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ओलंपिक में सबसे आगे दौड़ रहे मिल्खा सिंह ने पीछे मुड़कर क्यों देखा?

मिल्खा से देश एक ही सवाल पूछता रहा है. वे भी अपने आप से यही पूछते हैं. आखिर 1960 के रोम ओलंपिक के फाइनल में 400 मीटर की दौड़ में सबसे आगे चल रहे मिल्खा ने पीछे क्यों देखा.

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मिल्खा सिंह मिल्खा सिंह

मिल्खा सिंह से ये देश एक ही सवाल पूछता रहा है. खुद मिल्खा भी अपने आप से यही सवाल पूछते हैं. आखिर 1960 के रोम ओलंपिक के फाइनल में 400 मीटर की दौड़ में सबसे आगे चल रहे मिल्खा सिंह ने पीछे मुड़कर क्यों देखा. देखा और हार गए. वर्ल्ड रेकॉर्ड तोड़ने के बाद भी. हमारी इस स्टोरी में आपको इस सवाल का भी जवाब मिलेगा और मिल्खा की बदली हुई जिंदगी का हाल भी.

चंड़ीगढ़ के सेक्टर 8 का रिहाइशी इलाका हमेशा शांति की चादर ओढ़े रहता है. ऊंची-ऊंची चारदीवारी से घिरे आलीशान मकान. उनके गेट तभी खुलते हैं, जब कोई लंबी कार अंदर आती है या बाहर निकलती है. लेकिन इन दिनों फिल्म भाग मिल्खा भाग के हवन करेंगे गाने की भांगड़ा धुन से इस इलाके की शांति गायब हो गई है. लोगों के कार स्टीरियो पर यह गाना जोर-जोर से बजता रहता है.

मिल्खा सिंह की झलक कभी-कभार ही देखने को मिलती थी, लेकिन अब पुरानी परंपरा के अनुरूप वे अपने मेहमानों को गेट के बाहर तक छोडऩे आते हैं. उनसे मिलने वालों का तांता लगा रहता है. मित्र, शुभचिंतक और मीडिया वाले उनके दरवाजे पर लाइन लगाए रहते हैं और उनसे बात करना चाहते हैं. मिल्खा सिंह फिर से अंतरराष्ट्रीय हस्ती बन गए हैं.

उन्हें लगातार फोन आते रहते हैं. पूर्व एथलीट मिल्खा कहते हैं, ‘दुनिया भर से इतने फोन आ रहे हैं कि उनकी गिनती करना मुश्किल हो गया है.’ वे एक बार फिर देश के नायक बन गए हैं. आज 84 साल की उम्र में उनमें नई ऊर्जा आ गई है, वैसी ही ऊर्जा जो पहले हुआ करती थी. वे किसी संन्यासी की तरह कहते हैं कि उन्हें कुछ नहीं चाहिए, जबकि वे अपनी तीखी बेबाकी के लिए मशहूर थे और सरकार की ओर से मिलने वाले सम्मान को ठुकरा दिया करते थे.

पर आज प्रशंसा, पुरस्कार और सम्मान कोई भी चीज उन्हें रोमांचित नहीं करती. वे कहते हैं, ‘मैं संतुष्ट हूं. मुझे अब जिंदगी में कुछ नहीं चाहिए. मुझे किसी चीज की भूख नहीं है. मैं 84 साल का हो चुका हूं. मुझे किसी पद की जरूरत नहीं.’

उनके गोल्फ खिलाड़ी बेटे जीव मिल्खा का अर्जुन पुरस्कार उनके कमरे में मुश्किल से ही नजर आता है. दीवारों पर हर जगह परिवार की तस्वीरें ही दिखाई देती हैं, खासकर उनके साढ़े तीन साल के पोते हरजय की फ्रेम की हुई फोटो. जब उनसे उनकी शिरकत वाली 80 दौड़ों में से 77 में मिले अंतरराष्ट्रीय पदकों के बारे में पूछा जाता है तो वे कहते हैं, ‘ये सब दिखाने की चीजें नहीं हैं. मैं जिन अनुभवों से गुजरा हूं उन्हें देखते हुए वे मुझे अब भारत रत्न भी दे दें तो मेरे लिए उसका कोई महत्व नहीं है.’ अपनी मांगों को लेकर उनमें बड़ी खटास रही है. उन्होंने 2001 में अर्जुन पुरस्कार ठुकरा दिया था. उनका कहना था कि यह पुरस्कार उन्हें बहुत देर से दिया गया. वे पूछते हैं, ‘लंदन में भाग मिल्खा भाग के प्रीमियर के बाद मुझे हाउस ऑफ लॉर्ड्स में आमंत्रित किया गया. क्या हमारी सरकार को नहीं मालूम कि मिल्खा सिंह कौन है? ’

देश ने भले ही अब तक मिल्खा को पर्याप्त सम्मान न दिया हो लेकिन वे 1960 के रोम ओलंपिक में जीत की पक्की उम्मीद के साथ गए थे. तोक्यो में आयोजित 1958 के एशियाई खेलों में उन्होंने 45.8 सेकेंड का विश्व रिकॉर्ड बनाया था. वे अमेरिका के ओटिस डेविस को छोड़कर लगभग सभी प्रतिद्वंद्वियों को हरा चुके थे. मिल्खा रोम के स्टेडियो ओलंपिको में जब दौड़ रहे थे तो वे सबसे आगे चल रहे थे, लेकिन उन्हें लगा कि वे जरूरत से ज्यादा तेज दौड़ रहे हैं. आखिरी छोर तक पहुंचने से पहले उन्होंने पीछे मुड़कर देखना चाहा कि दूसरे धावक कहां पर हैं. इसी वजह से उनकी रफ्तार और लय टूट गई. उन्होंने उस समय का विश्व रिकॉर्ड तोड़ते हुए 45.6 सेकंड का समय तो निकाला लेकिन एक सेकेंड के दसवें हिस्से से पिछड़कर वे चौथे स्थान पर रहे. डेविस ने 44.9 सेकेंड के साथ नया विश्व रिकॉर्ड बनाया और स्वर्ण पदक जीत लिया. इसके बाद मिल्खा ने जकार्ता में 1962 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता लेकिन वे समझ गए कि अब वे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कभी नहीं कर सकेंगे.

अब वर्षों बाद वे कहते हैं कि खिलाड़ी को उसका राष्ट्रीय सम्मान मिलना चाहिए. राजनेताओं के खिलाफ अपनी जानी-पहचानी कड़वाहट जाहिर करते हुए वे कहते हैं, ‘एक खिलाड़ी से बेहतर देश का राजदूत और कौन हो सकता है?’ अपने करियर की बुलंदी के समय क्या उन्होंने कभी पुरस्कार के बारे में सोचा था. सेना में एथलीट रहे मिल्खा का जवाब है, ‘बिल्कुल नहीं. हम सिर्फ देश के सम्मान के लिए दौड़े.’

लेकिन जिंदगी की बुनियादी जरूरतों के आगे देश का नंबर भी दूसरे स्थान पर आ गया था. मिल्खा देश के बंटवारे के बाद दिल्ली के शरणार्थी शिविरों में अपने दुखदायी दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ‘जब पेट खाली हो तो देश के बारे में कोई कैसे सोच सकता है? जब मुझे रोटी मिली तो मैंने देश के बारे में सोचना शुरू किया.’

भूख की वजह से पैदा हुए गुस्से ने उन्हें आखिरकार अपने मुकाम तक पहुंचा दिया. जब आपके माता-पिता को आपकी आंखों के सामने मार दिया गया हो तो क्या आप कभी भूल पाएंगे, कभी नहीं. यह बात मशहूर है कि मिल्खा ने पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया था क्योंकि उनके जेहन में नरसंहार की यादें ताजा थीं.

लेकिन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समझने पर वे राजी हो गए. नेहरू को वे पिता समान समझते थे. मिल्खा कहते हैं, ‘पाकिस्तान में मुझे बहुत सम्मान मिला. जनरल अयूब खान ने मुझे फ्लाइंग सिख का खिताब दिया. मेरे मन में रंजिश तो बरकरार है लेकिन अब गुस्सा थूक चुका हूं मैं.’

मिल्खा के दिमाग में उनके माता-पिता की मौत के बाद जो बात सबसे ज्यादा घूमती है वह है ओलंपिक पदक से वंचित रह जाना. वे बताते हैं, ‘मैं सेमीफाइनल और फाइनल के बीच दो दिन तक बिल्कुल नहीं सोया था. मैं बस यही सोचता रहता था कि सारी दुनिया मुझे देख रही होगी.’ वे कहते हैं कि उनकी बस एक ही आखिरी ख्वाहिश है कि कोई भारतीय उस पदक को जीते, जो वे चूक गए थे. ‘दुर्भाग्य से मुझे उस स्तर का कोई भी खिलाड़ी नहीं दिखाई देता है.’

वे फिल्म स्क्रीनिंग में उपस्थित होने, इंटरव्यू देने और अगले महीने अपनी आत्मकथा द फ्लाइंग सिख का अंग्रेजी संस्करण तैयार करने में व्यस्त रहते हैं. वे रेस के अपने जूते उतारकर और जमीन पर नंगे पांव रखकर काफी खुश हैं.

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