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यूसीसी का तलाक पर क्या प्रभाव पड़ सकता है

तीन तलाक के अब गैरकानूनी होने के बाद सभी धर्मों के निजी कानून महिलाओं को पर्याप्त सुरक्षा देते हैं. यूसीसी इनके परस्पर अतिक्रमण और गलत व्याख्याओं से बचने के लिए इन्हें संहिताबद्ध कर सकता है

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समान नागरिक संहिता: इन्हें संहिताबद्ध कर सकता है समान नागरिक संहिता: इन्हें संहिताबद्ध कर सकता है

हिंदुओं के तलाक कानून
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत पति या पत्नी नौ आधारों पर तलाक की मांग कर सकते हैं. पत्नी के लिए चार अतिरिक्त आधार मौजूद हैं

पति और पत्नी दोनों को गुजारे भत्ते और भरण-पोषण का दावा करने का कानूनी हक है. पत्नी हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम 1956 की धारा 18 के तहत भी भरण-पोषण का दावा कर सकती है

मुसलमानों के तलाक कानून
इस्लामी कानून के तहत तलाक को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: शौहर के आग्रह पर तलाक; बीवी के आग्रह पर खुला या तलाक; और आपसी सहमति से मुबारात या तलाक. शौहर समझौते के जरिए पत्नी को तलाक कहने का अधिकार किसी तीसरे शख्स को दे सकता है.

मुस्लिम महिला (विवाह से संबंधित अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 ने शौहर की तरफ से दिए तीन तलाक को गैरकानूनी और दंडनीय अपराध बना दिया है. इसलिए अगर मुस्लिम शौहर अब तलाक चाहता है तो उसे परिवार अदालत के समक्ष तलाक को विधिमान्य करवाना होगा

मुस्लिम महिला के पास अलग होने के पारंपरिक तरीकों के अलावा कानूनी रास्ता भी है. मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम 1939 नौ आधार निर्धारित करता है जिन पर मुस्लिम महिला विवाह विच्छेद की मांग कर सकती है

शरीअत के मुताबिक, मुस्लिम महिलाओं को गुजारे भत्ते और भरण-पोषण का पूर्ण अधिकार दिया गया है. बीवी की वित्तीय स्थिति अच्छी हो और शौहर गरीब हो, तब भी यह अधिकार अप्रभावित रहता है

ईसाइयों के तलाक कानून
ईसाइयों में तलाक भारतीय तलाक अधिनियम 1869 के मुताबिक होते हैं. पति/पत्नी नौ आधारों पर तलाक की मांग कर सकते हैं. अगर पति बलात्कार, पुरुषमैथुन या पशुगमन करता है तो पत्नी तलाक मांग सकती है. गुजारे भत्ते और भरण-पोषण की मांग केवल पत्नी कर सकती है.

सिखों के तलाक कानून
आनंद विवाह (संशोधन) अधिनियम 2012 तलाक के प्रावधानों के मामले में खामोश है

पारसियों के तलाक कानून 
पारसी विवाह और तलाक अधिनियम 1936 के तहत तलाक के 10 आधार हैं और पति-पत्नी में से कोई भी तलाक मांग सकता है. फिर भी गुजारे भत्ते और भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार केवल पत्नी को है

यूसीसी का क्या असर पड़ेगा उत्तराधिकार पर 

मुस्लिम और पारसी बेटियों को अब भी उत्तराधिकार में बराबर का हक हासिल नहीं. यूसीसी से यह बदल सकता है. यह विवाह के दायरे से बाहर जन्मे बच्चों को भी विरासत का हक दे सकता है

हिंदुओं के उत्तराधिकार कानून
हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 में वसीयत लिखने का प्रावधान है. कानूनन मान्य वसीयत मौजूद होने पर उत्तराधिकार के कानून लागू नहीं होते. वसीयत नहीं होने पर उत्तराधिकार कानून के जरिए संपत्ति का बंटवारा किया जाता है

बेटियों को संपत्ति में बेटों के बराबर हिस्से का अधिकार हासिल है

कानून पैतृक संपत्ति और स्वयं अॢजत संपत्ति में फर्क करता है. पुरुष वंशावली की चार पीढ़ियों के वंशजों को उत्तरोत्तर मिलने वाली अविभाजित संपत्ति को पैतृक संपत्ति कहा जाता है. पोते को दादी-दादी की पैतृक संपत्ति विरासत में हासिल करने का जन्मसिद्ध अधिकार है, जबकि दादा-दादी की स्वयं अर्जित संपत्ति पर उसका कोई अधिकार नहीं

शून्यीकरणीय विवाह या विवाह से बाहर जन्मे बच्चे को वैध वारिस माना जाता है

यह कानून उन लोगों पर लागू नहीं होता जो विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत विवाह करते हैं, जब तक कि दोनों पति-पत्नी हिंदू, जैन, सिख या बौद्ध न हों. इन मामलों में उत्तराधिकार पर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 लागू होता है

मुस्लिमों के उत्तराधिकार कानून
मुस्लिम पर्सलन लॉ (शरीअत) ऐप्लिकेशन ऐक्ट,1937 के तहत मुस्लिम शख्स अपनी संपत्ति के केवल एक-तिहाई हिस्से की वसीयत कर सकता है, बशर्ते वारिसों की रजामंदी हासिल कर ली गई हो

बची जायदाद जीवनसाथी और बचे हुए वारिसों के हक में जाती है

कोई वारिस संपत्ति पर विरासत हासिल नहीं कर सकता अगर वह मृतक से विरासत में प्राप्त कर्जों को नहीं चुकाता 

महिला वारिस का हिस्सा पुरुष वारिस के हिस्से से आधा है

मुस्लिम महिला शौहर की संपत्ति के आठवें हिस्से की हकदार है बशर्ते उनके बच्चे हों, अन्यथा चौथाई हिस्सा मिलता है

मुस्लिम कानून शादी से बाहर जन्मे बच्चों को मान्यता नहीं देता

यह कानून विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत विवाहित लोगों पर लागू नहीं होता. इन केसों में विरासत पर भारतीय उत्तराधिकार कानून 1925 लागू होता है

ईसाइयों के उत्तराधिकार कानून
 उत्तराधिकार भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 से शासित होता है. पूरी संपत्ति या हिस्सा विरासत में दे सकते हैं.

बच्चों का हिस्सा बेटे और बेटियों में बराबर बांटा जाना चाहिए

ईसाई कानून विवाह से बाहर जन्मे बच्चों को मान्यता नहीं देता

ईसाई पत्नी पूर्व निर्धारित हिस्से की हकदार है. अगर मृतक बच्चे छोड़कर गया है, तो उसकी विधवा को जायदाद का एक तिहाई हिस्सा और शेष बच्चों को मिलता है. अगर वारिस बच्चों से इतर रिश्तेदार हैं, तो उसे आधी जायदाद मिलती है और बाकी मृतक के अन्य रिश्तेदारों को मिलती है. अगर बच्चे और अन्य रिश्तेदार दोनों ही नहीं हैं तो पत्नी को पूरी संपत्ति मिलती है

पारसियों के उत्तराधिकार कानून
उत्तराधिकार भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 से शासित होता है

पारसी शख्स पत्नी और बच्चों को छोड़कर मरता है, तो प्रत्येक बेटे और पत्नी का हिस्सा प्रत्येक बेटी के हिस्से से दोगुना होगा. अगर वह पत्नी नहीं केवल बच्चों को छोड़कर मरता है, तो हर बेटे का हिस्सा हर बेटी के हिस्से से दोगुना होगा

अगर पारसी महिला पति और बच्चों को छोड़कर मरती है, तो प्रत्येक बच्चे और पति को बराबर हिस्सा मिलता है

पुरुष बच्चों और पत्नी के अलावा एक या दोनों माता-पिता को छोड़कर मरता है, तो पिता को बेटे के हिस्से के आधे के बराबर हिस्सा मिलेगा और मां को बेटी के हिस्से के आधे के बराबर हिस्सा मिलेगा

औरत बच्चों और पति के साथ एक या दोनों माता-पिता को छोड़कर मरती है, तो एक या दोनों माता-पिता को हर बच्चे के हिस्से के आधे के बराबर हिस्सा मिलेगा

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