेता विनोद तावड़े ने यह कहकर आग में घी डाल दिया कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में जानबूझकर विफल रही क्योंकि वह आरक्षण को बंद करना चाहती थी. 16 सितंबर को, ठाकरे ने वादा किया कि जब तक कोर्ट अपना अंतिम फैसला नहीं दे देता, मराठा समुदाय को राहत मिलेगी. उन्होंने कहा, ''जब राज्य सरकार आपकी बात सुन रही है तो फिर आंदोलन क्यों?''


सरकार शायद अब सुन रही हो, लेकिन सचाई यह है कि ठाकरे को इस मामले की पहले से कोई जानकारी नहीं थी क्योंकि उन्होंने इसे पीडब्ल्यूडी मंत्री अशोक चव्हाण के हवाले छोड़ दिया था, जो आरक्षण पर पैनल के प्रमुख हैं. एक सराकरी अधिकारी बताते हैं, ''सभी मामलों को कानूनी रूप से हल नहीं किया जाता है. मुद्दों को हल करने के लिए राजनैतिक रास्ते भी अपनाने होते हैं.''

आपदा की चुनौती
17 सितंबर को 2,97,506 सक्रिय संक्रमण के मामलों और 30,883 मौतों के साथ, महाराष्ट्र सबसे अधिक महामारी से ग्रस्त राज्य है. वायरस अब ग्रामीण क्षेत्रों में फैल गया है और राज्य के 36 में से 13 जिलों में 20,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं. सरकार ने मुंबई की दो सबसे बड़ी बस्तियों धारावी और वर्ली में महामारी को नियंत्रित करके यह संदेश दिया कि इसे काबू में रखा जा सकता है.


लेकिन इस सफलता के बाद सरकार आत्मसंतुष्टि के भाव में चली गई. महामारी महाराष्ट्र के अन्य बड़े शहरों में फैल गई जहां 25 प्रतिशत लोग रहते हैं. 16 सितंबर को 80,152 सक्रिय संक्रमण मामलों के साथ, पुणे भारत का सबसे अधिक प्रभावित जिला है. मुंबई को छोड़कर हर जगह डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मचारियों, ऑक्सीजन सिलेंडर, एम्बुलेंस और दवाओं की कमी की शिकायतें मिली हैं. 'मेरा परिवार, मेरी जिम्मेदारी' और डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग जैसी योजनाएं अभी भी जारी हैं, लेकिन केंद्र की ओर से मास्क, सैनिटाइजर और पीपीई किट की आपूर्ति को रोकने के साथ, राज्य के लिए अधिक समस्याएं अभी सामने आनी बाकी हैं.

मुख्य मतदाता
सुशांत राजपूत मामले में मुंबई पुलिस की हीलाहवाली से ठाकरे को झेंपना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट ने 19 अगस्त को मामले की जांच सीबीआइ को सौंप दी. सुशांत मामले पर और मुंबई को लेकर कंगना रनौत की टिप्पणियों पर शिवसेना की तीखी प्रतिक्रिया से मामला बिगड़ा ही. कंगना के बांद्रा स्थित घर में 'अनधिकृत' निर्माण को ध्वस्त कर दिया गया.


शिवसेना के एक सूत्र का कहना है कि मुख्यमंत्री सोशल मीडिया और कुछ टीवी चैनलों पर बेटे आदित्य ठाकरे को सुशांत की मौत के साथ जोड़े जाने से नाराज थे. ठाकरे क्रोध में चिल्ला पड़े थे, ''ये पत्रकार होते कौन हैं? मुझे पता है कि वे किसके इशारे पर काम कर रहे हैं, मैं उन्हें नहीं छोड़ने वाला.''
हालांकि, रानौत प्रकरण ने शिवसेना के लिए कुछ राहत दी क्योंकि उसका मूल वोटर इसे कोई मुद्दा नहीं मानता है. कल्याण निवासी वंदना कदम कहती हैं, ''मुझे खुशी होगी अगर उद्धवजी जल्द से जल्द आने-जाने में होने वाली हमारी परेशानियों का समाधान करें. कंगना और सुशांत के मामले उतने गंभीर मुद्दे नहीं हैं जितना उसे बना दिया गया है.''


उधर, राज्य भाजपा अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ठाकरे सरकार के जल्द ही गिर जाने की भविष्यवाणी करते हैं. ऐसी अटकलें भी हैं कि एक प्रभावशाली नेता बिहार के चुनावों के बाद दिसंबर में राकांपा और कांग्रेस से बड़ी संख्या में विधायकों को तोड़कर भाजपा में विलय करा सकते हैं. हालांकि, भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि पार्टी ठाकरे की सरकार गिराना नहीं चाहेगी. वजह, वह ऐसे समय में राज्य की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहेगी जब महामारी तेजी से फैल रही है.  


अन्य मोर्चों पर बात करें तो राज्य की 400 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था भी डगमगा रही है. सुधारों को लेकर राज्य सरकार के ढुलमुल रवैए के कारण महाराष्ट्र व्यापार करने में आसानी के लिहाज से गिरकर 13वें पायदान पर आ गया है. पुणे के पास चाकन में भारत का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल हब कोविड-19 के प्रसार से बुरी तरह प्रभावित हुआ है. उद्योग मंत्री सुभाष देसाई कहते हैं कि अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के प्रयास में करीब 60,000 उद्योगों को फिर से खोलने की अनुमति दी गई है. उद्योग की अब तक की प्रतिक्रिया थोड़ी ठंडी रही है.


बहरहाल, कोविड-19 का असर विनाशकारी रहा है लेकिन मुख्यमंत्री सारी चीजों को बीमारी के मत्थे मढ़कर आगे भी नहीं बढ़ सकते हैं. ठाकरे ने अब तक अच्छा संतुलन बनाकर रखा है. लेकिन राज्य को पटरी पर लाने के लिए, उन्हें तेजी दिखानी होगी और राजनीति को परे रखते हुए राज्य के लिए दीर्घकालीन प्रभाव वाली नीतियां लागू करनी होंगी.   

—साथ में एम.जी. अरुण

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